प्रतिरोध की सांस्कृतिक धाराओं का मिलन



7 फरवरी। पवना से लौटकर आरा पहुंचता हूं, तो झारखंड से साथी बलभद्र का फोन आता है। वे सूचना देते हैं कि आज एक 62 वर्षीय शाइर तैयब खान की गजलों और कविताओं की पुस्तिका ‘बात कहीं से भी शुरू की जा सकती है’ का लोकार्पण झरिया में हुआ, जिसे जसम और जलेस ने मिलकर प्रकाशित किया है। तैयब खान की जिंदगी अभावों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए गुजरी है। उन्होंने झरिया-धनबाद में पत्रकारिता भी की। घर-परिवार चलाने के लिए कभी उन्हें मजदूरी भी करनी पड़ी। उनकी कविताओं में गरीबी और अभाव के चित्र हैं। फाकाकशी के बीच मुलुर-मुलर ताकते बच्चे हैं। लेकिन शाइरी महज उनके व्यक्तिगत दुखों की दास्तान नहीं रह जाती, बल्कि उसमें हमारे समय की बहुत उस बड़ी आबादी का दुख-दर्द जाहिर होता है, जो सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 20 रुपये से कम आय पर गुजर-बसर करने को मजबूर है। तैयब खान वामपंथी हैं। धनबाद-झरिया में बेहद लोकप्रिय रहे हैं। आम आदमी के जीवन की पीड़ा, तकलीफ, उसकी ख्वाहिशें, संघर्ष और आसपास की राजनीतिक घटनाओं और सक्रियताओं को भी उन्होंने अपनी रचनाओं में दर्ज किया है।
बलभद्र बताते हैं कि धनबाद में वे लंबे समय तक साहित्यिक आयोजन कराते रहे। पहली बार उन पर कोई आयोजन हुआ है। उनके चाहने वालों की बड़ी कतार है। कथाकार नारायण सिंह उन पर हो रहे आयोजन के लिए ही दिल्ली से आए। झरिया, सिंदरी, बोकारो, धनबाद के अधिकांश महत्वपूर्ण साहित्यकार- मनमोहन पाठक, डाॅ. अली इमाम, डाॅ. हसन नजामी, बलभद्र, अनवर शमीम, अनिल अनलहातु, कृपाशंकर प्रसाद, सत्येंद्र, अशोक कुमार, लालदीप गोप, ग्यास अकमल, मार्टिन जाॅन आदि- आयोजन में मौजूद थे। युवा रचनाकारों की भी अच्छी मौजूदगी थी। आयोजन के लिए एक स्कूल का हाॅल मिला था, लेकिन उसे उसके कैंपस में किया गया।
बलभद्र ने एक दिलचस्प बात बताई कि श्रोताओं में टीका-फाना किये एक वृद्ध भी पहुंचे थे, उन्होंने दो टूक टिप्पणी करते हुए तैयब खान की कविताओं को ‘सच्ची कविता’ कहा। बलभद्र ने मुझसे उनकी कविता ‘तुम आओगे’ का जिक्र करते हुए कहा कि वे परिवर्तनकारी शक्तियों को संगठित होने की कामना करते है। उन्होंने बताया कि तैयब खान की कविताओं पर बातचीत करते हुए लोगों ने भाकपा-माले के जननेता महेद्र सिंह और रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की कविताओं की भी चर्चा की।
हमने भी पवना, भोजपुर के आयोजन में किसान-मजदूर-नौजवान श्रोताओं के बीच विद्रोही जी के अवधी गीत- 'जनि जनिहा मनइया जगीर मांगता’, कविता ‘गुलामी की अंतिम हदों तक लड़ेंगे’ और ‘नई दुनिया’ तथा गजल ‘दर्द को महसूस करना आपका बूता नहीं है’ का पाठ किया।
आयोजन के आरंभ में हमने कवि पंकज सिंह, उर्दू के अफसानानिगार इंतजार हुसैन, मार्क्सवादी विचारक प्रो. रणधीर सिंह, कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग के साथ-साथ रोहित वेमुला समेत सामाजिक-राजनीतिक उत्पीड़न और हिंसा के कारण जिंदगी खोने वाले तमाम लोगों को श्रद्धांजलि दी और दमनकारी व्यवस्था को बदलने का संकल्प लिया। सोशल मीडिया से पता चला कि दिल्ली के आयोजन में शीतल साठे ने रोहित वेमुला पर लिखा गया एक गीत गाया, जिसमें ब्राह्मणवाद का विरोध किया गया और मौजूदा लोकशाही पर सवाल उठाए गए। हमने भी रोहित वेमुला की याद में हिरावल के साथी संतोष झा द्वारा गाए गए गीत को लोगों को सुनाया। मुझे सूचना है कि हिरावल के साथी हैदराबाद में आंदोलनरत छात्रों के बीच अपने गीतों के साथ पहुंचने वाले हैं। वे उसी तरह प्रतिरोध की धाराओं के साथ अपनी एकजुटता जाहिर कर रहे हैं, जैसे कबीर कला मंच के कलाकारों की गिरफ्तारी और पुलिसिया दमन के खिलाफ विरोध के अभियान में उतरे थे और उनकी जुबान पर शीतल साठे का मशहूर गीत- ‘ऐ भगतसिंह तुम जिंदा हो’ था।



गरीब-मेहनतकशों ने लड़ाई के हर तरीके को अपनाते हुए अपनी राजनीतिक दावेदारी पेश करने की शुरुआत की। एक दिन पहले ही मैंने आइसा के प्रोग्राम में रोहित के प्रसंग में भोजपुर के ही शहीद क्रांतिकारी निर्मल को याद किया था, जिन्होंने लगभग 4 दशक पहले शिक्षण संस्था में मौजूद सामंती-वर्णवादी वर्चस्व को चुनौती दी थी। कवि सुनील चौधरी ने ‘नक्सलबाड़ी का सपना’ कविता के जरिए कहा- नक्सलबाड़ी के सपने/ आज भी जिंदा हैं/ मजदूरों-किसानों, छात्र-नौजवानों के संघर्षों में।’। जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने अपने भोजपुरी गीत के जरिए इसी बात को कहा- ‘जबसे आइल माले लेके लाल निसनवा, कि तहिये से ना, बढ़ल गरीबन के शानवा कि तहिये से ना।’ उन्होंने अपने गीत में भोजपुर आंदोलन के कई शहीदों को याद किया। संयोग यह हुआ कि सत्तर के दशक में भोजपुर में का. जगदीश मास्टर और उनके कई साथियों की शहादत के बाद का.रामनरेश राम के साथ मिलकर उस आंदोलन को आगे बढ़ाने वाले, उसके शिल्पकार भाकपा-माले पोलित ब्यूरो के सदस्य का. स्वदेश भट्टाचार्य भी आयोजन की सूचना पाकर पहुंच गए। उनकी मौजूदगी हमारे लिए फख्र की बात थी। माले नेता का. रघुवर पासवान, चंद्रमा प्रसाद आदि भी आयोजन में शामिल हुए।


कवियों ने अपनी भोजपुरी कविताओं और गीतों के जरिए सत्ता के दोहरे चरित्र पर करारा व्यंग्य किया। सुनील चौधरी ने कहा- ‘गांव के ग्लोबल बनाव ताडें/ धर्म के नाम पर लड़ाव ताड़े/ किसान करजा में डूब ताड़ें/ उ अडानी अंबानी के किसान बनाव ताड़े।’ राकेश दिवाकर ने व्यंग्य किया- ‘जनता से कहत बाड़ें सब्सीडी छोड़ द/ आ पूंजीपतियन के कहले बाड़े/ सउंसे देस कोड़ द’। निर्मोही ने भी सत्ताधारियों पर निशाना साधा- ‘रघुपति राघव राजा राम/ भर भर दे मेरा गोदाम/ भूखे मर जाए देश तमाम।’ सुुमन कुमार सिंह ने भी विकास और अच्छे दिन के शासकवर्गीय पाखंड पर प्रहार किया- ‘रोजी गायब, रोटी गायब/ पढ़ने जाती बेटी गायब/ झूल रहा फंदों पे अब तो/ देश हमारा होता गायब’। जितेंद्र कुमार ने अपने दोहों के जरिए आज की सच्चाइयों और विडंबनाओं को अभिव्यक्त किया- ‘धर्म के शिखर पर अनर्थ के पंडे/ मासूम चेहरे बेचते चौक पर अंडे/ हर चौक पर लहराते बाजार के झंडे/ तख्त पर नृत्य करते राजनीति के पंडे।’ जसम के राज्य अध्यक्ष सुरेश कांटक ने 'का ए बकुला', 'हाड़ा हव' और 'बकरी' कविताओं के जरिए शोषक वर्ग के चरित्र को उजागर किया तथा उनका प्रतिरोध करने का संदेश दिया। भोजपुरी की इन कविताओं को श्रोताओं ने काफी पसंद किया।


पूरा आयोजन बाजार में सड़क के किनारे हो रहा था। सड़क के आधे हिस्से में लोग थे, कुछ बैठे हुए और कुछ खड़े। बीच-बीच में एक तरफ से गाड़ियां भी गुजर रही थीं। उनके हाॅर्न या प्रचार वाहन के लाउडस्पीकरों से कभी-कभी व्यवधान भी हो रहा था, पर कवि-कलाकार और दर्शक-श्रोता जमे हुए थे।
‘है नहीं अलग संघर्षों से जीवन की सुंदरता’ युवानीति के कलाकारों द्वारा गाया हुआ यह गीत मानो इस आयोजन को भी सार्थकता प्रदान कर रहा था। स्वाधीनता सेनानी रमता जी जनवरी 2008 में शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे, पर अपने गीतों के जरिए वे अब भी हमारे बीच थे। युवानीति के कलाकारों की आवाज में उनका संदेश गूंज रहा था- ‘अइसन गांव बना दे जहवां अत्याचार ना रहे/ जहां सपनों में जालिम जमींदार ना रहे।’
गांव से लेकर पूरे देश को नए किस्म से रचने की समझ और उसमें यकीन ही तो हम सबको जोड़ता है- ‘हमनी देशवा के नया रचवइया हईं जा...हमनी देशवा के नइया के खेवइया हईं जा’। शाम हो रही थी, पर हम सुबह की उम्मीद से भरे हुए थे।
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए मैंने गोरख पांडेय के ‘वतन का गीत’ को गाया- ‘हमारे वतन की नई जिंदगी हो।’ बाद में सोशल मीडिया के जरिए पता चला कि ठीक उसी वक्त दिल्ली की शाम में सुबह की वह आवाज- शीतल साठे की आवाज गूंज रही थी- भगत सिंह तुम जिंदा हो, इंकलाब के नारों में...।

