Wednesday, February 10, 2016

एक तारीख : तीन आयोजन


प्रतिरोध की सांस्कृतिक धाराओं का मिलन

7 फरवरी। दिल्ली के प्रेस क्लब के कैंपस में कबीर कला मंच की शीतल साठे और उनकी साथियों के जनगीतों की प्रस्तुति की खबर सोशल मीडिया के जरिए मुझ तक पहुंची। अगर मैं दिल्ली होता, तो जरूर वहां मौजूद होता। 
7 फरवरी। जन संस्कृति मंच की ओर से भोजपुर, बिहार के एक ग्रामीण बाजार पवना में स्वाधीनता सेनानी जनकवि रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’, जनकवि गोरख पांडेय और छात्रों-नौजवानों के प्रिय कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की याद में आयोजित कविता पाठ और नुक्कड़ नाट्य प्रस्तुति में हमलोग थे। 
7 फरवरी। पवना से लौटकर आरा पहुंचता हूं, तो झारखंड से साथी बलभद्र का फोन आता है। वे सूचना देते हैं कि आज एक 62 वर्षीय शाइर तैयब खान की गजलों और कविताओं की पुस्तिका ‘बात कहीं से भी शुरू की जा सकती है’ का लोकार्पण झरिया में हुआ, जिसे जसम और जलेस ने मिलकर प्रकाशित किया है। तैयब खान की जिंदगी अभावों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए गुजरी है। उन्होंने झरिया-धनबाद में पत्रकारिता भी की। घर-परिवार चलाने के लिए कभी उन्हें मजदूरी भी करनी पड़ी। उनकी कविताओं में गरीबी और अभाव के चित्र हैं। फाकाकशी के बीच मुलुर-मुलर ताकते बच्चे हैं। लेकिन शाइरी महज उनके व्यक्तिगत दुखों की दास्तान नहीं रह जाती, बल्कि उसमें हमारे समय की बहुत उस बड़ी आबादी का दुख-दर्द जाहिर होता है, जो सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 20 रुपये से कम आय पर गुजर-बसर करने को मजबूर है। तैयब खान वामपंथी हैं। धनबाद-झरिया में बेहद लोकप्रिय रहे हैं। आम आदमी के जीवन की पीड़ा, तकलीफ, उसकी ख्वाहिशें, संघर्ष और आसपास की राजनीतिक घटनाओं और सक्रियताओं को भी उन्होंने अपनी रचनाओं में दर्ज किया है।
बलभद्र बताते हैं कि धनबाद में वे लंबे समय तक साहित्यिक आयोजन कराते रहे। पहली बार उन पर कोई आयोजन हुआ है। उनके चाहने वालों की बड़ी कतार है। कथाकार नारायण सिंह उन पर हो रहे आयोजन के लिए ही दिल्ली से आए। झरिया, सिंदरी, बोकारो, धनबाद के अधिकांश महत्वपूर्ण साहित्यकार- मनमोहन पाठक, डाॅ. अली इमाम, डाॅ. हसन नजामी, बलभद्र, अनवर शमीम, अनिल अनलहातु, कृपाशंकर प्रसाद, सत्येंद्र, अशोक कुमार, लालदीप गोप, ग्यास अकमल, मार्टिन जाॅन आदि- आयोजन में मौजूद थे। युवा रचनाकारों की भी अच्छी मौजूदगी थी। आयोजन के लिए एक स्कूल का हाॅल मिला था, लेकिन उसे उसके कैंपस में किया गया। 
बलभद्र ने एक दिलचस्प बात बताई कि श्रोताओं में टीका-फाना किये एक वृद्ध भी पहुंचे थे, उन्होंने दो टूक टिप्पणी करते हुए तैयब खान की कविताओं को ‘सच्ची कविता’ कहा। बलभद्र ने मुझसे उनकी कविता ‘तुम आओगे’ का जिक्र करते हुए कहा कि वे परिवर्तनकारी शक्तियों को संगठित होने की कामना करते है। उन्होंने  बताया कि तैयब खान की कविताओं पर बातचीत करते हुए लोगों ने भाकपा-माले के जननेता महेद्र सिंह और रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की कविताओं की भी चर्चा की। 
हमने भी पवना, भोजपुर के आयोजन में किसान-मजदूर-नौजवान श्रोताओं के बीच विद्रोही जी के अवधी गीत- 'जनि जनिहा मनइया जगीर मांगता’, कविता ‘गुलामी की अंतिम हदों तक लड़ेंगे’ और ‘नई दुनिया’ तथा गजल ‘दर्द को महसूस करना आपका बूता नहीं है’ का पाठ किया। 
आयोजन के आरंभ में हमने कवि पंकज सिंह, उर्दू के अफसानानिगार इंतजार हुसैन, मार्क्सवादी विचारक प्रो. रणधीर सिंह, कार्टूनिस्ट सुधीर तैलंग के साथ-साथ रोहित वेमुला समेत सामाजिक-राजनीतिक उत्पीड़न और हिंसा के कारण जिंदगी खोने वाले तमाम लोगों को श्रद्धांजलि दी और दमनकारी व्यवस्था को बदलने का संकल्प लिया। सोशल मीडिया से पता चला कि दिल्ली के आयोजन में शीतल साठे ने रोहित वेमुला पर लिखा गया एक गीत गाया, जिसमें ब्राह्मणवाद का विरोध किया गया और मौजूदा लोकशाही पर सवाल उठाए गए। हमने भी रोहित वेमुला की याद में हिरावल के साथी संतोष झा द्वारा गाए गए गीत को लोगों को सुनाया। मुझे सूचना है कि हिरावल के साथी हैदराबाद में आंदोलनरत छात्रों के बीच अपने गीतों के साथ पहुंचने वाले हैं। वे उसी तरह प्रतिरोध की धाराओं के साथ अपनी एकजुटता जाहिर कर रहे हैं, जैसे कबीर कला मंच के कलाकारों की गिरफ्तारी और पुलिसिया दमन के खिलाफ विरोध के अभियान में उतरे थे और उनकी जुबान पर शीतल साठे का मशहूर गीत- ‘ऐ भगतसिंह तुम जिंदा हो’ था। 
विद्रोही, रोहित वेमुला, रमता जी, गोरख पांडेय,- सारे नाम एक-दूसरे में घुल-मिल रहे हैं। एक दिन पहले स्मृति ईरानी और बंडारू दत्तात्रेय के इस्तीफे की मांग को लेकर किए गए आइसा के हड़ताल में एक छात्र नेता ने विद्रोही जी की कविता ‘नई खेती’ पढ़ी थी। पवना, भोजपुर के आयोजन की अध्यक्षता करते हुए जसम के राष्ट्रीय सहसचिव कवि जितेंद्र कुमार खेती-किसानी की तबाही, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य के सवाल उठाए। गरीब-दलित परिवार के रोहित और उनके साथियों को किस तरह धार्मिक और जातिवादी भेदभाव को बनाए रखने में जुटी ताकतों ने हाॅस्टल से निकाला और ठंढ की रात में उन्हें बाहर गुजारना पड़ा। और जब रोहित मर गए और पूरे देश में विरोध शुरू हुआ तो उनके बाकियों साथियों का निष्कासन वापस लिया गया, इसकी उन्होंने चर्चा की।  उन्होंने दिल्ली में निहत्थे छात्र-छात्राओं के प्रदर्शन पर केंद्र सरकार की अधीन पुलिस और गुंडों द्वारा किए गए हमलों की भर्त्सना की और कहा कि यह निर्णायक वक्त है, इस वक्त गरीबों, मजदूर-किसानों, दलित-वंचित समुदायों और छात्र-नौजवानों के आंदोलनों के साथ एकजुटता बेहद जरूरी है। इसी से समाज और देश मजबूत होगा। 
जसम की नाट्य-गीत इकाई ‘युवानीति’ के कलाकारों ने गोरख पांडेय के गीत ‘समय का पहिया’ के गायन से आयोजन की शुरुआत की थी। मनुष्य ने अपनी मेहनत और ताकत के बल पर समय के जिस पहिये को प्रगति की दिशा में आगे बढ़ाया, उसे पीछे धकेलने की कोशिशों के खिलाफ और बड़ी एकजुटता और बड़े अभियान हमें जरूरी लगते हैं, क्योंकि मनुष्य को गुलाम बनाने वाली ताकतें कई रूप में सक्रिय हैं। जनता अपनी बदहाली की जिम्मेवार शक्तियों से बेखबर होकर किसी न किसी ईश्वर खुदा को भरोसे बैठी रहे, इसका कारोबार भी गांव-गांव में चल रहा है। हम तक उन औरतों की आवाजें पहुंचती है, जो हिंदुओं के एक देवता को पिछले एक-डेढ़ दशक से जगाने के लिए गुहार लगा रही हैं, ताकि उनकी जिंदगी की मुश्किलों का हल हो जाए, उनकी आकांक्षाएं पूरी हो जाएं। कविता पाठ के संचालक अरविंद अनुराग ने अपनी मगही कविता में समाज और राजनीति की विडंबनाओं के व्यक्त करने के साथ-साथ ऐसी भक्ति पर भी कटाक्ष किया। निर्माेही ने गोरख पांडेय के गीत ‘गुलमिया अब हम नाहिं बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले’ को गाकर सुनाया।
भोजपुर वह धरती है जहां नक्सलबाड़ी की चिंगारी गिरी और फिर तेज लपट में तब्दील हो गई। जिस आंदोलन ने सच्चे मायने में जनवादी राज-समाज के सपनों को नया आवेग प्रदान किया। जहां सामंती-वर्णवादी सामाजिक ढांचे को बदल देने की जुझारू लड़ाई की शुरुआत हुई, जहां
गरीब-मेहनतकशों ने लड़ाई के हर तरीके को अपनाते हुए अपनी राजनीतिक दावेदारी पेश करने की शुरुआत की। एक दिन पहले ही मैंने आइसा के प्रोग्राम में रोहित के प्रसंग में भोजपुर के ही शहीद क्रांतिकारी निर्मल को याद किया था, जिन्होंने लगभग 4 दशक पहले शिक्षण संस्था में मौजूद सामंती-वर्णवादी वर्चस्व को चुनौती दी थी। कवि सुनील चौधरी ने ‘नक्सलबाड़ी का सपना’ कविता के जरिए कहा- नक्सलबाड़ी के सपने/ आज भी जिंदा हैं/ मजदूरों-किसानों, छात्र-नौजवानों के संघर्षों में।’। जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने अपने भोजपुरी गीत के जरिए इसी बात को कहा- ‘जबसे आइल माले लेके लाल निसनवा, कि तहिये से ना, बढ़ल गरीबन के शानवा कि तहिये से ना।’ उन्होंने अपने गीत में भोजपुर आंदोलन के कई शहीदों को याद किया। संयोग यह हुआ कि सत्तर के दशक में भोजपुर में का. जगदीश मास्टर  और उनके कई साथियों की शहादत के बाद का.रामनरेश राम के साथ मिलकर उस आंदोलन को आगे बढ़ाने वाले, उसके शिल्पकार भाकपा-माले पोलित ब्यूरो के सदस्य का. स्वदेश भट्टाचार्य भी आयोजन की सूचना पाकर पहुंच गए। उनकी मौजूदगी हमारे लिए फख्र की बात थी। माले नेता का. रघुवर पासवान, चंद्रमा प्रसाद आदि भी आयोजन में शामिल हुए। 




 कवियों ने अपनी भोजपुरी कविताओं और गीतों के जरिए सत्ता के दोहरे चरित्र पर करारा व्यंग्य किया। सुनील चौधरी ने कहा- ‘गांव के ग्लोबल बनाव ताडें/ धर्म के नाम पर लड़ाव ताड़े/ किसान करजा में डूब ताड़ें/ उ अडानी अंबानी के किसान बनाव ताड़े।’ राकेश दिवाकर ने व्यंग्य किया- ‘जनता से कहत बाड़ें सब्सीडी छोड़ द/ आ पूंजीपतियन के कहले बाड़े/ सउंसे देस कोड़ द’। निर्मोही ने भी सत्ताधारियों पर निशाना साधा- ‘रघुपति राघव राजा राम/ भर भर दे मेरा गोदाम/ भूखे मर जाए देश तमाम।’ सुुमन कुमार सिंह ने भी विकास और अच्छे दिन के शासकवर्गीय पाखंड पर प्रहार किया- ‘रोजी गायब, रोटी गायब/ पढ़ने जाती बेटी गायब/ झूल रहा फंदों पे अब तो/ देश हमारा होता गायब’। जितेंद्र कुमार ने अपने दोहों के जरिए आज की सच्चाइयों और विडंबनाओं को अभिव्यक्त किया- ‘धर्म के शिखर पर अनर्थ के पंडे/ मासूम चेहरे बेचते चौक पर अंडे/ हर चौक पर लहराते बाजार के झंडे/ तख्त पर नृत्य करते राजनीति के पंडे।’ जसम के राज्य अध्यक्ष सुरेश कांटक ने 'का ए बकुला', 'हाड़ा हव' और 'बकरी' कविताओं के जरिए शोषक वर्ग के चरित्र को उजागर किया तथा उनका प्रतिरोध करने का संदेश दिया। भोजपुरी की इन कविताओं को श्रोताओं ने काफी पसंद किया। 
युवानीति के कलाकार इस मौके पर एक मनोशारीरिक नाटक ‘तेतू’ के साथ पहुंचे थे। कुछ साथियों को यह हिचक थी कि एक ऐसा नाटक जिसमें संवाद नहीं है, पता नहीं उसे ग्रामीण दर्शक कितना पसंद करेंगे! लेकिन चिड़िया, उसके बच्चों और गिद्ध के जरिए शोषक और शोषितों के बीच के संघर्ष को दर्शाने वाले इस नाटक को दर्शकों ने खूब पसंद किया। जब गिद्ध को चिड़ियाएं घेर लेती हैं और उसका अंत करती हैं, तब दर्शकों की खुशी और तालियां देखने-सुनने लायक थीं। ‘युवानीति’ इस वक्त बिल्कुल नए लड़कों की टीम है। दर्शकों ने इन कलाकारों को आर्थिक सहयोग भी दिया।
पूरा आयोजन बाजार में सड़क के किनारे हो रहा था। सड़क के आधे हिस्से में लोग थे, कुछ बैठे हुए और कुछ खड़े। बीच-बीच में एक तरफ से गाड़ियां भी गुजर रही थीं। उनके हाॅर्न या  प्रचार वाहन के लाउडस्पीकरों से कभी-कभी व्यवधान भी हो रहा था, पर कवि-कलाकार और दर्शक-श्रोता जमे हुए थे। 
‘है नहीं अलग संघर्षों से जीवन की सुंदरता’ युवानीति के कलाकारों द्वारा गाया हुआ यह गीत मानो इस आयोजन को भी सार्थकता प्रदान कर रहा था। स्वाधीनता सेनानी रमता जी जनवरी 2008 में शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे, पर अपने गीतों के जरिए वे अब भी हमारे बीच थे। युवानीति के कलाकारों की आवाज में उनका संदेश गूंज रहा था- ‘अइसन गांव बना दे जहवां अत्याचार ना रहे/ जहां सपनों में जालिम जमींदार ना रहे।’
गांव से लेकर पूरे देश को नए किस्म से रचने की समझ और उसमें यकीन ही तो हम सबको जोड़ता है- ‘हमनी देशवा के नया रचवइया हईं जा...हमनी देशवा के नइया के खेवइया हईं जा’। शाम हो रही थी, पर हम सुबह की उम्मीद से भरे हुए थे। 
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए मैंने गोरख पांडेय के ‘वतन का गीत’ को गाया- ‘हमारे वतन की नई जिंदगी हो।’ बाद में सोशल मीडिया के जरिए पता चला कि ठीक उसी वक्त दिल्ली की शाम में सुबह की वह आवाज- शीतल साठे की आवाज गूंज रही थी- भगत सिंह तुम जिंदा हो, इंकलाब के नारों में...।
एक मित्र ने यह वाजिब सवाल उठाया है कि मुख्यधारा की मीडिया में शीतल साठे के कार्यक्रमों की खबर नहीं है। चलिए सोशल मीडिया और मित्रों के जरिए ही सही, हमें तो खबर है। सत्ताधारियों के ताकतवर सूचना माध्यमों के नजरअंदाज किए जाने के बावजूद प्रतिरोध के तार आपस में जुड़ेंगे ही जुड़ेंगे। भारतीय शासकवर्ग ने भगतसिंह को भी मारने की बहुत कोशिश की, लेकिन वे कहां सफल हो पाए! वे तो जिंदा हैं और हमें एकजुट कर रहे हैं। प्रेस क्लब से जेएनयू, जेएनयू से दूसरे विश्वविद्यालयों तक, महाराष्ट्र से दिल्ली, दिल्ली से बिहार, झारखंड तक विरोध, प्रतिवाद और प्रतिरोध का संस्कृतिकर्म जारी है। 

Tuesday, February 2, 2016

शहर में साहित्यकार : रामनिहाल गुंजन

वे हमेशा प्रगतिशील मूल्यों के साथ रहे हैं
डाॅ. पशुपतिनाथ सिंह (पूर्व विभागाध्यक्ष, अर्थशास्त्र, वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा )

रामनिहाल गुंजन अपने को बहुत प्रोजेक्ट नहीं करते।  हमेशा प्रगतिशील मूल्यों के साथ रहे हैं। उनकी विनम्रता का कोई जवाब नहीं। अपने मूल्यों से समझौता किए बगैर दूसरे के साथ कैसे संबंध बनाए रखा जाता है, यह गुंजन जी से सीखा जा सकता है। सत्तर के दशक से ही उन्हें गोष्ठियों वगैरह में देख रहा हूं। 
मैं जितना उन्हें जानता हूं, मुझे कोई अवगुण उनमें दिखाई नहीं पड़ा। वे एक पूर्ण मनुष्य हैं अपने मूल्यों को साथ। ऐसी शख्सियतें बहुत कम हैं समाज में। यहां जो लोग हैं साहित्य में, जिनसे मेरा परिचय है, अधिकांश के व्यवहार से मैं क्षुब्ध रहता हूं। आज के युग में मनुष्य और साहित्यकारों के स्तर पर जो दुर्गुण हैं, इस आदमी में हमने कोई भी वैसा दुर्गुण नहीं देखा। तिकड़म वगैरह की जो सामान्य प्रवृत्ति है, इसका उनमें बिल्कुल अभाव है।

आलोचना की कृतियां उनकी मेहनत का सुबूत हैं
सुधाकर उपाध्याय, शहर के जाने-माने साहित्यप्रेमी 

गुंजन जी को तबसे देख रहा हूं जब वे लेखक नहीं, सचेत पाठक थे। वे खूब मेहनत करते हैं। पढते तो सभी हैं, पर उसे संजोना एक दूसरी चीज हैं। गुंजन जी ने सिलसिलेवार ढंग से जो पढ़ा उसे अपने ढंग से संजोया भी। लिखके अपनी समझदारी विकसित की। और यह सब शांति के साथ दत्तचित्त होकर किया। गुंजन जो भी लिखते हैं, उसे पढ़ते हुए झलकेगा कि लिखने के लिए वे कई जगहों से गुजरे हैं। 74-76 की किसी पत्रिका में क्या छपा, सव्यसाची की पत्रिका में कौन सी चीज निकली, इस तरह की जानकारियां उनकी जुबान पर रहती है। 

गुंजन जी की पारिवारिक समस्याएं भी कम नहीं रहीं। उन्हें संघर्ष बहुत करना पड़ा। उस दौरान भी उन्होंने अपनी बौद्धिकता को बचाए रखा। विचलित नहीं हुए। वे उत्तेजित नहीं होते कभी। यह बहुत बड़ी बात है। स्वस्थ हैं। अभी भी बहुत पैदल चलते हैं। उनमें धैर्य बहुत है। उनकी पत्नी जब मरीं, तो हम लोगों को सूचना मिली। पत्नी के न रहने का दुख बर्दाश्त नहीं होता। लेकिन मिलने पर वे जरा भी विचलित नहीं दिखे। बिल्कुल स्थितप्रज्ञ की तरह नजर आए। निजी सुख-दुख की चर्चा वे नहीं करते। हर आदमी के साथ उन्हें अपना संबंध अच्छा रखने की कोशिश की। आलोचना की कृतियां उनकी मेहनत का सुबूत हैं। उनसे उनके अध्ययन की झलक मिलती है।

गुंजन जी हमेशा आत्मप्रचार से दूर रहे हैं
प्रो॰ रवींद्रनाथ राय, वरिष्ठ आलोचक 
गुंजन जी से मेरी मुलाकात आरा की साहित्यिक गोष्ठियों में हुई थी। करीब 1980 से ही मेरा संबंध रहा है। उनसे पहली बार मिला तो लगा कि मैं ऐसे आदमी से मिल रहा हूं, जिसमें आत्मीयता और सहजता है। पहली बार ही उन्होंने मुझे एक बड़े और सहज व्यक्ति के रूप में प्रभावित किया। वे मुझे बड़े ही निश्छल और निरहंकारी लगे।उनसे मिलकर लगता था, वर्षों पुराने किसी व्यक्ति से मिल रहा हूं। हालांकि उस वक्त भी गुजन जी एक आलोचक के रूप में विख्यात हो चुके थे, लेकिन उनके व्यक्तित्व में कहीं भी कोई लेखकीय आतंक नहीं दिखाई पड़ा। 

मैं उनके घर भी आता-जाता रहा हूं। वे एक सामान्य वित्तीय परिवार से आते हैं, लेकिन लोगों को चाय पिलाना और उनको लेखन के लिए प्रेरित करना उनकी खास खूबी रही है। मैं उन्हें जितने वर्षों से जानता हूं, उनके व्यक्तित्व में कभी कोई दुहरापन की स्थिति नहीं देखी। उन्होंने अपनी पुस्तकें भी मुझे पढ़ने को उपलब्ध कराईं। उन्होंने नागार्जुन, मुक्तिबोध, शमशेर, निराला, समकालीन कविता, राहुल सांकृत्यायन, ग्राम्शी, जार्ज थाॅमसन इत्यादि पर अपनी आलोचना केंद्रित की है। उनकी दृष्टि निश्चित रूप से मार्क्सवादी रही है, लेकिन वे गैर-मार्क्सवादियों के प्रति भी सम्मान का भाव रखते थे। मुझे याद है कि जब में रामेश्वरनाथ तिवारी विशेषांक का संपादन कर रहे थे और इनके द्वारा लिखे कवि-परिचय की पुस्तक पर मैं समीक्षा लिख रहा था और उस समीक्षा में कबीर के प्रति उनकी उपेक्षा भाव को रेखांकित कर रहा था, तो गुंजन जी ने कहा कि किसी साहित्यकार की मृत्यु के बाद उसकी कठोर आलोचना नहीं की जानी चाहिए। मुझे याद है कि मेरे जैसे कभी कभार लिखने वाले लोगों से भी उन्होंने यशपाल, रामवृक्ष बेनीपुरी, चंद्रभूषण तिवारी इत्यादि पर लिखवा ही लिया। 

गुंजन जी की आलोचना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे विषयवस्तु को गहराई से स्पष्ट करते हैं। अपने व्यक्तित्व के अनुरूप भी उनकी आलोचना भी सहज और स्पष्ट है। नागार्जुन और मुक्तिबोध को मैं रामनिहाल गुंजन, नंदकिशोर गुंजन, नंदकिशोर नवल और खगेंद्र ठाकुर को ही पढ़कर ही समझ सका। 

गुंजन जी की आलोचनात्मक पुस्तकें न केवल दृष्टि संपन्न हैं, बल्कि वे छात्रोपयोगी भी हैं। गुंजन जी हमेशा आत्मप्रचार से दूर रहे हैं। हमने साहित्य की दुनिया में तो कुछ भी सीखा उसमें चंद्रभूषण तिवारी, मधुकर सिंह और सर्वाधिक रूप से रामनिहाल गुंजन का भी योगदान है। समकालीन दौर में जब बहुत साहित्यकार आत्मप्रशंसा और पुरस्कारों के लिए दिग्भ्रमित होते दिखाई पड़ रहे हैं, इस बुरे वक्त में भी गुंजन की सादगी और सहजता से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। विचारों के प्रति प्रतिबद्धता और आत्मप्रचार से अलग रहकर साहित्य सेवा करना उनकी अलोचना पुस्तकें जिस विश्वदृष्टि को अभिव्यक्त करती रही हैं, उससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। इस अंधेरे समय में रामनिहाल गुंजन हमारे लिए जरूरी साहित्यकार हैं। ये मेरा सौभाग्य है कि मुझसे उनका आत्मीय संबंध है और वैचारिक दृष्टि से बिरादराना भी। वे मेरे लिए मेरे परिवार के व्यक्ति हैं, अभिभावक तुल्य। 


उनमें अद्भुत धैर्य और सहनशीलता है
अनंत कुमार सिंह, कथाकार और संपादक, जनपथ

जब मैं आरा आया और विभिन्न लोगों से परिचय हुआ। पहला आकर्षण तो मधुकर सिंह ही थे। लोगों से मिलने-जुलने और गोष्ठियों में आने जाने का सिलसिला शुरू हुआ। गुंजन जी उन साहित्यकारों में थे जिनकी कुछ अपवाद को छोड़कर बिला लागा तमाम संगठनों की गोष्ठियों में समय पर शिरकत होती थी। 
मैं उनके घर जाने लगा। उनका परिवार बड़ा है। वे नीचे वाले कमरे में बैठाते थे। बिना हंगामे के उनका अनवरत लेखन चलता रहा है। जो लोग लिखने से ज्यादा हल्ला करते हैं, उनसे अलग हैं ये। उनमें अद्भुत धैर्य और सहनशीलता है। उन्हें कभी आक्रोशित होते नहीं देखा। अभाव के बावजूद इस उम्र में भी संगठन और साहित्य को एक साथ देखना यह दुर्लभ काम है। 

वे विचारों को थोपते नहीं
सुनील सरीन, पूर्व सचिव, युवानीति
यह उन दिनों की बात है जब हम आलोचना का मतलब समझते थे- शिकायत करना या कमियां निकालना। स्कूली ज्ञान से हमें यही सीखने को मिला था कि आलोचनात्मक उत्तर लिखना कमियों को गिनाना है। बाद में युवानीति से जुड़ने के बाद हम इस शब्द के और भी आदी हो गए। हमारी सभी बैठकों में एक मुद्दा हुआ करता था- आलोचना-आत्मालोचना। इसमें हम अक्सर उन साथियों की खिंचाई कर दिया करते थे जो संस्था के नियमों-उसूलों की अनदेखी करते थे। उन्हें रूला देते थे और भविष्य में वे ऐसी गलती ना दुहराएं- यह पाठ पढ़ाया जाता था। 
युवानीति से जुड़ने के कुछ वर्षों बाद ही मैंने गुंजन जी के बारे में सुना कि वे मार्क्सवादी आलोचक हैं। वे हमारे बगल के मुहल्ले के हैं और पटना सचिवालय में नौकरी करते हैं। दादा (सुभाष सरकार) ने एक दो बार उनकी चर्चा की थी। सुभाष दादा उस दौर के नक्सलवादी थे जब यह आंदोलन भूमिगत था। हमारे मुहल्ले में रहते थे। मैं जब पहली बार रामनिहाल गुंजन जी से मिला था तो साथ में विजेंद्र अनिल थे। दोनों लोग काफी देर तक साहित्य और वैचारिक चर्चा में लगे रहे। मुझे बहुत ज्यादा रुचि तो थी नहीं उनकी बातों में पर यह समझ पाया कि आलोचक सिर्फ निंदा नहीं करते। वे विचार और कला की कसौटी पर परखते हुए रचनाओं को समृद्ध करने में रचनाकार की मदद करते हैं। विजेंद्र अनिल ने मेरा परिचय कराया कि ये युवानीति से जुड़े हैं और नवजनवादी सांस्कृतिक मोर्चा के गठन में सक्रिय हैं। विजेंद्र अनिल ने मुझे बताया कि गुंजन जी पास ढेरों मार्क्सवादी पत्र-पत्रिकाओं व किताबों का अम्बार है। साहित्य और विचारधारा पर गुंजन जी ने खूब लिखा है। मैंने बहस और उत्तरार्द्ध के कई अंक उन्हीं के यहां से पढ़े। उस दौर की सभी लघु पत्रिकाएं उनके यहां मिल जाती थीं।   
पढने का शौक था ही और पास के मुहल्ले का होने का फायदा उठाया मैंने। जब भी मौका मिला गुंजन जी के अनुभवों से सीखने की कोशिश की मैंने। वे रविवार को या छुट्टियों के दिन ही मिल पाते। उनकी व्यस्तताओं के बावजूद हम यही कोशिश करते कि हमारी साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का एक अहम हिस्सा बनें। उनके बिना हमारी गोष्ठियों अधूरी लगतीं। जब युवानीति रामकथा पर रंगमंचीय प्रस्तुति की योजना बना रही थी तब नरेंद्र कोहली के संबंधित उपन्यास हमें गुंजन जी के यहां से पढ़ने को मिले थे। जब अरविंद जी के साथ मिलकर हम लोग बनारसी प्रसाद भोजपुरी जी की स्मृति में सम्मान समारोह की योजनाएं बनाया करते थे तो गुंजन जी उसमें बढ़-चढ़ कर भूमिका निभाते थे। 

गुंजन जी अपनी धीमी धीमी आवाज़ में  किसी भी विषय को ऐसे समझा देते हैं जैसे हृदय से आपको सिखा रहे हैं। अपने ज्ञान के सागर का जरा भी दम्भ नहीं उनमें। वे हमारी आपकी बातें उतनी ही संजीदगी से सुनते भी हैं। उनकी यह कोशिश होती है कि आप वैचारिक दृष्टि से समर्थ बनें। वे विचारों को थोपते नहीं, उसमें बहते और बहाते हैं। उद्धरणों और टिप्पणियों से वे अपनी बाते बखूबी सजा कर कहते हैं। विचारों की परख होने के साथ ही भरपूर सम्वेदना है उनमें। इसमें कोई दो राय नहीं कि वे एक बेहद सम्वेदनशील आलोचक हैं।   
आरा है तो एक छोटा शहर, पर अपने आप में साहित्य-संस्कृति का एक विशाल संसार संजोए हुए है। गुंजन जी इस शहर की विरासत से भलिभांति जुड़े हैं। इस विरासत को दुनिया भर में पहुंचाने में और पूरी दुनिया के हालातों से अपने साथियों को जोड़ने में एक कड़ी की तरह हैं गुंजन जी। उम्र के इस पड़ाव पर भी वो अपने लोगों के बीच सदैव मौजूद रह्ते हैं। उनका स्नेह और मार्गदर्शन हम सबको मिलता रहे यही कामना है।

उनका निरंतर लेखन हम सबको बहुत प्रभावित करता है
ओमप्रकाश मिश्र, युवा कवि 

गुंजन की सबसे बड़ी बात है एक छोटे शहर में रहकर निरंतर लेखन करते रहना। छोटी से लेकर बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में वे दिखते हैं। बहुत लोग शुरू में तो दिखते हैं, पर उम्र बढ़ने के बाद उनका लेखन अवरुद्ध हो जाता है। इनके साथ वैसा नहीं है। जिस रचनाकार या जिस विषय पर लिखते हैं, उसकी ठीक से तैयारी करते हैं, तब उस विषय को प्रस्तुत करते हैं। 
गुंजन जी की स्मरण शक्ति अच्छी है। उन्हें पहले की चीजें याद रहती हैं। उनके संस्मरण जानकारीपूर्ण होते हैं। किस बैठक में कौन था, कौन सी कहानी किसने लिखी है, इसके बारे में कोई संदेह या भ्रम होने पर हमलोग उनसे ही पूछते हैं। उनका लेखन जनसरोकारों से जुड़ा हुआ है। उनके विचार और लेखन में कोई बड़ी खाई नहीं है, अंतर नहीं है। वैचारिक रूप में वे जैसे हैं लेखक के रूप में भी वैसे ही हैं। उनका निरंतर लेखन हम सबको बहुत प्रभावित करता है।