इंकलाबी शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की जयंती पर दो सत्रों में कार्यक्रम संपन्न
वेलेंटाइन के माहौल में कवियों ने प्रेम कविताओं का पाठ किया
"नफरत के दौर में प्रेम की बात करना बहुत बड़ी बात है। प्रगतिशील-जनवादी कवियों ने जीवन में प्रेम किया, पर अपनी कविताओं में प्रेम पर कम ध्यान दिया। परंतु फ़ैज़ इसके अपवाद हैं। उनकी विरासत हमारी साझी विरासत है, भाषायी और महादेशीय दोनों स्तरों पर।" 13 फ़रवरी 25 को महान इंकलाबी शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की 114वीं जयंती के अवसर पर जन संस्कृति मंच द्वारा नागरी प्रचारिणी पुस्तकालय, आरा के सभागार में दो सत्रों में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जलेस के राज्य अध्यक्ष कथाकार नीरज सिंह ने ये विचार व्यक्त किये।
नीरज सिंह ने फ़ैज़ की नज़्म 'फिलीस्तीनी बच्चे के लिए लोरी' का पाठ करते हुए कहा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दलित-उत्पीड़ित मानवता के प्रति इतना गहरा सरोकार रखने वाला उर्दू का ऐसा प्रासंगिक शायर दूसरा नहीं है। उन्होंने कहा कि 1911 कवि केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, नागार्जुन, गोपाल सिंह नेपाली का भी जन्म का वर्ष था। उन पर कई कार्यक्रम आयोजित हुए थे। फ़ैज़ को छोड़ नहीं दिया गया था। फ़ैज़ की भारत-पाकिस्तान में प्रगतिशील आंदोलन को संगठित करने में भूमिका थी। उन्होंने विभाजन को कभी दिल से कुबूल नहीं किया। पाकिस्तानी हुकूमत ने उन्हें दो बार 1951 और 1958 में जेल में डाला। लेकिन हुकूमत फ़ैज़ की आवाज को दबा नहीं पायी। उनकी मकबूलियत बढ़ती गयी। 1962 में वे प्रिंसिपल बने और 1984 में अपने निधन तक वाम-लोकतांत्रिक ताकतों के साथ निरंतर जुड़े रहे। वे पाकिस्तानी जनता के हुकूक के संघर्षों में शामिल रहे।
इस मौके पर सुरेश कांटक के कविता संग्रह 'आईना हूँ मैं' का विमोचन भी किया गया।
अध्यक्ष मंडल के दूसरे सदस्य जसम के राज्य अध्यक्ष और कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार ने फ़ैज़ को समग्रता में पढ़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि फैज भारत और पाकिस्तान दोनों की जनता के प्रिय शायर हैं। वे हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति की विरासत हैं और हमारे संघर्षों के साथी हैं। जितेंद्र कुमार ने कहा कि फ़ैज़ के साथ-साथ हमें पाब्लो नेरूदा, नाज़िम हिकमत, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, भगतसिंह को भी याद करना चाहिए।
अध्यक्ष मंडल के तीसरे सदस्य कवि अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने कहा कि फ़ैज़ भारत-पाकिस्तान विभाजन नहीं चाहते थे।
मुख्य वक्ता के बतौर युवा कवि और आलोचक सिद्धार्थ वल्लभ ने आज के वक्त को अधिनायकवादी-फासीवादी, तकनीकी-सामंती (टेक्नो फ्यूडल) समय के रूप में चिह्नित करते हुए कहा कि यह एक विकट दौर है जब पूंजी की संस्कृति ने घर-घर, गांव-गांव तक अपनी जड़ें जमा ली हैं। इसने साहित्य की दुनिया को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। बड़े-बड़े नामवर साहित्यकार अपने मूल्यों और आदर्शों को ठुकराकर उनसे पुरस्कृत और सम्मानित हो रहे हैं। ऐसे समय में फ़ैज़ बहुत प्रासंगिक लगते हैं; क्योंकि उनमें कभी कोई विचलन नहीं आया।
वल्लभ ने कहा कि 1920 से 30 तक का ज़माना सामाजिक तौर से कुछ अजब तरह की बेफ़िक्री,आसूदगी और अंग्रेजी के वर्चस्व का ज़माना था। उस दौर के शायरों में हसरत मोहानी, जोश, हफ़ीज़ जालंधरी और अख़्तर शीरानी की बादशाहत क़ायम थी। उसके बाद देश की सूरत बदलने लगी थी। यह वह दौर था जब यकायक बच्चों की हँसी बुझ गयी थी। किसान खेत खलिहान छोड़ शहरों में मज़दूरी करने पर विवश हो गए। शहर की शरीफ बहू बेटियां बाज़ार में आ बैठीं। कॉलेज के बड़े बड़े तीसमार ख़ाँ गलियों की ख़ाक फाँकने लगे। जब शिद्दत से महसूस किया जाने लगा कि अब सारे रास्ते बंद हो गए और अब यहाँ से कोई आवाज़ बुलंद नहीं होगी तभी 'नक़्शे फ़रियादी' का आगाज़ हुआ। उस किताब की पहली नज़्म 'बरबत-ए-दिल के तार टूट गए/ हैं ज़मीं-बोस राहतों के महल' ने अविभाजित भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल पर गहरा असर डाला। उन्होंने कहा कि फ़ैज़ अपनी नज़्म में कहते हैं - और भी दुख है ज़माने में मुहब्बत के सिवा। यहां वे 'ग़म' नहीं कहते। इस दुख का रिश्ता कबीर के दुख से जुड़ता है।
इसके पूर्व सुधीर सुमन ने कार्यक्रम का संचालन आरंभ करते हुए कहा कि फ़ैज़ इश्क़ और इंकलाब के शायर हैं। एक भूमिहीन किसान के घर में पैदा हुए फ़ैज़ साहब की जिंदगी का सफ़र, बेहद रोमांचक और संघर्षों से भरा हुआ है। एक ओर उनकी शायरी इश्क में मिलन और विरह की कोमल और मार्मिक अनुभूतियों से बुनी गयी है, वहीं दूसरी और तानाशाह सत्ताओं के प्रतिरोध के तेवर से भी युक्त है। वे सबके लिए आजादी, बराबरी और जनतंत्र के लिए ताउम्र लड़ते रहे। उन पर रूसी क्रांति और युवा सशस्त्र आंदोलनकारियों के संघर्षों और विमर्शों का गहरा असर था।
#इश्क धुनकी है दुखों को धुनने का।
कार्यक्रम का दूसरा सत्र प्रेम कविताओं के नाम था। काव्य पाठ की शुरुआत करते हुए संतोष श्रेयांश ने अपनी एक बिना शीर्षक की कविता में कहा- सर्द रात में/ हरी हरी दूब पर/ओस की बूंद की तरह / तुम आयी मेरी जिंदगी में।
सिद्धार्थ वल्लभ ने इश्क के बारे में कहा- जादूगर के मायाजाल की तरह नहीं होता है इश्क/ कि बना रहे कोई दृष्टिभ्रम । अपनी दूसरी कविता 'प्रेम बार बार पुकारता है' में उन्होंने कहा- इश्क धुनकी है/ दुखों को धुनने का।
ओम प्रकाश मिश्र ने अपनी कविता में ऐसी दुनिया का खाका खींचा, जिसमें सारी अच्छी चीजें होगी।
सुमन कुमार सिंह ने फैज की नज़्म 'रकीब से' और 'चीड़ा' शीर्षक अपनी कविता का पाठ किया। उन्होंने कहा -
जिन चिडियों ने पंख खोलकर
होड लगाई बाजों से
भरी धूप में फड़फड़ फड़की
चुज्जे पाले नाजों से
उस चिड़िया से मिलकर आया।
वरिष्ठ कवि जनार्दन मिश्रा ने राज़ खोला- मैने भी कभी किसी से प्रेम किया था। ममता दीप ने प्रेम के अहसास को कुछ यूं बयान किया- हर रिश्ते के इर्द-गिर्द वही छाया है।
रूपेंद्र मिश्र ने पुस्तकालय में मौजूद छात्रों और प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारियों में लगे लोगों को सीख देते हुए कहा कि असफलताओं से निराश होकर गलत कदम नहीं उठाना चाहिए। बकौल फैज- दिल नाउम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है/ लंबी है राम की शाम मगर शाम ही तो है। उन्होंने अपनी कविता में कहा कि लिखना ही उनके प्रेम का आधार है। राकेश कुमार ओझा ने सुनाया- मेरे जीवन की प्राण वायु / अद्भुत तेरा बलिदान प्रिय। कवि कथाकार सिद्धनाथ सागर की कविता में माँ के 'घट्टे पड़े हाथ' को लेकर संवेदना व्यक्त की गयी थी।
वरिष्ठ कवि रामयश अविकल ने अपनी भोजपुरी कविता में यह फ़िक जाहिर की कि- आपस में रहल ना सरोकार ए भाई/ के करता केहू पर उपकार ए भाई। विक्रांत ने अपनी कविता 'कईसन ई दौर आइल बा' में गांव के प्रेममय जीवन छोड़़कर समस्याओं से भरे शहर में आने की विडंबना को दिखाया। सुनील चौधरी ने मौजूदा लोकतंत्र में नेताओं के अवसरवादी और जन विरोधी-चरित्र पर सवाल उठाया।
अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने सुनाया- मैं पर्वतों-खाइयों को लांघकर तुम्हारे पास आयी। जितेंद्र कुमार ने सुनाया- तुम्हारी तकरीर में नमी नहीं है रहबर।
नीरज सिंह ने मां की स्मृति और वर्तमान दौर में बदलती पारिवारिक स्थितियों का बयान किया। उन्होंने कहा- अपने दर से पुरखों के घर आए बच्चे। सुधीर सुमन ने 'तुम्हारे साथ' नामक प्रेम कविता सुनायी और आख़िर में फ़ैज़ साहब की रचना- 'चलो फिर से मुस्कुराएं' को गाकर सुनाया। धन्यवाद ज्ञापन पत्रकार और रंगकर्मी शमशाद प्रेम ने किया।