Sunday, March 23, 2025

भावना कभी नहीं मरती -सुधीर सुमन

भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु के शहादत दिवस के अवसर पर










23 मार्च शहीद-ए-आजम भगतसिंह और उनके साथियों सुखदेव और राजगुरु की शहादत का दिन है। आज उनको शहीद हुए 94 साल हो गए। शहादत के वक्त भगतसिंह की उम्र मात्र 23 साल थी। उनकी शहादत के बाद उनकी याद में कवियों और शायरों ने बहुत सारी रचनाएं लिखीं। ऐसी रचनाओं का एक संकलन लगभग दो दशक पूर्व ‘फांसी लाहौर की’ नाम से प्रकाशित हुआ था, जिसमें एक शेर संकलित है, जो मौत के बावजूद भगतसिंह के ख्वाब के प्रभाव को जाहिर करता है। वह शेर इस प्रकार है-

मौत के आगोश में हूँ देर से सोया हुआ।

फिर भी ख्वाबे-नाज से भारत को चौंकाता हूँ मैं।।

प्रेमचंद की कहानी आहुति की नायिका रूपमणि के विचारों में भगतसिंह के विचारों की अनुगूंज सुनाई पड़ती है। वह कहती है- ‘जिन बुराइयों को दूर करने के लिए आज हम प्राणों को हथेली पर लिए हुए हैं, उन्हीं बुराइयों को क्या प्रजा इसलिए सिर चढ़ाएगी कि वे विदेशी नहीं, स्वदेशी हैं? कम-से-कम मेरे लिए तो स्वराज्य का यह अर्थ नहीं है कि जॉन की जगह गोविंद बैठ जाएं। मैं समाज की ऐसी व्यवस्था देखना चाहती हूं, जहां कम-से-कम विषमता को आश्रय मिले।’ आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने भगतसिंह पर अंग्रेज सरकार द्वारा चलाए गए मुकदमे पर एक कहानी लिखी थी। उग्र की कहानी ‘जल्लाद’ भी भगतसिंह जैसे क्रांतिकारी के जीवन पर केंद्रित है। कहने का मतलब यह है कि इन क्रांतिकारियों के संघर्ष, क्रांतिकारी स्वप्न और शहादत का लोकगीतों के साथ-साथ साहित्य की अन्य विधाओं पर गहरा असर पड़ा।


सुखदेव इंकलाब की राह में भगतसिंह के हमसफर थे। उनके हठ और जुनून के कई किस्से हैं। यशपाल के अनुसार वे भावनात्मक उत्तेजना से संचालित होते थे। हालांकि बोर्स्टल जेल में प्राप्त एक अधूरे पत्र से क्रांति, संगठन और रणनीति के संबंध में सुखदेव के सुव्यवस्थित वैचारिक नजरिए का पता चलता है। वे एक कुशल संगठनकर्ता थे। उन्हें एचएसआरए के पंजाब शाखा की जिम्मेवारी दी गयी थी। वे प्रत्यक्ष रूप से सांडर्स की हत्या में शामिल नहीं थे, पर क्रांतिकारी संगठनकर्ता होने के नाते ही उन्हें फाँसी की सजा दी गयी थी। ‘भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’ के संपादक जगमोहन सिंह और चमनलाल ने उनके बारे में लिखा है- “भगतसिंह और सुखदेव ने क्रांति-पथ के पड़ाव भी साथ ही तय किये और परस्पर विचार-विमर्श द्वारा वैचारिक स्पष्टता भी हासिल की। हर महत्त्वपूर्ण समस्या पर इन दोनों की बहस होती थी, उसी बहस से क्रांतिकारी दल के चिंतन का भी पता चलता है। भगतसिंह और सुखदेव एक-दूसरे के अंतरंग मित्र भी थे।’’ इसके बावजूद सुखदेव ने यह हठ किया कि असेंबली में बम फेंकने का काम भगतसिंह को ही करना होगा। प्रेम को लेकर जो भगतसिंह और सुखदेव के बीच जो बहस है, वह आज के दौर में बहुत प्रासंगिक है। भगतसिंह ने सुखदेव के नाम पत्र में लिखा है- ‘‘प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को उपर उठाता है। सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता। वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कब?...मनुष्य में प्यार की गहरी भावना होनी चाहिए, जिसे कि वह एक ही आदमी में सीमित न कर दे, बल्कि विश्वमय रखे।


राजगुरु चंद्रशेखर आजाद की तरह ही कुशल निशानेबाज थे। वीर, साहसी और मस्तमौला व्यक्ति थे। जेम्स स्कॉट के भ्रम में सांडर्स की हत्या उन्होंने ही की थी। सांडर्स की सगाई वायसराय के पीए की बेटी से हुई थी, इस कारण ब्रिटिश हुकूमत ज्यादा बौखला गयी थी और भगतसिंह, सुखदेव के साथ उन पर मुकदमा चलाया था और उन्हें भी फांसी की सजा सुनाई थी।

भगतसिंह के साथ चंद्रशेखर आजाद और बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारियों का नाम भी अभिन्न रूप से जुड़़ा हुआ है। चंद्रशेखर आजाद तो हिन्दुस्तानी रिपब्लिकन आर्मी- जिसका नाम बाद में हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन हो गया- के कमांडर-इन-चीफ ही थे, उन्हें वैचारिक रूप से समाजवादी बनाने में भगतसिंह की अहम भूमिका थी। संगठन में ‘सोशलिस्ट’ शब्द उन्हीं के कहने पर जुड़ा था। इनके साथ यशपाल, शिव वर्मा, मन्मथ नाथ, अजय घोष, जयदेव कपूर जैसे कई नौजवान स्वतंत्रता आंदोलन की क्रांतिकारी धारा से जुड़े हुए थे। पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की कहानी ‘उसकी मां’ जो गोर्की के उपन्यास ‘मां’ से प्रभावित है, उसमें भगतसिंह और उनके साथियों की ही छवि है। जब हम भगतसिंह की विचारधारा की बात करते हैं, तो दुर्गा भाभी के पति भगवतीचरण वोहरा को भूल नहीं सकते। भारत नौजवान सभा के क्रांतिकारी विचारों वाले पर्चे भगवतीचरण वोहरा और भगतसिंह ही लिखा करते थे। बाद में भारत नौजवान सभा का एचआरए में विलय हो गया था। हालांकि भगवतीचरण वोहरा बम का परीक्षण करते हुए दुर्घटना में शहीद हो गए, पर भगतसिंह ने क्रांतिकारी विचारों की मशाल को जलाए रखा। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेख और कोर्ट में दिए गए भाषण इसका साक्ष्य हैं कि राजनीतिक, सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक स्थितियों की इतनी गहरी समझ उस दौर के किसी दूसरे नेता में नहीं थी। भगतसिंह और उनके साथी कांग्रेस में ही शामिल थे, पर चौरीचौैरा कांड के बाद जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया, तो उनके भीतर क्रांति की दिशा और तरीके को लेकर सवाल खड़े होने लगे। वे सशस्त्र आंदोलन की राह पर बढ़े। हालांकि बहुत जल्दी उन्होंने जनांदोलन और विचारों के व्यापक प्रचार-प्रसार की जरूरत को समझ लिया।

भगतसिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश साम्राज्य का साहसपूर्वक मुकाबला किया। एचएसआरए की केंद्रीय कमेटी के निर्णयानुसार 8 अप्रैल, 1929 ई. को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम फेंका और योजना के अनुसार वहीं रुके रहे। बम फेंकने के बाद उन्होंने जो पर्चे फेंके, उसमें ऊपर ही कहा गया था कि ‘बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज़ की आवश्यकता होती है’। उन्होंने सुनियोजित योजना के तह गिरफ्तारी दी और उसके बाद भगतसिंह ने जेल को अपने विचारों के प्रचार का मंच बना दिया। उन्होंने जेल में भी वहाँ के अधिकारियों के अत्याचार का विरोध किया। हफ़्तों तक उन्होंने और उनके साथियों ने भूख हड़ताल भी की। जेल में भगतसिंह को बर्बर यातना दी गई लेकिन ब्रिटिश हुकुमत और उसका प्रशासन उनकी भावनाओं को कुचल नहीं सकी। यह दिलचस्प है कि भगतसिंह को फाँसी की सजा दिल्ली असेंबली बम केस में नहीं हुई। उसमें उनको और बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास का दंड मिला। फाँसी की सजा उन्हें लाहौर षड्यंत्र केस में सुनायी गयी। इन दोनों मुकदमों के दौरान भगतसिंह ने अपने क्रांतिकारी विचारों से लोगों को अवगत कराने की हरसंभव कोशिश की। असेंबली बम केस में जब दिल्ली के सेशन जज ने भगतसिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनायी तो उसके खिलाफ उन्होंने लाहौर हाई कोर्ट में अपील की। उन्होंने कानून, अपराध, न्याय और हुकूमत आदि के वर्ग-चरित्र पर गंभीर सवाल उठाये और क्रांतिकारियों के दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए कहा कि “इंकलाब जिंदाबाद से हमारा वह उद्देश्य नहीं था, जो आमतौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और यही चीज थी जिसे हम प्रकट करना चाहते थे। हमारे इंकलाब का अर्थ पूँजीवादी युद्धों का अंत करना है।’’

जेल के भीतर भगतसिंह की आंदोलनात्मक कार्रवाइयों तथा अदालत और अख़बार में दिये गये बयानों और अधिकारियों को भेजे गये उनके विचारोत्तेजक पत्रों ने देश- दुनिया में उनकी छवि एच.एस.आर.ए. के मुख्य सिद्धांतकार के रूप में बना दी। पूरे देश की जनता को ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ एकजुट करने में उन्हें सफलता हासिल हुई, जो उनका तात्कालिक उद्देश्य था। भगतसिंह की सफलता यह थी कि उन्होंने अपनी राजनीतिक योजना के अनुसार ब्रिटिश प्रशासन, न्यायपालिका, पत्रकारिता- सबका इस्तेमाल किया। उनका अनुमान था कि यदि उन्हें मृत्युदंड दिया गया तो यह ब्रिटिश हुकूमत के लिए और खतरनाक होगा। लेकिन शहादत की संभावना के बावजूद जीवन के अंतिम वर्षों में भी उन्होंने अध्ययन की आदत नहीं छोड़ी। 6 जून, 1929 ई. को बमकांड पर सेशन कोर्ट में दिये गये बयान में उन्होंने ‘देश के इतिहास, परिस्थितियों और अन्य मानवोचित आकांक्षाओं के मननशील विद्यार्थी’ होने का विनम्रतापूर्ण दावा किया था। जेल में जिन्हें उनसे मिलने आना होता था, उनको लिखी गयी चिटिठयों में वे हर बार किताबें लाने का आग्रह करते थे और उनकी सूची भेजते थे। ये किताबों प्रायः द्वारिका दास लाइब्रेरी लाहौर से मंगवायी जाती थीं। ये किताबें मुख्य रूप से मार्क्सवाद, अर्थशास्त्र, इतिहास और रचनात्मक साहित्य की होती थीं। फाँसी से ठीक पूर्व भी वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। कुछ विचारकों का मानना है कि भगतसिंह यदि जीवित होते, तो भारत के लेनिन या माओ होते।

भगतसिंह का पंजाबी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी चार भाषाओं पर अधिकार था। उनकी अंग्रेजी पहले बहुत अच्छी नहीं थी, पर महज एक साल में ही उन्होंने अंग्रेजी बोलने और लिखने की ऐसी क्षमता हासिल कर ली थी कि कोर्ट में दिये गये उनके बयानों की विद्वान आज भी तारीफ करते हैं। बटुकेश्वर दत्त से उन्होंने बांग्ला भी सीखा था। उन्होंने अपनी जेल नोटबुक में 106 लेखकों और 43 पुस्तकों से उद्धरण लिये हैं। इतिहासकार बिपनचंद्र ने लिखा है कि “भारत की जनता के लिए यह बहुत बड़ी त्रासदी है कि इस महान मस्तिष्क को उपनिवेशवादी ताकतों ने असमय ही सुला दिया।’’ हालाँकि उनकी शहादत ने देश में बगावत की आंधी पैदा कर दी।

भगतसिंह का महत्त्व इसलिए भी है कि जब आजादी का नारा ठीक से सूत्रबद्ध भी नहीं हुआ था, उस दौर में भगतसिंह ने पूर्ण आजादी की माँग की तथा इंकलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद का नारा दिया। इंकलाब अर्थात क्रांति के लक्ष्य को परिभाषित किया। ‘धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम’ नामक लेख में उन्होंने लिखा है- ‘‘...हमारी आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह पूर्ण स्वतंत्रता का नाम है- जब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आजाद हो जाएँगे।’’

स्वतंत्रता के तरीकों व दिशा को लेकर कांग्रेसी नेतृत्व से भगतसिंह की तीखी बहस रही, पर व्यापक जनजागरण आरंभ करने में गांधी जी के योगदान को उन्होंने बेहिचक स्वीकार किया। लेकिन भगतसिंह वैसे परिवर्तन को स्वतंत्रता मानने के पक्ष में नहीं थे कि जिससे लार्ड इरविन की जगह सर पुरुषोत्तम दास टंडन आ जाएँ। उनकी राजनीतिक दूरदृष्टि बता रही थी कि निकट भविष्य में ही ब्रिटिश हुकूमत से समझौता होगा, लेकिन वह पूर्ण आजादी नहीं होगी। भगतसिंह ने धर्म को राजनीति से अलग रखने पर जोर दिया था। 1928 ई. में प्रकाशित अपने बहुचर्चित लेख ‘सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ में अत्यंत चिंता के साथ उन्होंने नेताओं और मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाया था। उस लेख में वे परस्पर मेल बढ़ाने, भारत की साझी राष्ट्रीयता की चिंता करते हैं। साम्राज्यवाद और सांप्रदायिकता विरोध पर आधारित राष्ट्रीयता को मजबूत बनाने के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता कम नेताओं और विचारकों में नजर आती है। दरअसल भगतसिंह ने साम्राज्यवाद, संप्रदायवाद, सामंतवाद और वर्ण-व्यवस्था की अलोकतांत्रिक और गैरप्रगतिशील प्रवृत्तियों के खिलाफ एक नये जनतांत्रिक समाज और राष्ट्र के निर्माण का सपना देखा था।

उन्होंने ‘क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ में लिखा है- ‘‘क्रांति जनता के लिए होगी। कुछ स्पष्ट निर्देश यह होंगे- 1. सामंतवाद की समाप्ति 2. किसानों के कर्जें समाप्त करना 3. क्रांतिकारी राज्य की ओर से भूमि का राष्ट्रीयकरण ताकि सुधरी हुई व साझी खेती स्थापित की जा सके। 4. रहने के लिए आवास की गारंटी 5. किसानों से लिए जाने वाले सभी खर्च बंद करना. सिर्फ इकहरा भूमिकर लिया जाएगा। 6. कारखानों का राष्ट्रीयकरण और देश में कारखाने लगाना, 7. आम शिक्षा, 8. काम करने के घंटे जरूरत के अनुसार कम करना।”11 भगतसिंह एक क्रांतिकारी नेता तो थे ही, वे इतिहास के गंभीर अध्येता भी थे। वे एक क्रांतिकारी लेखक-पत्रकार भी थे। प्रख्यात पत्रकार शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’ में भी उन्होंने काम किया था। पंजाबी और हिन्दी की पत्रिकाओं में उनके लेख छपते थे। उन्होंने अपने पहले के शहीदों और क्रांतिकारियों पर लेखमाला भी लिखे। भगतसिंह ने पुस्तकों की समीक्षाएँ भी लिखीं। साहित्य, भाषा, संस्कृति, धर्म, विश्वास-अंधविश्वास, नास्तिकता, सांप्रदायिक दंगों, अखबारों की सांप्रदायिक नीति, अछूतों के प्रश्न, किसान-मजदूरों के जीवन की बुनियादी समस्याओं, गांधीवाद, अराजकतावाद, हिंसा-अहिंसा, युवक, छात्र राजनीति, न्याय और कानून व्यवस्था आदि विभिन्न विषयों पर उन्होंने लेख लिखे। अदालत में दिये गये बयानों में भी उन्होंने सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था को लेकर गंभीर विचारोत्तेजक प्रश्न उठाये, जो अब इतिहास की विरासत हैं और आज भी उन विचारों की प्रासंगिकता बनी हुई है।

क्रांतिकारी शिव वर्मा ने जेल में हुई भगतसिंह और राजगुरु से आखिरी मुलाकात का जिक्र करते हुए लिखा है कि वे ब्रिटिश हुकूमत के बारे में कह रहे थे कि ‘‘ वे सोचते हैं कि मेरे पार्थिव शरीर को नष्ट करके वे इस देश में सुरक्षित रह जाएँगे। यह उनकी भूल है। वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन मेरी भावनाओं को नहीं कुचल सकेंगे। ब्रिटिश हुकूमत के सिर पर मेरे विचार उस समय तक एक अभिशाप की तरह मंडराते रहेंगे जब तक वे यहाँ से भागने के लिए मजबूर न हो जाएँ।’’ शिव वर्मा ने उस पल को याद करते हुए लिखा है कि हम लोग भूल गये कि जो आदमी हमारे सामने बैठा है वह हमारा सहयोगी है। वे बोलते जा रहे थे- ‘‘लेकिन यह तसवीर का सिर्फ एक पहलू है। दूसरा पहलू भी उतना ही उज्ज्वल है। ब्रिटिश हुकूमत के लिए मरा हुआ भगतसिंह जीवित भगतसिंह से ज्यादा खतरनाक होगा। मुझे फाँसी हो जाने के बाद मेरे क्रांतिकारी विचारों की सुगंध हमारे इस मनोहर देश के वातावरण में व्याप्त हो जाएगी। वह नौजवानों को मदहोश करेगी और वे आजादी और क्रांति के लिए पागल हो उठेंगे। नौजवानों का यह पागलपन ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को विनाश के कगार पर पहुँचा देगा। यह मेरा दृढ़ विश्वास है। मैं बेसब्री के साथ उस दिन का इंतजार कर रहा हूँ जब मुझे देश के लिए मेरी सेवाओं और जनता के लिए मेरे प्रेम का सर्वाेच्च पुरस्कार मिलेगा।’’

शिव वर्मा का मानना था कि “भगतसिंह की भविष्यवाणी एक साल के अंदर ही सच साबित हुई। उनका नाम मौत को चुनौती देनेवाले साहस, बलिदान, देशभक्ति और संकल्पशीलता का प्रतीक बन गया। ...विद्रोह की भावना ने पूरे राष्ट्र को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। भगतसिंह ने ठीक ही तो कहा था, ‘‘भावना कभी नहीं मरती।’’

भगतसिंह अपने आप में क्रांतिकारी विचारों के प्रतीक हैं। ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ लेख में उन्होंने लिखा है- ‘‘प्रत्येक मनुष्य जो विकास के लिए खड़ा है, उसे रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना तथा उन पर अविश्वास करना होगा और उनको चुनौती देनी होगी। प्रत्येक प्रचलित मत की हर बात को हर कोने से तर्क की कसौटी पर कसना होगा। ...निरा विश्वास और अंधविश्वास खतरनाक है। यह मस्तिष्क को मूढ़ तथा मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है।’’

भगतसिंह के विचारों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। वे हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान, युवाओं की क्रांतिकारी परिवर्तनकारी शक्ति, स्वतंत्रता की भावना और वास्तविक जनतांत्रिक आकांक्षाओं के आज भी वैचारिक प्रतिनिधि बने हुए हैं।

Sunday, February 23, 2025

नफरत के दौर में प्रेम की बात करना बहुत बड़ी बात : नीरज सिंह (फ़ैज़ जयंती)


इंकलाबी शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की जयंती पर दो सत्रों में कार्यक्रम संपन्न
वेलेंटाइन के माहौल में कवियों ने प्रेम कविताओं का पाठ किया


"नफरत के दौर में प्रेम की बात करना बहुत बड़ी बात है। प्रगतिशील-जनवादी कवियों ने जीवन में प्रेम किया, पर अपनी कविताओं में प्रेम पर कम ध्यान दिया। परंतु फ़ैज़  इसके अपवाद हैं। उनकी विरासत हमारी साझी विरासत है, भाषायी और महादेशीय दोनों स्तरों पर।" 13 फ़रवरी 25 को महान इंकलाबी शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़  की 114वीं जयंती के अवसर पर जन संस्कृति मंच द्वारा नागरी प्रचारिणी पुस्तकालय, आरा के सभागार में दो सत्रों में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जलेस के राज्य अध्यक्ष कथाकार नीरज सिंह ने ये विचार व्यक्त किये।


नीरज सिंह ने फ़ैज़ की नज़्म 'फिलीस्तीनी बच्चे के लिए लोरी' का पाठ करते हुए कहा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दलित-उत्पीड़ित मानवता के प्रति इतना गहरा सरोकार रखने वाला उर्दू का ऐसा प्रासंगिक शायर दूसरा नहीं है। उन्होंने कहा कि 1911 कवि केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, नागार्जुन, गोपाल सिंह नेपाली का भी जन्म का वर्ष था। उन पर कई कार्यक्रम आयोजित हुए थे। फ़ैज़ को छोड़ नहीं दिया गया था। फ़ैज़ की भारत-पाकिस्तान में प्रगतिशील आंदोलन को संगठित करने में भूमिका थी। उन्होंने विभाजन को कभी दिल से कुबूल नहीं किया। पाकिस्तानी हुकूमत ने उन्हें दो बार 1951 और 1958 में जेल में डाला। लेकिन हुकूमत फ़ैज़ की आवाज को दबा नहीं पायी। उनकी मकबूलियत बढ़ती गयी। 1962 में वे प्रिंसिपल बने और 1984 में अपने निधन तक वाम-लोकतांत्रिक ताकतों के साथ निरंतर जुड़े रहे। वे पाकिस्तानी जनता के हुकूक के संघर्षों में शामिल रहे।


इस मौके पर सुरेश कांटक के कविता संग्रह 'आईना हूँ मैं' का विमोचन भी‌ किया गया।


अध्यक्ष मंडल के दूसरे सदस्य जसम के राज्य अध्यक्ष और कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार ने फ़ैज़ को समग्रता में पढ़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि फैज भारत और पाकिस्तान दोनों की जनता के प्रिय शायर हैं। वे हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति की विरासत हैं और हमारे संघर्षों के साथी हैं। जितेंद्र कुमार ने कहा कि फ़ैज़ के साथ-साथ हमें पाब्लो नेरूदा, नाज़िम हिकमत, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, भगतसिंह को भी याद करना चाहिए।
अध्यक्ष मंडल के तीसरे सदस्य कवि अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने कहा कि फ़ैज़ भारत-पाकिस्तान विभाजन नहीं चाहते थे।
मुख्य वक्ता के बतौर युवा कवि और आलोचक सिद्धार्थ वल्लभ ने आज के वक्त को अधिनायकवादी-फासीवादी, तकनीकी-सामंती (टेक्नो फ्यूडल) समय  के रूप में चिह्नित करते हुए कहा कि यह एक विकट दौर है जब पूंजी की संस्कृति ने घर-घर, गांव-गांव तक अपनी जड़ें जमा ली हैं। इसने साहित्य की दुनिया को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। बड़े-बड़े नामवर साहित्यकार अपने मूल्यों और आदर्शों को ठुकराकर उनसे पुरस्कृत और सम्मानित हो रहे हैं। ऐसे समय में फ़ैज़ बहुत प्रासंगिक लगते हैं; क्योंकि उनमें कभी कोई विचलन नहीं आया।
वल्लभ ने कहा कि 1920 से 30 तक का ज़माना सामाजिक तौर से कुछ अजब तरह की बेफ़िक्री,आसूदगी और अंग्रेजी के वर्चस्व का ज़माना था। उस दौर के शायरों में हसरत मोहानी, जोश, हफ़ीज़ जालंधरी और अख़्तर शीरानी की बादशाहत क़ायम थी। उसके बाद देश की सूरत बदलने लगी थी। यह वह दौर था जब यकायक बच्चों की हँसी बुझ गयी थी। किसान खेत खलिहान छोड़ शहरों में मज़दूरी करने पर विवश हो गए। शहर की शरीफ बहू बेटियां बाज़ार में आ बैठीं। कॉलेज के बड़े बड़े तीसमार ख़ाँ गलियों की ख़ाक फाँकने लगे। जब शिद्दत से महसूस किया जाने लगा कि अब सारे रास्ते बंद हो गए और अब यहाँ से कोई आवाज़ बुलंद नहीं होगी तभी 'नक़्शे फ़रियादी' का आगाज़ हुआ। उस किताब की पहली नज़्म 'बरबत-ए-दिल के तार टूट गए/ हैं ज़मीं-बोस राहतों के महल' ने अविभाजित भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल पर गहरा असर डाला। उन्होंने कहा कि फ़ैज़ अपनी नज़्म में कहते हैं - और भी दुख है ज़माने में मुहब्बत के सिवा। यहां वे 'ग़म' नहीं कहते। इस दुख का रिश्ता कबीर के दुख से जुड़ता है।



इसके पूर्व सुधीर सुमन ने कार्यक्रम का संचालन आरंभ करते हुए कहा कि फ़ैज़ इश्क़ और इंकलाब के शायर हैं। एक भूमिहीन किसान के घर में पैदा हुए फ़ैज़ साहब की जिंद‌गी का सफ़र, बेहद रोमांचक और संघर्षों से भरा हुआ है। एक ओर उनकी शायरी इश्क में मिलन और विरह की कोमल और मार्मिक अनुभूतियों से बुनी गयी है, वहीं दूसरी और तानाशाह सत्ताओं के प्रतिरोध के तेवर से भी युक्त है। वे सबके लिए आजादी, बराबरी और जनतंत्र के लिए ताउम्र लड़ते रहे। उन पर रूसी क्रांति और युवा सशस्त्र आंदोलनकारियों के संघर्षों और विमर्शों का गहरा असर था।


#इश्क धुनकी है दुखों को धुनने का।


कार्यक्रम का दूसरा सत्र प्रेम कविताओं के नाम था। काव्य पाठ की शुरु‌आत करते हुए संतोष श्रेयांश ने अपनी एक बिना शीर्षक की कविता में कहा- सर्द रात में/ हरी हरी दूब पर/ओस की बूंद की तरह / तुम आयी मेरी जिंद‌गी में।
सिद्धार्थ वल्लभ ने इश्क के बारे में कहा- जादूगर के मायाजाल की तरह नहीं होता है इश्क/ कि बना रहे कोई दृष्टिभ्रम । अपनी दूसरी कविता 'प्रेम बार बार पुकारता है' में उन्होंने कहा- इश्क धुनकी है/ दुखों को धुनने का।
ओम प्रकाश मिश्र ने अपनी कविता में ऐसी दुनिया का खाका खींचा, जिसमें सारी अच्छी चीजें होगी।
सुमन कुमार सिंह ने फैज की नज़्म 'रकीब से' और 'चीड़ा' शीर्षक अपनी कविता का पाठ किया। उन्होंने कहा -
जिन चिडियों ने पंख खोलकर
होड लगाई बाजों से
भरी धूप में फड़फड़ फड़की
चुज्जे पाले नाजों से
उस चिड़िया से मिलकर आया।
वरिष्ठ कवि जनार्दन मिश्रा ने राज़ खोला- मैने भी कभी किसी से प्रेम किया था। ममता दीप ने प्रेम के अहसास को कुछ यूं बयान किया- हर रिश्ते के इर्द-गिर्द वही छाया है।
रूपेंद्र मिश्र ने पुस्तकालय में मौजूद छात्रों और प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारियों में लगे लोगों को सीख देते हुए कहा कि असफलताओं से निराश होकर गलत कदम नहीं उठाना चाहिए। बकौल फैज- दिल नाउम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है/ लंबी है राम की शाम मगर शाम ही तो है। उन्होंने अपनी कविता में कहा कि लिखना ही उनके प्रेम का आधार है। राकेश कुमार ओझा ने सुनाया- मेरे जीवन की प्राण वायु / अद्भुत तेरा बलिदान प्रिय। कवि कथाकार सिद्धनाथ सागर की कविता में माँ के 'घट्टे पड़े हाथ' को लेकर संवेदना व्यक्त की गयी थी।
वरिष्ठ कवि रामयश अविकल ने अपनी भोजपुरी कविता में यह फ़िक जाहिर की कि- आपस में रहल ना सरोकार ए भाई/ के करता केहू पर उपकार ए भाई। विक्रांत ने अपनी कविता 'कईसन ई दौर आइल बा' में गांव के प्रेममय जीवन छोड़़कर समस्याओं से भरे शहर में आने की विडंबना को दिखाया। सुनील चौधरी ने मौजूदा लोकतंत्र में नेताओं के अवसरवादी और जन विरोधी-चरित्र पर सवाल उठाया।
अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने सुनाया- मैं पर्वतों-खाइयों को लांघकर तुम्हारे पास आयी। जितेंद्र कुमार ने सुनाया- तुम्हारी तकरीर में नमी नहीं है रहबर।

नीरज सिंह ने मां की स्मृति और वर्तमान दौर में बदलती पारिवारिक स्थितियों का बयान किया। उन्होंने कहा- अपने दर से पुरखों के घर आए बच्चे। सुधीर सुमन ने 'तुम्हारे साथ' नामक प्रेम कविता सुनायी और आख़िर में फ़ैज़ साहब की रचना- 'चलो फिर से मुस्कुराएं' को गाकर सुनाया। धन्यवाद ज्ञापन पत्रकार और रंगकर्मी शमशाद प्रेम ने किया।