(हूल दिवस और बाबा नागार्जुन की जयंती पर प्रस्तुत है कवि, कहानीकार, आलोचक और कथांतर पत्रिका के संपादक राणा प्रताप का एक लेख)
आॅक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुुसार आदिवासी की परिभाषा है, ‘एक पारंपरिक समाज में एक सामाजिक विभाजन- एक ऐसा समाज जो कि सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक या रक्त-संबंधों से जुड़ा हो और जिसकी अपनी परंपरा और बोली हो, और आम तौर पर उसका एक नायक हो।’’
भारत में साढ़े सात फीसदी लोगों को आदिवासी की श्रेणी में रखा गया है। यह संख्या अन्य देशों के बनिस्पत कहीं ज्यादा है। भारत में सबसे अधिक आदिवासी जनसंख्या मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, उत्तर पूर्वी राज्य (अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड) और सिक्किम में पाई जाती है।
आमेजन वर्षा वन में आज भी कई ऐसी आदिवासी प्रजातियां हैं जो कि विश्व के अन्य लोगों से नहीं मिली हैं।
इन लोगों से सीखने के लिए काफी कुछ है जो कि प्रकृति के इतने करीब रहते हैं और वे अक्सर प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर ही चलते हैं। जल, जंगल और जमीन के सिवा इनके पास और कुछ भी नहीं है। मगर इनके प्रति विश्व भर की उदासीनता हैरत में डालती है। इन्हें असभ्य, कामुक और न जाने क्या-क्या कहा जाता है। मगर इस बात को हमेशा भुला दिया जाता है कि इनके पास भी अपनी भाषा है, कला-साहित्य और संस्कृति है। लेकिन उन्हें सभ्य बनाने के दुश्चक्र में उन पर निरंतर हमले हो रहे हैं। निश्चय ही इसे मानवीय कतई नहीं कहा जा सकता।
शायद, इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मनाया जाता है। आदिवासी लोगों द्वारा सामना किए जाने वाले खतरों को ध्यान में रखकर यूूनेस्को ने यह कदम उठाया और वर्ष 1993 में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस घोषित किया। मगर यह सोचने की बात है कि यह घोषणा महज औपचारिक घोषणा भर बनकर तो नहीं रह गई है?
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित उपन्यासकार मारियो वार्गास ल्योसा ने एक उपन्यास लिखा है- स्टोरी टेलर। इस उपन्यास के जरिए उन्होंने आदिवासियों को लेकर इतने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं कि उन पर बातचीत करना- पूरी दुनिया में- आज भी ज्वलंत मुद्दे की तरह है। यहां उपन्यासकार के लिए कथा-सर्जन करना उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि एक ही दुनिया में रहते हुए प्रकृति और मानव के मानवीय रिश्ते को समझने और सहअस्तित्व बनाए रखने के बजाय उसे खत्म करने और उसे मिटा देने की हवस का सवाल?
शंपा शाह ने सच ही लिखा है, ‘‘भारत में 460 जनजातियां हैं जो दूर-दराज के जंगलों, पहाड़ों में छोटे-छोटे समूहों में रहती हैं। यह तथ्य है कि वे ही जंगल बचे हुए हैं जहां आदिवासी समाज पीढ़ियों से रहता आया है। किंतु विडंबना देखिए कि अब सरकारें उन्हें जंगल तथा अन्य जीवों को बचाने के नाम पर ही खदेड़ रही है। आदिवासियों के इस पृथ्वी पर अपनी तरह से रहने के अधिकार तथा उनकी धर्म, न्याय, समाज-संबंधी मान्यताओं को समझने की कोशिश हमारे यहां नहीं के बराबर हुई है तथा समाज का बड़ा हिस्सा इससे पूूरी तरह से अनजान या उदासीन है।
मगर हमारे जनकवि नागार्जुन उदासीन नहीं हैं। प्रकृति-पुत्रों की उन्हें पूरी खबर है। 1953 की उनकी एक कविता है, ‘तन है सांवला-सलोना’। प्रकृति-पुत्र का बहुत ही सटीक, सजीव चित्र उन्होंने खींचा है-
गोल-मटोल चेहरा
बादामी आंखें
तन है सांवला-सलोना।
नाचता है, गाता है
हंसता-हंसाता है
जानता हो शायद ही खीझना-रोना।
साथिन है बांसुरी
मौज है मादल
नदी बहना, जननी जंगल
रग-रग में प्रवाहित खनिज धातु
होंठों से झरते हैं मोती
श्रम-जल से ढलता है सोना।
प्रकृति-पुत्र की यह तस्वीर नागार्जुन ने अपनी कलम से खींची है। गोल-मटोल चेहरा, बादामी आंखें और तन है सांवला-सलोना! प्रेम और निश्च्छलता की यह तस्वीर आपको लुभाती है, अपनी ओर बरबस आकर्षित करती है। इस भोले-भाले मनुष्य के लिए कवि की दिली इच्छा है-
सौ-सौ फन वाले नाग पर
रत्नाकर होगा घर
अबके इस विष्णु को
लोक लक्ष्मी का दूल्हा है होना।
कवि की यह अभिलाषा फलीभूत नहीं होती, बल्कि उसका जीवन रोज ब रोज कठिन से कठिनतर होता जाता है। कवि सजग है। उसकी उन्हें परवाह है। खोजते फिरते हैं वे। इस बार उन्हें मिलता है रविशंकर विश्वविद्यालय का एम.ए.। लगभग दीन-हीन अवस्था में। मिलने पर खुल नहीं पाता। कवि को चिंता है-
काश! झोपड़ियों वाली इसकी बस्ती तक
पहुँच पाते अपन
रातों वाली अड्डेबाजी में साथ देते इसका
साखू के पत्तों वाले दोनों में साथ-साथ पीते सभी
चखते भुना हुआ गोश्त सुअर का साथ-साथ
फिर शायद खुलकर बातें करता यह हमसे।
कवि को दुख है कि इस बात की, कि वह मिला भी तो उससे खुलकर बातें नहीं हो सकीं। सिर्फ अठन्नी लेकर वह चंपत हो गया। हलबी और हिंदी का दुभाषिया बताता है-
दस-पंद्रह वर्ष पहले यह दिल्ली गया था
आदिवासी लोकनृत्य वाली अपनी पार्टी के साथ
मैंने जानना चाहा-
पूछो, उन दिनों का कौन था दिल्ली का राजा?
नचाकर हथेलियां
अबूझ-सी पहेलियों में गुम हो गया बेचारा शबरपुत्र
क्या कहे! क्या न कहे!
नाम ले कौन-सा!
कौन-सा नाम न ले!
यह कविता 1973 में प्रकाशित है। पाठक सहज ही अनुमान लगा सकता है कि उस समय देश का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति कौन रहा होगा। कवि इशारे-इशारे में बता देता है कि उस समय एक एम.ए. पास आदिवासी नौजवान की क्या हालत थी। कवि अपनी सोच में उलझता-सुलझता रहा कि अचानक वह लोकनर्तक अलक्षित हो गया। संभव है, दिल्ली जाने पर उसकी मुलाकात राष्ट्रपति महोदय से भी हुई हो। हो सकता है, तब उन्होंने उसकी पीठ थपथपाई हो और शाबासी भी दी हो। लेकिन आज उसकी कोई खोज-खबर लेने वाला तक नहीं।
देखते रह गए शालवनों की उस पगडंडी की ओर
कम से कम दस मिनट देखते रहे
लेकिन वह तो अब अलक्षित हो चुका था
जा चुका था गहरे निबिड़ अरण्य की अतल-
झील के अंदर।
ध्यान दीजिए जरा इस पंक्ति पर, ‘जा चुका था वह गहरे निबिड़ अरण्य की अतल झील के अंदर।’ झील में कोई बहाव नहीं होता, कोई धारा नहीं होती, गतिशीलता नहीं होती। आदमी देर तक झील में तैर भी नहीं सकता यानी कि उसका डूबना निश्चित है। तो यह है पढ़े-लिखे आदिवासी जीवन की विडंबना। जो अनपढ़ हैं, अशिक्षित हैं, उनकी जीवन लीला तो ऐसे ही किसी अदृश्य डोर से बंधी होती है।
माचीग्वेंगाओं का एक लोकगीत है। इस लोकगीत में जैसे समस्त आदिवासी-जीवन का दुख साकार हो उठा है-
दुख मेरी ओर देख रहा है
दुख मेरी ओर देख रहा है
दुख मुझे घूर-घूर कर देख रहा है
दुख मुझे घूर-घूूर कर देख रहा है
दुख मुझे बेहद सालता है
वायु, पवन मुझे लेकर आए हैं
वायु मुझे लेकर लौटी है
दुख मुझे बेहद सालता है
दुख मुझे बेहद परेशान करता है
वायु, पवन मुझे लेकर आए हैं
दुख मुझे बेहद सालता है
दुख
छोटा केंचुआ
छोटा केंचुआ मुझे लेकर आया है
हवा, पानी, हवा।
नागार्जुन की अगली कविता 1979 की है। शीर्षक है, ‘दरख्तों की सघन बगीची में’। इस कविता में ‘धधकते खेत-खलिहानों की दास्तान’ वाली चेतना सुगबुगाने लगती है। आदिवासी युवकों के भीतर भी जल, जंगल और जमीन अपना है, इसे किसी को हड़पने नहीं देंगे की चेतना बल खाने लगती है। नागार्जुन ने इस कविता में नई चेतना से लैस युवक और युवतियों का सजीव चित्र खींचा है।
गाढ़ा सांवला रंग
झबरे बालों वाले सिर
छोटी-छोटी तेज आंखें
पतले-पतले होंठ
छोटी-छोटी नाक
जरा-सी मूंछें
तनिक-सी दाढ़ी
सफेद झकझक
नन्हें-नन्हें मोतियों वाले दांत
बेहद चमकीली घनी पांतें...
कौन है ये, कौन है ये!
कवि आगे की पंक्तियों में खुद इसकी सूचना देता है कि ये लोग कौन हैं?
काले-कलूटे, सूखे सांवले
लगभग नंग-धड़ंग सौ-पचास
आदिवासी मजदूरों की छोटी-सी सभा
झोपड़ियों वाली विरल बस्तियों के मध्य
जामुन, नीम, बड़हल-आम के
दरख्तों की सघन बगीची में
मर्द भी, औरतें भी
नवजात शिशुओं को, अपनी पीठ पीछे बांधे लटकाए!
इस वर्णन से साफ पता चलता है कि आदिवासी मजदूरों की कोई छोटी-सी सभा होने वाली है। इसी सभा के लिए ये काले-कलूटे, नंग-धड़ंग लोग एक छोटी-सी बगीची में जुटे हैं। इसी बीच एक ठिंगना नौजवान उठा और तेज आवाज में, जल्दी-जल्दी कहने लगा-
हम अपने अलावा
और किसी को नहीं जानते
हम आप ही अपने लीडर हैं, अपने मुखिया हैं
जंगल और पहाड़ हमारे बाप हैं, चाचा हैं
नदियां हमारी मां हैं, मौसी-मामी हैं
झरने हैं हमारे सगे
ये खोह, वो झुरमुट, वो कछार
पत्तों-टहनियों से छाई हुई ये झोंपड़ियां
ये हैं हमारे गांव शहर जिला...
हम किसी रिसी-मुनी की औलाद नहीं हैं
बसिष्ठ-यागबलक-मनु-शांडिल
उनके आदि पुरुष होंगे
हमारे तो कोई नहीं होते
हम तो जंगली हैं, चांडाल, पामर, भुच्च
सूअर गाय मोर बतक का भोग चढ़ाने वाले
हमारे पितर, हमारी देवियां
इतिहास वो होगा जो हम रच रहे हैं
तत्काल ही एक सांवली और उठी। वो
छोकरी सरीखी औरत! शांत स्वर में बोली-
मैंने पिछले महीने
दो दुश्मनों पर घात लगाए
तीरों का निशाना जरा-सा चूका था
दसियों फौजी जीपें गुजरीं
किसी को मेरी गंध तक न लगी
कसम खा रही है
दुश्मनों पर घात लगाती रहूंगी।
तीसरा वक्ता एक अधेड़ था। उसने उठकर आहिस्ते से कहा, ‘हम किसी की जान नहीं लेंगे। मगर अब आगे चुप नहीं बैठेंगे।’ उसने सिलसिलेवार रूप से बताना शुरू किया-
देखो न,
कारखाना के नाम पर
पिछले दस-पंद्रह साल के अंदर
हमारे सारे जंगल हमसे
छीन लिए हैं उन लोगों ने
सफेदपोश बाबू लोगों ने
कहीं का नहीं रहने दिया हमें
आज हम पूरी तरह उनके गुलाम हैं
हमारे कुछ एक लोगों को उन्होंने खरीद लिए हैं
वे हमें भी खरीदने की कोशिश करते हैं
मगर मैदानी इलाके से
रोजी-रोटी के लिए इधर आए हुए
गरीब कुली-मजदूर भी तो उनके खिलाफ
गोलबंद हो रहे हैं अब
उनके जोर-जुलुम और बेइंसाफी का
ये कुली-मजदूर भी तो
विरोध कर रहे हैं
ये तो हमारे दुश्मन नहीं हैं
अपनी लड़ाई में हम उन्हंे जरूर साथ लेंगे
उनके जद्दोजहद में
हम भी इनके साथ होंगे।
गरीब-गुरबा लोगों के संघर्ष में मजदूरों का साथ और मजदूरों के संघर्ष में गरीब-गुरबा लोगों का साथ। यह जो सचेत वर्ग-समाज की चेतना है धीरे-धीरे उनके बीच प्रस्फुटित हो रही है। नागार्जुन इस बात की सूचना अत्यंत ही उद्दाम और प्रखर शब्दों में देते हैं। इस कविता से इस बात की सूचना भी मिलती है कि कैसे उनके भीतर वर्ग-संघर्ष की चेतना लहराने लगी है। अब, वे अनपढ़, गंवार और बुद्धू नहीं रहे। उन्हें बरगलाया नहीं जा सकता।
भाषण-क्रम में आगे आने वाला नौजवान आधी बाहों वाला गोलकट बनियान पहने हुए था। उसने खीचड़ी बोली में कहा-
हम हिंदू नहीं हैं, न हम ईसाई हैं
हम तो आदिवासी हैं, गिरिजन हैं हम
हिंदूू हों चाहे ईसाई, भूख तो सभी को लगती है
जो हमारी रोजी-रोटी का प्रबंध करेगा
हम उसी को अपना मानेंगे
हमारे बाप-दादा बुद्धू थे
हम लेकिन बुद्धू नहीं बनेंगे
और अंत में निकर-बनियान वाला एक नौजवान आवेगी सुरों में गा उठा-
सुनो नहीं
आलतू-फालतू बात
खाओ नहीं
डंडा-घूसा-लात
चैकस रहो
एक न एक दिन
तभी तो भैया
जालिम खाएंगे मात
जान लो भैया
गरीबों की एक होती जात
उसी के हुकुम से
हिलेंगे एक-एक पात
किसी की सुनो नहीं
आलतू-फालतू बात।
ऊपर के उद्धरण में नागार्जुन की नागार्जुनी शैली का जबर्दस्त उदाहरण देखने को मिलता है। जनता के कवि को हमेशा जनता की भाषा में बोलना चाहिए। यह कोई सूक्ति नहीं। सच को सच की तरह बेबाकी के साथ कहने का सामान्य लहजा है। नागार्जुन इस बात के उस्ताद रहे हैं। ‘दरख्तों की सघन बगीची’ शीर्षक कविता आदिवासियों की तरफ से नागार्जुन का जैसे आह्वान है।
और यही चेतना 1983 तक आते-आते एकदम धधकने लगी थी। प्रतिहिंसा का महारूद्र बनकर अपना रौद्र रूप दिखलाने लगा था। भला ऐसी स्थिति में जनकवि नागार्जुन चुप कैसे बैठते? उन्होंने जैसे भविष्यवाणी करते हुए लिखा-
फिलहाल तुम्हारा यह मारक खेल
अभी कुछ समय और चलेगा
लेकिन याद रखो-
हम तुम्हारी बिरादरी के
एक-एक सदस्य का वध करेंगे
तुम मुनाफालोभी
तुम स्वार्थ के नारकीय कीड़े
इस जंगल का एक-एक बिरवा
तुम्हारे समूचे वर्ग के लिए
प्रतिहिंसा का महारूद्र प्रमाणित होगा।

मैं हमेशा से कहता आया हूं, प्रतिरोध हमेशा भीतर से उपजता है। बाहर से थोपा नहीं जाता। और नागार्जुन तो प्रतिरोध के ही कवि हैं। ‘जनमत’ के प्रवेशांक में उनकी एक कविता छपी थी- ‘प्रतिहिंसा ही स्थाई भाव है’। कविता के नौ स्थाई भाव के साथ प्रतिरोध के इस स्थाई भाव को काव्य से जोड़ना अपने-आप में युगांतकारी है। ‘प्रतिहिंसा ही स्थाई भाव है’ में बड़े साफ शब्दों में उन्होंने घोषणा की थी-
प्रतिहिंसा ही स्थाई भाव है अपने कवि का
जन-जन में जो ऊर्जा भर दे, मैं उद्गाता हूं उस रवि का।
नागार्जुन का यह स्वर सहसा चिली के महान कवि नेरूदा से जा मिलता है, जैसे-
मैं भी साझेदार हूं
पृथ्वी पर प्रकाश फैलाने में।
इस प्रकार हम देखते हैं कि नागार्जुन ने आदिवासी जन-जीवन को लेकर जो भी चार-पांच कविताएं लिखी हैं, समय सापेक्ष और कालबद्ध हैं। भाषा और शिल्प के स्तर पर भी ये कविताएं जन-मन को आंदोलित करने वाली हैं। अब तक ये कविताएं आलोचकों की नजर से प्रायः ओझल ही रहीं। जबकि इन कविताओं के जरिए नागार्जुन के क्रांतिकारी दृष्टिकोण को सहज ही समझा जा सकता है। आदिवासी विमर्श चलाने वाले बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों के लिए ये कविताएं आज भी मार्गदर्शन का काम कर सकती हैं।