8 मई को बाल हिंदी पुस्तकालय, आरा के सभागार में वरिष्ठ कवि जगदीश नलिन के पहलेे कविता संग्रह ‘सपना साथ नहीं छोड़ता’ पर प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की ओर से एक बातचीत का आयोजन किया गया। लगभग साढ़े तीन घंटे से अधिक समय तक चले इस आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन, चर्चित जनवादी कहानीकार नीरज सिंह और प्रगतिशील आलोचक रवींद्रनाथ राय ने की। संचालन युवा कवि सुमन कुमार सिंह ने किया।

कविता संग्रह पर बातचीत से पहले जगदीश नलिन ने यह कहते हुए कि उनकी जिंदगी में सपनों का बहुत महत्व रहा है, ‘सपना: एक संकल्प’, ‘मजबूर सपने’, ‘सपना साथ नहीं छोड़ता’, ‘ना बेटी ना!’, ‘दुख, भूभुर में बैठा मोची’, ‘क्या पता था’ आदि अपनी कविताओं का पाठ किया।
अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए रामनिहाल गुंजन ने कहा कि जगदीश नलिन अपनी कविताओं को सिर्फ लिखते-पढ़ते ही नहीं, बल्कि उसे जीते हैं। जो कवि मनुष्यता को ध्यान में रखकर लिखता है उसकी कविताएं ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं।


जनपथ के संपादक कथाकार अनंत कुमार सिंह ने विरासत के प्रति नलिन जी की श्रद्धा और उनके संवेदनशील व्यक्तित्व से जोड़कर उनकी कविताओं को देखा।


इस आयोजन की खासियत यह थी कि संचालक समेत तीन अन्य युवा रचनाकारों ने जगदीश नलिन के संग्रह पर समीक्षात्मक आलेख लिखे थे। एक वरिष्ठ कवि के प्रति युवा पीढ़ी के लगाव का भी इससे पता चलता है। नई पीढ़ी के कवि रविशंकर सिंह ने उनके व्यक्तित्व और उनके कविता पाठ से जुड़े अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि उनके संग्रह की कविताओं में जिंदगी की जबर्दस्त जिजीविषा दिखाई पड़ती है।
युवा कवि सुनील श्रीवास्तव ने कहा कि जब कविता से काव्यात्मकता गायब होती जा रही है, तब जगदीश नलिन की कविताएं कविता के प्रभाव के प्रति आशा के बीज बोती हैं। उन्होंने उनकी कविताओं में बेटियों के प्रति गैरप्रगतिशील नजरिये पर सवाल भी उठाया।
मुझे जगदीश नलिन की शुरुआती दौर की कविताओं को पढ़ते हुए उनमें निराशा, उदासी, अकेलापन, नश्वरता और मृत्यु का बोध अधिक महसूस हुआ था। यह वही दौर है जिसे हिंदी साहित्य में मोहभंग का दौर कहा जाता है। आत्मउत्पीड़न और आत्मनाश के जरिए विडंबनाओं से ग्रस्त समाज को बदलने की अपील कवि-शायर करते रहे हैं, मुझे उनकी कविताएं उसी परंपरा से जुड़ी लगीं। मैंने उनकी कविताओं को गुरुदत्त की फिल्मों के गीतों से भी जोड़कर देखा। उनकी कई कविताएं उर्दू की जमीन पर लिखी गई हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए मशहूर शायर मजाज की भी याद आई।
सपने जगदीश नलिन की कविता की ताकत हैं। वे उनके काव्य विषय और उसके शिल्प को भी बदलते हैं। आत्मपीड़ा और मोहभंग की वजहें जो अपेक्षाकृत शुरू की कविताओं में अमूर्त हैं, वे धीरे-धीरे मूर्त होती हैं-
आप थे हमसफर, रहनुमा आप थे
जिस्म में जान थे, हमनवां आप थे
आपकी शख्सियत रहबरे आम थी
नक्शेपां आपका राह दिखलाएगा
क्या पता था कि मौसम बदल जाएगा
दिन वफाओं का चुपके से ढल जाएगा।
मैंने कहा कि इस कविता को राजनीतिक कविता की तरह भी पढ़ा जा सकता है और उनकी एक चर्चित कविता ‘कहवा घरों की युवा आवाजों के नाम’ से इसे जोड़कर देखा जा सकता है। बाद के दौर की कविताओं में आम अवाम की जिंदगी से जुड़े सवालों और बेहतर दुनिया के नक्शानवीस कई साहित्यकारों को जिस तरह जगह मिलती है, वह उनकी कविता को ज्यादा महत्वपूर्ण बनाता है।
शुरू की कविताओं में जो गहरा मृत्युबोध है, कवि की जिजीविषा उसे पार करती है। एक कविता का शीर्षक ही है- ‘नहीं मरेगी जिजीविषा’। ‘आत्मावलोकन’ कविता में वे कहते हैं- ‘‘मुझे मत ले चलो/ तुम पाल लगी नाव में/ हवा की मर्जी पर चलना/ मुझे गवारा नहीं।...हो सके तो छोड़ दो तुम मुझे/ तट पर अकेला...
हवा का क्या भरोसा/ कभी भी रुख बदल लेती है वह/ पाल नीचे गिरा दो/ और थाम लो पतवार।’’
प्रो. तुंगनाथ चौधरी इस आयोजन के आमंत्रण पत्र में छपी इस कविता की पंक्तियों से ही प्रभावित होकर खींचे चले आए थे। जगदीश नलिन भी अंग्रेजी के शिक्षक थे और प्रो. तुंगनाथ चौधरी भी अंग्रेजी साहित्य के अध्यापक थे। लेकिन इन दोनों को हिंदी कविता परस्पर जोड़ रही थी। प्रो. चौधरी ने अनुभवों को कविता में ढाल देने की कवि की खासियत की खास तौर से तारीफ की।
शायर इम्तयाज अहमद दानिश की गुजारिश थी कि किसी भी कविता के बारे में जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं सुनाया जाए। एक कविता की कई परतें होती हैं। उन्होंने उर्दू अदब से उनके गहरे जुड़ाव का जिक्र किया। उनके अनुसार उन्होंने उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल किया है और उसमें सफल भी रहे हैं।
1985 से 95 तक क्षत्रिय हाई स्कूल में नलिन जी के सहकर्मी रहे शिक्षक संगठन की पत्रिका ‘प्राच्य प्रभा’ के संपादक विजय कुमार सिंह ने बताया कि उन्हें खुद उनसे लिखने की प्रेरणा मिलती थी। उनकी कविताओं में उम्मीदें टूटती हुई लग सकती हैं, पर सपने कभी नहीं टूटते। उन्होंने कहा कि उनका व्यक्तित्व एक लाइटहाउस की तरह है।
युवा कवि ओमप्रकाश मिश्र और संतोष श्रेयांश 78 साल की उम्र में भी जगदीश नलिन की सक्रियता से बेहद प्रभावित नजर आए। संतोष श्रेयांश ने कहा कि इस उम्र में उनकी सक्रियता नई पीढ़ी के लिए प्रेरक है। ओमप्रकाश मिश्र ने तो उन्हें साहित्य का कुंवरसिंह ही कह डाला। उनकी कविताओं में मौजूद कवितापन की उन्होंने सराहना की।

वरिष्ठ कवि केडी सिंह ने कहा कि नलिन जी की काव्य भाषा, खासकर शुरुआती कविताओं की काव्य-भाषा उनके लिए दुरुह है। वे कविताएं उनको समझ में नहीं आतीं। हालांकि उनकी कविता ‘बारिश’ की उन्होंने विस्तार से चर्चा की।
किरण कुमारी, आशुतोष कुमार पांडेय, विजय मेहता ने भी नलिन जी की कविताओं पर अपने विचार रखे।
धन्यवाद ज्ञापन सुनील चौधरी ने किया।
आयोजन में कहानीकार शीन हयात, शायर कुर्बान आतिश, कवि अरुण शीतांश, चित्रकार राकेश दिवाकर, कवि ए.के. आंसू, अयोध्या सिंह, डाॅ. महेंद्र सिंह, शमशाद प्रेम, नीलेश कुमार ‘गुल्लू’, सुबोध कुमार सिंह, सत्यदेव आदि भी मौजूद थे।