Sunday, March 23, 2025

भावना कभी नहीं मरती -सुधीर सुमन

भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु के शहादत दिवस के अवसर पर










23 मार्च शहीद-ए-आजम भगतसिंह और उनके साथियों सुखदेव और राजगुरु की शहादत का दिन है। आज उनको शहीद हुए 94 साल हो गए। शहादत के वक्त भगतसिंह की उम्र मात्र 23 साल थी। उनकी शहादत के बाद उनकी याद में कवियों और शायरों ने बहुत सारी रचनाएं लिखीं। ऐसी रचनाओं का एक संकलन लगभग दो दशक पूर्व ‘फांसी लाहौर की’ नाम से प्रकाशित हुआ था, जिसमें एक शेर संकलित है, जो मौत के बावजूद भगतसिंह के ख्वाब के प्रभाव को जाहिर करता है। वह शेर इस प्रकार है-

मौत के आगोश में हूँ देर से सोया हुआ।

फिर भी ख्वाबे-नाज से भारत को चौंकाता हूँ मैं।।

प्रेमचंद की कहानी आहुति की नायिका रूपमणि के विचारों में भगतसिंह के विचारों की अनुगूंज सुनाई पड़ती है। वह कहती है- ‘जिन बुराइयों को दूर करने के लिए आज हम प्राणों को हथेली पर लिए हुए हैं, उन्हीं बुराइयों को क्या प्रजा इसलिए सिर चढ़ाएगी कि वे विदेशी नहीं, स्वदेशी हैं? कम-से-कम मेरे लिए तो स्वराज्य का यह अर्थ नहीं है कि जॉन की जगह गोविंद बैठ जाएं। मैं समाज की ऐसी व्यवस्था देखना चाहती हूं, जहां कम-से-कम विषमता को आश्रय मिले।’ आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने भगतसिंह पर अंग्रेज सरकार द्वारा चलाए गए मुकदमे पर एक कहानी लिखी थी। उग्र की कहानी ‘जल्लाद’ भी भगतसिंह जैसे क्रांतिकारी के जीवन पर केंद्रित है। कहने का मतलब यह है कि इन क्रांतिकारियों के संघर्ष, क्रांतिकारी स्वप्न और शहादत का लोकगीतों के साथ-साथ साहित्य की अन्य विधाओं पर गहरा असर पड़ा।


सुखदेव इंकलाब की राह में भगतसिंह के हमसफर थे। उनके हठ और जुनून के कई किस्से हैं। यशपाल के अनुसार वे भावनात्मक उत्तेजना से संचालित होते थे। हालांकि बोर्स्टल जेल में प्राप्त एक अधूरे पत्र से क्रांति, संगठन और रणनीति के संबंध में सुखदेव के सुव्यवस्थित वैचारिक नजरिए का पता चलता है। वे एक कुशल संगठनकर्ता थे। उन्हें एचएसआरए के पंजाब शाखा की जिम्मेवारी दी गयी थी। वे प्रत्यक्ष रूप से सांडर्स की हत्या में शामिल नहीं थे, पर क्रांतिकारी संगठनकर्ता होने के नाते ही उन्हें फाँसी की सजा दी गयी थी। ‘भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज’ के संपादक जगमोहन सिंह और चमनलाल ने उनके बारे में लिखा है- “भगतसिंह और सुखदेव ने क्रांति-पथ के पड़ाव भी साथ ही तय किये और परस्पर विचार-विमर्श द्वारा वैचारिक स्पष्टता भी हासिल की। हर महत्त्वपूर्ण समस्या पर इन दोनों की बहस होती थी, उसी बहस से क्रांतिकारी दल के चिंतन का भी पता चलता है। भगतसिंह और सुखदेव एक-दूसरे के अंतरंग मित्र भी थे।’’ इसके बावजूद सुखदेव ने यह हठ किया कि असेंबली में बम फेंकने का काम भगतसिंह को ही करना होगा। प्रेम को लेकर जो भगतसिंह और सुखदेव के बीच जो बहस है, वह आज के दौर में बहुत प्रासंगिक है। भगतसिंह ने सुखदेव के नाम पत्र में लिखा है- ‘‘प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को उपर उठाता है। सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता। वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कब?...मनुष्य में प्यार की गहरी भावना होनी चाहिए, जिसे कि वह एक ही आदमी में सीमित न कर दे, बल्कि विश्वमय रखे।


राजगुरु चंद्रशेखर आजाद की तरह ही कुशल निशानेबाज थे। वीर, साहसी और मस्तमौला व्यक्ति थे। जेम्स स्कॉट के भ्रम में सांडर्स की हत्या उन्होंने ही की थी। सांडर्स की सगाई वायसराय के पीए की बेटी से हुई थी, इस कारण ब्रिटिश हुकूमत ज्यादा बौखला गयी थी और भगतसिंह, सुखदेव के साथ उन पर मुकदमा चलाया था और उन्हें भी फांसी की सजा सुनाई थी।

भगतसिंह के साथ चंद्रशेखर आजाद और बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारियों का नाम भी अभिन्न रूप से जुड़़ा हुआ है। चंद्रशेखर आजाद तो हिन्दुस्तानी रिपब्लिकन आर्मी- जिसका नाम बाद में हिंदुस्तानी सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन हो गया- के कमांडर-इन-चीफ ही थे, उन्हें वैचारिक रूप से समाजवादी बनाने में भगतसिंह की अहम भूमिका थी। संगठन में ‘सोशलिस्ट’ शब्द उन्हीं के कहने पर जुड़ा था। इनके साथ यशपाल, शिव वर्मा, मन्मथ नाथ, अजय घोष, जयदेव कपूर जैसे कई नौजवान स्वतंत्रता आंदोलन की क्रांतिकारी धारा से जुड़े हुए थे। पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की कहानी ‘उसकी मां’ जो गोर्की के उपन्यास ‘मां’ से प्रभावित है, उसमें भगतसिंह और उनके साथियों की ही छवि है। जब हम भगतसिंह की विचारधारा की बात करते हैं, तो दुर्गा भाभी के पति भगवतीचरण वोहरा को भूल नहीं सकते। भारत नौजवान सभा के क्रांतिकारी विचारों वाले पर्चे भगवतीचरण वोहरा और भगतसिंह ही लिखा करते थे। बाद में भारत नौजवान सभा का एचआरए में विलय हो गया था। हालांकि भगवतीचरण वोहरा बम का परीक्षण करते हुए दुर्घटना में शहीद हो गए, पर भगतसिंह ने क्रांतिकारी विचारों की मशाल को जलाए रखा। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेख और कोर्ट में दिए गए भाषण इसका साक्ष्य हैं कि राजनीतिक, सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक स्थितियों की इतनी गहरी समझ उस दौर के किसी दूसरे नेता में नहीं थी। भगतसिंह और उनके साथी कांग्रेस में ही शामिल थे, पर चौरीचौैरा कांड के बाद जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया, तो उनके भीतर क्रांति की दिशा और तरीके को लेकर सवाल खड़े होने लगे। वे सशस्त्र आंदोलन की राह पर बढ़े। हालांकि बहुत जल्दी उन्होंने जनांदोलन और विचारों के व्यापक प्रचार-प्रसार की जरूरत को समझ लिया।

भगतसिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश साम्राज्य का साहसपूर्वक मुकाबला किया। एचएसआरए की केंद्रीय कमेटी के निर्णयानुसार 8 अप्रैल, 1929 ई. को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम फेंका और योजना के अनुसार वहीं रुके रहे। बम फेंकने के बाद उन्होंने जो पर्चे फेंके, उसमें ऊपर ही कहा गया था कि ‘बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज़ की आवश्यकता होती है’। उन्होंने सुनियोजित योजना के तह गिरफ्तारी दी और उसके बाद भगतसिंह ने जेल को अपने विचारों के प्रचार का मंच बना दिया। उन्होंने जेल में भी वहाँ के अधिकारियों के अत्याचार का विरोध किया। हफ़्तों तक उन्होंने और उनके साथियों ने भूख हड़ताल भी की। जेल में भगतसिंह को बर्बर यातना दी गई लेकिन ब्रिटिश हुकुमत और उसका प्रशासन उनकी भावनाओं को कुचल नहीं सकी। यह दिलचस्प है कि भगतसिंह को फाँसी की सजा दिल्ली असेंबली बम केस में नहीं हुई। उसमें उनको और बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास का दंड मिला। फाँसी की सजा उन्हें लाहौर षड्यंत्र केस में सुनायी गयी। इन दोनों मुकदमों के दौरान भगतसिंह ने अपने क्रांतिकारी विचारों से लोगों को अवगत कराने की हरसंभव कोशिश की। असेंबली बम केस में जब दिल्ली के सेशन जज ने भगतसिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनायी तो उसके खिलाफ उन्होंने लाहौर हाई कोर्ट में अपील की। उन्होंने कानून, अपराध, न्याय और हुकूमत आदि के वर्ग-चरित्र पर गंभीर सवाल उठाये और क्रांतिकारियों के दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए कहा कि “इंकलाब जिंदाबाद से हमारा वह उद्देश्य नहीं था, जो आमतौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और यही चीज थी जिसे हम प्रकट करना चाहते थे। हमारे इंकलाब का अर्थ पूँजीवादी युद्धों का अंत करना है।’’

जेल के भीतर भगतसिंह की आंदोलनात्मक कार्रवाइयों तथा अदालत और अख़बार में दिये गये बयानों और अधिकारियों को भेजे गये उनके विचारोत्तेजक पत्रों ने देश- दुनिया में उनकी छवि एच.एस.आर.ए. के मुख्य सिद्धांतकार के रूप में बना दी। पूरे देश की जनता को ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ एकजुट करने में उन्हें सफलता हासिल हुई, जो उनका तात्कालिक उद्देश्य था। भगतसिंह की सफलता यह थी कि उन्होंने अपनी राजनीतिक योजना के अनुसार ब्रिटिश प्रशासन, न्यायपालिका, पत्रकारिता- सबका इस्तेमाल किया। उनका अनुमान था कि यदि उन्हें मृत्युदंड दिया गया तो यह ब्रिटिश हुकूमत के लिए और खतरनाक होगा। लेकिन शहादत की संभावना के बावजूद जीवन के अंतिम वर्षों में भी उन्होंने अध्ययन की आदत नहीं छोड़ी। 6 जून, 1929 ई. को बमकांड पर सेशन कोर्ट में दिये गये बयान में उन्होंने ‘देश के इतिहास, परिस्थितियों और अन्य मानवोचित आकांक्षाओं के मननशील विद्यार्थी’ होने का विनम्रतापूर्ण दावा किया था। जेल में जिन्हें उनसे मिलने आना होता था, उनको लिखी गयी चिटिठयों में वे हर बार किताबें लाने का आग्रह करते थे और उनकी सूची भेजते थे। ये किताबों प्रायः द्वारिका दास लाइब्रेरी लाहौर से मंगवायी जाती थीं। ये किताबें मुख्य रूप से मार्क्सवाद, अर्थशास्त्र, इतिहास और रचनात्मक साहित्य की होती थीं। फाँसी से ठीक पूर्व भी वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। कुछ विचारकों का मानना है कि भगतसिंह यदि जीवित होते, तो भारत के लेनिन या माओ होते।

भगतसिंह का पंजाबी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी चार भाषाओं पर अधिकार था। उनकी अंग्रेजी पहले बहुत अच्छी नहीं थी, पर महज एक साल में ही उन्होंने अंग्रेजी बोलने और लिखने की ऐसी क्षमता हासिल कर ली थी कि कोर्ट में दिये गये उनके बयानों की विद्वान आज भी तारीफ करते हैं। बटुकेश्वर दत्त से उन्होंने बांग्ला भी सीखा था। उन्होंने अपनी जेल नोटबुक में 106 लेखकों और 43 पुस्तकों से उद्धरण लिये हैं। इतिहासकार बिपनचंद्र ने लिखा है कि “भारत की जनता के लिए यह बहुत बड़ी त्रासदी है कि इस महान मस्तिष्क को उपनिवेशवादी ताकतों ने असमय ही सुला दिया।’’ हालाँकि उनकी शहादत ने देश में बगावत की आंधी पैदा कर दी।

भगतसिंह का महत्त्व इसलिए भी है कि जब आजादी का नारा ठीक से सूत्रबद्ध भी नहीं हुआ था, उस दौर में भगतसिंह ने पूर्ण आजादी की माँग की तथा इंकलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद का नारा दिया। इंकलाब अर्थात क्रांति के लक्ष्य को परिभाषित किया। ‘धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम’ नामक लेख में उन्होंने लिखा है- ‘‘...हमारी आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह पूर्ण स्वतंत्रता का नाम है- जब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आजाद हो जाएँगे।’’

स्वतंत्रता के तरीकों व दिशा को लेकर कांग्रेसी नेतृत्व से भगतसिंह की तीखी बहस रही, पर व्यापक जनजागरण आरंभ करने में गांधी जी के योगदान को उन्होंने बेहिचक स्वीकार किया। लेकिन भगतसिंह वैसे परिवर्तन को स्वतंत्रता मानने के पक्ष में नहीं थे कि जिससे लार्ड इरविन की जगह सर पुरुषोत्तम दास टंडन आ जाएँ। उनकी राजनीतिक दूरदृष्टि बता रही थी कि निकट भविष्य में ही ब्रिटिश हुकूमत से समझौता होगा, लेकिन वह पूर्ण आजादी नहीं होगी। भगतसिंह ने धर्म को राजनीति से अलग रखने पर जोर दिया था। 1928 ई. में प्रकाशित अपने बहुचर्चित लेख ‘सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ में अत्यंत चिंता के साथ उन्होंने नेताओं और मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाया था। उस लेख में वे परस्पर मेल बढ़ाने, भारत की साझी राष्ट्रीयता की चिंता करते हैं। साम्राज्यवाद और सांप्रदायिकता विरोध पर आधारित राष्ट्रीयता को मजबूत बनाने के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता कम नेताओं और विचारकों में नजर आती है। दरअसल भगतसिंह ने साम्राज्यवाद, संप्रदायवाद, सामंतवाद और वर्ण-व्यवस्था की अलोकतांत्रिक और गैरप्रगतिशील प्रवृत्तियों के खिलाफ एक नये जनतांत्रिक समाज और राष्ट्र के निर्माण का सपना देखा था।

उन्होंने ‘क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ में लिखा है- ‘‘क्रांति जनता के लिए होगी। कुछ स्पष्ट निर्देश यह होंगे- 1. सामंतवाद की समाप्ति 2. किसानों के कर्जें समाप्त करना 3. क्रांतिकारी राज्य की ओर से भूमि का राष्ट्रीयकरण ताकि सुधरी हुई व साझी खेती स्थापित की जा सके। 4. रहने के लिए आवास की गारंटी 5. किसानों से लिए जाने वाले सभी खर्च बंद करना. सिर्फ इकहरा भूमिकर लिया जाएगा। 6. कारखानों का राष्ट्रीयकरण और देश में कारखाने लगाना, 7. आम शिक्षा, 8. काम करने के घंटे जरूरत के अनुसार कम करना।”11 भगतसिंह एक क्रांतिकारी नेता तो थे ही, वे इतिहास के गंभीर अध्येता भी थे। वे एक क्रांतिकारी लेखक-पत्रकार भी थे। प्रख्यात पत्रकार शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’ में भी उन्होंने काम किया था। पंजाबी और हिन्दी की पत्रिकाओं में उनके लेख छपते थे। उन्होंने अपने पहले के शहीदों और क्रांतिकारियों पर लेखमाला भी लिखे। भगतसिंह ने पुस्तकों की समीक्षाएँ भी लिखीं। साहित्य, भाषा, संस्कृति, धर्म, विश्वास-अंधविश्वास, नास्तिकता, सांप्रदायिक दंगों, अखबारों की सांप्रदायिक नीति, अछूतों के प्रश्न, किसान-मजदूरों के जीवन की बुनियादी समस्याओं, गांधीवाद, अराजकतावाद, हिंसा-अहिंसा, युवक, छात्र राजनीति, न्याय और कानून व्यवस्था आदि विभिन्न विषयों पर उन्होंने लेख लिखे। अदालत में दिये गये बयानों में भी उन्होंने सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था को लेकर गंभीर विचारोत्तेजक प्रश्न उठाये, जो अब इतिहास की विरासत हैं और आज भी उन विचारों की प्रासंगिकता बनी हुई है।

क्रांतिकारी शिव वर्मा ने जेल में हुई भगतसिंह और राजगुरु से आखिरी मुलाकात का जिक्र करते हुए लिखा है कि वे ब्रिटिश हुकूमत के बारे में कह रहे थे कि ‘‘ वे सोचते हैं कि मेरे पार्थिव शरीर को नष्ट करके वे इस देश में सुरक्षित रह जाएँगे। यह उनकी भूल है। वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन मेरी भावनाओं को नहीं कुचल सकेंगे। ब्रिटिश हुकूमत के सिर पर मेरे विचार उस समय तक एक अभिशाप की तरह मंडराते रहेंगे जब तक वे यहाँ से भागने के लिए मजबूर न हो जाएँ।’’ शिव वर्मा ने उस पल को याद करते हुए लिखा है कि हम लोग भूल गये कि जो आदमी हमारे सामने बैठा है वह हमारा सहयोगी है। वे बोलते जा रहे थे- ‘‘लेकिन यह तसवीर का सिर्फ एक पहलू है। दूसरा पहलू भी उतना ही उज्ज्वल है। ब्रिटिश हुकूमत के लिए मरा हुआ भगतसिंह जीवित भगतसिंह से ज्यादा खतरनाक होगा। मुझे फाँसी हो जाने के बाद मेरे क्रांतिकारी विचारों की सुगंध हमारे इस मनोहर देश के वातावरण में व्याप्त हो जाएगी। वह नौजवानों को मदहोश करेगी और वे आजादी और क्रांति के लिए पागल हो उठेंगे। नौजवानों का यह पागलपन ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को विनाश के कगार पर पहुँचा देगा। यह मेरा दृढ़ विश्वास है। मैं बेसब्री के साथ उस दिन का इंतजार कर रहा हूँ जब मुझे देश के लिए मेरी सेवाओं और जनता के लिए मेरे प्रेम का सर्वाेच्च पुरस्कार मिलेगा।’’

शिव वर्मा का मानना था कि “भगतसिंह की भविष्यवाणी एक साल के अंदर ही सच साबित हुई। उनका नाम मौत को चुनौती देनेवाले साहस, बलिदान, देशभक्ति और संकल्पशीलता का प्रतीक बन गया। ...विद्रोह की भावना ने पूरे राष्ट्र को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। भगतसिंह ने ठीक ही तो कहा था, ‘‘भावना कभी नहीं मरती।’’

भगतसिंह अपने आप में क्रांतिकारी विचारों के प्रतीक हैं। ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ लेख में उन्होंने लिखा है- ‘‘प्रत्येक मनुष्य जो विकास के लिए खड़ा है, उसे रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना तथा उन पर अविश्वास करना होगा और उनको चुनौती देनी होगी। प्रत्येक प्रचलित मत की हर बात को हर कोने से तर्क की कसौटी पर कसना होगा। ...निरा विश्वास और अंधविश्वास खतरनाक है। यह मस्तिष्क को मूढ़ तथा मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है।’’

भगतसिंह के विचारों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। वे हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान, युवाओं की क्रांतिकारी परिवर्तनकारी शक्ति, स्वतंत्रता की भावना और वास्तविक जनतांत्रिक आकांक्षाओं के आज भी वैचारिक प्रतिनिधि बने हुए हैं।

Sunday, February 23, 2025

नफरत के दौर में प्रेम की बात करना बहुत बड़ी बात : नीरज सिंह (फ़ैज़ जयंती)


इंकलाबी शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की जयंती पर दो सत्रों में कार्यक्रम संपन्न
वेलेंटाइन के माहौल में कवियों ने प्रेम कविताओं का पाठ किया


"नफरत के दौर में प्रेम की बात करना बहुत बड़ी बात है। प्रगतिशील-जनवादी कवियों ने जीवन में प्रेम किया, पर अपनी कविताओं में प्रेम पर कम ध्यान दिया। परंतु फ़ैज़  इसके अपवाद हैं। उनकी विरासत हमारी साझी विरासत है, भाषायी और महादेशीय दोनों स्तरों पर।" 13 फ़रवरी 25 को महान इंकलाबी शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़  की 114वीं जयंती के अवसर पर जन संस्कृति मंच द्वारा नागरी प्रचारिणी पुस्तकालय, आरा के सभागार में दो सत्रों में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जलेस के राज्य अध्यक्ष कथाकार नीरज सिंह ने ये विचार व्यक्त किये।


नीरज सिंह ने फ़ैज़ की नज़्म 'फिलीस्तीनी बच्चे के लिए लोरी' का पाठ करते हुए कहा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दलित-उत्पीड़ित मानवता के प्रति इतना गहरा सरोकार रखने वाला उर्दू का ऐसा प्रासंगिक शायर दूसरा नहीं है। उन्होंने कहा कि 1911 कवि केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, नागार्जुन, गोपाल सिंह नेपाली का भी जन्म का वर्ष था। उन पर कई कार्यक्रम आयोजित हुए थे। फ़ैज़ को छोड़ नहीं दिया गया था। फ़ैज़ की भारत-पाकिस्तान में प्रगतिशील आंदोलन को संगठित करने में भूमिका थी। उन्होंने विभाजन को कभी दिल से कुबूल नहीं किया। पाकिस्तानी हुकूमत ने उन्हें दो बार 1951 और 1958 में जेल में डाला। लेकिन हुकूमत फ़ैज़ की आवाज को दबा नहीं पायी। उनकी मकबूलियत बढ़ती गयी। 1962 में वे प्रिंसिपल बने और 1984 में अपने निधन तक वाम-लोकतांत्रिक ताकतों के साथ निरंतर जुड़े रहे। वे पाकिस्तानी जनता के हुकूक के संघर्षों में शामिल रहे।


इस मौके पर सुरेश कांटक के कविता संग्रह 'आईना हूँ मैं' का विमोचन भी‌ किया गया।


अध्यक्ष मंडल के दूसरे सदस्य जसम के राज्य अध्यक्ष और कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार ने फ़ैज़ को समग्रता में पढ़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि फैज भारत और पाकिस्तान दोनों की जनता के प्रिय शायर हैं। वे हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति की विरासत हैं और हमारे संघर्षों के साथी हैं। जितेंद्र कुमार ने कहा कि फ़ैज़ के साथ-साथ हमें पाब्लो नेरूदा, नाज़िम हिकमत, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, भगतसिंह को भी याद करना चाहिए।
अध्यक्ष मंडल के तीसरे सदस्य कवि अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने कहा कि फ़ैज़ भारत-पाकिस्तान विभाजन नहीं चाहते थे।
मुख्य वक्ता के बतौर युवा कवि और आलोचक सिद्धार्थ वल्लभ ने आज के वक्त को अधिनायकवादी-फासीवादी, तकनीकी-सामंती (टेक्नो फ्यूडल) समय  के रूप में चिह्नित करते हुए कहा कि यह एक विकट दौर है जब पूंजी की संस्कृति ने घर-घर, गांव-गांव तक अपनी जड़ें जमा ली हैं। इसने साहित्य की दुनिया को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। बड़े-बड़े नामवर साहित्यकार अपने मूल्यों और आदर्शों को ठुकराकर उनसे पुरस्कृत और सम्मानित हो रहे हैं। ऐसे समय में फ़ैज़ बहुत प्रासंगिक लगते हैं; क्योंकि उनमें कभी कोई विचलन नहीं आया।
वल्लभ ने कहा कि 1920 से 30 तक का ज़माना सामाजिक तौर से कुछ अजब तरह की बेफ़िक्री,आसूदगी और अंग्रेजी के वर्चस्व का ज़माना था। उस दौर के शायरों में हसरत मोहानी, जोश, हफ़ीज़ जालंधरी और अख़्तर शीरानी की बादशाहत क़ायम थी। उसके बाद देश की सूरत बदलने लगी थी। यह वह दौर था जब यकायक बच्चों की हँसी बुझ गयी थी। किसान खेत खलिहान छोड़ शहरों में मज़दूरी करने पर विवश हो गए। शहर की शरीफ बहू बेटियां बाज़ार में आ बैठीं। कॉलेज के बड़े बड़े तीसमार ख़ाँ गलियों की ख़ाक फाँकने लगे। जब शिद्दत से महसूस किया जाने लगा कि अब सारे रास्ते बंद हो गए और अब यहाँ से कोई आवाज़ बुलंद नहीं होगी तभी 'नक़्शे फ़रियादी' का आगाज़ हुआ। उस किताब की पहली नज़्म 'बरबत-ए-दिल के तार टूट गए/ हैं ज़मीं-बोस राहतों के महल' ने अविभाजित भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल पर गहरा असर डाला। उन्होंने कहा कि फ़ैज़ अपनी नज़्म में कहते हैं - और भी दुख है ज़माने में मुहब्बत के सिवा। यहां वे 'ग़म' नहीं कहते। इस दुख का रिश्ता कबीर के दुख से जुड़ता है।



इसके पूर्व सुधीर सुमन ने कार्यक्रम का संचालन आरंभ करते हुए कहा कि फ़ैज़ इश्क़ और इंकलाब के शायर हैं। एक भूमिहीन किसान के घर में पैदा हुए फ़ैज़ साहब की जिंद‌गी का सफ़र, बेहद रोमांचक और संघर्षों से भरा हुआ है। एक ओर उनकी शायरी इश्क में मिलन और विरह की कोमल और मार्मिक अनुभूतियों से बुनी गयी है, वहीं दूसरी और तानाशाह सत्ताओं के प्रतिरोध के तेवर से भी युक्त है। वे सबके लिए आजादी, बराबरी और जनतंत्र के लिए ताउम्र लड़ते रहे। उन पर रूसी क्रांति और युवा सशस्त्र आंदोलनकारियों के संघर्षों और विमर्शों का गहरा असर था।


#इश्क धुनकी है दुखों को धुनने का।


कार्यक्रम का दूसरा सत्र प्रेम कविताओं के नाम था। काव्य पाठ की शुरु‌आत करते हुए संतोष श्रेयांश ने अपनी एक बिना शीर्षक की कविता में कहा- सर्द रात में/ हरी हरी दूब पर/ओस की बूंद की तरह / तुम आयी मेरी जिंद‌गी में।
सिद्धार्थ वल्लभ ने इश्क के बारे में कहा- जादूगर के मायाजाल की तरह नहीं होता है इश्क/ कि बना रहे कोई दृष्टिभ्रम । अपनी दूसरी कविता 'प्रेम बार बार पुकारता है' में उन्होंने कहा- इश्क धुनकी है/ दुखों को धुनने का।
ओम प्रकाश मिश्र ने अपनी कविता में ऐसी दुनिया का खाका खींचा, जिसमें सारी अच्छी चीजें होगी।
सुमन कुमार सिंह ने फैज की नज़्म 'रकीब से' और 'चीड़ा' शीर्षक अपनी कविता का पाठ किया। उन्होंने कहा -
जिन चिडियों ने पंख खोलकर
होड लगाई बाजों से
भरी धूप में फड़फड़ फड़की
चुज्जे पाले नाजों से
उस चिड़िया से मिलकर आया।
वरिष्ठ कवि जनार्दन मिश्रा ने राज़ खोला- मैने भी कभी किसी से प्रेम किया था। ममता दीप ने प्रेम के अहसास को कुछ यूं बयान किया- हर रिश्ते के इर्द-गिर्द वही छाया है।
रूपेंद्र मिश्र ने पुस्तकालय में मौजूद छात्रों और प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारियों में लगे लोगों को सीख देते हुए कहा कि असफलताओं से निराश होकर गलत कदम नहीं उठाना चाहिए। बकौल फैज- दिल नाउम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है/ लंबी है राम की शाम मगर शाम ही तो है। उन्होंने अपनी कविता में कहा कि लिखना ही उनके प्रेम का आधार है। राकेश कुमार ओझा ने सुनाया- मेरे जीवन की प्राण वायु / अद्भुत तेरा बलिदान प्रिय। कवि कथाकार सिद्धनाथ सागर की कविता में माँ के 'घट्टे पड़े हाथ' को लेकर संवेदना व्यक्त की गयी थी।
वरिष्ठ कवि रामयश अविकल ने अपनी भोजपुरी कविता में यह फ़िक जाहिर की कि- आपस में रहल ना सरोकार ए भाई/ के करता केहू पर उपकार ए भाई। विक्रांत ने अपनी कविता 'कईसन ई दौर आइल बा' में गांव के प्रेममय जीवन छोड़़कर समस्याओं से भरे शहर में आने की विडंबना को दिखाया। सुनील चौधरी ने मौजूदा लोकतंत्र में नेताओं के अवसरवादी और जन विरोधी-चरित्र पर सवाल उठाया।
अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने सुनाया- मैं पर्वतों-खाइयों को लांघकर तुम्हारे पास आयी। जितेंद्र कुमार ने सुनाया- तुम्हारी तकरीर में नमी नहीं है रहबर।

नीरज सिंह ने मां की स्मृति और वर्तमान दौर में बदलती पारिवारिक स्थितियों का बयान किया। उन्होंने कहा- अपने दर से पुरखों के घर आए बच्चे। सुधीर सुमन ने 'तुम्हारे साथ' नामक प्रेम कविता सुनायी और आख़िर में फ़ैज़ साहब की रचना- 'चलो फिर से मुस्कुराएं' को गाकर सुनाया। धन्यवाद ज्ञापन पत्रकार और रंगकर्मी शमशाद प्रेम ने किया।





















Monday, November 20, 2023

एलिस के खत फैज के नाम

हम तो बस अंधेरे पार से तुम्हारे आने की राह तक रहे हैं
एलिस के खत फैज के नाम (अनुवाद- नूर ज़हीर)


9 मार्च, 1951 को चार बजे सुबह, लाहौर पाकिस्तान में फैज अहमद फैज को गिरफ्तार किया गया। तीन महीने तक किसी को यह खबर नहीं थी कि वे कहां कैद हैं, उन पर कौन से इल्जाम लगाए गए हैं, वे जिंदा भी हैं या नहीं।
गिरफ्तारी के वक्त उनकी पत्नी एलिस फैज और दोनों बेटियां- नौ साल की सलीमा (चीमी), और पांच साल की मोनीजा (मीजू) घर पर मौजूद थीं। एलिस ने न सिर्फ पैसा कमाने, घर चलाने और बच्चियों को पालने की जिम्मेदारी उठा ली, बल्कि पाकिस्तान सरकार को सैकड़ों अर्जियां भेजी, देश के बाहर फैज और अपने चाहने वालों को अनगिनत खत लिखे, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस नाजायज गिरफ्तारी के खिलाफ आंदोलन खड़ा करवाया, और सबसे बढ़कर यह कि अंग्रेज होने के बावजूद, इंग्लैंड लौट जाने के बहुत से मौके मिलने के बावजूद वे पाकिस्तान में डटी रहीं।
फैज जिस समय गिरफ्तार हुए वे पाकिस्तान के कम्युनिस्ट पार्टी के सेेक्रेटरी थे। सज्जाद जहीर जो तीन दिन बाद गिरफ्तार हुए, वे जेनरल सेक्रेटरी थे। इन दोनों के अलावा बहुत से और कम्युनिस्ट भी पकड़े गए।
तीन महीने बाद पता चला कि एक बहुत पुराने ऐक्ट- 1818 बंगाल कांस्पिरेसी ऐक्ट के तहत उन्हें गिरफ्तार किया गया है। ऐलिस के अपने शब्दों में, ‘‘ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे जालिम, अन्यायी और बदबख्त दिनों का यह ऐक्ट!’’
यहाँ भी बात थमी नहीं। प्रधानमंत्री लियाकत अली खां ने इन लोगों के बारे में ऐसा भाषण दिया जैसे ये लोग पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने की साजिश रच रहे थे। प्रेस ने खूब हंगामा मचाया और लाहौर चौक में इन लोगों को फाँसी देने की माँग की। पाकिस्तान ऐसेंबली ने एक स्पेशल ऐक्ट पारित किया- दि रावलपिंडी कांस्पिरेसी ऐक्ट। हाईकोर्ट जजों का एक ट्रिब्यूनल बनाया गया। सिंध के रेगिस्तान के बीच, हैदराबाद जेल में इस मुकदमे को चलाया जाएगा, यह तय हुआ।
तीन महीने फैज को सालिट्री कनफाइन्मेंट में रखा गया था, ताकि उनका मनोबल टूट जाए। खैर, एक इंकलाबी का मनोबल तोड़ना इतना आसान तो था नहीं, सज्जाद जहीर ने एक लेख में लिखा है कि जब ट्रिब्यूनल ने यह फैसला सुनाया कि अब सारे कैदियों को एक जेल में रखा जाएगा और उन्हें आपस में मिलने की इजाजत होगी, तो फैैज ने खुशी में कोर्ट के अंदर ही भंगड़ा नाचना शुरू कर दिया।
जब मुकदमा चला और तथ्य सामने आते गए, तो यह असलियत भी खुलती गई कि सारे इल्जाम झूठे और बेबुनियाद हैं और पाकिस्तान सरकार के पास इनलोगों को गिरफ्तार करने या सजा देने लायक कोई सुबूत नहीं है। 1951 का अंत आते-आते यह बात साफ हो गई थी और किसी भी पल सभी कैदियों के रिहा हो जाने की उम्मीद बंध गई थी। लेकिन भला सत्ताधारी इतनी जल्दी कैसे गलती स्वीकार कर लेते। मुकदमा खिंचता रहा, वक्त गुजरता रहा, आखिर 1955 में, चार साल की बिलावजह की कैद काटकर फैज रिहा किए गए। उस वक्त वे मंटगुमरी जेल में थे।
एलिस फैज ने इन चार सालों में, एक पत्नी के फर्ज तो अदा किए ही, उससे भी बढ़कर उन्होंने एक सशक्त कामरेड का रोल अदा किया। इन चार सालों में उन्होंने जेल में बंद फैज को जो खत लिखे वे सुबूत हैं उनके हौसले के, उनकी निष्ठा के, उनकी मोहब्बत और उनके यकीन के।
इन खतों से यह पता चलता है कि अक्सर एलिस और फैज का इंसानियत के बारे में दृष्टिकोण भिन्न है, लेकिन दोनों ने जद्दोजहद की, संघर्ष किया और लड़ाई लड़ी, एक जैसे उसूलों और एक जैसे मूल्यों के लिए। दोनों ने अपने -अपने हिस्से की सलीब यह मानकर उठाई कि न्याय के लिए लड़ने का खामियाजा भुगतना, उस न्याय को जीने का एक हिस्सा है।
इन खतों की भाषा सीधी-साधी है, लेकिन इनमें भावनाओं की वह गहराई है जो पढ़ने वाले की आंखें नम नहीं करती, बल्कि उनमें भी सच के लिए लड़ने की आग को प्रज्जवलित करती है। इन खतों में एलिस ने यह कोशिश की है कि फैज को जेल से बाहर का जीवन दे सकें। घर की, लाहौर की, मौसम की, दोस्तों की छोटी-छोटी बातें दर्ज हैं। जहां यह खत फैज की उम्मीद को जिंदा रखने की कोशिश करते हैं, वहीं एलिस अपने अकेलेपन और दुख को भी फैज से छुपाती नहीं, बांटती हैं। दो कामरेडों का सबकुछ बांटना जरूरी है।
फैज को लिखे इन खतों में एलिस की जो तस्वीर उभरती है, वह एक ऐसी औरत की है जो बेइंतिहा हिम्मत और हौसले से भरपूर है, जिसकी एक अपनी अलग पहचान है, जो अपनी नियति, अपना धर्म खुद गढ़ती और जीती है। वह ऐसी जिंदगी की कामना करती है, जिसमें संघर्ष जिंदा रहे, ताकि आने वाला कल गीत गाता हुआ आए।
फैज ने इन खतों को जेल में संभालकर रखा, यह इस बात की गवाही है कि ये खत उन मुश्किल दिनों में उनके सहारा थे, बाहरी दुनिया से उनका संपर्क थे और एतमाद की ताकत को बढ़ाते थे।
हमारे लिए ये खत उम्मीदों, आकांक्षाओं और चाहतों के प्रतीक हैं, क्योंकि इनमें जिंदा है हमारा आने वाला कल। इनको पढ़कर यह यकीन होता है कि संघर्ष ही एकमात्र विकल्प है, कि उम्मीद अभी जिंदा है, कि ख्वाब मरते नहीं!
इन खतों में
न कोई संबोधन है और न ही ये एलिस के नाम से खत्म होते हैं। अगर यूं ही पढ़ें तो ये संघर्ष कर रहे दो कामरेडों के बीच का पत्र व्यवहार है। दुनिया के किसी भी कोने में न्याय के लिए लड़ते हुए दो साथियों के प्रेम और वचनबद्धता के प्रतीक हो सकते हैं ये खत। क्या एलिस ने जानबूझकर इनको यह व्यापकता प्रदान की थी?
(फैज अहमद फैज के जीवन पर केंद्रित नूर जहीर की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक से)


31. 7. 51
आज मुझे तुम्हारा पहला खत मिला... कितना संक्षिप्त... मगर इन फाकाकशी के दिनों में, हमें जिंदा रखने के लिए काफी। घर का यह समाचार है कि मुझे ‘स्टे ऑर्डर’ मिल गया है- यानी मकान मालिक हमें निकाल नहीं सकता, पर किराया बढ़ाने की उसे इजाजत मिल गई है। उम्मीद है ‘एन’ (नजीर- फैज के भाई का बेटा) मेरे साथ किराया बांट पाएगा। वह सरकारी मुलाजिम है इसलिए उसे सरकारी इजाजत चाहिए होगी। प्रेस हमारा साथ दे रहा है, शायद इसीलिए अफसरों के हौसले कुछ ठंढे पड़े हैं। इस खत के साथ, आई जी प्रिजन का एक खत है, तुम्हारे बकाया पैसों के बारे में.....दिन भर में एक बार, पेट भर खुराक इसमें मुश्किल से आएगी!
आज बारिश हुई और आज इतवार भी है.....याद है तुम्हारी इतवार की सुस्ती पर तुमसे कितना झगड़ती थी?.....आज यह हाल है कि मैं भी छुट्टी के दिन बस पड़ी रहती हूं। कुछ करने की ताकत ही नहीं रहती। बरसात ने यादों के बंद किवाड़ खोल दिए हैं.....याद है, जब बुखारी यहां आया था और हमने पिछले बरामदे में पिकनिक मनाई थी?....डबलरोटी, मक्खन और कितना सारा जैम.....और बस बारिश! बारिश! बारिश!
खलील और निजामी ने हमारी मुसीबतजदा हालत पर एडीटोरियल लिखे हैं.....बहुत अच्छे हैं दोनों। लोग इतने हमदर्द हैं। सभी समझ रहे हैं कि मेरे लिए घर चलाना और ऊपरी तौर पर एक गरिमा बनाए रखना जरूरी है ताकि दूसरों का हौसला बढ़े। जबसे तुम गए हो मैंने एक भी सिनेमा नहीं देखा, लेकिन आज जा रही हूं। बाली ने (फैज की रिश्ते की बहन) घर का हिसाब-किताब रखना शुरू कर दिया है। देखें 430 रुपये में, जिसमें 100 रुपये किराया भी शामिल है, घर कैसे चलता है? बड़ा भिगोना-निचोड़ना पड़ेगा, लेकिन निभ जाएगी! हम तो बस अंधेरे पार से तुम्हारे आने की राह तक रहे हैं। तब इतना कुछ होगा पूरा करने को, इतना कुछ याद करने को, उतना ही भूल जाने को....
तुम हमें बदला हुआ पाओगे। बच्चियां तो बहुत बदल गई हैं..... दोनों समझदार और गंभीर हो गई हैं....और मैं भी ज्यादा अक्लमंद हो गई हूं। वह चीजें जो बहुत माने रखती थीं, आज बेमानी मालूम होती हैं.....गई रात मीजू (छोटी बेटी मुनीजा) एक दांत ब्रश और रात के कपड़े लेकर सरवर के यहां चली गई। आज जब लौटी तो मैंने पूछा, ‘‘क्या तुम उदास रही, अम्मीजान के लिए?’’
उसने जवाब दिया, ‘‘नहीं तो, मैं सिर्फ अब्बूजान के लिए उदास हूं।’’ मीजू हमारी धूप भी है और खुशी भी....वही हमें हमें जिंदादिल और खिलखिलाता रखती है।
मजहर (कामरेड मजहर अली- तारीक अली के पिता) तुम्हें बहुत मोहब्बत से याद करता है और बहुत सारे और लोग भी। हमारे बहुत सारे, बहुत ही सारे दोस्त हैं...... मेरा शुरू का डर और सोच बेमानी थी। हरामजादे तो दुनिया भर में हरामजादे ही रहेंगे और दुनिया को सड़ाकर खोखला करने की कोशिश करते रहेंगे। आजकल ‘पाकिस्तान डे’ नंबर पर काम चल रहा है। कमाल भी पहले से ज्यादा समझदार हो गया है.....अपनी मेज साफ-सुथरी ओर बाकायदा रखता है। अभी तक तो वह एक अच्छा सहकर्मी साबित हो रहा है।.....


10.9.51
आज ‘सबात’ था, सो हमने जितना हो सका उसे अपवित्र रखने की कोशिश की। आने वाले जाड़े के दिनों के लिए पूरा घर साफ किया, कालीनों को धूप दी, झाड़ा फटका और फिर से बिछाया, इस उम्मीद के साथ कि तुम जल्द उन पर चहलकदमी करोगे। रातें ठंढी हो चली हैं और बच्चों पर गिरती शफाक चांदनी उन्हें और ज्यादा खूबसूरत बना रही है। यह लिखते वक्त दोनों मेरे बराबर में सोई हैं।
मीजू की कही हुई बातें किस्से बन जाती है और हर जगह दोहराई जाती है। आज कहने लगी, ‘‘आप चीमी आपा (फैज की बड़ी बेटी सलीमा) को तो ‘प्यारी’ कहकर पुकारती है। मुझे किस नाम से पुकारेंगी? मैं सीधे फीके ‘मीजू, मीजू’ से तंग आ गई हूं।
मैंने जवाब दिया, ‘‘तो ठीक है, मैं तुम्हें जानी बुलाऊंगी।’’
खैर, उसने उस वक्त तो अनमने ढंग से बात मान ली। लेकिन कुछ ही देर बाद, गलती से मेरे मुंह से चीमी के लिए भी ‘जानी’ निकल गया! ऐसा बिगड़ी कि क्या बताऊं! ‘‘यह आपने तीसरी बार आपा को जानी कहा है! क्या आप मेरे लिए कोई ऐसा नाम नहीं सोच सकतीं जो किसी और का ना हो?
‘एन’ और उसकी बीवी उससे अच्छा खासा घबराते हैं। एक दिन जिद करने लगी कि उसकी बीवी को नहाते देखेगी और जब डांटकर मना किया गया तो ऐसा भौंकड़ा मचाया कि बस! रोते-रोते कहने लगी, ‘‘क्यों नहीं! मैं तो अम्मी को नहाते देखती हूं।’’
जब तुम लौटोगे तो अपनी जिंदगी में इन दो मोहतरमाओं से भी तुम्हें जूझना होगा। चीनी भी जिंदगी की पेचीदगियों पर सवाल पूछने लगी है- ‘‘जानवरों को शादी और बच्चे पैदा करने की इजाजत कौन देता है?’’ वगैरह।
जेल के अफसर क्या ज्यादा एहतियात से तुम्हारे खत ‘सेंसर’ नहीं कर सकते? पिछले वाले पर पान के बड़े चकत्ते थे!.....


18.9.51
दिन चुपचाप फिसल रहे हैं....मसरूफियत के दिन हैं, जिनमें दफ्तरी काम की भगदड़ है, घर के कामों की भीड़ है और सैकड़ों दूसरे मसले हैं। मेरे लिए तो सुकून के पल तब होते हैं जब सब सो चुके होते हैं, जैसे कि अभी। कल से बच्चियों का स्कूल खुल जाएगा। मीजू आखिरकार अपनी चुटिया काट देने को राजी हो गई है। हर रोज दो रिबन और बेशुमार क्लिपें खोेने के बाद। घर के खर्च का हिसाब ही गड़बड़ा गया था। अब उसे तकरीबन ‘सफाचट’ करवा दिया है।
मौसम हर दिन ज्यादा ठंढा होता जा रहा है। इस वक्त मखमली हवा बह रही है और आधा खाया हुआ-सा चांद चमक रहा है। जानती हूं यह चांद तुम्हें भी दिखाई दे रहा है और यह ख्याल मुझे खुशी देता है। लोग आजकल अजीब-ओ-गरीब बातें कर रहे हैं। अचानक लगाई गई ‘इमरजेंसी’ और फिर उसका इस तरह फुसफुसाकर खत्म हो जाना..... लोग चकरा गए हैं। सरकारी फैसला ‘‘जंग नहीं’’, क्योंकि ईरान में तेल का संकट पैदा हो गया है.....जंग के लिए तेल तो जरूरी है! यह थैकी पता नहीं कैसे अपना कत्लेआम मचाए हुए है? समझदारी और अक्ल की बातचीत को दिल तरस गया है। पढ़ती रहती हूं, ज्यादातर फ्रांसीसी, लेकिन दफ्तर का काम इतना थका देता है, और इतनी सारी दूसरी परेशानियां हैं कि कुछ करने की ताकत ही नहीं रहती। लेकिन बच्चियों के फलसफियाना खोज बहुत दिलचस्प होती है। इतना सहारा बहुत है, और तुम्हारे खत भी तो हैं!.....
जब मीजू के बाल कटवाए तो क्या बोली जानते हो?....‘‘अब्बू आकर कहेंगे....अरे, यह लड़का कहां से आया?’’
इतनी प्यारी है! कभी-कभी उन दोनों को देखती हूं तो जैसे जिस्मानी तकलीफ का एहसास होता है....एक टीस सी....उस जगह जहां दिल होना चाहिए। घर तुम्हारे बगैर सूना है.....उस तपिश से खाली जो तुमसे होती थी....जल्दी लौट आओ......


4.11.51
कल भी तुम्हें लिखा था। क्या मालूम, तुम्हें इतनी जल्दी जल्दी एक के बाद एक, खत पाने की इजाजत है या नहीं! चीमी ‘स्पाईडर एंड दि फ्लाई’ के उर्दू संस्करण से जूझ रही है और हमारी नन्हीं घुमक्कड़ गहरी नींद सो रही है। आज उन्होंने तुम्हारी तस्वीर के पास असली सुर्ख गुलाब सजाए हैं....बूबू जान के दिए हुए। वे इन गुलाबों को लेकर, अपने लड़के की साईकल पर सवार, सरपटाती हुई चली आईं....अपने बुर्के समेत! तुम्हें प्यार भेजा है। लड़कियों ने बहुत सलीके से ताजा गुलाब सजाए और पहली बार नकली वाले छुपा दिए गए हैं.....


7.11. 51
जाड़े धीरे-धीरे, पर यकीनी तौर पर आ रहे हैं। तुम्हारी वाली सुबहें आखिरकार आ गई हैं....तुम आशिक हो इस लाहौर के....धुंधली सुबह, शफाक दिन! मैं बेकरार हो जाती हूं और अक्सर सोचती हूं कि जनता के वक्त और पैसों की ऐसी बरबादी से आखिर किसे खुशी मिल रही है। इस तकलीफ से जो मुस्तकिल खिंचती जाती है किसका भला हो रहा है! लोग अब खुल्लम खुल्ला कहते हैं कि ‘मुकदमा अब खत्म पर है और तुम घर लौट आओगे।’ हर तरफ तुमलोगों की तारीफ हो रही है। मिस्र ने दुनिया भर की आंखें खोल दी है....
गेरहार्ड हेगलबर्ग का बहुत खूबसूरत खत मुझे मिला। यह एक अमरीकन है जो 1945 में, तासीर के दिल्ली के घर में ठहरा हुआ था। वह, पॉल राबसन, हावर्ड फास्ट और बहुत से और लोग तुम सबके लिए बहुत कुछ कर रहे हैं। उसने तुम्हारा अभिनंदन किया है और उम्मीद जाहिर की है कि तुम जल्द घर लौटेगो। कैसे अच्छे लोग हैं दुनिया में, हालांकि कितने दूसरे भी हैं जो इनकी आवाज दबा देना चाहते हैं......
सुनो, इसके बारे में क्या कहते हो.......
‘‘फैज अहमद फैज, ट्रेड यूनियन लीडर, पीस काउंसिल मेंबर, ऐडीटर पाकिस्तान टाईम्स, पाकिस्तान के और उर्दू बोलने वाले हिंदुस्तानियों के सबसे लोकप्रिय कवि.....’’ ऐसा कहते हैं एक बयान में पॉल राबसन, हावर्ड फास्ट और अनेकानेक दूसरे......
मैं पिछले दिनों काफी मसरूफ रही। तुम्हारी राय के मुताबिक ‘युवा पाठक मोर्चा’ कायम करने की दौड़धूप करती रही। आज रात उसकी पहली मीटिंग हुई.....तकरीबन 400 लड़के-लड़कियां थे।
इफ्ती (मियां इफ्तिकारूदीन- पाकिस्तान टाईम्स के मालिक) लौट आए हैं। कल उन्होंने दफ्तर का चक्कर लगाया। बता रहे थे कि जहां भी वे गए, फैज की चर्चा जरूर हुई.... जब तुम अप्रैल (?) में आओगे, तो इस पूरी जद्दोजहद के यकीनन बहुत बड़े मतलब होंगे।
एक फ्रांसीसी अखबार भेज रही हूं...... अल्जीरिया का है। बन्ने को (कामरेड सज्जाद जहीर) को जरूर दिखाना।
तासीर की पहली बरसी है नवंबर 30 को। हर तरफ अफसुर्दगी-सी छाई है।
.....लोग दिन ब दिन भले होते जा रहे हैं और यह उम्मीद बंध रही है कि वह वक्त दूर नहींे जब समझदारी कायम हो जाएगी....


अंग्रेजी से अनुवाद: नूर जहीर









Friday, June 25, 2021

महेश्वर के असंकलित गीत और कविताएँ

महेश्वर जी हिंदी की क्रांतिकारी जनवादी धारा के महत्वपूर्ण एक्टिविस्ट, पत्रकार, संपादक, लेखक, कवि और विचारक थे। वे समकालीन जनमत के प्रधान संपादक थे। महेश्वर जी जन संस्कृति मंच के महासचिव भी रहे। अपनी जानलेवा बीमारी से उनका जुझारू संघर्ष चला। लगभग एक दशक के उसी अंतराल में उन्होंने साहित्य-संस्कृति और पत्रकारिता के मोर्चे पर बेमिसाल काम किया। 25 जून 1994 को उनका निधन हो गया, पर आज भी उनका जीवन और उनका काम हमारे लिए उत्प्रेरक है, प्रासंगिक है। उनके स्मृति दिवस पर पेश है उनके कुछ असंकलित गीत और कविताएँ-


प्रीत के परनवां

अनगिन किरिनियां से घेरि के गगनवां 

                    सुरूजवा उतरै धरतिया

                    हमरी धरती पै राम

                    खेले फाग तपनवां।

रूमझुम रगिनिया से घेरि के गगनवां

                पवनवां उतरै धरतिया

                हमरी धरती पै राम

                        बाजे मारू बजनवां।

अतल हिलोरि चहूं दिसि व्यापै

अटक तोड़ि जिनगानी,

तेग सपन सतरंगिया बान्हे

फिरै जगत हुलसानी।

बावरी बिजुरिया से घेरि के गगनवां

            बदरवा उतरै धरतिया

            हमरी धरती पै राम

                    दमकै सरस सवनवां।

रंगमहल की राजलक्ष्मी

जब बिच मरै पियासी

अगम लहर पै डारि हिंडोला

झूलै जुग अविनासी।

अपरूब रंगोलिया से घेरि कै गगनवां

            मधुअवा उतरै धरतिया

            हमरी धरती पै राम

                    गावे कजरी फगुनवां।

सत की चुंदरी ओढ़ि सुहागिनि

सेज चढ़ी पुरवइया

सीस बदै नित न्याय की चैसर

खेलै सजन समइया

टटकी चंदनिया से घेरि कै गगनवां

            चनरमा उतरै धरतिया

            हमरी धरती पै राम

                दहकै प्रीत के परनवां

(जगरम, मार्च 91, प्रवेशांक)



सुन लो जिंदगी की मांग

सुन लो जिंदगी की मांग-

थोड़ी छाया

थोड़ी धूप

दे दो साथियो!

समय का पहिया ठहरा क्यों है, सोचो मेरे भाई,

सदियों से अपनी धरती की दिखी नहीं अंगड़ाई;

आसमान से गिरी न बिजली आंधी कभी न आई,

ऐसा क्या हो गया जगत की रीत बदल न पाई?

सुन लो जिंदगी की मांग-

थोड़ी छाया...



जिस तेवर से दुश्मन कांपे वहीं कहाये छाया,

बहुत पुराना भेद जगत का कोई समझ न पाया;

धूप वही करनी है जो अंधियारा दूर भगाये,

पिंजरे में बंदी गोरैया सांस मुक्ति की पाये।

सुन लो जिंदगी की मांग-

थोड़ी छाया....



जोर लगाकर पिंजरा तोड़े वही कहाये वीर,

अपने पथ पर बढ़ता जाये उल्टी धारा चीर;

ओस शीत ठिठुराये चाहे छूटे पसीना,

सूरज सा दमके कर डाले चाक वर्दी का सीना,

सुन लो जिंदगी की मांग-

थोड़ी छाया....



रोक टोक न माने दिल पर कड़ी चोट ले झेल,

विपदाओं के आगे खेलें धूप-छांव का खेल;

ऐसे वीरों की जमात को टेक सके यह धरती,

एका का हथियार उठाये, मारे कभी न मरती।

सुन लो नयी कबीरी सीख-



ले के छाया

ले के धूप

आओ साथियों।

जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाओ-

ले के छाया

ले के धूप

आओ साथियो!



चले हिरावल काल के

चले हिरावल काल के

जलती हुई मशाल से

रोशनियों को रोशन करती, चढ़ी रक्त की धारा

बदल रही है रस्म जिंदगी तोड़ जुल्म की कारा

                           साथी, तोड़ जुल्म की कारा!



धरती की भट्टी में तपकर जिंदा हुआ पसीना,

फसल हाथ से फाड़ रहा खूंख्वार जेठ का सीना,

चले हिरावल काल के

ज्वालामुखी सवाल से

मेड़ रौंदते कदम ढूंढते पावे नहीं किनारा,

बदल रही है रस्म जिंदगी तोड़ जुल्म की कारा,

                    साथी, तोड़ जुल्म की कारा!



पर्वत सीना तान कूच कर ओ मासूम इरादे,

मेहनतकश आकाश दहक छाती पर सूरज साधे,

चले हिरावल आज के

भावी सही समाज से

बच्चों की सांसों ने कातिल सपनों को ललकारा,

एक बार बस और कि होता सदियों का निपटारा,

                            साथी, तोड़ जुल्म की कारा!

(अग्रिम पहल, दिसंबर-फरवरी 1989)



कविताएँ

महेश्वर

बच्चों के बारे में

बच्चों से अदब से बात करो

वे तुमसे बाहर

तुम्हारे आदमी होने की तमीज है

जब भी उठता है

कोई हाथ

उनके खिलाफ

तुम्हारे आदमी होने की तमीज हैं

जब भी उठता है

कोई हाथ

उनके खिलाफ

तुम्हारे अंदर का इन्सान मारा जाता है

लोट सको

तो बचपन की देहरी पर लौटकर देखो

वहाँ मासूमियत की जबान में

घायल इन्सानियत का प्रतिशोध पलता है।

16.9.93



किसी एक के लिए

तुम्हारे सीने में जज्ब था मेरे सूरज का बीज

तभी तो धरती के अंधकार में

अब भी सलामत है उजाले की संभावना

तुम्हारी धड़कनों ने न सहेजा होता

मेरे उद्धत मन का आवारा समुद्र

तो लहरें किनारों से भला क्या बतियातीं

और कितना बेअक्स गुजर जाता

भंवर में फंसे आकाश का दिल

युद्ध के भोगे हुए दर्द की तरह तुम अपनी देह से उठीं

और मेरी सांसों के टूटते कगार पर

एक इन्सानी चीख की तरह ठहर गई

उस क्षण

काल की परिधि से परे

तुम्हारे एहसासों की जलती जमीन पर

मैंने जाना कि जन्म लेना भी कितना मुश्किल है

मैंने कहा- मुझे लो

                        मुझे ग्रहण करो

                        मुझे जीतो

                        मुझे जोड़ो

                        मुझे अपने बंधन में मुक्ति दो...

तुमने मुस्कराकर मेरी आत्मा के ऊसर में

रोप दिया अपनी उदास आंखों का नन्हा-सा बिरवा और आज मैं

तुम्हारे उस भरे-पूरे पेड़ पर

जीवन और यौवन का शाश्वत बसंत हूं

आखिर में एक दिन

जब पतझड़ और पाले की सूनी पगडंडी से

रात और बिरात की रागिनी अलापता

आएगा मृत्यु का अभिशप्त हरकारा-

जब सजने से पहले ही घिस-पिट जाएगा

श्रद्धांजलियों की लफ्फाजी का कीमती लिबास-

जब उठने से पहले ही बैठ जाएगा

अफवाहनुमा सच और सचमुच अफवाहों का गर्द-गुबार-

जब कलई किये चेहरों से अचानक

उतर जाएगा आंसुओं और अफसोस का मुलम्मा-

और जब नामी-गिरामी मसखरों का भी जायका बिगाड़ देंगे

मेरी उदात्तता के लावारिस चुटकुले-

तब,

तुम्हारे भरे-पूरे पेड़ के धूप धुले माथे से

टूटेगा एक कोई पत्ता-चुपचाप-

सदियों के धीरज-सा

आहिस्ता-आहिस्ता आएगा नीचे

छुएगा

समेटेगा

धारण करेगा मुझे मेरी संपूर्णता में

और मेरी जड़ों में बज उठेगा जैसे जलतरंग....

27.9.93



कुछ निरे खैरख्वाहों से

पहले भाव से लुभाया

अब अभाव का ठेंगा दिखाते हो!

अपने को अपने ही शीशे में उतारते हुए

जब नमक निभाने का वक्त आया

तो मौत की शर्तों पर जीना सिखाते हो!

क्या समझते हो मुझे-

सिर्फ इसलिए

कि काजी जी दुबले हैं शहर के अंदेशे

मैं नाक दबाकर निगल लूंगा

तुम्हारी छिनाल भलमनसी का गू!

मैं नहीं हूं

सवर्ण मुर्दों पर लुटाए गए सिक्कों-जैसे

जिंदगी के चंद भगोड़े पलों का बेगैरत उठाईगीर

टूटी सांसों की आंख मिचौली नहीं है मेरी दास्तान

न शो-केस में सजी बेजान मूरतों पर

खारिश मारे कुत्तों की उठी हुई टांग

मैं नहीं हूं

आत्मा की देहबंदी का दलाल

न भिखारी

न मसीहा

न वाइज

न बनिया-बक्काल


मैं हूं समय का स्वायत्त सारथी

मेरे हाथ की रेखाओं में नत्थी है

नकचढ़े सूरज के सात घोड़ों की बाग

मेरे तलवों में दम तोड़ते हैं

दिन के सेंधमार काली रातों के लंबोतरे साये

मेरे फैसलों की शिनाख्त है

अतीत के गर्त में सर धुनता भय का अपराधी अंधड़

मुझे मालूम है मचकती सदिच्छाओं की साजिश

और ऐसी शुभकामनाओं का वह पुराना शब्द जाल

जो आदमी से चूस लेता है आदमी की अंतर्वस्तु....

नहीं, नहीं

तुम कभी नहीं बना सकते

मेरी अर्थवत्ता को मेरा ही शून्य

एहतियात और पाबंदियों की फकत खैरख्वाही से

जकड़ नहीं सकते तुम


हामियों-मनाहियों के निरे दस्तूर से



कंधों पर भविष्य वहन करने का मेरा दायित्व...



मैं नहीं हूं ताबेदार कैलेंडर के पन्नों का

न घड़ी के कांटों का हुक्मी गुमाश्ता

मैं तो हूं आने वाली पीढ़ियों का राजदूत

काल के द्वार पर भावी नर-नारियों की दस्तक

मैं तुम पर इंसानियत का चढ़ा हुआ कर्ज हूं

और इसकी भरपाई की बकाया रसीद पर

अपने बच्चों के नाम का रबड़ स्टाम्प हूं...

नगद-उधार के रिश्तों के माहिर हो,

अब तो कबूल करो

मेरी ताईद के बगैर तुम उलटपांव प्रेत हो....

                                                        ऋणी हो

                                                        कैदी हो

                                                        सीठी हो

                                                        रेत हो!! 
                                                                        (30.9.93)



एक कटे हुए सिर का बयान

(तसलीमा नसरीन के लिए एक कविता)

अंधेरे की छाती में

रोशनी के सूराख की तरह

मैं अपने लहू की धार से उभरा

और

जबकि

मुर्दा जिस्मों की नुमाइश में मशगूल थे

खुदाई खिदमतगार

मैंने एक अदद सीधे-सच्चे इन्सान को

उसकी अपनी जबान में पुकारा

रिश्तों के सफेद खून को क्या मालूम

कि किसी सरहद के रोके नहीं रुकता

जमीर का फैलाव

मांएं अलबत्ता जानती हैं

कि उनके बच्चों के लिए

नकचढ़े मजहब से ज्यादा जरूरी है

कायदे के सूखे गर्भ पोतड़े

तो क्या....

तो क्या मांओं और बच्चों के बाद

अब पोतड़ों को भी सूली चढ़ाओगे?

और क्या होगा

सरहदों का और जमीर का-

ये तो हद है, म्यां,

ये तो हद है...

मैंने कहा- नहीं...

मैं ऐलान करता हूं-

मैं ऐलान करता हूं

खुदा से खाविंद तक

अब और नहीं है

महज खौफ की परछाई

एक औरत

साजिश की रेशमी उंगलियों पर

अब और नहीं है

सिर्फ अक्सरीयत और

अकल्लीयत का जोड़-बाकी

आने वाले कल का बीज

एड़ियों से झटककर मौत के साये

मुक्त हो जीवन का प्रचंड सौंदर्य

पचास हजार टके की सनद रहे-

मेघना बेचकर मदीना नहीं

कमाएगा मेरा मयमनसिंग

मेघना

बेचकर

मदीना

नहीं कमाएगा

मेरा मयमनसिंग!!

13.12.93

(समकालीन जनमत, 16-31 दिसंबर 1994)

Thursday, November 5, 2020

....ताकि देश बच सके

शोभा सिंह की कविताओं पर संक्षिप्त टिप्पणी

-सुजीत कुमार 

शोभा सिंह का कविता संग्रह ‘यह मिट्टी दस्तावेज हमारा’ पढ़ने को मिला। यह संग्रह गुलमोहर किताब प्रकाशन, 55 सी, पाॅकेट-4, मयूर विहार-1 दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। इसका मूल्य 120 रुपया है। इस कविता संग्रह में 61 कविताओं को संग्रहित किया गया है। 

शोभा सिंह की कविताएं मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण हैं। कविताओं में सामाजिक-राजनैतिक घटनाक्रम का बड़े ही सहज अंदाज में बयान किया गया है। आज के दौर में जिस तरह का राजनीतिक पतन हुआ है कविताओं को पढ़ते वक्त उसे महसूस किया जा सकता है। शोभा सिंह ने अपनी कविताओं में बहुत सूक्ष्मता से देश में बढ़ रहे अलोकतांत्रिक विचारों को दर्शाया है। किस तरह फासिस्ट शक्तियां हमारे समाज और पूरे देश को बर्बाद करने पर उतारू हैं, कविताओं को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है।

शोभा सिंह की कविताओं में संघर्ष करती महिला की अभिव्यक्ति है। कैसे एक महिला बाहरी और भीतरी नौकरी के मामले मेें परिस्थितियों का सामना करती है इस पर फोकस किया गया है। ‘शाहीनबाग: यह मिट्टी दस्तावेज हमारा’, ‘रोहित बेमुला और अंबेडकर’, ‘तलवार की तुर्श धार’ (सोनी सोरी के लिए), गटर में और मौतें नहीं, आजादी की लौ, कश्मीर, औरत, बीड़ी और मजदूर, भुट्टे वाली, नमक मजदूर, स्त्री, गौरी लंकेश, मिसाल: बिलकिस बानो, उदास है देश की मिट्टी, एसिड विक्टिम, रिश्ते, नहीं चाहिए नफरत आदि कविताएं बेमिसाल कविताएं हैं। 

इन सारी कविताओं के माध्यम से शोभा सिंह ने महिला व्यक्तित्व को उभारने की कोशिश की है। भारतीय राजनीति का जिस तरह से सांप्रदायीकरण किया गया है, उसकी तस्वीर शोभा सिंह की कविताओं में बखूबी देखने को मिलती है-

मिसाल: बिलकिस बानो

पिछले पंद्रह साल

तुमने इंतजार किया

बिलकिस बानो, न्याय का

पिछले पंद्रह साल

आसान नहीं था कुछ

कितनी बाधाएं, दुश्वारियां जटिल

और बेहद तल्ख

विपरीत हालात के बीच

तुमने सिर्फ इंतजार किया

मिलने वाले इंसाफ का

या दूसरी कविता 

गौरी लंकेश

गौरी लंकेश! 

तुम्हारी हत्या के बाद भी

वे तुम्हें दागदार करते रहे

वे गालियां देते भद्दी

जिनसे खून खौलता

फिर लगता उन वहशियों से संवाद भी

शर्मनाक है- बेहद शर्मनाक

इन दोनों कविताओं में फासीवादी घटनाओं को उजागर किया गया है। वर्तमान सरकार के राजनैतिक पैंतरों और फासीवादी वहशी चेहरे को उजागर करने की दृष्टि से शोभा सिंह की कविताएं बहुत प्रासंगिक हैं। कविताओं के द्वारा शोभा सिंह ने समकालीन यथार्थ को उजागर किया है। सारी कविताएं आज के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। कवि का मूल उद्देश्य लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाना है ताकि देश बच सके। 

Tuesday, June 23, 2020

नियमित फेसबुक लाइव

पचास दिनों तक नियमित फेसबुक लाइव की सूची
(1 मई से 19 जून तक)

1 may 2020
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216836821652504/
बलराज साहनी और दो बीघा ज़मीन । बलराज साहनी की आत्मकथा का अंश।

Sudhir Suman लाइव थे.
2 मई •
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216848416342364/
I. सत्यजीत राय और उनकी फ़िल्में
फ़िल्म समीक्षक और कहानीकार ब्रजेश्वर मदान की नज़र में

https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216848792031756/
II. कहानीकार मार्कंडेय जी के जन्मदिन पर उनकी कहानी 'माँ जी का मोती' का पाठ

3 may
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216856342340509/
नीरा परमार की कहानी 'एक और कोलंबस' का पाठ

4 May 2020
आरा की कविता-I https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216868784211548/ & आरा की कविता-II https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216869201941991/
(रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’, विजेंद्र अनिल, रामनिहाल गुंजन, अजय सिंह, कुमार मुकुल, चंद्रेश्वर, निलय उपाध्याय, कुमार वीरेंद्र, बलभद्र, सुमन कुमार सिंह, अरुण शीतांश, जितेंद्र कुमार, सुनील श्रीवास्तव, ओमप्रकाश मिश्र, रविशंकर सिंह, सिद्धार्थ वल्लभ की कविताओं का पाठ)

5 May
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216878233327770/
'कार्ल मार्क्स और विश्व साहित्य'। एस.एस. प्रैवर के लेख के अंशों का पाठ

6 May 2020

https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216888628107633/
पत्रकार, आलोचक, कला समीक्षक, कहानीकार और सांस्कृतिक संगठक अनिल सिन्हा की कहानी 'बहुत कीमती देह' का पाठ

7 May 2020
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216899662063475/
रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी 'छुट्टी' का पाठ

Sudhir Suman लाइव थे.
8 मई •
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216910366291074/
कहानीकार-पत्रकार शशिभूषण द्विवेदी की याद में उनकी कहानी 'एक बूढ़े की मौत' का पाठ

9 may 2020
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216919785046537/
'1857 की क्रांति, अजीमुल्ला खां और कौमी तराना- हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा’ पर चर्चा


10 may 2020 https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216930221187434/
'1857 और आरा', प्रसन्न कुमार चौधरी और श्रीकांत की पुस्तक '1857 बिहार-झारखंड में महायुद्ध' से

Sudhir Suman लाइव थे.
11 मई • https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216939755945797/
मंटो के जन्मदिन पर उनकी एक कहानी 'शहीद-साज़' का पाठ

Sudhir Suman लाइव थे.
12 मई • https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216947970831164/
आरा (भोजपुर) की महिला रचनाकारों- उर्मिला कौल, ऋता शुक्ल, सविता सिंह, शोभा सिंह, मीरा श्रीवास्तव, डाॅ. विजय लक्ष्मी शर्मा,अर्चना श्रीवास्तव, संजू वर्मा, प्रियंबरा, स्वयंबरा, आस्था, नेहा नुपुर, नीतु सुदीप्ति ‘नित्या’ और छवि उर्फ रचना की रचनाएं की रचनाओं का पाठ।
Sudhir Suman लाइव थे.
13 मई • https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216956941175417/
मशहूर इंकलाबी शायर हसरत मोहानी की याद में
हसरत मोहानी तथा आरा के शाहिद कलीम, नोमान शौक़, आलम ख़ुर्शीद, सुल्तान अख़्तर, रमेश कंवल, क़ुर्बान आतिश, इम्तयाज अहमद , वेदनंदन सहाय, रामनिहाल गुंजन, विजेंद्र अनिल, पवन श्रीवास्तव, जगदीश नलिन, नीरज सिंह, सुशील कुमार की ग़ज़लों और तब्बसुम फातिमा की कविताओं का पाठ।

Sudhir Suman लाइव थे.
14 मई • https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216965233982732/
रेणुजी के रिपोर्ताज 'भूमि-दर्शन की भूमिका-4' और कहानी 'तबे एकला चलो रे' का पाठ

15 may
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216973084778997/
हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी, जिन्होंने बच्चों के लिए कई पुस्तकें लिखी थीं, की एक लंबी कहानी 'बगुला भगत' का पाठ।
(फेसबुक लाइव का पंद्रहवाँ दिन)

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16 मई • https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216982497134300/
मंगलेश जी के जन्मदिन पर उनकी कुछ कविताओं का पाठ
(फेसबुक लाइव का सोलहवाँ दिन)

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17 मई को 10:56 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216991882408926/
चेखव की कहानी 'वांका' का पाठ

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18 मई को 10:01 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10216999304554475/
कथाकार अल्पना मिश्र की कहानी 'गुमशुदा' का पाठ।
आज 18 मई को अल्पना मिश्र का जन्मदिन है।

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19 मई को 9:58 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217007184471468/
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के स्मृति दिवस पर उनके निबंध 'भीष्म को क्षमा नहीं किया गया' का पाठ। साथ में दो निबंधों- 'घर छोड़ने की माया' और 'देवदारु' के अंशों को भी पढ़ा।

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20 मई को 10:00 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217016594466712/
जन्मदिन की 120वीं वर्षगाँठ पर पंत जी (सुमित्रानंदन पंत) की कुछ कविताओं का पाठ।
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21 मई को 10:01 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217025437167774/
व्यंग्यकार शरद जोशी के जन्मदिन पर उनकी कुछ व्यंग्य-रचनाओं का पाठ।
साथ में हिंदी व्यंग्य विधा के आरंभिक दौर के महत्वपूर्ण लेखक बालमुकुंद गुप्त के व्यंग्य ‘श्रीमान का स्वागत’ का भी पाठ।
(फेसबुक लाइव का इक्कीसवाँ दिन)

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22 मई को 9:39 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217034281348873/
राजाराम मोहन राय के जन्मदिवस पर
महादेवी वर्मा की पुस्तक ‘शृखला की कड़ियाँ’ के अंश और स्वयं प्रकाश की कहानी ‘मंजू फालतू’ का पाठ

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23 मई को 9:56 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217043217452270/
अखिलेश कुमार की कहानी 'कोहरे की रात' का पाठ

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24 मई को 9:55 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217052379681320/
प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ का पाठ। सबको ईद मुबारक हो।

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25 मई को 10:05 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217061711114600/
नक्सलबाड़ी दिवस, काजी नजरूल इस्लाम के जन्मदिवस, ईद और इप्टा के स्थापना दिवस पर कुछ कविताओं और गीतों का पाठ
(फेसबुक लाइव का 25वाँ दिन)

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26 मई को 10:03 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217070447212997/
कथाकार रणेंद्र की कहानी ‘सरेंडर जतरा’ का पाठ

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27 मई को 9:59 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217079297914259/
आज 27 मई को युवा रचनाकार सुमन कुमार सिंह की कहानी ‘मन रे गा’ और ओमप्रकाश मिश्र की कहानी ‘सोलर प्लेट’ का पाठ किया। इन कहानियों में गाँवों में रोजगार और चिकित्सा के प्रश्न को केंद्र बनाया गया है। दोनों कहानीकारों की कहानियों की भाषा-शैली बेहद संप्रेषणीय थी।
आज के फेसबुक लाइव में 24 मई को स्मृतिशेष हुए आरा के भोजपुरी के गजलकार और नाटकों तथा भोजपुरी फिल्मों और टीवी सीरियल के अभिनेता ए.के. आँसू और आज ही गुजरे उर्दू के प्रसिद्ध व्यंग्यकार मुज्तबा हुसैन को भी याद किया। आज देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का भी स्मृति दिवस था। इस मौके पर उनके द्वारा अपनी बेटी इंदिरा के नाम लिखे गए पत्रों के अंशों को पढ़ा। बच्चों के भीतर जिज्ञासा, वैज्ञानिक बोध और तर्कशीलता पैदा करने के लिहाज से नेहरू जी के ये खत उल्लेखनीय हैं। उनके लिए किस तरह के लहजे में लिखा जाए, इसका भी ये बेहतरीन उदाहरण हैं।

Sudhir Suman लाइव थे.
28 मई को 9:51 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217087839687798/
1. सगीर रहमानी की कहानी ‘उसे जमीन पर रहने दो’ का पाठ
2. महान क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा की शहादत की 90वीं वर्षगाँठ के मौके पर,
भगवतीचरण वोहरा के साथी जयदेव कपूर द्वारा लिखे गए एक पुराने संस्मरण का पाठ

Sudhir Suman लाइव थे.
29 मई को 10:01 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217096982556364/
फेसबुक लाइव के 29वें दिन आज कवि मदन कश्यप के जन्मदिन पर उनकी कुछ कविताओं और हिंदी-भोजपुरी के प्रसिद्ध कहानीकार-नाटककार सुरेश कांटक की कहानी ‘अब और नहीं’ का पाठ। सुप्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर और स्मृतिशेष गीतकार योगेश की संक्षिप्त चर्चा।।

Sudhir Suman लाइव थे.
30 मई को 10:01 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217105681373829/
30 मई। हिंदी पत्रकारिता दिवस।
जनपथ संपादक अनंत कुमार सिंह की कहानी 'एक्सक्लूसिव न्यूज़', विमल कुमार के काव्य-संग्रह 'हत्या से आत्महत्या तक' की कुछ कविताओं और प्रसिद्ध आलोचक रामविलास शर्मा के संस्मरण 'हिंदी-भूषण बाबू शिवपूजन सहाय' का पाठ।
(नियमित फेसबुक लाइव का तीसवाँ दिन)

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31 मई को 9:57 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217114723159868/
आज नियमित फेसबुक लाइव की 31वी कड़ी में कहानीकार नीरज सिंह की कहानी ‘रिलीफ’ का पाठ। साथ ही स्मृति दिवस पर अनिल विश्वास द्वारा संगीतबद्ध एक गीत का गायन और वरिष्ठ क्रांतिकारी कवि वरवर राव की रिहाई की माँग के साथ उनकी चार कविताओं का पाठ।
आज एक माह का सफर हमने तय कर लिया। आप सबका शुक्रगुजार हूँ।

Sudhir Suman लाइव थे.
1 जून को 9:47 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217123561900831/
चंद्रभूषण और मनोज शर्मा की कविताओं का पाठ

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2 जून को 10:05 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217141212342081/
पत्रकार, कहानीकार और रंगकर्मी रामेश्वर उपाध्याय की कहानी ‘दुखवा में बीतल रतिया’ का पाठ
(2 जून 2020, नियमित फेसबुक लाइव की 33वीं कड़ी।)

Sudhir Suman लाइव थे.
3 जून को 9:54 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217141212342081/
शीन हयात की कहानी 'डायनासोर' का पाठ

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4 जून को 9:58 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217150111684559/
डाॅ. विंध्येश्वरी की आत्मकथात्मक कहानी ‘जोखिम’ का पाठ।
(4 जून 2020)

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5 जून को 10:03 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217159771726054/
गीत-नाट्य संस्था युवानीति की 42वीं वर्षगाँठ पर उससे संबंधित संस्मरण। साथ में विश्व पर्यावरण दिवस, संपूर्ण क्रांति दिवस, संत कबीर और जाबिर हुसैन के जन्मदिन पर कुछ चर्चा

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6 जून को 9:51 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217169232362564/
मधुकर सिंह की कहानी ‘लहू पुकारे आदमी’ और गीत ‘महुआ गीत’ तथा अलेक्सान्द्र पूश्किन के जन्मदिन पर उनकी तीन कविताओं का पाठ
(नियमित फेसबुक लाइव का सैंतीसवाँ दिन)

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7 जून को 9:57 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217178997286681/
राकेश कुमार सिंह की कहानी ‘घोड़ा’ और अरविंद गुप्त की कहानी ‘देशराग’ का पाठ।

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8 जून को 9:53 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217187554860615/
कथाकार मिथिलेश्वर की कहानी ‘हरिहर काका’ का पाठ।

Sudhir Suman लाइव थे.
9 जून को 9:52 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217195781426274/
वरिष्ठ कवि आलोकधन्वा की कुछ कविताओं का पाठ। उलगुलान और उसके महानायक बिरसा मुंडा के संदर्भ से जुड़ी अनुज लुगुन और अच्युतानंद मिश्र की कविताओं, एम.एफ.हुसैन के स्मृति दिवस पर कुमार मुकुल और सुधीर सुमन की कविताओं तथा जन्मदिन पर शोभा सिंह की कुछ कविताओं का पाठ।
(9 जून, 2020 नियमित फेसबुक लाइव का 40वाँ दिन)

Sudhir Suman लाइव थे.
10 जून को 9:57 अपराह्न बजे •
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217205348705450/
10 जून 2020, भोजपुर के मजदूर-किसान आंदोलन पर केंद्रित रणजीत बहादुर माथुर की कहानी ‘अहं’ भाग-1 (किंचित संक्षिप्त)
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217205268023433/
रणजीत बहादुर माथुर की कहानी ‘अहं’ भाग-2 (किंचित संक्षिप्त)
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217204728529946/
रणजीत बहादुर माथुर की कहानी ‘अहं’ भाग-3 और जितेंद्र कुमार के गीत ‘नीर आँखिन बरसे’ का पाठ

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11 जून को 9:55 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217213399906725/
11 जून, शिव कुमार यादव की कहानी ‘साँप का धर्म’ और कुछ लघुकथाओं तथा महावीर राजी की कहानी ‘योद्धा’ का पाठ। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी धारा के शहीद रामप्रसाद बिस्मिल के जन्मदिन पर उनके बारे में भगतसिंह के विचारों की प्रस्तुति।

Sudhir Suman लाइव थे.
12 जून को 10:02 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217222379771216/
नियमित फेसबुक लाइव में लाल्टू, कुमार मुकुल, विनय सौरभ, घनश्याम त्रिपाठी, अनीता भारती, पंकज चौधरी, राकेश प्रियदर्शी, राजेश कमल और रमेश प्रजापति की कविताओं का पाठ। (12 जून 2020)

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13 जून को 9:57 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217231614602081/
13 जून, फेसबुक लाइव में भोजपुरी कहानी। कृष्णानंद कृष्ण की भोजपुरी कहानी ‘खाली बक्सा, सूखल गुलाब’ और सत्तर के दशक में चंपारण में हुए क्रांतिकारी किसान आंदोलन के नायक शहीद गंभीरा साह की जिंदगी पर केंद्रित ब्रजकिशोर की कहानी ‘एगो आउर अभिमन्यु’ का पाठ। श्रद्धांजलि- वीरेंद्र कुमार बरनवाल, गुलजार देहलवी उर्फ पंडित आनंद मोहन जुत्शी। मेहदी हसन साहब के यादगारी दिवस पर उनकी आवाज में गायी गई इंकलाबी शायर हबीब जालिब की मशहूर गजत ‘दिल की बात लबों पर लाकर अब तक हम दुख सहते हैं’ का गायन।
( नियमित फेसबुक लाइव की 44 वीं कड़ी।)

Sudhir Suman लाइव थे.
14 जून को 9:54 अपराह्न बजे • https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217240144935334/
अवधेश श्रीवास्तव की कहानी ‘विमल मेहता सेकिंड’ और वासुकी प्रसाद ‘उन्मत्त’ की कविताओं का पाठ।
दुनिया के महान क्रांतिकारी चे ग्वेरा के जन्मदिन के अवसर पर चर्चित लातिन अमेरिकी लेखक एदुआर्दो गालेआनो की चुनी हुई रचनाओं की पुस्तक ‘आग की यादें’ (गार्गी प्रकाशन) के अंशों का पाठ।
(14 जून 2020, नियमित फेसबुक लाइव का 45वाँ दिन)

Sudhir Suman लाइव थे.
15 जून को 10:04 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217248445822851/
बनारसी प्रसाद भोजपुरी, शमशेर बहादुर सिंह, दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’, अविनाशचंद्र विद्यार्थी, भुनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव ‘भानु’, मधुकर सिंह, सर्वदेव तिवारी ‘राकेश’, रामनाथ पाठक ‘प्रणयी’, विन्ध्यवासिनी दत्त त्रिपाठी, विन्ध्यवासिनी देवी, जितराम पाठक, महेंद्र गोस्वामी, विजेंद्र अनिल, दुर्गेंद्र अकारी, विजयानंद तिवारी, चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह, बरमेश्वर सिंह, रामनिहाल गुंजन, कुमार विरल, हरिद्वार प्रसाद ‘किसलय’, जितेंद्र कुमार, सुरेश कांटक, शिवपूजनलाल विद्यार्थी, नीरज सिंह, हरेश्वर राय, ब्रजभूषण तिवारी, प्रकाश उदय, बलभद्र, कृष्ण कुमार ‘निर्मोही’, राजाराम प्रियदर्शी, आदित्य नारायण, सुमन कुमार सिंह, चंद्रप्रकाश तिवारी, चंद्रभूषण पांडेय, राकेश दिवाकर की #भोजपुरी कविताओं, गीतों और गजलों का पाठ।(15 जून 2020, नियमित फेसबुक लाइव)


16 june
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217257279483687/
भोजपुरी गद्य : डाॅ. गदाधर सिंह के ललित निबंध ‘हम बोका बननी’, शिवपूजन लाल विद्यार्थी की कहानी ‘लगेज’ और तैयब हुसैन ‘पीड़ित’ की कहानी ‘सुविधा के शहर में सांप’ का पाठ।
शायर शहरयार के जन्मदिन पर उनकी दो गजलों और सुप्रसिद्ध गायक व संगीतकार हेमंत कुमार के जन्मदिन पर उनके द्वारा गाये गाये दो फिल्मी गानों का गायन। यह वर्ष हेमंत कुमार का जन्मशताब्दी वर्ष है।
श्रद्धांजलि : कैलाश चंद चैहान (16 जून 2020, नियमित फेसबुक लाइव का 47वाँ दिन)

Sudhir Suman लाइव थे.
17 जून को 10:02 अपराह्न बजे https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217265662853266/
आरा (भोजपुर) की कविता-3 का आरंभ दो नये कवियों उद्देश्य कुमार और सुजीत कुमार की कविताओं के पाठ से हुआ, उसके बाद जितराम पाठक, ब्रजभूषण मिश्र ‘आक्रांत’ अजित कुमार सिन्हा, शृंगेश्वर, भगवती राकेश, शाह भोला, जगदीश पांडेय, माहिर आरिफ आरवी, सुरेंद्राचार्य, संतोष मिश्रा ‘गोपाल’, रमाकांत पांडेय, शाह भोला, देव कुमार मिश्र ‘अलमस्त’, श्याम मोहन अस्थाना, सूर्यदेव राय, श्रीराम तिवारी, दिनेश, मनमोहनी कांत, विजयमोहन सिंह, कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह, सुधाकर उपाध्याय, अनिल चमड़िया, मीर हसनैन ‘मुश्किल’, बनाफर चंद्र, आसिफ रोहतासवी, शिवकुमार यादव, संतोष श्रेयांश और रामदेव करथ की कविताओं, गीतों और गजलों का पाठ किया गया।
(17 जून 2020, नियमित फेसबुक लाइव की 48वीं कड़ी(

18 june 2020
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217275017807134/
आरा (भोजपुर/शाहाबाद) की कविता-4.
अरुण कमल, बद्रीनारायण, जनार्दन मिश्र, कुमार नयन, प्रेमरंजन अनिमेष, दिनेश कुमार, अनिल अनलहातु, नीलोत्पल रमेश, सपना चमड़िया, लक्ष्मीकांत मुकुल, शेषनाथ पांडेय, राजेश दूबे, ए.कुमार आंसू, हीरा ठाकुर, रामसुभग मिश्र ‘रासु’, हरेराम सिंह, सुनील कुमार चौधरी, इंदु पांडेय, कुमारी बेबी, अरविंद अनुराग, सुरेश श्रीवास्तव, यतींद्रनाथ सिंह, सुरेश श्रीवास्तव की कविताओं, गीतों और गजलों का पाठ।
(नियमित फेसबुक लाइव की 49वीं कड़ी)

19 जून 2020
https://www.facebook.com/1222778292/videos/10217283181771228/
नियमित फेसबुक लाइव की 50 वीं कड़ी
जनगीतकार और जनवादी कहानीकार विजेंद्र अनिल पर विशेष
जन्मदिन पर हिंदी माधवराव सप्रे की कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ का पाठ
फराज नजर चांद की गजल