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Saturday, January 17, 2015

अक्खड़ - फक्कड़ मिजाज के कवि भोला जी की स्मृति को सलाम : बलभद्र


सुधीर सुमन और सुमन कुमार से पता चला कि 15 जनवरी 2015 को आरा में भोला जी की स्मृति में 2 बजे से एक कार्यक्रम आयोजित है। मैं भोला जी के प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ । वे हमलोगों के एक प्रिय साथी थे। वे हिंदी और भोजपुरी में कवितायेँ लिखते थे और उनकी पतली सी काव्य- पुस्तिका 'भोला के गोला' की कुछ काव्य-पंक्तियाँ मुझे अब भी याद हैं । वे पान की दूकान पर बैठे-बैठे तुकबन्दियाँ किया करते थे और उन तुकबंदियों में वे कभी सरकार, कभी पुलिस, कभी तथाकथित रंगदारों पर व्यंग्य के जरिये उन की तीखी आलोचना करते थे । 
उनके कुछ स्थायी ग्राहक थे और वे पान के साथ साथ भोला जी की तुकबंदियों के भी मजे लिया करते थे।  मेरे कुछ सहपाठी भी भोला जी के पान के साथ-साथ उनकी तुकबंदियों के मुरीद हो गए थे और बनाही, बिहियां से चलकर वे भोला जी के पान और तुकबंदियों के साथ कॉलेज परिसर में पहुँचते थे  वे एक केंद्र थे। भोला जी सबको उनके नाम से पुकारते थे, सबको जानते थे वे एक ऐसे केंद्र थे जहाँ से हमलोग जान जाते थे कि कौन शहर में है, कौन नहीं है वे मेरे आरा के डेरे पर भी आते थे और कई बार हमलोगों ने साथ- साथ खाना खाया हैं । मेरी माँ और बड़ी माँ सब भोला जी को जानती थी और उनको प्रेम से बैठाती-बतियाती थी| 

भोला जी को मैं 1984 से जानता हूँ तब छात्र संगठन ए. बी. एस. यू. था और जब मैं उससे जुड़ा तो पाया कि इससे और इस तरह के संगठनों और मिज़ाज के लोग भोला जी के पास जाते थे, बतियाते थे और चाय-पान करते थे । भोला जी भाकपा (माले) से जुड़े थे और कई बार जसम के राष्ट्रीय अधिवेशन में भी शरीक हुए थे । वे अक्खड़-फक्कड़ मिज़ाज के आदमी थे और इसी मिज़ाज के कवि भी थे ।
वे कुछ इस तरह के व्यक्ति थे जिनको खासकर वे लोग जो सभ्य- भव्य मन-मिज़ाज वाले थे, पचा नहीं पाते थे। जैसे कि चाय में खैनी मिला कर पी जाना,   जैसे कि जूठ-काँठ के भेद भाव को न मानना जैसे कि लठमार तरीके से अपनी बात कहना ।
वे जिस मिज़ाज के थे, उसी मिज़ाज के साथ हमलोगों के मित्र थे, साथी थे। उनके खिलाये पान की लाली मेरे व्यक्तित्व का अविभाजित हिस्सा हैं । उनकी कविताएं बहुत कलात्मक न होते हुए भी एक आम आदमी की सामाजिक प्रतिक्रिया के तौर पर बहुत मायने रखती हैं 



Thursday, January 15, 2015

नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी (भोला जी के स्मृति दिवस पर ) : सुधीर सुमन

भोला जी को मैं अपने बचपन से नवादा थाने के इर्द-गिर्द पान की गुमटी में बैठा देखता रहा। यहीं बैठकर वे गरीब-मेहनतकशों पर जुल्म ढाने वाले थाने और कोर्ट को उड़ाने और जलाने की बात करते रहे, बेशक व्यावहारिक तौर पर नहीं, जुबानी ही सही, पर इन संस्थाओं के प्रति जनता का जो गहरा गुस्सा था, वह तो इसके जरिए अभिव्यक्त होता ही था। कितनी बार प्रशासन के अतिक्रमण हटाओ अभियान में उन्हें यहां से हटना पड़ा था, पर बार-बार वे यहीं आकर जम जाते थे। 

उनकी पान दूकान आरा में जनसंस्कृति और जनता की राजनीति से जुड़े लोगों के मेल-मिलाप का अड्डा रही। भले व्यंग्य में कभी उन्होंने खुद पर बेवकूफ पान वाले का लेबल लगा लिया था, पर वे पढ़े-लिखे और अपने ही निजी स्वार्थ की दुनिया में खोये रहने वाले समझदारों में से नहीं थे, बल्कि उन समझदारों में से थे, जिनके लिए रमता जी ने कहा था कि राजनीति सबके बूझे के बुझावे के पड़ी, देशवा फंसल बाटे जाल में छोड़ावे के पड़ी। भोला जी शहर में माले और जसम की गतिविधियों मे शिरकत करते और पान की दूकान पर बैठे हुए कांग्रेस और गैर-कांग्रेस की तमाम सरकारों को आते-जाते देखते रहे और महसूस किया कि गरीबों की पीड़ा खत्म ही नहीं हो रही है। उदाहरण के तौर पर इसी गीत को देखा जा सकता है-

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा 
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा

कांग्रेस के लंबे शासन के बाद लालू जी जो वर्णव्यवस्था और धार्मिक अंधविश्वास की आलोचना करते हुए सत्ता में आए थे, वे बहुत ही जल्दी उसी की शरण में चले गए, लेकिन भोला जी ने ऐसा नहीं किया। बल्कि अपनी पान की दूकान पर बैठकर उनकी सरकार की भी आलोचना की। जिंदगी भर वे किराये के घर में रहे, बाल-बच्चों के लिए जितना करना चाहिए था, उतना कर नहीं पाए, लेकिन वे अपनी मुश्किलों के हल के लिए किसी देवी-देवता के शरण में नहीं गए और ना ही मुश्किलों के कारण निराशा में डूबे। जीवन ही नहीं, उनकी कविता में भी गरीब तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सवाल पूछता है और यह सवाल पूछना ही उनकी कविता और व्यक्ति दोनों की ताकत है।

मुझे जनमत के पुराने अंक में पढ़ी हुई ‘मैं आदमी हूं’ शीर्षक की उनकी एक कविता याद आती है, जिसमें उन्होंने मेहनतकश मनुष्यों की जुझारू शक्ति, शान और सौंदर्य के बारे में लिखा था। इतना ही नही, भोला ने जाने-अनजाने हमें यह सिखाया कि गरीब-मेहनतकश आदमी की निगाह से देखने से ही शासन-प्रशासन के दावों, राजनीति और विचार का असली सच समझ में आ सकता है। ‘पढ़निहार बुड़बक का जनिहें, का पढ़ावल जा रहल बा’ कविता इसी की बानगी है, जिसमें अखबार की खबरों पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि नीचा को ऊंचा और ऊंचा को नीचा बताया जा रहा है, जिन्हें शरीफ कहा जा रहा है, दरअसल लोगों की निगाह वे लुच्चे हैं। उसी कविता में आगे वे कहते हैं गरीबन के कइसे गारल जा रहल बा। अपनी आवाज के जरिए वे बकायदा गारने ( कसकर निचोड़ने) की प्रक्रिया को भी व्यक्त करते थे।

मुझे जनमत में ही सितंबर 87 में छपी भोला जी की एक और कविता की याद आती है- जान जाई त जाई, ना छूटी कभी/ बा लड़ाई इ लामा, ना टूटी कभी। और इस लंबी लड़ाई में यकीन के बल पर ही भोला ने दो टूक कहा- जनता के खीस, देखिंहे नीतीश। इसे खीस और नीतीश का तुक जोड़ना मत समझ लीजिए। सोचिए जब नीतीश सरकार द्वारा बांटे जा रहे पुरस्कारांे और सम्मानों के बोझ तले दबे साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों को जनता के इस गुस्से का अंदाजा नहीं था, किताबी ज्ञान रखने वालों या वर्गीय श्रेष्ठता के अहं से ग्रस्त रचनाकारों और बुद्धिजीवियों को भी जब नीतीश के पराजय की आशंका नहीं रही होगी, तब जनता के कवि ने उनके भविष्य का लेखा लिख दिया था। अब भी बहुत सारे साहित्यकार जनता की ताकत को मजबूत बनाने के बजाए किसी न किसी शासकवर्गीय गठबंधन की ओर उम्मीद लगाए रखते हैं, उनकी तारीफें करते हैं। जनवादी ताकतों की शिकस्त से जो रचनाकार निराशा में डूबकर किसी न किसी शासकवर्गीय राजनीति के साथ जा खड़े होते हैं, उनमें से भोला जी नहीं थे। वे लड़ाई लड़ने के लिए संकल्पबद्ध थे। पाश के लहजे में कहें तो हम लड़ेंगे जब तक लड़ने की जरूरत बाकी है। भोला की समझ थी कि जनता की लड़ाई लंबी है और इस लंबी लड़ाई में दुश्मनों और दोस्तों की पहचान लगातार होनी है। जिस तरह गरीब जनता सरकार और प्रशासन के नस-नस को जानती है, उसी तरह भोला भी उन्हें जानते-समझते थे। उनके पैमाने से अफसर और मच्छड़, हड्डा और गुंडा, नेता और कुत्ता एक ही थे। अब नेता तो जनता के संघर्ष के भी होते हैं, पर उनके लिए उनका पैमाना अलग था, यहां तो नेता साथी होते हैं। तभी तो 1987 की कविता में उन्होंने लिखा कि ‘साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल/ नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी।’ और यह नेह मरते दम तम उनके भीतर मौजूद रहा। 

कई बार खुद से सवाल करता हूं कि भोला जी की कविताएं क्या हैं? जवाब मिलता है, आम जनता का दुख-दर्द ही तो है उनमें, जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए जो लंबा संघर्ष चल रहा है, जो उसकी आजादी, बराबरी और खुदमुख्तारी का संघर्ष है, उसी के प्रति उम्मीद और भावनात्मक लगाव का इजहार ही तो है उनकी कविताएं। उन्होंने कोई पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार के लिए तो लिखा नहीं। जिस तरह कबीर कपड़ा बुनते हुए, रैदास जूते बनाते हुए कविताई करते रहे, उसी तरह भोला पान बेचते हुए कविताई करते रहे। भोला आशु कवि थे यानी ऐसे कवि जो तुरत कुछ पंक्तियां गढ़के आपको सुना देते हैं। महान कवियों के इतिहास में शायद भोला का नाम दर्ज न हो पाए, पर जिस तरह इतिहास में बहुसंख्यक जनता का नाम भले नहीं होता, लेकिन वह बनता उन्हीं के जरिए है, उसी तरह भोला की कविताएं भी हैं। वे आरा काव्य-जगत की अनिवार्य उपस्थिति थे। जसम के पहले महासचिव क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में हर साल होने वाले नुक्कड़ काव्यगोष्ठी ‘कउड़ा’ के आयोजन में भोला जी का उत्साह देखने लायक होता था। हमने देखा है कि जब भी उन्हें कार्यक्रमों में बोलने का मौका मिला, उन्होंने कम ही शब्दों में बोला, पर हमेशा उनकी कोशिश यह रही कि कुछ सारतत्व-सा सूत्रबद्ध करके रख दें। और ऐसे मौके पर अक्सर लोग उनकी कुछ ही पंक्तियों के वक्तव्य पर वाह, वाह कर उठते थे। 

डाइबिटिज की बीमारी से भी एक योद्धा की तरह उन्होंने लंबा संघर्ष किया। अस्वस्थता के कारण उनका शरीर कमजोर हो गया था। लेकिन उन्होंने अंतिम दम तक हार नहीं मानी। भोला ने अपना गोला दागना यानी कविताओं की पतली पुस्तिकाएं प्रकाशित करवाना नहीं छोड़ा। उनका लाल झोला और उसमें रखा हथौड़ा हमेशा उनके साथ रहा, जिसके बल पर वे जनता के दुश्मनों से फरिया लेने का हौसला रखते थे।

हमारे फिल्म उद्योग को धर्म-अध्यात्म के नाम पर जनता को ठगने वालों पर उंगली उठाने के लिए एलियन को गढ़ना पड़ता है, जिसे लोग समझते हैं वह नशे में है यानी पीके है। भोला जी हमारे पीके थे, लेकिन वे कोई एलियन नहीं थे, जीते-जागते इसी दुनिया के मनुष्य थे, पीके इसलिए थे कि पान के पत्ते काटने वाले कवि थे। वे पान के पत्तों के जरिए समाज को देखते-समझते थे, उनका मानना था कि अगर सड़े हुए पत्तों को बाहर नहीं फेंका गया तो वे सारे पत्तों को सड़ा देते हैं। यह संयोग है कि अभी फेसबुक पर अनिल जनविजय ने उनकी तस्वीर लगाकर पूछा कि यह किसकी तस्वीर है तो ज्यादातर लोगों ने उन्हें नागार्जुन बताया।

बेशक वे नागार्जुन नहीं थे, पर उन्होंने मिजाज उन्हीं का पाया था। वे साधारण थे इसीलिए असाधारण थे। आइए साधारण की इस सृजनात्मकता के महत्व को पहचानें, जनता की इस आवाज को सलामी दें। हर साल हम उनकी याद में आयोजन करेंगे और अगले साल से विषय भी देंगे, जिन पर उन्हीं की तरह आशुकविताओं का सृजन किया जाएगा और जनता के बीच उन्हें प्रस्तुत किया जाएगा। उनकी परंपरा इस तरह से आगे बढ़ेगी। 

उन्होंने जिस संघर्षशील जनता को अपने गीत में संबोधित किया आइए हम भी उसे गाएं- 

तोहरा नियर केहू ना हमार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा।

जनकवि भोला की कुछ रचनाएँ


भोजपुरी रचनाएं और उनका हिंदी अनुवाद 

1-तोहरा नियर दुनिया में केहू ना हमार बा

तोहरा नियर दुनिया में केहू ना हमार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
जिनिगी के जानि जवन खास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
हेने आव नाया एगो दुनिया बसाईं जा
जिनिगी के बाग आव फिर से खिलाईं जा
देखिए के तोहरा के मिलल आधार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
दहशत में पड़ल बिया दुनिया ई सउंसे
लह-लह लहकत बिया दुनिया ई सउंसे
छोड़िं जा दुनिया आव लागत ई आसार बा

(आप सब के जैसा दुनिया में कोई और हमारा नहीं है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
मन को आशा और विश्वास आप ही से मिला है
जिंदगी को खास जान आप ही से मिला है
आप ही से मेरी जिंदगी का तार जुड़ा है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
इधर आइए एक नई दुनिया बसाई जाए
जिंदगी के बाग को फिर से खिलाया जाए
आपको देखके ही मुझे आधार मिला है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
यह सारी दुनिया दहशत में पड़ी हुई है
यह दुनिया लह-लह लहक रही है 
इस दुनिया को छोड़के आइए, यही आसार लग रहा है)

2-जान जाई त जाई

जान जाई त जाई, ना छूटी कभी
बा लड़ाई ई लामा, ना टूटी कभी
रात-दिन ई करम हम त करबे करब
आई त आई, ना रुकी कभी
बा दरद राग-रागिन के, गइबे करब
दुख आई त आई, ना झूठी कभी
साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल
नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी

5सितंबर, 87 समकालीन जनमत में प्रकाशित

(जान जानी है तो जाए, पर नहीं छूटेगी कभी
यह लड़ाई तो तो लंबी है, नहीं टूटेगी कभी
रात-दिन यह कर्म तो हम करेंगे ही करेंगे
आना होगा तो आएगा ही, नहीं रुकेगा कभी
यह दर्द है राग-रागिनी का, जिसे गाऊंगा ही
साथी का यह साथ मुझे जबसे मिला है
स्नेह की यह लता तो कभी सूखेगी नहीं) 

3-आज पूछता गरीबवा

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा 
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
जाति धरम के हम कुछहूं न जननी
साथी करम के करनवा बतवनी
ना रोजी, ना रोटी, न रहे के मकनवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा
माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी
दिहनी बहुते कुछुवो न पवनी
इ लोरवा, इ लहूवा से बूझल पियसवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा।

( कौन है देवी-देवता और कौन है मालिक
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
बाढ़ में डूबे, सुखाड़ में सुखाए
जाड़ों की रातें कलप के बिताए
करें किस पर भरोसा, पूछें हम तरीका
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
जाति-धरम को हमने कुछ नहीं जाना
साथी कर्म के कारणों को बताए
न रोजी है, न रोटी और न रहने का मकान
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
मिट्टी, पत्थर, धातु और कागज पर देखे
उसे दिए बहुत, पर कुछ भी नहीं पाए
आंसू और खून से अपनी प्यास बुझाए
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।)

4. जन-संगीत
हम चहनी, चाहींला, चाहत बानी
कबहूं तहरे ही खातिर मरत बानी
तोहरे पिरितिया के याद में जिनिगिया
निंदवा में अइतू सुनइती हम गीतिया
कहां चल जालू निंदवा में खोजत बानी
कबहूं....
दिन रात के बाड़ू हो तू ही दरपनवा
जवरे पिरितिया के गाइला हो गनवा
काहे जनबू ना जान जनावत बानी
कबहूं....
ना देखती कउनो हम कबो सपनवा
शहीदन के हउवे ई प्यारा जहनवा
अब कउनो ना डर बा जानत बानी
कबहूं तहरे ही खातिर मरत बानी
(हमने चाहा, चाहता हूं, चाह रहा हूं
हमेशा तुम्हारे लिए ही मरता हूं
तुम्हारी प्रीत की याद में है जिंदगी
नींद में आती तो गीत सुनाता
साथ में प्रीत के गाने गाता
क्यों नहीं जानोगी जान, बता रहा हूं
हमेशा तुम्हारे लिए ही मरता हूं
नहीं देखता कभी सिर्फ कोई स्वप्न
शहीदों का है यह प्यारा जहान
अब कोेई डर नहीं यह जानता हूं
हमेशा तुम्हारे लिए ही मरता हूं)


5. जनवाद के आवाज
आवऽता दहाड़ते 
जनवाद के आवाज
ना चलल बा ना चली
सामंती ई राज
जन-जन के त्याग शक्ति
ना करी अब कउनो भक्ति
घर गांव जवार के नारा बा
जाति ना साथिये दुलारा बा
ना रही कनहूं हत्यारा
जन जीवने बा प्यारा
बस इहे बा नारा, इहे बा नारा
सभे बा प्यारा, प्यारा, प्यारा।


(आ रही है दहाड़
जनवाद की आवाज की 
नहीं चला है न चलेगा 
यह  राज सामंती
जन जन की त्याग शक्ति 
नहीं करेगी अब कोई भक्ति
घर जवार गांव का नारा है
जाति नहीं साथी ही दुलारा है
नहीं रहूंगा कहीं हत्यारा
जन जीवन है प्यारा
बस यही है नारा, यही है नारा
हर कोई है प्यारा, प्यारा, प्यारा )


हिंदी कवितायेँ  

लहू किसका
सोचता था,
मुझे फिर से सोचना पड़ रहा है
कारण,
मेरे समक्ष मौत जो खड़ी है,
दिन रात सदा भूख के रूप में
जिसे चाहता हूं खत्म करना
हर राह चुनी नाकामयाब रहा
मिली है आजादी संघर्ष कर रहा हूं
एक सोच है यही 
कविता कर रहा हूं
बह रहा है आज लहू किसका
यही प्रश्न कर रहा हूं

आओ, बात करें
बात ज्ञान और विज्ञान की करें
बात जमीं और आसमान की करें
बात मजदूर किसान की करें
और की नहीं बात मात्र इंसान की करें
न हिंदू न इसाई मुसलमान की करें
जाति-धर्म नहीं बात इंसान की करें
बात रोटी और बेटी के अरमान की करें
बात साथी सम्मान की करें
आओ बात ज्ञान विज्ञान की करें

आदमी 
मैं आदमी हूं
भर दिन मेहनत करता हूं
देखने मेें जिंदा लाश हूं 
लेकिन.....
मैं लाश नहीं हूं
मैं हूं दुनिया का भाग्य विधाता
जिसके कंधों पर टिकी हैं
दैत्याकार मशीन
खदान, खेत, खलिहान
जी हां, मैं वहीं आदमी हूं
जिसके बूते चलती है
ये सारी दुनिया
जिसे बूते बैठे हैं
ऊंची कुर्सी पर 
कुछ लोग
जो पहचानते नहीं
इस आदमी को
समझते नहीं
इस आदमी को
नहीं, नहीं,
ऐसा हरगिज नहीं 
मैं होने दूंगा
अपनी पहचान मिटने नहीं दूंगा
क्योंकि 
मैं आदमी हूं
हां, हां,
मैं वही आदमी हूं।

आखिर कौन है दोषी?
जब से होश हुआ तब से लड़ रहा हूं
कारण सबसे कह रहा हूं
यह सारी मुफलिसी बेबसी की देन है।
सुनो समझो तुम्हारे अरमानों को अपने साथ देख रहा हूं
साफ है दिल जिसका, उसी के पीछे लगा हत्यारा देख रहा हूं
आॅफिसरों और नेताओं में लूटखसोट का रोजगार देख रहा हूं
जनवितरण प्रणाली से जल रहा बाजार देख रहा हूं
गंदगी में गंदगी से रोग बढ़ते हाल देख रहा हूं
कुछ घर में रोगियों को दवा के बिना मरते बेबस लाचार देख रहा हूं
कुछ ही शिक्षा के रहते, बेशुमार बेरोजगार देख रहा हूं
कर्ज पर कर्ज से दबी जिंदगी सरेआम देख रहा हूं
चलचित्र के द्वारा सेक्स का प्रचार देख रहा हूं
पास पड़ोस में बढ़ते लुच्चे-लफंगों की कतार देख रहा हूं
तिलक दहेज की ज्वाला में 
बहनों को जिंदा जलाते-मारते घर से निकालते अखबार देख रहा हूं
बिजली के पोल तार अधिकारी और कर्मचारी के रहते
घर गांव शहर में अंधकार देख रहा हूं
कब कौन मरेगा उनके इशारे पर 
लाश को छिपाते अखबार देख रहा हूं
कान में तेल डालकर बैठी राज्य और केंद्र सरकार देख रहा हूं
कब तक साधेगी खामोशी जनता, उनके बीच मचा हाहाकार देख रहा हूं
अब नहीं बचेगी जान भ्रष्ट नेताओं और आॅफिसरों की 
जनता के हाथ में न्याय की तलवार देख रहा हूं
अभी नजर नहीं आ रहा है, लेकिन बम और बारूद के धुएं को तैयार देख रहा हूँ

हम लड़ रहे हैं
हम लड़ रहे हैं
हम किनसे लड़ रहे हैं?
हम लड़ रहे हैं
सामंती समाज से
रूढि़वादी समाज से
पूंजीवादी समाज से
अंधविश्वासी समाज से
आखिर क्यों ल़ड़ रहे हैं इनसे?
समता लाने के लिए
समाजवादी व्यवस्था लाने के लिए
पूंजीवाद के सत्यानाश के लिए
सांप्रदायिकता को समूल नष्ट करने के लिए
ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेंकने के लिए
अंधविश्वास को दूर भगाने के लिए
क्योंकि-
इसी से गरीबी मिटेगी,
गरीबों को मान-सम्मान मिलेगा,
अब तक ये जो सिर झुका कर चलते थे
सिर उठाकर चलेंगे
इसी क्रांति से 
अमन, चैन, शांति मिलेगी
सापेक्ष चेतना जगेगी
इसी चेतना के जगने से होगी क्रांति। 
क्रांति का मतलब गुणात्मक, मात्रात्मक नहीं।
मात्रात्मक यानी पानी का भाप, भाप का पानी, 
अर्थात पूंजीवादी सरकार का आना-जाना
फिर फिर वापस आना
गुणात्मक-
जैसे दूध का दही बनना
फिर कोई उपाय नहीं 
दही का फिर से दूध बनना
अर्थात् पूंजीवादी सामंतवादी आतंकवादी सरकार का जाना 
समाजवादी सरकार का आना।
अब तक के आंदोलन से 
ऊपरी परिवर्तन होते रहे
अंतर्वस्तु नहीं बदली
अब गुणात्मक क्रांति होगी
अंतर्वस्तु भी बदलेगी
परिणाम
अब धरती पर पूंजीपति नहीं रहेगा
न जंगल में शेर रहेगा
न शेर वाला कोई विचार रहेगा
गरीबों की सरकार रहेगी
हम रहेंगे, हमारी जय-जयकार रहेगी
हमारा अब यही नारा रहेगा 
न कोई हत्यारा रहेगा
न सामंती पाड़ा रहेगा
क्योंकि,
हम बढ़ रहे हैं, बढ़ रहे हैं...