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Friday, October 27, 2017

रमता जी के बारे में कुछ भी जानने से पहले उनके गीतों को जाना : बलभद्र

रमता जी (छाया- राकेश दिवाकर) 
रमता-स्मरण 
रमाकांत दिवेदी 'रमता' भोजपुरी और हिंदी के एक महत्वपूर्ण कवि। 30 अक्टूबर 1917 उनकी जन्मतिथि। यह उनके जन्म का सौवां साल है। भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में उनकी महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय भूमिका रही है। आजादी के बाद भी 'स्वराज को सुराज' में बदलने का उनका संघर्ष जारी रहता है। गांधीजी के विचारों से प्रभावित रमताजी आगे चलकर समाजवादी विचारों से जुड़ते हैं। पर, यहां भी वे ठहरते नहीं, आगे बढ़कर वामपंथी विचारधारा से जुड़ते हैं। फिर, आगे बढ़कर जनता और देश की स्थितियों महसूसते हुए वाम की क्रांतिकारी धारा सीपीआई-एमएल से जुड़कर जनांदोलनों में खुद को साझीदार बनाते हैं। हर दौर-हर अनुभव- को उन्होंने कविताओं में दर्ज किया है। भोजपुरी और हिंदी के ये पॉवरफुल कवि हैं। इस अवसर पर 29 अक्टूबर 2017 को आरा में जसम के जन भाषा समूह की तरफ से एक कार्यक्रम का आयोजन होने वाला है। 


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रमताजी की एक कविता 'भोजपुरी' भाषा पर है, जिसका शीर्षक है 'भोजपुरी'। उनकी यह कविता 15-11-1952 की है। भोजपुरी भाषा और भोजपुरिया जवान पर भोजपुरी में कई कवियों की कविताएं हैं। उन पर यहां कोई टिप्पणी देना ठीक नहीं। आप सब रमता जी की यह कविता पढ़ें। यह कविता संतोष सहर से प्राप्त हुई है। "नागिचा ना रहे इस्कूल, आ, गरीबी गुने/ बारी रे समयिया गइल बीत!/ अचके में हवा बहल गंवई के सुधि लेके/ लागल भोजपुरी पिरीत! गिटपिट 'हिन्दुई' बुझाला न झरेला लो'के/ मोर मन करेला ये मीत।। भरि पेट रोईं-मुसुकाई भोजपुरिये में/ गाईं भोजपुरिये में गीत।' 




रमता जी के बारे में कुछ भी जानने से पहले उनके गीतों को जाना। वह 1988 का साल होगा जब पहली बार अपने गांव में भगेला यादव के चौपाल पर रमता जी का एक गीत सुना। वह गीत था- "क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब केहू का न सोहाला त हम का करीं।" इस चौपाल पर गांव के किसानों-मजदूरों की एक मीटिंग हो रही थी। कॉमरेड चंद्रमा प्रसाद आये थे। मेरे गाँव की अपने टाइप की यह पहली मीटिंग थी। लोगों से बातचीत के बाद चंद्रमा जी ने यह गीत सुनाया। मेरे गाँव की ही नहीं, मेरे लिए भी यह पहली मीटिंग थी। चंद्रमा जी ने तब कवि का नाम भी बताया था, लेकिन मैं तब कवि से बिल्कुल ही अपरिचित था। कविता भी उनकी पहली बार ही सुनने को मिली थी। उनका गीत दूसरी बार सुनने का अवसर अपने बगल के सिकरिया गांव में मिला। इस गांव के गरीब किसान-मजदूर (दलित) ढोल-झाल के साथ गा रहे थे- "हमनी गरीबवन के दुखवा अपार बा।" संत शिवनारायण की जयंती थी और शिवनारायनी की धुन में ही यह गीत है। गाने वालों को पता नहीं था कि यह किसका गीत है। वे तो गा रहे थे कि इसमें वे अपने को पा रहे थे। अपने दुख-तकलीफों को अपनी उपेक्षाओं को। बाद में पता चला कि यह रमता जी का गीत है। तब सिकरिया में राजेंद्र राम, विजय राम, उदय पासवान, बिलगू जी, साहेबजी आदि सक्रिय थे। 




आर्थिक तंगहाली एवं पारिवारिक दबावों के कारण सिकरिया गांव के ये उभरते हुए कार्यकर्ता रोजी-रोजगार की तलाश में बाहर निकलते गए। ये गीत-गवनई में रुचि रखने वाले युवा थे। साहेब तो बाजा पार्टी भी चलाते थे। उदय और राजेंद्र भी उस पार्टी में थे। भर लगन ये शादी-विवाह में सट्टे पर जाते थे। इससे इन लोगों को कुछ कमाई हो जाती थी और खेती के मौके पर ये अपनी थोड़ी- सी खेती संभाल कर दूसरों के यहां मजदूरी भी किया करते थे। राजनीतिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। लगन के अवसरों पर ये लोग फूहड़-अश्लील गीतों को गाने-बजाने से बच-बचाकर चलते थे। फगुआ-चैता में जब ताल ठोका जाता था, तब भी ये सचेत रहते थे। गोरख पाण्डेय, रमता जी, विजेंद्र अनिल, दुर्गेन्द अकारी, कृष्ण कुमार निर्मोही के गीत इन लोगों खूब याद थे। ये अपने से भी गीत बनाना सीख चुके थे। ये इनके ही गीतों को गाया करते थे। फगुआ-चैता में भी, लगन के अवसरों पर भी, पार्टी-कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार में भी। तब इंडियन पीपुल्स फ्रंट का समय था। लेकिन इन लोगों कौन गीत किसका लिखा हुआ है, यह नहीं मालूम था। इनको यह पता था कि इन्हें इन गीतों को गाना है।इसके चलते इनके गांव और आस पास के तथाकथित बड़े लोग , खासकर बड़ी जाति के, काफी नाराज रहा करते थे। 




ये लोग रमता जी के इस गीत को भी खूब गाते थे-'हमनी देसवा के नया रचवइया हई जा/ हमनी साथी हई आपस में भइया हई जा।' गोरख के 'समाजवाद' और 'शुरू भइल हक के लड़इया' वाले गीत को भी जमकर गाते थे। इसमे थोड़ा अपनी ओर से संशोधन कर गाते थे। 'हक' की जगह 'किसान' कर लेते थे। 89 के चुनाव में 'अकारी' के गीत 'चोर राजीव गांधी घुसखोर राजीव गांधी/ बिदेसी सौदा में पकरईल कमीशन खोर राजीव गांधी।' बोफोर्स घोटाले पर यह लिखा गया था। उस चुनाव के समय का यह सुपर-डुपर हिट गीत था। 'ए बबुआ टोपी सिया ल चुनाव में' भी खूब चला। यह विजेंद्र अनिल का गीत है। निर्मोही का 'जबले न रुकी भइया शोषण जुलुमवा कांरवा बढ़ते रही' भी गाया जाता था। इन गीतों के अलावे भी और कई गीत थे जो खूब गाये गये। आज कोई यकीन नही करेगा कि गांव-गांव में इन गीतों को गाने वाले थे। पार्टी के धुर विरोधी भी मन ही मन इन गीतों की लाइनों को गुनगुनाने को मजबूर थे। कभी-कभार तो बकझक करते या मजाक उड़ाते भी इन गीतों की एक-दो लाइनों को बोल जाते थे। ये गीत एक कार्यकर्ता की भूमिका में होते थे। एक मास्टर साहब थे हाई स्कूल जादोपुर के- ओझा जी, वे उस दौर के गानों और नारों को चिढ़ के कारण लोगों के बीच अक्सर सुनाया करते थे। बड़ी बड़ी रैलियों और जुलूसों में मंच से गीत होते थे। 10 मार्च 1989 की रैली जो पटना के गांधी मैदान में आयोजित थी, उसकी पूर्व संध्या पर मैंने नरेंद्र कुमार को गांधी मैदान के मंच से गाते देखा-सुना था। गीत था-'माई गोहरवे मोर ललनवा हो।' 1992 के बाद बनारस एबी होस्टल कमच्छा में रहते इनसे निकटता बनी। आज वो इस धरा-धाम पर नहीं हैं। यह गीत उनके गीतों-गजलों के संग्रह 'कब होगी बरसात' में है। नरेंद्र को भी रमताजी और विजेंद्र अनिल के गीत याद थे। इन गीतों को लोग आज भी गाते हैं। 'हिरावल', पटना के गायक और रंगकर्मी बड़े मन से इन गीतों को गाते हैं। लेकिन क्या कि गांव -गांव गाने वाली बात अब नहीं रही। आंदोलन तो हैं, पर गीत कम हैं। 



89 के लोकसभा चुनाव में आरा लोकसभा क्षेत्र से आईपीएफ के कॉ. रामेश्वर प्रसाद की जीत हुई थी। इसके बाद बिहार विधान सभा के लिए चुनाव था। शाहपुर विधान सभा क्षेत्र के आईपीएफ के प्रत्याशी थे चंद्रमा प्रसाद। शाहपुर बाजार में एक आम सभा होने वाली थी। उस सभा को संबोधित करने आए थे सांसद रामेश्वर प्रसाद और रमता जी। प्रत्याशी चंद्रमा जी को तो रहना ही था। मैं भी उस सभा में था और मेरे गाँव के कुछ युवक भी थे और पार्टी समर्थक अन्य गांवों के भी आए थे। इन वक्ताओं के संबोधन से पहले गीत गाये जा रहे थे। गीत सिकरिया के उदय गा रहे थे। एक पर एक और एक से एक। गोरख, रमताजी, विजेंद्र अनिल के लिखे। उदय अच्छा गाते थे। गोरख पांडेय की एक कविता मैंने भी सुनाई थी। वह कविता थी 'हुआ यह है'। उसकी एक लाइन है- 'जिनको हिरासत में होना चाहिये उनका इशारा संविधान है/ और हम हैं कि खुली सड़कों पर कैद हैं'। है न यह आज पूरापुरी मौजूं। रामजी भाई ने इस लाइन को दो-तीन दिन हुआ, फेसबुक वाल पर डाला था। तो इस कविता को सुनने के बाद रमताजी ने सभा सम्पन्न होने पर मुझसे बातचीत की। उनके करीब बैठने औऱ बोलने-बतियाने का यह पहला अवसर था। मैंने इस सभा मे स्थानीय मुद्दों को केंद्रित करते एक छोटा-सा भाषण भी दिया था। शाहपुर से बिहिया आना था। यहां भी एक सभा होनी थी। यहां भी गीत गाये गये। गीत हमारे संगठन की पहचान बन गए थे। सभा के बाद हमलोग चाय पीने के लिये एक जगह बैठे। रमताजी से यहां भी कुछ बातें हुईं। बीच में आकर चंद्रमा जी ने रमताजी से कहा कि ये साथी बलभद्र जी हैं, इस अंचल में पार्टी कामकाज में हैं। उन्होंने कहा कि ये संतोष सहर के बडे भाई हैं। यह सुन वे और प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि आरा पार्टी ऑफिस में हमलोग मिलते हैं। रामेश्वर जी से पहले से अच्छी जान-पहचान थी। रमताजी और रामेश्वर जी हाथ मिला जगदीशपुर के लिए रवाना हुए। 



तो रमता जी और कामरेड रामेश्वर प्रसाद जी बिहिया से जगदीशपुर के लिये रवाना हुए। बिहिया से थोड़ी ही दूरी पर है जगदीशपुर- बाबू कुंवर सिंह वाला जगदीशपुर। बताते चलें कि बाबू कुंवर सिंह पर रमता जी ने भोजपुरी में एक बड़ी अच्छी कविता लिखी है। कुंवर सिंह पर लिखी गयी कविताओं में यह अपनी एक अलग विशिष्ट पहचान रखती है। शाहपुर की सभा को संबोधित करते रमता जी बहुत ही सहज के साथ साथ तथ्यों के विश्लेषण में सन्तुलित और धारदार लगे। कांग्रेसी हुकूमत की कारगुजारियों का सहज ढंग से विश्लेषण किया। आज मैं जितना याद कर पा रहा हूँ, भाषण को बातचीत की शैली में वे रखते थे, जैसे कि भोजपुरी की अपनी कोई कविता सुना रहे हों। एक हाथ की ताली को दूसरे हाथ की ताली से मासूम स्पर्श कराते हुए। धोती कुरता गमछा और झोले वाले रमताजी। आज याद कर रहा हूँ सभा को सम्बोधित करते रमता जी को, एक हाथ की ताली को दूसरे हाथ की ताली से मासूम स्पर्श कराते, तो उनकी इस कविता की याद बारम्बार आ रही है- "खाके किरिया समाजवाद के खानदानी हुकूमत चले/ जइसे मस्ती में हाथी सामन्ती निरंकुश झूमत चले/ खाके के गोली गिरल परजातन्तर कि मुसकिल इलाज हो गइल/ चढ़के छाती पर केहू राजरानी, त केहू युवराज हो गइल।" यह 1984 की कविता है। इस कविता को सुनाने के अंदाज में वो सभा संबोधित कर रहे थे। "हक-पद खोजे से फँसावे आपन गरदन, ऐंठत चले अत्याचारी"। कविता के इन्ही तथ्यों को कविता सुनाने की शैली के बिल्कुल आसपास सुना रहे थे। तब मैं इनकी कविताओं का पाठक नही बन पाया था। तो कहां से जानता रमता जी को कायदे से। मुझे याद है कि किसी कार्यक्रम में शामिल होने आरा गया था तो पुरबवारी रेलवे गुमटी के पास जो पार्टी आफिस(cpi-ml) है, भीतर रमता जी थे। उन्होंने पूछा कि "आप भी कुछ लिखते हैं, कविता, कहानी?" मैंने तब हाँ-ना कुछ भी नही कहा था। फिर पूछा बाबा ने कि नाम के साथ कुछ लिखते हैं क्या जैसे मैं रमता लिखता हूँ, जैसे संतोष अपने नाम के साथ सहर लिखते हैं। मैंने कहा था कि ऐसा कुछ सोचा जरूर था, पर मन को भाया नहीं। फिर जितेंद्र जी ने चाय मंगा दी। भोजपुर के साथियों के बीच रमता जी के लिए जो प्यारा सा संबोधन था वो बाबा था। साहित्य जगत में, खासकर हिंदी में, नागार्जुन को बाबा कहाने का गौरव प्राप्त है। 


8 

30 अक्टूबर 1917 रमता जी का जन्म दिन है। 24 जनवरी 2008 को उन्होंने अपने जीवन की आखिरी सांसें ली। इस तरह यह उनका जन्म शती वर्ष है। जन-सुराज के संघर्षों के सहयात्री कवि थे रमता जी। पूरा नाम- रमाकांत द्विवेदी 'रमता'। बिहार के भोजपुर जिला का महुली घाट(बड़हरा) उनका जन्म स्थान था। यह बाढ़ -बूडाव वाला इलाका है। बाढ़ के चलते इसकी स्थिति काफी बदल चुकी है। बाढ़ ,सुखाड़ और अपने बड़हरा पर भी उन्होंने कविताएं लिखी हैं। उनके लिखे 'गंगाजी के बाढ़ में डुबकियां मारेला खूब/ जिला शाहाबाद भ में खाल बा बड़हरा।' पहले भोजपुर जिला शाहाबाद में था। शाहाबाद के दो भाग हुए-1.भोजपुर और 2.रोहतास। अब तो भोजपर और रोहतास के भी विभाजन हो गए हैं। इस कविता में कवि बड़हरा की भौगोलिक अवस्थिति बताने के साथ-साथ वहां की बदहाली के लिए बाढ़ जैसे प्राकृतिक प्रकोप के साथ-साथ आजादी के बाद की सरकारी नीतियों और अफसरशाही को जिम्मेवार मानता है। वह बड़हरा की बेहाली को गीत का विषय बनाता है। जो तथाकथित भक्त(सत्ता भक्त) किस्म के लोग हुआ करते हैं, उनको ऐसी कविताएं क्योंकर पसंद आएंगी। वे तो आज की तारीख में और मुँहजोर हैं। कहेंगे कि देखो जहां जन्म लेता है, वहीं की शिकायत करता है। राष्ट्रद्रोही है। और खुद जाकर बी डी ओ से मिल-बतियाकर फण्ड का पैसा मजे में हजम करने में जरा भी नहीं शर्माएंगे। तभी तो किसी एक कार्यक्रम के दौरान बड़हरा में ही वहां जमीदारों और उनके लठैतों को रमता जी पर हाथ चलाने में जरा भी संकोच नही हुआ। नहीं संकोच हुआ कि यह आदमी आजादी का लड़ाका भी रहा है। आजादी के लिये इसे रन-वन छिछियाना भी पड़ा है। रमता जी स्वतंत्रता आंदोलन के विचारशील योद्धा थे। आजादी के बाद भी सत्ता- संरचनाओं की पेंचों को समझने और उसकी न केवल आलोचना करने वाले, बल्कि जनआंदोलनों के साथ होकर सच्चे सुराज को संभव करने हेतु जूझते रहने वाले योद्धा थे। किसानों-मजदूरों और नौजवानों के साथ जुलूसों में चलते थे और जुलूसों के लिए गीत भी लिखते थे। बतियाते हुए गीत और ललकारते हुए गीत और चेत कराते हुए गीत। वे किसानों पर कविता लिखते हैं, पर किसान नहीं थे। कहना जरूरी है कि विजेंद्र अनिल भी इसी धारा के कवि हैं, किसान-मजूर उनकी कविताओं और कहानियों के पात्र और विषय हैं, पर वे भी किसान नहीं थे। दुर्गेन्दर अकारी भी इसी धरती की उपज हैं। उन्होंने शुरू -शुरू में मजदूरी भी की थी। बाद में उन्होंने खुद कहा- "मत कर भाई बनिहारी तू सपन में"। अकारी जी पार्टी के हर कार्यक्रम में सक्रिय रूप में मौजूद रहते थे। जनता के बीच बिना माइक-बिना मंच स्वरचित गीतों को गाते-सुनाते दिख ही जाते थे। अकारी जी की एक काव्य पुस्तिका है 'चाहे जान जाये'। उसकी भूमिका रमता जी की लिखी हुई है। भोजपुर और भोजपुरी कविता की यह एक त्रयी है। 

October 27

9

रमता, विजेंद्र अनिल और दुर्गेन्दर अकारी की त्रयी को संग्रामी त्रयी कहना ठीक होगा। इनके बाद इस धारा में आते हैं निर्मोही। सुरेश काँटक, जितेंद्र कुमार, निर्मोही, सुमन कुमार सिंह के साथ-साथ संतोष सहर की कविताओं और गीतों को इस त्रयी की नई कड़ी कहने या नया स्वर कहने में मुझे कोई हिचक या संकोच नहीं। सुरेश काँटक इनमें सबसे अधिक सक्रिय और पहले हैं।विजेंद्र अनिल के बहुत करीब के हैं। इस त्रयी पर अगर कोई बात होगी तो 'युवानीति', जो कि सांस्कृतिक मोर्चे पर सक्रिय युवाओं की एक टीम थी, जिसकी धमक सुदूर गांव-देहातों से लेकर कस्बों और नगरों-महानगरों तक पहुंच चुकी थी, की चर्चा के बगैर बात पूरी नहीं हो पाएगी। युवानीति में तब सुनील सरीन, अजय, धनन्जय, नीरू, राजू, कृष्णेन्दू, संतोष सहर, सुधीर सुमन, शमशाद प्रेम, अरुण आदि कई पूरे प्राणप्रण से सक्रिय थे। नाटकों के साथ-साथ ये इनके गीतों को बड़े प्रभावशाली अंदाज में मंच पर और चौक-चौराहों पर प्रस्तुत किया करते थे। गोरख के गीतों को भी खूब गाते थे। केशव रत्नम के गीत 'हाथों में होगी हथकड़ियां' की याद तो होगी ही सुनील सरीन को। इन गीतों को जन -जन तक पहुंचाने का जरूरी काम युवानीति के साथियों ने किया। मुझे युवानीति के अनेक प्रोग्रामों को देखने का अवसर मिला है। टीम के साथ कई जगहों पर जाने का। टीम के अभ्यासों को भी देखने का। आज की तारीख में 'हिरावल' के साथी यह भूमिका निभा रहे हैं। अनिल अंशुमन , निर्मल नयन की भूमिका भी उल्लेखनीय है। इन लोगों के पास भी रमताजी और विजेंद्र जी की अनेक स्मृतियां होंगी। मुझे याद है कि आरा के कुछ मित्रों ने मिल-जुलकर भोजपुरी की एक पत्रिका निकाली थी, जिसका एक ही अंक आ पाया। वह पत्रिका थी 'हिलोर'। उसमें रमता जी कविताएं छपी थीं और याद आ रहा है कि उसमें सुधीर सुमन का एक लेख भी था रमताजी पर। उस पत्रिका के संपादन से पहले चंद्रभूषणजी ने योजना के बारे में बताया भी था। कृष्णेन्दु, निलय उपाध्याय, चन्द्रभूषण,शमशाद प्रेम का उसमें सहयोग था। शमशाद जी ने बताया था कि इस पत्रिका की पूरी योजना कृष्णेन्दु की थी । पैसे की व्यवस्था में कृष्णेन्दु ही थे। पत्रिका की प्रति मुझे कृष्णेन्दु ने ही दी थी। मैं उनके पकड़ी, आरा वाले घर पे गया हुआ था। याद आ रहा है, झिलमिल-झिलमिल कि आरा के नागरी प्रचारिणी के सभागार में कोई एक कार्यक्रम आयोजित था। सभागार में रमता जी मौजूद थे। वे रामजी राय के साथ बतियाते बाहर निकले, नागरी प्रचारिणी के पूरब के गेट से। रामजी भाई उनकी एक कविता सुन रहे थे। गौर कर सुना था मैंने भी--'सुलहा सुराज ई कुराज हो गइल/ रहे जेकरा प आसा-भरोसा ऊ नेता दगाबाज हो गइल।' रमताजी को अथवा इस त्रयी के किसी एक को याद करने का मतलब मेरे लिए इन सबको और इन तमाम बातों को याद करना है।मेरी स्मृतियों में यह सब एकमुश्त बसे हुए हैं। ढोलक-झाल, हारमोनियम, कैसियो, अपना गांव-जवार। वो चंदा मांगना, यहां-वहां भटकना। 

October 28 



Wednesday, November 2, 2016

कवि बलभद्र के भोजपुरी गीत और कविता

भलहीं जे रहबो कुजतिया
भलहीं जे रहबो कुजतिया
ना ढोअले ढोआला इजतिया

लइका सेयान सभे भाॅंजे लउरिया
कातिक असाढ़ तानि सुते दुपहरिया
असकत के भरल मोटरिया
ना ढोअले ढोआला इजतिया

लाम-चाकर अतना कि आॅंटे ना बतिया
आॅंखि जाए जहॅंवा ले बाटे बिगहटिया
नवले नवे ना फुटनिया
ना ढोअले ढोआला इजतिया

घरवा में कुहुकेली कनिया-कुॅंआरी
हतिएसा बतिया प लात-मुका-गारी
देखत झवान भइल मतिया
ना ढोअले ढोआला इजतिया

बड़े-बड़े लोगवा से नेवता हॅंकारी
बड़का कहाए के बड़की बेमारी
जतिए भइल जहमतिया
ना ढोअले ढोआला इजतिया


अबेर हो जाई
गड़िए में बचवा सबेर होइ जाई
ठाॅंवे-ठाॅंवे रोकबऽ, अबेर होइ जाई

खाइब-पियब कइसे के रतिया कटाइब
काल्हुए सहेबवा का बतिया बताइब
कुल्हिए कइलका अनेर होइ जाई
ठाॅंवे-ठाॅंवे रोकबऽ, अबेर होइ जाई

नाहीं बा सड़किया, ना सुविधा-सहूर बा
टेसन से गॅंउवा हमार बड़ा दूर बा
साॅंप-बिछी गोड़वा कॅंटेर होइ जाई
ठाॅंवे-ठाॅंवे रोकबऽ, अबेर होइ जाई
होइहें अन्हार राहे-बाटे बटमारवा
अरजल धन सून छन्हिया छपरवा
हॅॅंसिए बखेरा में अन्हेर हो जाई
ठाॅंवे-ठाॅंवे रोकबऽ, अबेर होइ जाई

गइया दुआर खूॅंटा अन्हके बछरुआ
घरवा बेहाल कवनो नाहीं रे पहरुआ
नेहिया टॅंगाई के बॅंड़ेर होइ जाई
ठाॅंवे-ठाॅंवे रोकबऽ, अबेर होइ जाई

गफलत परी हाय गिर-पर जइबऽ
सॅॅंचल सनेहिया के कइसे बॅंचइबऽ
हाथ-गोड़ का जाने ढेर होई जाई
ठाॅंवे-ठाॅंवे रोकबऽ, अबेर होइ जाई

भाई-भउजाई तहार माई ताके रहिया
मने-मने बाबूू देलें अपनो उमिरिया
रोटिया सुखाइ के कड़ेर होइ जाई
ठाॅंवे-ठाॅंवे रोकबऽ, अबेर होइ जाई

आजुए ना कल्हुए त लड़ि जाले रेलिया
चिरई के जान लइका के खेलिया
दिने-दुपहर गधबेर होइ जाई
ठाॅंवे-ठाॅंवे रोकबऽ, अबेर होइ जाई

गड़िए में बचवा सबेर होइ जाई
ठाॅंवे-ठाॅंवे रोकबऽ, अबेर होइ जाई

गम काथी के बा
हम त काॅंट-कूस चलवइया
हमरा गम काथी के बा
हम त ताल-तूल बन्हवइया
हमरा गम काथी के बा

देह अॅंइठलऽ रोबे आपन
लोक बिगड़लऽ रोबे आपन
हम त साॅंच-साॅंच कहवइया
हमरा गम काथी के बा

सगरो भरम-भेद फैलवलऽ
सहक-सनक के माथ गिरवलऽ
हम त नेह-छोह सॅॅंचवइया
हमरा गम काथी के बा

आखिर माया-मरम छुपल ना
कंचल काया फरल-फुलल ना
हम त रूप-रंग रचवइया
हमरा गम काथी के बा

रोजे-रोज बनवलऽ सेना*
तब्बो कवनो जोर चले ना
हम त अंतकथा लिखवइया
हमरा गम काथी के बा

*सेना- बिहार की निजी सामंती सेनाएँ 

खत अगिला में शेष
जालऽ कवना दो देस
देके जोगिनी के भेस
आहो अॅंखिए में कटि जाला रतिया नू हो
जालऽ कवना दो देस...

पीहऽ फूँकि-फूॅंकि पानी
बिसरइहऽ जनि छान्ही
आहो ठोपे-ठोपे चूए बरसतिया नू हो
ढाॅंपी अॅंचरा कि केस?
जालऽ कवना दो देस...

जोते बोए के सुतार
नाहीं केनियो उधार
घरे ससुरू बेमार
सासु आॅंखे अलचार
आहो थउसल सॅंउसन उमिरिया नू हो
कहीं कतना कलेस!
जालऽ कवना दो देस...

एगो धउगल डोले
एगो टापा-टोंइया बोले
जानीं सॅॅंझवा ना भोर
बा समइया मुॅंहजोर
आहो फरके से छाॅंटेलऽ फुटनिया नू हो
इहाॅं ठाॅंवे-ठाॅंवे ठेस
जालऽ कवना दो देस...

होला काॅंव कीच हाला
झूठ भइलें धरमसाला
जाने कतना दो बोझा
लउके केहू नाहीं सोझा
आहो बखरे बेहाल बखरिया नू हो
आहो दूनो हाथे बजिहें थपरिया नू हो
खत अगिला में शेष
जालऽ कवना दो देस...

जालऽ कवना दो देस
देके जोगिनी के भेस



मधुर राग में
खाए से जादे खिआवे के सुख
दिन के फिकिर, दुनिया भर के
सुति जाली सिरहाना सहेज

चूल्हि दमक दिहलस
तसला के बाफ ठंढक
उनकर सबसे पाॅंखवार दिन
चउकठ के पाठ से टकरा के गुुजरल
जबसे होस हम सम्हरलीं
घेरत घटा के
लुभावे से बेसी
उनके के सचेत करत पवलीं
उनका लिलार के रेख से पुछलीं
पुछलीं आॅंगन के माथ प मेड़रिआत मेघ से

उमिर का थकाई उनका के!
थका दिहलस ठेहुना के दरद

उनका दरद के बारे में सोचत
इयाद परेला दॅंवरी
मेह घेरवटत मुॅंह जाबल महादेव

जबकि सभे नीन में रहेला
बिचहीं टूटल मनभावन सपना
जोड़े के कोशिश में केहू-केहू
नीम के पतइन बीचे बइठल भुुचेंगा
भोर के अगरम पाके शिव-शिव गुहरावेला
आ मधुर राग में गावेली माई-
‘...अमवा लगवलीं टिकोरवा के आसा
बहि गइलें पुरवा चुअन लागे लासा...’

आ भोर के झुलफुल चदर ओढ़ि
सिरहाना से
उठा लेली सहेजल आपन चीज मनगॅंवे
उनका खटर-पटर के संगे
पसर जाला दिन के दुधमुॅंह मुसकी
दुनिया भर के


जा रहल बा लोग, अबकियो
ऊ लोग गुरुप में बा
साॅंस-में-साॅंस गॅंथाइल-जेनरल डाबा में
चूरा-चबेना के फाॅंका में
मन के अपना फरियावत-फॅंफरियावत

कमा-धमा के रहे लोग आइल
फेरू जा रहल बा- कमाए-धमाए
घर के, खेती-खरिहानी के-
तास सम्हार के
सम्हारे भर भरि के
फेरु लवटि आवे खतिरा
ई जतरा

सटि-सुटि के बइठल, बइठवले
बीड़ी धरावत
खइनी बनावत
नीन के बेसम्हार झोंका
बगलवाला कान्ह प सम्हरावत

नया नइखे ई सफर
ना रेल, ना टीटी, ना पुलिस
ना हल्ला, ना हुज्जत, ना खोमचा-खॅंचोली
नया नइखे पानी बिना परान घुटुकत नल
बाकिर! के जाने कइसे, कुछ अइसन
कि जा तारे जा
पहिले-पहिले जात जइसन
सभत्तर लुटात-डॅंटात
डब्बा के हज-हज में
गाॅंव-घर के फेंटले आपन बात
जा रहल बा लोग- हॅंसत-हहात
साल-छौ महीना के दूरी के
कठिन एहसास में दहात
जा रहल बा लोग एगो झोंक में
एह झोंक में दिल्ली बा झलकत
झलकत बा सूरत...

दियरखा प छूटल चुनौटी के संग
जइसे छूटि गइल होखे मन
जा रहल बा लोग
अपना के छोड़ले...

निसबद रात में
दीया अस बरी अबकियो
गीत बन झरी
कूकर, कराही भा ताल ठोंकी तसला प
ईहे छुटलका

जा रहल बा लोग
अबकियो
कतने कुुल्हि बात
कतने फरमाइस
कतने कुल्हि आस-फाॅंस लिहले
लवटि के आवे के दिन धइले
जा रहल बा लोग
अबकियो....



अपनापन एगो जियला अस
कबो बेटा के तरफ
कबो पतोह के तरफ
कबो बेटी
कबो दामाद के तरफ
बोलेली माई
बेटा-पतोह के तरफ जतना
कम ना तनिको बेटी-दामाद के तरफ
बाबू जहिया उतरल-उतरल
भा लउकेलन थाकल-थहराइल
भा कम जहिया खालन
उनका से हिर-फिर पूछेली माई
बाकी जब बोले के होला
त बहुते कम बोलेली बाबू के तरफ

उनका बोले के जगह के नइखे कवनो कमी
ऊ रसोई घर से बोल सकेली
बोल सकेली भंडार घर से
आॅंगन-दुुआर भंडार घर से
आॅॅंगन-दुआर
कवनो कोना कवनो अंतरा से बोल सकेली
ऊ जहॅंवा से बोलस चाहे जवना तरे
भाषा में उनका ना परेला कवनो खास फरक
बोलेली त जरुरियो ई नइखे
कि लग्गे उनका होखबे करे केहू

ऊ बतिया लेली चूल्हा से
तावा-चउकी-बेलन से बतिया लेली भरपेट
सूप से चलनी से
बहुत फरिछ भाषा में बतिया लेली झाड़ू से
अनाज के बोरा आ फाटल-पुरान झोरा से
बरिस-बरिस के ई अरजन उनकर आपन

उनकर बोलल-बतियावल
कबो लड़ला अस लागेला
कबो गीत कवनो गवला अस
जेठ के दुपहरिया में
ओरियानी तर एक सुर में बोलेलें स पंडुक
काम के पल्ला छटका के सुस्तालें मजूर
आ सुस्ताली माई
सुुई-धागा के हर टोप पर
मतलब छोड़त चीजन के नया एगो मतलब देत
अपनो के मतलब से जोड़त हर टोप पर

तीज-तेवहार के मोका प कवनो
भा असहूॅं बीच क के सूक भा सोमार
घरर-घरर ताल आपन ठोकेला जाॅंत
उचटि जाला घर के बड़-बनुआ नीन

जाॅंत के उखाड़े के चलल जब-जब बात
उखड़ि गइली माई
कि जइसे कि उखाड़त केहू उनुके के होखे

गाॅॅंव में आटा-चक्की के नइखे कवनो कमी
घर-दुआर चूल्हा-चउका बदल गइल बहुते
बहुते बदल गइल बात-बेवहार
तब्बो रुकल नइखे ई जाॅंत
नइखी रुकल माई
खूब बा दवर आ दरकार
खूबे खीस-पीत
खूब बा अपनापन
ऊ बोलेली अपना अपनापन के तरफ
एह अपनापन के जियला अस बाटे
उनकर बोलल-डोलल



हद बाड़ी स!
हद बा
अतना रोक-टोक के बादो
चहकि रहल बाड़ी स ई लइकी
जाए के बा बक्सर
पुरहर एगो गोल में
बहकि रहल बाड़ी स ई लइकी
हद बाड़ी स

बिरत रात ले गावत-बजावत
सहेजत-सरियावत एक-एक चीज
बिरत रात ले
तेयारी में बाड़ी स

कब सुतली स
कब जगली स
कब भइली स तेयार
कहल कठिन बा
होत फजीरे बइठे लगली स बस मंे
पिछिला सीट प
एक पताॅंह से
भउजियो के छोड़ली स ना
खींच ले ली स अपना लग्गे
घूघ-घेरा सरका देली स
एकनिए के लग्गे, लागि के
बेबइठले रहली ना
आजी, चाची, माई आ मउसी

बस अपना चाल में आइल
आ लइकियो अपना गोल-ढोल के साथे
मुॅंह प एकनी के झूलि-झूलि आवत रहे केस
खात रहे रहि-रहि के झटका
जतने ऊ रहली स बस में
ओसे तनिको कम ना सड़क प
हाट-बाट के कतने कुल्हि लोग
लय-बहार ई लोक लेत रहे लपकि-लपकि
बस के संगे उड़त धूूर के जाके पार

अनेर नइखे ई चहक-बहक
ढोल आ बोल
तान आ ताल नइखे ई अनेर
गहगहा रहल बा बस
नस-नस में दउरत खून अस
सनसनी एगो पसरि रहल बा सगरो

हद बा
अतना रोक-टोक के बादो
गा-बजा रहल बाड़ी स
अतना गवला-बजवला के बादो
रोक-टोक में बाड़ी स
हद बाड़ी स!



काका के गइला के बाद
चाय त बनी
रोज
बूढ़, जवान, लइका, मेहरारू सभे सुरुकी
ना होइहें त एगो मुखिया काका
खाटी के पाटी से ना होई लागल उनुकर डंटा
दोसर कवनो डंटा उपरा लिहें स लइका
खेलिहें स घोड़ा-घोड़ा
केहू अउर के लुकवा के जूता, केहू अउर उहाॅं होई-
मने मुसुकात, मुॅंहे छिछियात-बिखियात

आसमान में बदरी-कबो झमरी, भा करी खूब झापस
फुहियाई भा फाटी, भा घमरस बरखी
कबो दिन-दिन भ सूरुज के सॅंवस ना लागी कि झाॅंकी
त आॅंख प तरहथी के ओट से, जब कवनो मौसम-विज्ञानी
थाही कि कबले निबद्दर हो पाई आकाश
काका के आई इयाद

केहू किहें हित-नात अइहें
तै-तापर होई शादी-बियाह
बिकाई-किनाई केहू के बैल, गाय बियाई
केहू घरे सोहर गवाई
भा आई कवनो आफत
झाॅंकियो ना पारी
जब केहू किहाॅं केहू
त काका के रहला के माने बुझाई
काका के गइला के बाद

जे उठावत रहे तनखाह
हलुको-पातर नगद के आवग रहे जेकरा
ना जानि पावल ऊ, काका के घुकुुड़ियाइल कद-काठी के राज
उनुका बूता के बहरी रहे काका के मन के पीर-पहचान

समिलात सताइस बिगहा के जोत
परथकू होखे तक जवना के, शान से गिनत-गिनावत अइले आपन
बान्हि के राखल चहले जवन इज्जत-बरोह
हर लेलस ऊहे, उनुका भीतर के आग-पानी

उनका बारे में जवन चाहत बानीं कहल साफ-साफ
अॅॅंटक के अझुरा जा रहल बाटे बिचहीं
उनुका जिनगी के तार, के जाने कवन-कवन दुविधा में
ना झनक पावल, अपना रंग-राग में कबहीं

एह धरा-धाम से मुकुती के
महीना-डेढ़ महीना पहिले के बात उनुकर
नाच रहल बाटे सुरता प हमरा
कि सचहूूॅं, जाति-जनेव से आदिमी के पहचान बा अनेर...
कि आदिमी के सोचे के परी, आदिमी बन
उनुका जिनगी के रहे ई निचोर, कि कवनो मुॅंह देखल बात!

उनुका गइला के कई-कई दिन बाद ले, रोज साॅंझ खा
काकी जोहत रही, बगही* से उनुका लवटला के बाट
*बगही- एक स्थानीय बाजार



ई सोचि के
ई सोचि के ना बनल रहे ई पुल
कि लोग एह पर बइठी-सुहताई
बोली-बतियाई
खइनी-बींड़ी बनाई-धराई
चरवाह चढ़ि तकिहें
कि गाय-गोरू गइलें स केने
लगइहें हाॅंक
बूनी-बदरी में लुकइहें
गोबर-गोइंठा बीने वाली
गढ़ेवाली घास जुड़इहें एकरा नीचे
का-का दो ना बतियइहें
हेरिहें ढील
ई सोचि के थोड़े ना बनल रहे
कि पानी जब आई अफरात
एह पर से कूदिहें-फनिहें लइका
साॅंझ से बिरत रात ले
खाये के खोज-पुकार ले
रहिहें एही पर जमल
राही-बटोही पूछिहें
एह पर बइठल मनई से
कि ए भाई
बर्हमपुर परी कतना दूर
रानीसागर जाई कवन राह

मामा जो अइहें
बहिन से अपना भेंटे से पहिले
एही पर होइहंे नया-पुरान
केहू खुरपी पिजाई
केहू हॅंसुआ-कुदारी के बेंट सोझियाई
ललकारी केहू फगुआ-चइता
पेठाई केहू गीतन के जरिए कलकत्ता सनेस

ना बनल रहे ई सोचि के
कि एकरा जरी बनी छठ के घाट
माई अपना छोटकी पतोह के
दीहें कलसुप

ई सोचि के थोड़े बनल रहे
कि रहले ई रही
कि एह पर कहियो
लिखल जाई कविता

(लोकायत प्रकाशन, बी-2, सत्येंद्र कुमार गुप्त नगर, लंका, वाराणसी-221005  से प्रकाशित कविता संग्रह 'कब कहलीं हम' से साभार। मूल्य- 100 रुपए)









Saturday, January 17, 2015

अक्खड़ - फक्कड़ मिजाज के कवि भोला जी की स्मृति को सलाम : बलभद्र


सुधीर सुमन और सुमन कुमार से पता चला कि 15 जनवरी 2015 को आरा में भोला जी की स्मृति में 2 बजे से एक कार्यक्रम आयोजित है। मैं भोला जी के प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ । वे हमलोगों के एक प्रिय साथी थे। वे हिंदी और भोजपुरी में कवितायेँ लिखते थे और उनकी पतली सी काव्य- पुस्तिका 'भोला के गोला' की कुछ काव्य-पंक्तियाँ मुझे अब भी याद हैं । वे पान की दूकान पर बैठे-बैठे तुकबन्दियाँ किया करते थे और उन तुकबंदियों में वे कभी सरकार, कभी पुलिस, कभी तथाकथित रंगदारों पर व्यंग्य के जरिये उन की तीखी आलोचना करते थे । 
उनके कुछ स्थायी ग्राहक थे और वे पान के साथ साथ भोला जी की तुकबंदियों के भी मजे लिया करते थे।  मेरे कुछ सहपाठी भी भोला जी के पान के साथ-साथ उनकी तुकबंदियों के मुरीद हो गए थे और बनाही, बिहियां से चलकर वे भोला जी के पान और तुकबंदियों के साथ कॉलेज परिसर में पहुँचते थे  वे एक केंद्र थे। भोला जी सबको उनके नाम से पुकारते थे, सबको जानते थे वे एक ऐसे केंद्र थे जहाँ से हमलोग जान जाते थे कि कौन शहर में है, कौन नहीं है वे मेरे आरा के डेरे पर भी आते थे और कई बार हमलोगों ने साथ- साथ खाना खाया हैं । मेरी माँ और बड़ी माँ सब भोला जी को जानती थी और उनको प्रेम से बैठाती-बतियाती थी| 

भोला जी को मैं 1984 से जानता हूँ तब छात्र संगठन ए. बी. एस. यू. था और जब मैं उससे जुड़ा तो पाया कि इससे और इस तरह के संगठनों और मिज़ाज के लोग भोला जी के पास जाते थे, बतियाते थे और चाय-पान करते थे । भोला जी भाकपा (माले) से जुड़े थे और कई बार जसम के राष्ट्रीय अधिवेशन में भी शरीक हुए थे । वे अक्खड़-फक्कड़ मिज़ाज के आदमी थे और इसी मिज़ाज के कवि भी थे ।
वे कुछ इस तरह के व्यक्ति थे जिनको खासकर वे लोग जो सभ्य- भव्य मन-मिज़ाज वाले थे, पचा नहीं पाते थे। जैसे कि चाय में खैनी मिला कर पी जाना,   जैसे कि जूठ-काँठ के भेद भाव को न मानना जैसे कि लठमार तरीके से अपनी बात कहना ।
वे जिस मिज़ाज के थे, उसी मिज़ाज के साथ हमलोगों के मित्र थे, साथी थे। उनके खिलाये पान की लाली मेरे व्यक्तित्व का अविभाजित हिस्सा हैं । उनकी कविताएं बहुत कलात्मक न होते हुए भी एक आम आदमी की सामाजिक प्रतिक्रिया के तौर पर बहुत मायने रखती हैं