Showing posts with label भोजपुरी. Show all posts
Showing posts with label भोजपुरी. Show all posts

Sunday, October 29, 2017

रमाकांत द्विवेदी रमता के गीत



हो गइले दीवाना
सुरजवा के कारण छैला हो गइले दीवाना
खद्दर पहिर के धइले भेस फकिराना
लाठी सहे, हंटर सहे, लाख-लाख गाली सहे
पुलिस-दारोगा के सहेले तीखे ताना
देखि के जुलुम बैमान अंगरेजवन के
बागी बन के गावेलें आजादी के तराना
चेत-चेत भारत के भाई हो-बहिनिया हो
तोड़ ई हुकूमत सुंदर आइल बा जमाना
कहे रमाकांत राज होई पंचाइत के
जरि जइहें आग में कचहरी अवरू थाना
19.1.1942


विद्रोही

रूढ़िवाद का घोर विरोधी, परिपाटी का नाशक हूं
नई रोशनी का उपासक, विप्लव का विकट उपासक हूं
प्राचीनता की चिता-भस्म से प्रतिमा नई बनाता हूं
नई कल्पना के सुमनों से रच-रच उसे सजाता हूं
मैं तो चला आज, जिस पथ पर भगत गए, आजाद गए
खुदीराम-सुखदेव-राजगुरु-बिस्मिल रामप्रसाद गए
ममता शेष नहीं जीवन की बीत मृदुल अरमान गए
मैं तो आज बना विद्रोही, जग के झूठे मान गए
सिंधु सलिल को क्षार करूं, वह बड़वानल की ज्वाला हूं
शंकर का भी कंठ जला दूं, काल कूट का प्याला हूं
हंसी उड़ाऊं कानूनों की, वह बांका मतवाला हूं
शासन सत्ता की आंखों में सदा खटकने वाला हूं
कठिन पंथ है मेरे आगे, पर इसकी परवाह नहीं
मुझे जरूरत है वीरों की, भयभीतों की चाह नहीं
असंतोष की आग नहीं, यह विप्लव की तैयारी है
आए मेरे साथ कि जिसको सजा मौत की प्यारी है
भस्मसात कर दूं दुनिया को, धूमकेतु का तारा हंू
पल में बरस बहा दूं जग को, प्रलय जलद की धारा हूं
जोश फूंक दूं मुर्दों में, वह महाक्रांति का नारा हूं
दुश्मन दल की ताकत पर आघात कराल करारा हूं
नहीं कल्पना के घोड़े पर बैठ हवाखोरी करता
उससे घृणा असीम, मौत से बिना लड़े ही जो मरता
मैं न हवाई महल बनाता, ठोस काम भाता मुझको
सुलह-बुझारत नहीं सुहाती, लड़ना बस आता मुझको
1943



नई जिंदगी
हम मरते नई जिंदगी पर, तस्वीर पुरानी रहने दे
नस-नस में भरी जवानी है, शमशीर पुरानी रहने दे

तूफान छुपाये कानों को, रुनझुन से बहलाना कैसा
हम झाड़ जिसे आये पथ में, जंजीर पुरानी रहने दे
रे कलम चलाने वाले, अब बेकार सभी कोशिश तेरी
निर्माण हमारे कदमों में, तकदीर पुरानी रहने दे
24.4.1950


गांव के बतकही
गांव-गांव के लोग आज बस इहे बात बतिआवत बा
बीती दुख के समय, जमाना मन लायक आवत बा
उहे बनी मालिक जमीन के, जे हर-फार चलावत बा
अपना हाथे कुटी काटि के भोरे बैल खिलावत बा
उहे बनी मालिक मशीन के चक्का जवन चलावत बा
किसिम-किसिम के चीज बनाके कहां-कहां पहुंचावत बा
अब अइसन अन्हेर ना रही कि केहू खटते खटत मरी
केहू मुफुते बाबू बनि के शान बघारी-मउज करी
11.12.51

किसान
जहवां न उजहल खगड़ा-धमोइया, ओही खेते उपजेला धान
ओही खेते गेहूं-बूंट-रहर-मटरन-जव, ओही खेते गड़ेला मचान
छिछिलेदर फूंटिया सियरवो ना पूछे, बांस नियन मकई के थान
जेकर पसेना बूंन मोती झरि लावेला, सभे के जियावेला किसान
खेतही मड़इया मड़उवे के छाजन, बांसवा के उटुंग मचान
सावन-भदउआ के रतिया भेयावन, लउर लेके सूतेला चितान
सनसन पुरवा के लरहा झटासेला, तबहूं ना जागेला नादान
‘पट’ सेनी ओही आरी करेला सहिलिया, चिहुंकि के फानेला जवान
हंसुआ-खुरुपिया-कुदारी-हर-हेंगा लेके, दिन में करेला घमसान
ठेहा पर चूकामूका बइठेला गंड़ासी लेके, जसही होखेला मुंह लुकान
मंस-डंस, पिलुआ-पताई के ना फिकिर करे, छनकल राखेला बथान
पिछिली पहर लोही लागेले पहिलकी, ओही राति जागेला किसान
जेठ के झरक, झाराझरी चाहे सावन के, माघ के टुसार मारे जान
कवनो जुगुतिये दइब बिलमावे, जनमे से मेहनत के बान
एही रे धरतिया प बाप-दादा रहले, दूधे-दही कइले असनान
कवन कमाई राम, आजु चूक गइलीं कि फुटहा के छछने किसान
जेकरा धरमे चमकत बाटे ईंटा-ईंटा, गछियोले ऊंचे-ऊंच मकान
धरती से बड़ी दूर, बदरियो से ऊपर, चिल्हि अइसन उड़ता विमान
आदिमी के हुकुम बजावेले मशीनिया कि रोजे रोजे बढ़े बिगेयान
कवनि कमाई राम, आजु चूकि गइलीं कि देखि-देखि तरसे किसान
जेकरा धरमे बसे शहर-बजरिया, दिने दिन बढ़ती प शान
जेकरा धरमे अनमन रंग चीजवा से चमचम चमके दोकान
जेकरा धरमे झारि लामी-लामी धोतिया आदमी कहावे बबुआन
कवनि कमाई राम, आजु चूकि गइलीं कि गंवंई में दुखिया किसान
30.7.52


बेयालिस के साथी
साथी, ऊ दिन परल इयाद, नयन भरि आइल ए साथी
गरजे-तड़के-चमके-बरसे, घटा भयावन कारी
आपन हाथ आपु ना सूझे, अइसन रात अन्हारी
चारों ओर भइल पंजंजल, ऊ भादो-भदवारी
डेग-डेग गोड़ बिछिलाइल, फनलीं कठिन कियारी
केहि आशा वन-वन फिरलीं छिछिआइल ए साथी
हाथे कड़ी, पांव में बेड़ी, डांड़े रसी बन्हाइल
बिना कसूर मूंज के अइसन, लाठिन देह थुराइल
सूपो चालन कुरुक करा के जुरुमाना वसुलाइल
बड़ा धरछने आइल, बाकी ऊ सुराज ना आइल
जवना खातिर तेरहो करम पुराइल ए साथी
भूखे-पेट बिसूरे लइका, समुझे ना समुझावे
गांथि लुगरिया रनिया, झुखे, लाजो देखि लजावे
बिनु किवांड़ घर कूकुर पइसे, ले छुंछहंड़ ढिमिलावे
रात-रात भर सोच-फिकिर में आंखों नींन न आवे
ई दुख सहल न जाइ कि मन उबिआइल ए साथी
क्रूर-संघाती राज हड़पले, भरि मुंह ना बतिआवसु
हमरे बल से कुरसी तूरसु, हमके आंखि देखावसु
दिन-दिन एने बढ़े मुसीबत, ओने मउज उड़ावसु
पाथर बोझल नाव भवंर में, दइबे पार लगावसु
सजगे! इन्हिको अंत काल नगिचाइल ए साथी
8.6.53



हरवाह-बटोही संवाद
हरवा जोतत बाड़े भइया हरवहवा कि आग लेखा बरिसेला घाम
तर-तर चूबेला पसेनवा रे भइया कि तनिए सा करिले आराम
चुप रहु, बुझबे ना तेहूं रे बटोहिया कि राहे-राहे धरती के ताल
जइसे चूवे तन के पसेना रे बटोहिया कि ओइसे बढ़े धरती के हाल
हरवा जोतत बाड़े भइया हरवहवा कि सहि-सहि बरखा ले घाम
कबहूं ना भरिपेट खइले करमजरूआ कि झूलि गइले ठटरी के चाम
हरवा जोतत मोरि जिनिगि सिरइली कि हरवा से नान्हें पिरीति
भरी छुधा जिनिगी में कहियो ना खइलीं कि इहे तोरा देशवा के रीति
खेतवा में बोईं ले जे बारहो बिरिहिनी कि लागेला जम्हार लेखा चास
कवना करमवां के चूक भइया हितवा, कि बाले-बचे सूतीं ले उपास
जोत-कोड़ कमती ना गंगा बढ़िअइली कि परुए से भइल ना सुखार
कवना करमवां में चूकलीं रे दइबा, कि तेहू पर रहलीं भिखार
देशवा के नांव लेले भइया हरवहवा, कि देशवा में बड़का के राज
हमनी का भइलीं रामा गुलर के पिलुआ कि बड़का भइले दगाबाज
भइल बाटे तलफी भुंभरिया रे भइया कि हाली-हाली डेगवा बढ़ाउ
बोलिया जे बोलले पिरीतिया के भइया कि छंहरी बइठि बतिआउ
जेठ-बइशाखवा के अइन दुपहरिया कि रोएं-रोएं मार तारे धाह
मोरा लेखे भइया रे, दुनिया उलटली कि तोरा लेखे बबुरी तर छांह
14.8.54

कुंवर सिंह
झांझर भारत के नइया खेवनहार कुंवर सिंह
आजादी के सपना के सिरिजनहार कुंवर सिंह

इतिहास के होला सांपे लेखा टेढ़टाढ़ चाल
कभी सूतेला निहाल, कभी उठेला बेहाल
बढ़ल आपस के फूट, देश हो गइल पैमाल
गांवे-नगरे फएल गइल कंपनी के जाल

मने-मने करत रहन सब विचार कुंवर सिंह
अपना देश खातिर पोसत रहन प्यार कुंवर सिंह

देखत-देखत ढाका-काशी के उजार हो गइल
लंकाशायर-मैनचेस्टर के सुतार हो गइल
अने-धने भरल-पुरल, से भिखार हो गइल
भूखड़ टापू इंगलैंड गुलजार हो गइल

चुपे चुपे होत रहन तइयार कुंवर सिंह
खीसी जरत रहन एंड़ी से कपार कुंवर सिंह

जब अनमोल कलाकार के अंगूठा कटाई
आ, बलाते जब सोहागिनी के जेवर छिनाई
दिने दूपहर सड़क पर जबकि इज्जत लुटाई
अइसन के होइ, करेजा जेकर फाट ना जाई

आंख फार के देखले लूट-मार कुंवर सिंह
कान पात के सुनले हाहाकार कुंवर सिंह

भारत माता के अचक्के में पुकार हो गइल
खीस दबल रहे भीतर से उघार हो गइल
बाढ़ आइल अइसन जोश के, दहार हो गइल
बात बढ़त-बढ़त आखिर में जूझार हो गइल

देशी फउज के बनले सरदार कुंवर सिंह
अपना देश के भइले रखवार कुंवर सिंह

रहे मोछ ना, उ बरछी के नोक रहे रे
तरूआरे अइसन तेगा अइसन चोख रहे रे
कसल सोटा अइसन देह, मन शोख रहे रे
अइसन वीर जनमावल, धनी कोख रहे रे

ओह बुढ़ारी में जवानी के उभार कुंवर सिंह
अलबेला रे बछेड़ा असवार कुंवर सिंह
गइल जिनिगी अनेर, जब निशानी ना रहल
सवंसार के जवान प’ कहानी ना रहल
जिअल-मुअल दूनों एक, जब बदानी ना रहल
छिया-छिया रे जवानी, जबकि पानी ना रहल
हुंहुंकार के सुनवले ललकार कुंवर सिंह
रने वन मचवले धुआंधार कुंवर सिंह

होश बड़े-बड़े वीर के ठेकाने ना रहल
तोप, गोला के, बनूक के कवनो माने ना रहल
केकरो हाथ, गोड़, नाक, केकरो काने ना रहल
लागल एको झापड़, ओकरा तराने ना रहल

छपाछप फेरसु चारो ओर दुधार कुंवर सिंह
नीचे खून के बहवले पवनार कुंवर सिंह
होला ईंट के उत्तर पत्थर से देवे के जबाना
कस के दुशमन से बदला लेवे के जबाना
कभी छिप के, कभी परगट लड़े के जबाना
कभी हटे के, आ, कबहीं बढ़े के जबाना

रहन अइसन फन में खूबे हुंसियार कुंवर सिंह
राते रात करस अस्सी कोश ले पार कुंवर सिंह
अधिकार पा के मुरुख मतवाला हो जाला
रउआ कतनो मनाई, सुर्तवाला हो जाला
देश जागेला त दुनिया में हाला हो जाला
कंपनी का? परलामेंट के देवाला हो जाला

एह विचार के सिखवले बेवहार कुंवर सिंह
जगदीशपुर के माटी के सिंगार कुंवर सिंह

खांव गेहूं चाहे रहे एहूं दूनों सांझे पेट
दान मुटठी खोल के होय, चाहे खाली रहे टेंट
बांह देश के उधारे, चाहे गंगाजी के भेंट
मान कायम रहे, जीवन लीला ले समेट

अस्सी बरिस के भोजपुरी चमत्कार कुंवर सिंह
लक्ष्मीबाई-तंतिया-नाना के इयार कुंवर सिंह
23. 4. 55


टपान
बाटे टपान बस इहे, कदम बढ़ा के चल

आवे दे, का भइल अगर तूफान आ गइल
बिछिली भइल अन्हार में, बरखा बरिस गइल
बिजुरी सुझाई राह, तनि नोंह गड़ा के चल
साथी-समाज ना छूटे, कसिके हंकार ले
के दो गिरे-गिरे भइल, धइले-संभार ले
नइ के उठाउ, अब बा, कान्हा चढ़ाके चल


खेवा-खरच ओरा गइल, चिंता के बात का
पेटे भइल पहाड़ त, शिव के जमात का
हिम्मत न हार, जान के बाजी लड़ाके चल

फाटी कुहेस, सब घरी अन्हार ना रही
फहरी निशान जय के, झुर-झुर पवन बही
जिनिगी के बिपत-बिघिन के, कबड्डी पढ़ाके चल

24.8.56


जिंदा शहीद

अरे नौजवान, तुम्हें क्या बताएं
कि किन मुश्किलों से आजादी ले आए

गजब जुल्म की आधियां चल रही थीं
कयामत की उमड़ी थीं सौ-सौ घटाएं
जमीं धंस रही, आसमां फट रहा
जान पर आ पड़ी, कांपती थीं दिशाएं

मगर हम थे ऐसे कि चट्टान जैसे
अड़े रह गए, ना तनिक डगमगाए

अजब बेरहम हो गई थी हुकूमत
अजब बेबसी का था जालिम जमाना
हम अपने ही घर से बेदखल यूं हुए थे
कि मरघट में भी था न अपना ठिकाना

जो थे गैर, वे तो भले गैर थे ही
जो अपने भी थे, हो गए थे पराए

मिटे जा रहे थे घरों के घिरौंदे
कुटुंब और कबीले छुटे जा रहे थे
मगर एक धुन के हजारों दीवाने
कहीं एक लय पर जुटे जा रहे थे

तमन्ना थी, गोरी हुकूमत मिटा के
गरीबों की देशी हुकूमत बनाएं

सभा चल रही थी, जुलूस चल रहा था
अहिंसा का आदर्श भी चल रहा था
चले जा रहे थे बढ़े डेपुटेशन
सुलह का परामर्श भी चल रहा था

मगर हमने देखा कि बेकार है सब
तो आखिर बगावत का झंडा उठाए

सजा कर के बलिवेदियां अपने हाथों से
सर पे लपेटे कफन हम खड़े थे
फिरंगी उधर था मशीनों के पीछे
इधर शाम में हम निहत्थे अड़े थे

बरसती थी गोली धुआंधार लेकिन
बढ़े पांव हमने न पीछे हटाए

अभी हाथ में चिह्न हैं हथकड़ी के
अभी पांव में बेड़ियों के हैं घट्ठे
कभी देख लेना खुला जब बदन हो
कि हैं बेंत के दाग कितने इकट्ठे

मगर यह न समझो कि हम रो पड़े थे
सदा मौज में हम रहे, गीत गाए

बढ़े जा रहे हों नए टैक्स दिन-दिन
कि लाचार जनता मरी जा रही हो
करोड़ों को रोटी-लंगोटी न हो, पर
अमीरों की थैली भरी जा रही हो

बताओ तुम्हीं नौजवानों, कि ऐसे में
कैसे कोई रह सके चुप लगाए

जहां न्याय नीलाम होता हो खुल कर
जहां रिश्वतों का ही हो बोलबाला
हर आॅफिस जहां डाकुओं का हो अड्डा
औ’ कानून का पिट गया हो दिवाला

थी ऐसी हुकूमत की साया से नफरत
हम ऐसी हुकूमत की धज्जी उड़ाए

29.4.59


नक्सलबाड़ी की जय

चला दमन का चक्र, छेड़ सोता सिंह जगाओ
धरती के भूखे कृषकों तक, राजनीति पहुंचाओ

लाठी-गोली-जेल-सेल से, जनता नहीं डरेगी
छोटी चिनगारी सारे, जंगल को क्षार करेगी

जमींदार-सेठों के टुकड़खोर, तुम्हारी क्षय हो
धरती के बेटों की जय, नक्सलबाड़ी की जय हो

8.8.67


सरकारी हिंसा हिंसा न भवति                                                                                                                          
भुनते रोज गोलियों से सौ-सौ भूखे मजदूर-किसान
भुनते रोज गोलियों से अन्याय विरोधी छात्र-जवान
नारि-पुरुष, बच्चे-बूढ़े तक घेर जलाए जाते हैं
अक्सर गांव-नगर में लंकाकांड रचाए जाते हैं

लेकिन यह सरकारी हिंसा, तो कानूनी हिंसा है
चाहे जितनी गर्दन काटो, सौ फीसदी अहिंसा है

मगर दूसरे उबल पड़ें तो कुल विकास रुक जाते हैं
मिट जाती एकता, देश पर खतरे आ मड़राते हैं
सत्ता के सारे ही भोंपू, पहले से रहते तैयार
गला फाड़ चिल्ला उठते हैं, ‘‘प्रजातंत्र डूबा मझधार’’

4.2.75



धनवान इजाजत ना देगा
जीने के लिए कोई बागी बने, धनवान इजाजत ना देगा
कोई धर्म इजाजत ना देगा, भगवान इजाजत ना देगा

रोजी के लिए-रोटी के लिए, इज्जत के लिए कानून नहीं
यह दर्द मिटाने की खातिर, मिल्लत के लिए कानून नहीं
कानून नया गढ़ने के लिए, जिंदगी की तरफ बढ़ने के लिए
गद्दी से चिपककर फूला हुआ शैतान इजाजत ना देगा

जो समाज बदलने को निकले, बे-पढ़ो में चले, पिछड़ों में चले
फुटपाथ पे सोनेवालों में, और उजड़े हुए झोंपड़ों में चले
कुर्सी-टेबुल-पंखे के लिए जो कलमफरोशी करता है
बदलाव की खातिर सोच की वह विद्वान इजाजत ना देगा

20.4.82


रे कुचाली

थोरे दिनवां ना रे कुचाली, थोरे दिनवां ना
जनाले आपन जारी रे, थोरे दिनवां ना

डाका-चोरी, छीना-छोरी, लूट-मार-हत्यारी रे
सब अबगुन आगर जनमवलस कइसन बाप मतारी रे

लुच्चा-लंपट-लुकड़-पियक्कड़, सबके खातिरदारी रे
दुनिया भर के गुंडन खातिर तोरे घर ससुरारी रे

तोरा घर में अड्डा मारे पुलिस, लंठ, व्याभिचारी रे
निमन सिखावन सीखत होइहें बेटा, बेटी, नारी रे

खल से प्रीति, बैर भल मन से, जनता से बरिआरी रे
देशभक्त पर, जनसेवक पर हमला, निंदा, गारी रे

गांव-जवार, पड़ोसा-टोला सबके दुश्मन भारी रे
जे भी आपन हक पद चिन्हे, कहिदे नक्सलवारी रे

का करिहें बंदूक-रायफल, बडीगार्ड सरकारी रे
तोरा कुल के जरि से कोड़ी पीजल लाल कुदारी रे

4.2.83

अइसन गांव बना दे
अइसन गांव बना दे, जहां अत्याचार ना रहे
जहां सपनों में जालिम जमींदार ना रहे

सबके मिले भर पेट दाना, सब के रहे के ठेकाना
कोई बस्तर बिना लंगटे- उघार ना रहे
सभे करे मिल-जुल काम, पावे पूरा श्रम के दाम
कोई केहू के कमाई लूटनिहार ना रहे

सभे करे सब के मान, गावे एकता के गान
कोई केहू के कुबोली बोलनिहार ना रहे

18.3.83


त हम का करीं
क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब
केहू का ना सोहाला त हम का करीं
लाल झंडा हवा में उड़़इबे करब
केहू जरिके बुताला त हम का करीं

केहू दिन-रात खटलो प’ भूखे मरे
केहू बइठल मलाई से नाश्ता करे
केहू टुटही मड़इया में दिन काटता
केहू कोठा-अटारी में जलसा करे

ई ना बरम्हा के टांकी ह तकदीर में
ई त बैमान-धूर्तन के करसाज ह
हम ढकोसला के परदा उठइबे करब
केहू फजिहत हो जाला त हम का करीं

ह ई मालिक ना, जालिम जमींदार ह
खून सोखा ह, लंपट ह, हत्यार ह
ह ई समराजी पूंजी के देशी दलाल
टाटा-बिड़ला ह, बड़का पूंजीदार ह

ह ई इन्हने के कुकुर वफादार ह
देश बेचू ह, सांसद ह, सरकार ह
सबके अंगुरी देखा के चिन्हइबे करब
केहू सकदम हो जाला त हम का करीं

सौ में पंचानबे लोग दुख भोगता
सौ में पांचे सब जिनिगी के सुख भोगता
ओही पांचे के हक में पुलिस-फौज बा
दिल्ली-पटना से हाकिम-हुकुम होखता

ओही पांचे के चलती बा एह राज में
ऊहे सबके तरक्की के राह रोकता
ऊहे दुश्मन ह, डंका बजइबे करब
केहू का धड़का समाला त हम का करीं
30.1.83


भारत जननि तेरी जय हो
(राग वागेश्वरी, झपताल)

भारत जननि! तेरी जय, तेरी जय हो

हों वीर, रणधीर तेरी सु-संतान
तेरी सभी संकटों पर विजय हो

आजाद, अस्फाक, बिस्मिल, खुदीराम
उधम, भगत सिंह का फिर उदय हो

चारू की, राजू की, किस्टा-भुमैया की
जौहर की आवाज गुंजित अभय हो

जनगण हों आजाद, कायम हो जनवाद
सत्ता निरंकुश का अंतिम प्रलय हो
18.2.1984

भटकल गायक
गाव गान कि जन-जन जगे आत्मसम्मान मितवा
अब तू रचे चल जनमन के हिंदुस्तान मितवा

कबले भटक-भटक भटकइब, कब ले गीत अनर्गल गइब
कबले सरस्वती के बेचब वरदान मितवा

कबही वन में रास रचवल, कबही झूठा जगत बतवल
कबही पत्थर पर बलिदान चढ़वल प्रान मितवा

अबले बात न्याय के दूरे, हक जे भेंटल, उहो अधूरे
जेकर ढोल बजवल, डुबा चुकल ईमान मितवा

कब से ग्राह पकड़ले बाटे, फंदा चल देश के काटे
कबले राह चितइब, ना अइहें भगवान मितवा
13.5.84

राजनीति सब के बुझे के बुझावे के परी                                                                                                  राजनीति सब के बुझे के बुझावे के परी
देश फंसल बाटे जाल में, छोड़ावे के परी

सहि के लाखों बरबादी, मिलल नकली आजादी
एहके नकली से असली बनावे के परी

कवनो वंशे करी राज, या कि जनता के समाज
जतना जलदी, जइसे होखे, फरियावे के परी

बड़-बड़ सेठ-जमींदार, पुलिस-पलटनिया हतेयार
सब लुटेरन, हतेयारन के मिटावे के परी

रूस, अमरीका से यारी, सारी दुनिया के बीमारी
अपना देश के एह यारी से बचावे के परी

कहीं देश फिर ना टूटे, टूटल-फूटल बा से जुटे
सबके हक के झंडा ऊंचा फहरावे के परी

सौ में पांचे जहां सुखिया, भारत दुनिया ऊपर दुखिया
घर-घर क्रांति के संदेशा पहुंचावे के परी
25.9.1984


नौजवान भइया

रोजे रोज बटिया हम जोहिले तोहार
नौजवान भइया! देशवा के तूही करनधार

कहिया ले चारों ओर एकता बनइब
कहिया ले जुलुमिन के जुलुम मेटइब
कहिया ले देब नया युग के विचार

कहिया ले जाई अपना देश से बेकारी
कहिया ले छूटी भूखल पेट के बेमारी
कहिया ले सहल जाई महंगी के मार

कहिया ले होई हमनी के सुनवाई
कहिया ले धन के गुलामी मिट जाई
कहिया ले बनी हमनी के सरकार

तूहीं कुछ सोचब, त, सूझी कवनो राह
तू ही कुछ करब त, होई कुछ छांह
तोहरे पर लागल बाटे आसरा हमार
30.4.85

मैं तो नक्सलवादी

मैं तो नक्सलवादी वंदे! मैं तो नक्सलवादी रे
मुझसे तनिक सही ना जाए अब घर की बरबादी रे

लूटे मेरा देश विदेशी जंगखोर साम्राजी
साथ-साथ सामंत रिजाला, पूंजीवाला पाजी
सबके मन सहकाए, जो बैठे दिल्ली की गद्दी रे

खट-खट के खलिहान-खेत में, मिल में और खदान में
मर-मर सब सुख साज सजावे गांव-नगर-मैदान में
दो रोटी के लिए बने वह द्वार द्वार फरियादी रे

भ्रष्टाचार-भूख-बेकारी दिन-दिन बढ़े सवाई
अत्याचार विरोधी को सरकार कहे अन्यायी
यह कैसा जनतंत्र देश में, यह कैसी आजादी रे

मैं तो वंदे! अग्नि-पंथ का पंथी दूर मुकामी
मेरे संगी-साथी ये अंतिम जुझार संग्रामी
रोटी-आजादी-जनवाद हेतु जो करें मुनादी रे

30.4.85


हमनी साथी हईं
हमनी देशवा के नया रचवइया हईंजा
हमनी साथी हईं, आपस में भइया र्हइंजा

हमनी हईंजा जवान, राहे चलीं सीना तान
हमनी जुलुमिन से पंजा लड़वइया हईंजा

सगरे हमनी के दल, गांव-नगर हलचल
हमनी चुन-चुन कुचाल मेटवइया हईंजा

झंडा हमनी के लाल, तीनों काल में कमाल
सारे झंडा ऊपर झंडा उड़वइया हईंजा

बहे कइसनो बेयार, नइया होइये जाई पार
हमनी देशवा के नइया के खेवइया हईंजा
1.5.85



शहीदों का गीत                                                                                                                                             भगत-आजाद- ऊधम का जो फिर अवतार हो जाए
तो बेशक जालिमों का अंत अबकी बार हो जाए

गए गोरे, मगर अंग्रेज काले जड़ जमा बैठे
कोई तदबीर हो, इनका भी बंटाधार हो जाए

जो रोटी और इज्जत चाहते, क्यों कत्ल होते हैं
ये कैसा रोग है, इसका सही उपचार हो जाए

हमें इस जुल्म की बुनियाद से ऐसे निबटना है
कि अगला हर कदम उस पै करारा वार हो जाए
फंसी तूफान में किश्ती हमारे देश भारत की
जवानो! बल लगाओ तुम तो बेड़ा पार हो जाए

14.8.86

                                                                                                                                                           हामार सुनीं

काहे फरके-फरके बानीं, रउरो आईं जी
हामार सुनीं, कुछ अपनो सुनाईं जी

जब हम करींले पुकार, राउर खुले ना केवांर
एकर कारन का बा, आईं समुझाईं जी

जइसन फेर में बानी हम, ओहले रउरो नइखीं कम
कवनो निकले के जुगुति बताईं जी

सोचीं, कइसन बा ई राज, कुछ त रउरो बा अंदाज
देहबि कहिया ले एह राज के दोहाई जी

जवन सांसत अबहीं होता, का-का भोगिहें नाती-पोता
एह पर रउरो तनि गौर फरमाईं जी

अब मत फरके-फरके रहीं, सब कुछ संगे-संगे सहीं
संगे-संगे करीं बचे के उपाई जी

सभे आइल, रउरो आईं, संगे रोईं-संगे गाईं
हम त रउरे हईं, रउरा हमार भाई जी

9.11.86


रोटी के गीत

जगत में रोटी बड़ी महान!

बिन रोटी क्या पूजा-अर्चा-तीरथ-बरत-नहान
छापा-तिलक-जनेऊ-कंठी-माला कथा-पुरान

बिन रोटी सब सूना-सूना घर-बाहर-मैदान
मंदिर-मस्जिद-मठ-गुरुद्वारा-गिरजाघर मसान

रोटी बढ़कर स्वर्ग लोक से, रोटी जीवन प्राण
रोटी से बढ़कर ना कोई देव-दनुज-भगवान

सो रोटी उपजे खेती से, खेती करे किसान
जो किसान का साथ निबाहे, सो सच्चा इंसान

15.6.88

( ये गीत समकालीन प्रकाशन से 1996 में प्रकाशित रमता जी के हिंदी-भोजपुरी गीतों के एकमात्र संग्रह ‘हामार सुनीं’ से लिए गए हैं। )

Friday, October 27, 2017

रमता जी के बारे में कुछ भी जानने से पहले उनके गीतों को जाना : बलभद्र

रमता जी (छाया- राकेश दिवाकर) 
रमता-स्मरण 
रमाकांत दिवेदी 'रमता' भोजपुरी और हिंदी के एक महत्वपूर्ण कवि। 30 अक्टूबर 1917 उनकी जन्मतिथि। यह उनके जन्म का सौवां साल है। भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में उनकी महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय भूमिका रही है। आजादी के बाद भी 'स्वराज को सुराज' में बदलने का उनका संघर्ष जारी रहता है। गांधीजी के विचारों से प्रभावित रमताजी आगे चलकर समाजवादी विचारों से जुड़ते हैं। पर, यहां भी वे ठहरते नहीं, आगे बढ़कर वामपंथी विचारधारा से जुड़ते हैं। फिर, आगे बढ़कर जनता और देश की स्थितियों महसूसते हुए वाम की क्रांतिकारी धारा सीपीआई-एमएल से जुड़कर जनांदोलनों में खुद को साझीदार बनाते हैं। हर दौर-हर अनुभव- को उन्होंने कविताओं में दर्ज किया है। भोजपुरी और हिंदी के ये पॉवरफुल कवि हैं। इस अवसर पर 29 अक्टूबर 2017 को आरा में जसम के जन भाषा समूह की तरफ से एक कार्यक्रम का आयोजन होने वाला है। 


· 

रमताजी की एक कविता 'भोजपुरी' भाषा पर है, जिसका शीर्षक है 'भोजपुरी'। उनकी यह कविता 15-11-1952 की है। भोजपुरी भाषा और भोजपुरिया जवान पर भोजपुरी में कई कवियों की कविताएं हैं। उन पर यहां कोई टिप्पणी देना ठीक नहीं। आप सब रमता जी की यह कविता पढ़ें। यह कविता संतोष सहर से प्राप्त हुई है। "नागिचा ना रहे इस्कूल, आ, गरीबी गुने/ बारी रे समयिया गइल बीत!/ अचके में हवा बहल गंवई के सुधि लेके/ लागल भोजपुरी पिरीत! गिटपिट 'हिन्दुई' बुझाला न झरेला लो'के/ मोर मन करेला ये मीत।। भरि पेट रोईं-मुसुकाई भोजपुरिये में/ गाईं भोजपुरिये में गीत।' 




रमता जी के बारे में कुछ भी जानने से पहले उनके गीतों को जाना। वह 1988 का साल होगा जब पहली बार अपने गांव में भगेला यादव के चौपाल पर रमता जी का एक गीत सुना। वह गीत था- "क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब केहू का न सोहाला त हम का करीं।" इस चौपाल पर गांव के किसानों-मजदूरों की एक मीटिंग हो रही थी। कॉमरेड चंद्रमा प्रसाद आये थे। मेरे गाँव की अपने टाइप की यह पहली मीटिंग थी। लोगों से बातचीत के बाद चंद्रमा जी ने यह गीत सुनाया। मेरे गाँव की ही नहीं, मेरे लिए भी यह पहली मीटिंग थी। चंद्रमा जी ने तब कवि का नाम भी बताया था, लेकिन मैं तब कवि से बिल्कुल ही अपरिचित था। कविता भी उनकी पहली बार ही सुनने को मिली थी। उनका गीत दूसरी बार सुनने का अवसर अपने बगल के सिकरिया गांव में मिला। इस गांव के गरीब किसान-मजदूर (दलित) ढोल-झाल के साथ गा रहे थे- "हमनी गरीबवन के दुखवा अपार बा।" संत शिवनारायण की जयंती थी और शिवनारायनी की धुन में ही यह गीत है। गाने वालों को पता नहीं था कि यह किसका गीत है। वे तो गा रहे थे कि इसमें वे अपने को पा रहे थे। अपने दुख-तकलीफों को अपनी उपेक्षाओं को। बाद में पता चला कि यह रमता जी का गीत है। तब सिकरिया में राजेंद्र राम, विजय राम, उदय पासवान, बिलगू जी, साहेबजी आदि सक्रिय थे। 




आर्थिक तंगहाली एवं पारिवारिक दबावों के कारण सिकरिया गांव के ये उभरते हुए कार्यकर्ता रोजी-रोजगार की तलाश में बाहर निकलते गए। ये गीत-गवनई में रुचि रखने वाले युवा थे। साहेब तो बाजा पार्टी भी चलाते थे। उदय और राजेंद्र भी उस पार्टी में थे। भर लगन ये शादी-विवाह में सट्टे पर जाते थे। इससे इन लोगों को कुछ कमाई हो जाती थी और खेती के मौके पर ये अपनी थोड़ी- सी खेती संभाल कर दूसरों के यहां मजदूरी भी किया करते थे। राजनीतिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। लगन के अवसरों पर ये लोग फूहड़-अश्लील गीतों को गाने-बजाने से बच-बचाकर चलते थे। फगुआ-चैता में जब ताल ठोका जाता था, तब भी ये सचेत रहते थे। गोरख पाण्डेय, रमता जी, विजेंद्र अनिल, दुर्गेन्द अकारी, कृष्ण कुमार निर्मोही के गीत इन लोगों खूब याद थे। ये अपने से भी गीत बनाना सीख चुके थे। ये इनके ही गीतों को गाया करते थे। फगुआ-चैता में भी, लगन के अवसरों पर भी, पार्टी-कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार में भी। तब इंडियन पीपुल्स फ्रंट का समय था। लेकिन इन लोगों कौन गीत किसका लिखा हुआ है, यह नहीं मालूम था। इनको यह पता था कि इन्हें इन गीतों को गाना है।इसके चलते इनके गांव और आस पास के तथाकथित बड़े लोग , खासकर बड़ी जाति के, काफी नाराज रहा करते थे। 




ये लोग रमता जी के इस गीत को भी खूब गाते थे-'हमनी देसवा के नया रचवइया हई जा/ हमनी साथी हई आपस में भइया हई जा।' गोरख के 'समाजवाद' और 'शुरू भइल हक के लड़इया' वाले गीत को भी जमकर गाते थे। इसमे थोड़ा अपनी ओर से संशोधन कर गाते थे। 'हक' की जगह 'किसान' कर लेते थे। 89 के चुनाव में 'अकारी' के गीत 'चोर राजीव गांधी घुसखोर राजीव गांधी/ बिदेसी सौदा में पकरईल कमीशन खोर राजीव गांधी।' बोफोर्स घोटाले पर यह लिखा गया था। उस चुनाव के समय का यह सुपर-डुपर हिट गीत था। 'ए बबुआ टोपी सिया ल चुनाव में' भी खूब चला। यह विजेंद्र अनिल का गीत है। निर्मोही का 'जबले न रुकी भइया शोषण जुलुमवा कांरवा बढ़ते रही' भी गाया जाता था। इन गीतों के अलावे भी और कई गीत थे जो खूब गाये गये। आज कोई यकीन नही करेगा कि गांव-गांव में इन गीतों को गाने वाले थे। पार्टी के धुर विरोधी भी मन ही मन इन गीतों की लाइनों को गुनगुनाने को मजबूर थे। कभी-कभार तो बकझक करते या मजाक उड़ाते भी इन गीतों की एक-दो लाइनों को बोल जाते थे। ये गीत एक कार्यकर्ता की भूमिका में होते थे। एक मास्टर साहब थे हाई स्कूल जादोपुर के- ओझा जी, वे उस दौर के गानों और नारों को चिढ़ के कारण लोगों के बीच अक्सर सुनाया करते थे। बड़ी बड़ी रैलियों और जुलूसों में मंच से गीत होते थे। 10 मार्च 1989 की रैली जो पटना के गांधी मैदान में आयोजित थी, उसकी पूर्व संध्या पर मैंने नरेंद्र कुमार को गांधी मैदान के मंच से गाते देखा-सुना था। गीत था-'माई गोहरवे मोर ललनवा हो।' 1992 के बाद बनारस एबी होस्टल कमच्छा में रहते इनसे निकटता बनी। आज वो इस धरा-धाम पर नहीं हैं। यह गीत उनके गीतों-गजलों के संग्रह 'कब होगी बरसात' में है। नरेंद्र को भी रमताजी और विजेंद्र अनिल के गीत याद थे। इन गीतों को लोग आज भी गाते हैं। 'हिरावल', पटना के गायक और रंगकर्मी बड़े मन से इन गीतों को गाते हैं। लेकिन क्या कि गांव -गांव गाने वाली बात अब नहीं रही। आंदोलन तो हैं, पर गीत कम हैं। 



89 के लोकसभा चुनाव में आरा लोकसभा क्षेत्र से आईपीएफ के कॉ. रामेश्वर प्रसाद की जीत हुई थी। इसके बाद बिहार विधान सभा के लिए चुनाव था। शाहपुर विधान सभा क्षेत्र के आईपीएफ के प्रत्याशी थे चंद्रमा प्रसाद। शाहपुर बाजार में एक आम सभा होने वाली थी। उस सभा को संबोधित करने आए थे सांसद रामेश्वर प्रसाद और रमता जी। प्रत्याशी चंद्रमा जी को तो रहना ही था। मैं भी उस सभा में था और मेरे गाँव के कुछ युवक भी थे और पार्टी समर्थक अन्य गांवों के भी आए थे। इन वक्ताओं के संबोधन से पहले गीत गाये जा रहे थे। गीत सिकरिया के उदय गा रहे थे। एक पर एक और एक से एक। गोरख, रमताजी, विजेंद्र अनिल के लिखे। उदय अच्छा गाते थे। गोरख पांडेय की एक कविता मैंने भी सुनाई थी। वह कविता थी 'हुआ यह है'। उसकी एक लाइन है- 'जिनको हिरासत में होना चाहिये उनका इशारा संविधान है/ और हम हैं कि खुली सड़कों पर कैद हैं'। है न यह आज पूरापुरी मौजूं। रामजी भाई ने इस लाइन को दो-तीन दिन हुआ, फेसबुक वाल पर डाला था। तो इस कविता को सुनने के बाद रमताजी ने सभा सम्पन्न होने पर मुझसे बातचीत की। उनके करीब बैठने औऱ बोलने-बतियाने का यह पहला अवसर था। मैंने इस सभा मे स्थानीय मुद्दों को केंद्रित करते एक छोटा-सा भाषण भी दिया था। शाहपुर से बिहिया आना था। यहां भी एक सभा होनी थी। यहां भी गीत गाये गये। गीत हमारे संगठन की पहचान बन गए थे। सभा के बाद हमलोग चाय पीने के लिये एक जगह बैठे। रमताजी से यहां भी कुछ बातें हुईं। बीच में आकर चंद्रमा जी ने रमताजी से कहा कि ये साथी बलभद्र जी हैं, इस अंचल में पार्टी कामकाज में हैं। उन्होंने कहा कि ये संतोष सहर के बडे भाई हैं। यह सुन वे और प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि आरा पार्टी ऑफिस में हमलोग मिलते हैं। रामेश्वर जी से पहले से अच्छी जान-पहचान थी। रमताजी और रामेश्वर जी हाथ मिला जगदीशपुर के लिए रवाना हुए। 



तो रमता जी और कामरेड रामेश्वर प्रसाद जी बिहिया से जगदीशपुर के लिये रवाना हुए। बिहिया से थोड़ी ही दूरी पर है जगदीशपुर- बाबू कुंवर सिंह वाला जगदीशपुर। बताते चलें कि बाबू कुंवर सिंह पर रमता जी ने भोजपुरी में एक बड़ी अच्छी कविता लिखी है। कुंवर सिंह पर लिखी गयी कविताओं में यह अपनी एक अलग विशिष्ट पहचान रखती है। शाहपुर की सभा को संबोधित करते रमता जी बहुत ही सहज के साथ साथ तथ्यों के विश्लेषण में सन्तुलित और धारदार लगे। कांग्रेसी हुकूमत की कारगुजारियों का सहज ढंग से विश्लेषण किया। आज मैं जितना याद कर पा रहा हूँ, भाषण को बातचीत की शैली में वे रखते थे, जैसे कि भोजपुरी की अपनी कोई कविता सुना रहे हों। एक हाथ की ताली को दूसरे हाथ की ताली से मासूम स्पर्श कराते हुए। धोती कुरता गमछा और झोले वाले रमताजी। आज याद कर रहा हूँ सभा को सम्बोधित करते रमता जी को, एक हाथ की ताली को दूसरे हाथ की ताली से मासूम स्पर्श कराते, तो उनकी इस कविता की याद बारम्बार आ रही है- "खाके किरिया समाजवाद के खानदानी हुकूमत चले/ जइसे मस्ती में हाथी सामन्ती निरंकुश झूमत चले/ खाके के गोली गिरल परजातन्तर कि मुसकिल इलाज हो गइल/ चढ़के छाती पर केहू राजरानी, त केहू युवराज हो गइल।" यह 1984 की कविता है। इस कविता को सुनाने के अंदाज में वो सभा संबोधित कर रहे थे। "हक-पद खोजे से फँसावे आपन गरदन, ऐंठत चले अत्याचारी"। कविता के इन्ही तथ्यों को कविता सुनाने की शैली के बिल्कुल आसपास सुना रहे थे। तब मैं इनकी कविताओं का पाठक नही बन पाया था। तो कहां से जानता रमता जी को कायदे से। मुझे याद है कि किसी कार्यक्रम में शामिल होने आरा गया था तो पुरबवारी रेलवे गुमटी के पास जो पार्टी आफिस(cpi-ml) है, भीतर रमता जी थे। उन्होंने पूछा कि "आप भी कुछ लिखते हैं, कविता, कहानी?" मैंने तब हाँ-ना कुछ भी नही कहा था। फिर पूछा बाबा ने कि नाम के साथ कुछ लिखते हैं क्या जैसे मैं रमता लिखता हूँ, जैसे संतोष अपने नाम के साथ सहर लिखते हैं। मैंने कहा था कि ऐसा कुछ सोचा जरूर था, पर मन को भाया नहीं। फिर जितेंद्र जी ने चाय मंगा दी। भोजपुर के साथियों के बीच रमता जी के लिए जो प्यारा सा संबोधन था वो बाबा था। साहित्य जगत में, खासकर हिंदी में, नागार्जुन को बाबा कहाने का गौरव प्राप्त है। 


8 

30 अक्टूबर 1917 रमता जी का जन्म दिन है। 24 जनवरी 2008 को उन्होंने अपने जीवन की आखिरी सांसें ली। इस तरह यह उनका जन्म शती वर्ष है। जन-सुराज के संघर्षों के सहयात्री कवि थे रमता जी। पूरा नाम- रमाकांत द्विवेदी 'रमता'। बिहार के भोजपुर जिला का महुली घाट(बड़हरा) उनका जन्म स्थान था। यह बाढ़ -बूडाव वाला इलाका है। बाढ़ के चलते इसकी स्थिति काफी बदल चुकी है। बाढ़ ,सुखाड़ और अपने बड़हरा पर भी उन्होंने कविताएं लिखी हैं। उनके लिखे 'गंगाजी के बाढ़ में डुबकियां मारेला खूब/ जिला शाहाबाद भ में खाल बा बड़हरा।' पहले भोजपुर जिला शाहाबाद में था। शाहाबाद के दो भाग हुए-1.भोजपुर और 2.रोहतास। अब तो भोजपर और रोहतास के भी विभाजन हो गए हैं। इस कविता में कवि बड़हरा की भौगोलिक अवस्थिति बताने के साथ-साथ वहां की बदहाली के लिए बाढ़ जैसे प्राकृतिक प्रकोप के साथ-साथ आजादी के बाद की सरकारी नीतियों और अफसरशाही को जिम्मेवार मानता है। वह बड़हरा की बेहाली को गीत का विषय बनाता है। जो तथाकथित भक्त(सत्ता भक्त) किस्म के लोग हुआ करते हैं, उनको ऐसी कविताएं क्योंकर पसंद आएंगी। वे तो आज की तारीख में और मुँहजोर हैं। कहेंगे कि देखो जहां जन्म लेता है, वहीं की शिकायत करता है। राष्ट्रद्रोही है। और खुद जाकर बी डी ओ से मिल-बतियाकर फण्ड का पैसा मजे में हजम करने में जरा भी नहीं शर्माएंगे। तभी तो किसी एक कार्यक्रम के दौरान बड़हरा में ही वहां जमीदारों और उनके लठैतों को रमता जी पर हाथ चलाने में जरा भी संकोच नही हुआ। नहीं संकोच हुआ कि यह आदमी आजादी का लड़ाका भी रहा है। आजादी के लिये इसे रन-वन छिछियाना भी पड़ा है। रमता जी स्वतंत्रता आंदोलन के विचारशील योद्धा थे। आजादी के बाद भी सत्ता- संरचनाओं की पेंचों को समझने और उसकी न केवल आलोचना करने वाले, बल्कि जनआंदोलनों के साथ होकर सच्चे सुराज को संभव करने हेतु जूझते रहने वाले योद्धा थे। किसानों-मजदूरों और नौजवानों के साथ जुलूसों में चलते थे और जुलूसों के लिए गीत भी लिखते थे। बतियाते हुए गीत और ललकारते हुए गीत और चेत कराते हुए गीत। वे किसानों पर कविता लिखते हैं, पर किसान नहीं थे। कहना जरूरी है कि विजेंद्र अनिल भी इसी धारा के कवि हैं, किसान-मजूर उनकी कविताओं और कहानियों के पात्र और विषय हैं, पर वे भी किसान नहीं थे। दुर्गेन्दर अकारी भी इसी धरती की उपज हैं। उन्होंने शुरू -शुरू में मजदूरी भी की थी। बाद में उन्होंने खुद कहा- "मत कर भाई बनिहारी तू सपन में"। अकारी जी पार्टी के हर कार्यक्रम में सक्रिय रूप में मौजूद रहते थे। जनता के बीच बिना माइक-बिना मंच स्वरचित गीतों को गाते-सुनाते दिख ही जाते थे। अकारी जी की एक काव्य पुस्तिका है 'चाहे जान जाये'। उसकी भूमिका रमता जी की लिखी हुई है। भोजपुर और भोजपुरी कविता की यह एक त्रयी है। 

October 27

9

रमता, विजेंद्र अनिल और दुर्गेन्दर अकारी की त्रयी को संग्रामी त्रयी कहना ठीक होगा। इनके बाद इस धारा में आते हैं निर्मोही। सुरेश काँटक, जितेंद्र कुमार, निर्मोही, सुमन कुमार सिंह के साथ-साथ संतोष सहर की कविताओं और गीतों को इस त्रयी की नई कड़ी कहने या नया स्वर कहने में मुझे कोई हिचक या संकोच नहीं। सुरेश काँटक इनमें सबसे अधिक सक्रिय और पहले हैं।विजेंद्र अनिल के बहुत करीब के हैं। इस त्रयी पर अगर कोई बात होगी तो 'युवानीति', जो कि सांस्कृतिक मोर्चे पर सक्रिय युवाओं की एक टीम थी, जिसकी धमक सुदूर गांव-देहातों से लेकर कस्बों और नगरों-महानगरों तक पहुंच चुकी थी, की चर्चा के बगैर बात पूरी नहीं हो पाएगी। युवानीति में तब सुनील सरीन, अजय, धनन्जय, नीरू, राजू, कृष्णेन्दू, संतोष सहर, सुधीर सुमन, शमशाद प्रेम, अरुण आदि कई पूरे प्राणप्रण से सक्रिय थे। नाटकों के साथ-साथ ये इनके गीतों को बड़े प्रभावशाली अंदाज में मंच पर और चौक-चौराहों पर प्रस्तुत किया करते थे। गोरख के गीतों को भी खूब गाते थे। केशव रत्नम के गीत 'हाथों में होगी हथकड़ियां' की याद तो होगी ही सुनील सरीन को। इन गीतों को जन -जन तक पहुंचाने का जरूरी काम युवानीति के साथियों ने किया। मुझे युवानीति के अनेक प्रोग्रामों को देखने का अवसर मिला है। टीम के साथ कई जगहों पर जाने का। टीम के अभ्यासों को भी देखने का। आज की तारीख में 'हिरावल' के साथी यह भूमिका निभा रहे हैं। अनिल अंशुमन , निर्मल नयन की भूमिका भी उल्लेखनीय है। इन लोगों के पास भी रमताजी और विजेंद्र जी की अनेक स्मृतियां होंगी। मुझे याद है कि आरा के कुछ मित्रों ने मिल-जुलकर भोजपुरी की एक पत्रिका निकाली थी, जिसका एक ही अंक आ पाया। वह पत्रिका थी 'हिलोर'। उसमें रमता जी कविताएं छपी थीं और याद आ रहा है कि उसमें सुधीर सुमन का एक लेख भी था रमताजी पर। उस पत्रिका के संपादन से पहले चंद्रभूषणजी ने योजना के बारे में बताया भी था। कृष्णेन्दु, निलय उपाध्याय, चन्द्रभूषण,शमशाद प्रेम का उसमें सहयोग था। शमशाद जी ने बताया था कि इस पत्रिका की पूरी योजना कृष्णेन्दु की थी । पैसे की व्यवस्था में कृष्णेन्दु ही थे। पत्रिका की प्रति मुझे कृष्णेन्दु ने ही दी थी। मैं उनके पकड़ी, आरा वाले घर पे गया हुआ था। याद आ रहा है, झिलमिल-झिलमिल कि आरा के नागरी प्रचारिणी के सभागार में कोई एक कार्यक्रम आयोजित था। सभागार में रमता जी मौजूद थे। वे रामजी राय के साथ बतियाते बाहर निकले, नागरी प्रचारिणी के पूरब के गेट से। रामजी भाई उनकी एक कविता सुन रहे थे। गौर कर सुना था मैंने भी--'सुलहा सुराज ई कुराज हो गइल/ रहे जेकरा प आसा-भरोसा ऊ नेता दगाबाज हो गइल।' रमताजी को अथवा इस त्रयी के किसी एक को याद करने का मतलब मेरे लिए इन सबको और इन तमाम बातों को याद करना है।मेरी स्मृतियों में यह सब एकमुश्त बसे हुए हैं। ढोलक-झाल, हारमोनियम, कैसियो, अपना गांव-जवार। वो चंदा मांगना, यहां-वहां भटकना। 

October 28 



Thursday, January 15, 2015

जनकवि भोला की कुछ रचनाएँ


भोजपुरी रचनाएं और उनका हिंदी अनुवाद 

1-तोहरा नियर दुनिया में केहू ना हमार बा

तोहरा नियर दुनिया में केहू ना हमार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
जिनिगी के जानि जवन खास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
हेने आव नाया एगो दुनिया बसाईं जा
जिनिगी के बाग आव फिर से खिलाईं जा
देखिए के तोहरा के मिलल आधार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
दहशत में पड़ल बिया दुनिया ई सउंसे
लह-लह लहकत बिया दुनिया ई सउंसे
छोड़िं जा दुनिया आव लागत ई आसार बा

(आप सब के जैसा दुनिया में कोई और हमारा नहीं है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
मन को आशा और विश्वास आप ही से मिला है
जिंदगी को खास जान आप ही से मिला है
आप ही से मेरी जिंदगी का तार जुड़ा है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
इधर आइए एक नई दुनिया बसाई जाए
जिंदगी के बाग को फिर से खिलाया जाए
आपको देखके ही मुझे आधार मिला है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
यह सारी दुनिया दहशत में पड़ी हुई है
यह दुनिया लह-लह लहक रही है 
इस दुनिया को छोड़के आइए, यही आसार लग रहा है)

2-जान जाई त जाई

जान जाई त जाई, ना छूटी कभी
बा लड़ाई ई लामा, ना टूटी कभी
रात-दिन ई करम हम त करबे करब
आई त आई, ना रुकी कभी
बा दरद राग-रागिन के, गइबे करब
दुख आई त आई, ना झूठी कभी
साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल
नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी

5सितंबर, 87 समकालीन जनमत में प्रकाशित

(जान जानी है तो जाए, पर नहीं छूटेगी कभी
यह लड़ाई तो तो लंबी है, नहीं टूटेगी कभी
रात-दिन यह कर्म तो हम करेंगे ही करेंगे
आना होगा तो आएगा ही, नहीं रुकेगा कभी
यह दर्द है राग-रागिनी का, जिसे गाऊंगा ही
साथी का यह साथ मुझे जबसे मिला है
स्नेह की यह लता तो कभी सूखेगी नहीं) 

3-आज पूछता गरीबवा

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा 
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
जाति धरम के हम कुछहूं न जननी
साथी करम के करनवा बतवनी
ना रोजी, ना रोटी, न रहे के मकनवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा
माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी
दिहनी बहुते कुछुवो न पवनी
इ लोरवा, इ लहूवा से बूझल पियसवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा।

( कौन है देवी-देवता और कौन है मालिक
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
बाढ़ में डूबे, सुखाड़ में सुखाए
जाड़ों की रातें कलप के बिताए
करें किस पर भरोसा, पूछें हम तरीका
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
जाति-धरम को हमने कुछ नहीं जाना
साथी कर्म के कारणों को बताए
न रोजी है, न रोटी और न रहने का मकान
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
मिट्टी, पत्थर, धातु और कागज पर देखे
उसे दिए बहुत, पर कुछ भी नहीं पाए
आंसू और खून से अपनी प्यास बुझाए
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।)

4. जन-संगीत
हम चहनी, चाहींला, चाहत बानी
कबहूं तहरे ही खातिर मरत बानी
तोहरे पिरितिया के याद में जिनिगिया
निंदवा में अइतू सुनइती हम गीतिया
कहां चल जालू निंदवा में खोजत बानी
कबहूं....
दिन रात के बाड़ू हो तू ही दरपनवा
जवरे पिरितिया के गाइला हो गनवा
काहे जनबू ना जान जनावत बानी
कबहूं....
ना देखती कउनो हम कबो सपनवा
शहीदन के हउवे ई प्यारा जहनवा
अब कउनो ना डर बा जानत बानी
कबहूं तहरे ही खातिर मरत बानी
(हमने चाहा, चाहता हूं, चाह रहा हूं
हमेशा तुम्हारे लिए ही मरता हूं
तुम्हारी प्रीत की याद में है जिंदगी
नींद में आती तो गीत सुनाता
साथ में प्रीत के गाने गाता
क्यों नहीं जानोगी जान, बता रहा हूं
हमेशा तुम्हारे लिए ही मरता हूं
नहीं देखता कभी सिर्फ कोई स्वप्न
शहीदों का है यह प्यारा जहान
अब कोेई डर नहीं यह जानता हूं
हमेशा तुम्हारे लिए ही मरता हूं)


5. जनवाद के आवाज
आवऽता दहाड़ते 
जनवाद के आवाज
ना चलल बा ना चली
सामंती ई राज
जन-जन के त्याग शक्ति
ना करी अब कउनो भक्ति
घर गांव जवार के नारा बा
जाति ना साथिये दुलारा बा
ना रही कनहूं हत्यारा
जन जीवने बा प्यारा
बस इहे बा नारा, इहे बा नारा
सभे बा प्यारा, प्यारा, प्यारा।


(आ रही है दहाड़
जनवाद की आवाज की 
नहीं चला है न चलेगा 
यह  राज सामंती
जन जन की त्याग शक्ति 
नहीं करेगी अब कोई भक्ति
घर जवार गांव का नारा है
जाति नहीं साथी ही दुलारा है
नहीं रहूंगा कहीं हत्यारा
जन जीवन है प्यारा
बस यही है नारा, यही है नारा
हर कोई है प्यारा, प्यारा, प्यारा )


हिंदी कवितायेँ  

लहू किसका
सोचता था,
मुझे फिर से सोचना पड़ रहा है
कारण,
मेरे समक्ष मौत जो खड़ी है,
दिन रात सदा भूख के रूप में
जिसे चाहता हूं खत्म करना
हर राह चुनी नाकामयाब रहा
मिली है आजादी संघर्ष कर रहा हूं
एक सोच है यही 
कविता कर रहा हूं
बह रहा है आज लहू किसका
यही प्रश्न कर रहा हूं

आओ, बात करें
बात ज्ञान और विज्ञान की करें
बात जमीं और आसमान की करें
बात मजदूर किसान की करें
और की नहीं बात मात्र इंसान की करें
न हिंदू न इसाई मुसलमान की करें
जाति-धर्म नहीं बात इंसान की करें
बात रोटी और बेटी के अरमान की करें
बात साथी सम्मान की करें
आओ बात ज्ञान विज्ञान की करें

आदमी 
मैं आदमी हूं
भर दिन मेहनत करता हूं
देखने मेें जिंदा लाश हूं 
लेकिन.....
मैं लाश नहीं हूं
मैं हूं दुनिया का भाग्य विधाता
जिसके कंधों पर टिकी हैं
दैत्याकार मशीन
खदान, खेत, खलिहान
जी हां, मैं वहीं आदमी हूं
जिसके बूते चलती है
ये सारी दुनिया
जिसे बूते बैठे हैं
ऊंची कुर्सी पर 
कुछ लोग
जो पहचानते नहीं
इस आदमी को
समझते नहीं
इस आदमी को
नहीं, नहीं,
ऐसा हरगिज नहीं 
मैं होने दूंगा
अपनी पहचान मिटने नहीं दूंगा
क्योंकि 
मैं आदमी हूं
हां, हां,
मैं वही आदमी हूं।

आखिर कौन है दोषी?
जब से होश हुआ तब से लड़ रहा हूं
कारण सबसे कह रहा हूं
यह सारी मुफलिसी बेबसी की देन है।
सुनो समझो तुम्हारे अरमानों को अपने साथ देख रहा हूं
साफ है दिल जिसका, उसी के पीछे लगा हत्यारा देख रहा हूं
आॅफिसरों और नेताओं में लूटखसोट का रोजगार देख रहा हूं
जनवितरण प्रणाली से जल रहा बाजार देख रहा हूं
गंदगी में गंदगी से रोग बढ़ते हाल देख रहा हूं
कुछ घर में रोगियों को दवा के बिना मरते बेबस लाचार देख रहा हूं
कुछ ही शिक्षा के रहते, बेशुमार बेरोजगार देख रहा हूं
कर्ज पर कर्ज से दबी जिंदगी सरेआम देख रहा हूं
चलचित्र के द्वारा सेक्स का प्रचार देख रहा हूं
पास पड़ोस में बढ़ते लुच्चे-लफंगों की कतार देख रहा हूं
तिलक दहेज की ज्वाला में 
बहनों को जिंदा जलाते-मारते घर से निकालते अखबार देख रहा हूं
बिजली के पोल तार अधिकारी और कर्मचारी के रहते
घर गांव शहर में अंधकार देख रहा हूं
कब कौन मरेगा उनके इशारे पर 
लाश को छिपाते अखबार देख रहा हूं
कान में तेल डालकर बैठी राज्य और केंद्र सरकार देख रहा हूं
कब तक साधेगी खामोशी जनता, उनके बीच मचा हाहाकार देख रहा हूं
अब नहीं बचेगी जान भ्रष्ट नेताओं और आॅफिसरों की 
जनता के हाथ में न्याय की तलवार देख रहा हूं
अभी नजर नहीं आ रहा है, लेकिन बम और बारूद के धुएं को तैयार देख रहा हूँ

हम लड़ रहे हैं
हम लड़ रहे हैं
हम किनसे लड़ रहे हैं?
हम लड़ रहे हैं
सामंती समाज से
रूढि़वादी समाज से
पूंजीवादी समाज से
अंधविश्वासी समाज से
आखिर क्यों ल़ड़ रहे हैं इनसे?
समता लाने के लिए
समाजवादी व्यवस्था लाने के लिए
पूंजीवाद के सत्यानाश के लिए
सांप्रदायिकता को समूल नष्ट करने के लिए
ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेंकने के लिए
अंधविश्वास को दूर भगाने के लिए
क्योंकि-
इसी से गरीबी मिटेगी,
गरीबों को मान-सम्मान मिलेगा,
अब तक ये जो सिर झुका कर चलते थे
सिर उठाकर चलेंगे
इसी क्रांति से 
अमन, चैन, शांति मिलेगी
सापेक्ष चेतना जगेगी
इसी चेतना के जगने से होगी क्रांति। 
क्रांति का मतलब गुणात्मक, मात्रात्मक नहीं।
मात्रात्मक यानी पानी का भाप, भाप का पानी, 
अर्थात पूंजीवादी सरकार का आना-जाना
फिर फिर वापस आना
गुणात्मक-
जैसे दूध का दही बनना
फिर कोई उपाय नहीं 
दही का फिर से दूध बनना
अर्थात् पूंजीवादी सामंतवादी आतंकवादी सरकार का जाना 
समाजवादी सरकार का आना।
अब तक के आंदोलन से 
ऊपरी परिवर्तन होते रहे
अंतर्वस्तु नहीं बदली
अब गुणात्मक क्रांति होगी
अंतर्वस्तु भी बदलेगी
परिणाम
अब धरती पर पूंजीपति नहीं रहेगा
न जंगल में शेर रहेगा
न शेर वाला कोई विचार रहेगा
गरीबों की सरकार रहेगी
हम रहेंगे, हमारी जय-जयकार रहेगी
हमारा अब यही नारा रहेगा 
न कोई हत्यारा रहेगा
न सामंती पाड़ा रहेगा
क्योंकि,
हम बढ़ रहे हैं, बढ़ रहे हैं...