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Thursday, February 5, 2015

कृष्ण मुरारी किशन ने बिहार के सच को अपनी तस्वीरों में दर्ज किया


कृष्ण मुरारी किशन वैकल्पिक मीडिया और जनांदोलनों के साथी छायाकार थे

समकालीन जनमत और जन संस्कृति मंच की ओर से श्रद्धांजलि 

1987 में जनमत में छपा इंटरव्यू 
समकालीन जनमत के नए अंक की तैयारी के सिलसिले में इलाहाबाद में था। तभी सूचना मिली कि 1 फरवरी की रात में बिहार के मशहूर प्रेस फोटोग्राफर कृष्ण मुरारी किशन का दिल्ली के मेदांता हास्पीटल में निधन हो गया। पिछले दिसंबर में प्रतिरोध का सिनेमा, पटना फिल्मोत्सव में उनसे आखिरी बार मुलाकात हुई थी। उस रोज फिल्मोत्सव में ढेर सारे छोटे-छोटे बच्चे आए थे। फिल्मोत्सव में एक पेटिंग कार्यशाला भी आयोजित थी। बच्चे अभी दो कतारों में बैठकर कागज पर पेंसिल और रंग के जरिए अपनी कल्पनाओं को आकार देने की शुरुआत ही कर रहे थे, कि तभी अचानक कृष्ण मुरारी किशन नजर आए और आते ही उनका कैमरा उमंग और उत्साह से भरे नन्हें कलाकारों पर टिक गया, मानो फिल्मोत्सव का सबसे खास दृश्य वही हो। फिल्मकारों के प्रेस कांफ्रेस वगैरह से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण उनके लिए बच्चे थे। 

यूं तो हमलोग बचपन से ही अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में उनकी तस्वीरें देखते रहे। लेकिन मैंने उन्हें सबसे ज्यादा समकालीन जनमत में छपी उनकी तस्वीरों से जाना था। चाहे वे गरीब-दलित, खेत मजदूर और भूमिहीन किसानों के जनसंहारों और बिहार में उभरते एक नए किसान आंदोलन की तस्वीरें हों या मुर्गा खाते मुख्यमंत्री विंदेश्वरी दूबे की तस्वीर या बोफोर्स तोप घोटाले के खिलाफ उभरे जबर्दस्त जनांदोलन की तस्वीरें, सबकी याद आने लगी। बैक कवर पर भी कई बार उनके द्वारा ली गई ऐसी तस्वीरें छपती थीं, जिनसे आम आदमी की जीवन स्थिति और जनविरोधी तंत्र का असली चेहरा उजागर हो जाता था। 

समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने बताया कि ‘‘कृष्ण मुरारी किशन जिन अखबारों से जुड़े हुए थे, उन्होंने ‘बेलछी कांड’ से संबंधित फोटो को छापने की हिम्मत नहीं दिखाई थी। बाद में जनमत ने उन्हें छापा था। इस कारण वे कहते थे कि जनमत जनता की पत्रिका है, इसे जब भी जरूरत होगी, मैं बिना पारिश्रमिक के तस्वीरें दूंगा। और अपने इस वायदे को उन्होंने आजीवन निभाया। पटना से जब समकालीन जनमत साप्ताहिक निकलती थी, तब अक्सर उनके द्वारा खींची गई तस्वीरें उसमें छपती थीं। कई अंकों के आवरण भी उन तस्वीरों से बनाए गए थे।’’ 

एक गरीब परिवार में पले-बढ़े छायाकार कृष्ण मुरारी किशन आम आदमी की जिंदगी और उसके संघर्षों के प्रति बेहद संवेदनशील थे। सिर्फ राजधानी पटना ही नहीं, बल्कि पिछले तीस सालों में बिहार-झारखंड की लगभग तमाम चर्चित घटनाओं, जनांदोलनों, प्राकृतिक आपदाओं, पुलिसिया दमन, गरीब-मेहनतकशों के जनसंहार, सामंती जुल्म के खिलाफ सुलगते जनप्रतिरोध और आम जनजीवन के अनेक अछूते दृश्यों को उन्होंने अपने कैमरे की आंख से देखा और अपनी तस्वीरों में उन्हें दर्ज किया। अस्सी के दशक में समकालीन जनमत के संपादक मंडल के सदस्य रहे पत्रकार विष्णु राजगढि़या उन्हें जिंदगी को कैमरे की नजर से देखने वाले आम आदमी के छायाकार के बतौर ही याद करते हैं। संपादक मंडल के दूसरे सदस्य पत्रकार चंद्रभूषण ने बताया कि अपने साथी छायाकारों से वे हमेशा यह कहते थे कि सिर्फ अपनी आंख से देखकर फोटो मत खींचो, कैमरे की आंख से देखो। उन्होंने यह भी बताया कि जनमत के हर अंक की सामग्री तैयार हो जाने के बाद जिस तरह के फोटो की जरूरत होती थी, उसके बारे में उन्हें बताया जाता था और वे उसके अनुसार तस्वीरें उपलब्ध करा देते थे। 

1987 में समकालीन जनमत में छपे एक इंटरव्यू में कृष्ण मुरारी किशन ने बताया था कि 1974 में छात्रों के आंदोलन से वे जुड़े हुए थे। छात्रों के बर्बर दमन की तस्वीरें अखबारों से गायब रहती थीं। उन्हें लगा कि जो तस्वीरें उनमें छपती हैं, वे हकीकत से काफी दूर हैं। वे चाहते थे कि एक्शन तस्वीरें छपे, इसलिए उन्होंने अपने हाथों में कैमरा थामा। जयप्रकाश आंदोलन के चर्चित फोटोग्राफरों में उनकी गिनती होती थी।

जनमत के इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि डाक टिकट जमा करना उनकी हाॅबी थी। डाक टिकट बेचकर ही उन्होंने 1974 में एक साधारण कैमरा खरीदा था और 1977 तक उसी से फोटोग्राफी करते रहे। उन्होंने यह भी बताया था कि उस समय वे पैसे के लिए फोटोग्राफी नहीं करते थे, बल्कि ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च चलाते थे। उसी समय बिहार में आए बाढ़ और 1979 के जमशेदपुर दंगों की तस्वीरें उन्होंने खींची। कृष्ण मुरारी किशन का कहना था कि ‘‘वह दंगा जनता रिजिम की देन था। सरकार कह रही थी कि 10 लोग मारे गए हैं, लेकिन सच तो यह है कि कुल 300 लोग से कम नहीं मरे थे। कभी मुस्लिम के घर में और कभी हिंदू के घर रात को रुककर मैंने दंगे की तस्वीर उतारी थी।’’

1980 में कृष्ण मुरारी किशन ने पटना के दैनिक ‘आर्यावर्त’ को ज्वाइन कर लिया। फिर रविवार से जुड़े, जिसमें पत्रकार अरुण रंजन और छायाकार कृष्ण मुरारी किशन की जोड़ी बहुत चर्चित रही। दिनमान, साप्ताहिक हिंदुस्तान, इंडिया टुडे, संडे मेल, चौथी दुनिया आदि देश के तमाम पत्र-पत्रिकाओं, समाचार एजेंसियों और बीबीसी और रायटर समेत कई अंतर्राष्ट्रीय प्रसारण संस्थाओं में भी उनकी तस्वीरों को जगह मिली। कई पुरस्कार और सम्मान भी मिले। सत्ता, राजनीति और नौकरशाही की दुनिया में सब उन्हें जानते थे, लेकिन इस जान-पहचान और संपर्क से उत्पन्न किसी विशिष्टता का गुमान उन्हें कभी नहीं रहा। देश-दुनिया में काफी मकबूलियत के बावजूद वे उतने ही सहज और आम जन के उतने ही करीब थे, जैसा फोटोग्राफी की शुरुआती दिनों में थे। कंधे पर झोला और टूटही साइकिल से उनके छायाकार के सफर की शुरुआत हुई थी, जो स्कूटर से होते हुए एक पुरानी कार तक पहुंची। कार की जरूरत भी उन्हें तब पड़ी जब उनके पैरों में तकलीफ रहने लगी थी।

मैं तो हकीकत को सामने भर लाना चाहता हूँ
कृष्ण मुरारी किशन जोखिम से कभी नहीं डरे। 1980 में तो पटना हाईकोर्ट में सीआरपी वालों ने उन्हें सिर्फ इसलिए घसीट-घसीटकर मारा कि वे सच्चाई को सामने लाना चाहते थे। बिहार में सांमती शक्तियों और पुलिस द्वारा दलितों और खेत मजदूरों की उत्पीड़न की अनेक घटनाओं और उनके संगठित होते आंदोलन को उन्होंने कवर किया। कोई इसके लिए उनकी तारीफ करता तो बहुत ही सहज अंदाज में हंसते हुए वे कहते थे- ‘मैं तो हकीकत को सामने भर लाना चाहता हूं।’ हकीकत को सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध कृष्ण मुरारी किशन पर लगभग डेढ़ दशक पहले मुजफ्फरपुर से रात में पटना लौटते वक्त हमला हुआ था और उन्हें गोली मार दी गई थी। उस वक्त भी उन्हें इलाज के लिए दिल्ली भेजा गया था और तब उन्होंने जिंदगी की जंग जीत ली थी। लेकिन इस बार वे हम सबसे हमेशा के लिए जुदा हो गए। 

कृष्ण मुरारी किशन ने बी. काॅम तक पढ़ाई की थी। लेकिन उन्होंने कैमरे के जरिए बिहार के जिस सच को तस्वीरों में दर्ज किया, वह आने वाले समय में न केवल फोटोग्राफी, बल्कि जन माध्यमों, जन संस्कृति और जनराजनैतिक आंदोलनों से जुड़े तमाम लोगों के लिए एक नजीर रहेगा, वह बेमिसाल काम आने वाली पीढि़यों के लिए भी एक प्रेरणा बना रहेगा। वे चाहते थे कि प्रेस फोटोग्राफर प्रेस कांफ्रेस में ही सारा समय न व्यतीत करें, वे गांवों में जाएं। उन्होंने बिहार के गांवों में पल रहे दर्द और आम आदमी की जिंदगी की जिजीविषा को अपनी तस्वीरों में जगह दी। गांवों से शहर आकर मेहनत-मजदूरी करने वाले लोगों की जिंदगी तक भी उनके कैमरे की निगाह पहुंची। 

हमारे लिए वे समकालीन जनमत के अनन्य सहयोगी तो थे ही, जन सांस्कृतिक आंदोलन के भी एक अनिवार्य अंग थे। जन संस्कृति मंच और हिरावल समेत पटना के अधिकांश साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों के आयोजनों मेें वे अपने कैमरे के साथ मौजूद रहते थे और उसे पूरी दिलचस्पी से कवर करते थे। सांवले चेहरे पर सजी उनकी सौम्य मुस्कुराहट और सबके साथ बहुत अपनापे से उनका पेश आना हमेशा याद आएगा। वैकल्पिक मीडिया और जनसांस्कृतिक-जनराजनीतिक आंदोलनों ने सचमुच आज अपने एक सच्चे हमदर्द और साथी को खो दिया है। उनके परिजनों के शोक में हम सब शामिल हैं। समकालीन जनमत और जन संस्कृति मंच की ओर से उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि! 

Thursday, January 15, 2015

नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी (भोला जी के स्मृति दिवस पर ) : सुधीर सुमन

भोला जी को मैं अपने बचपन से नवादा थाने के इर्द-गिर्द पान की गुमटी में बैठा देखता रहा। यहीं बैठकर वे गरीब-मेहनतकशों पर जुल्म ढाने वाले थाने और कोर्ट को उड़ाने और जलाने की बात करते रहे, बेशक व्यावहारिक तौर पर नहीं, जुबानी ही सही, पर इन संस्थाओं के प्रति जनता का जो गहरा गुस्सा था, वह तो इसके जरिए अभिव्यक्त होता ही था। कितनी बार प्रशासन के अतिक्रमण हटाओ अभियान में उन्हें यहां से हटना पड़ा था, पर बार-बार वे यहीं आकर जम जाते थे। 

उनकी पान दूकान आरा में जनसंस्कृति और जनता की राजनीति से जुड़े लोगों के मेल-मिलाप का अड्डा रही। भले व्यंग्य में कभी उन्होंने खुद पर बेवकूफ पान वाले का लेबल लगा लिया था, पर वे पढ़े-लिखे और अपने ही निजी स्वार्थ की दुनिया में खोये रहने वाले समझदारों में से नहीं थे, बल्कि उन समझदारों में से थे, जिनके लिए रमता जी ने कहा था कि राजनीति सबके बूझे के बुझावे के पड़ी, देशवा फंसल बाटे जाल में छोड़ावे के पड़ी। भोला जी शहर में माले और जसम की गतिविधियों मे शिरकत करते और पान की दूकान पर बैठे हुए कांग्रेस और गैर-कांग्रेस की तमाम सरकारों को आते-जाते देखते रहे और महसूस किया कि गरीबों की पीड़ा खत्म ही नहीं हो रही है। उदाहरण के तौर पर इसी गीत को देखा जा सकता है-

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा 
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा

कांग्रेस के लंबे शासन के बाद लालू जी जो वर्णव्यवस्था और धार्मिक अंधविश्वास की आलोचना करते हुए सत्ता में आए थे, वे बहुत ही जल्दी उसी की शरण में चले गए, लेकिन भोला जी ने ऐसा नहीं किया। बल्कि अपनी पान की दूकान पर बैठकर उनकी सरकार की भी आलोचना की। जिंदगी भर वे किराये के घर में रहे, बाल-बच्चों के लिए जितना करना चाहिए था, उतना कर नहीं पाए, लेकिन वे अपनी मुश्किलों के हल के लिए किसी देवी-देवता के शरण में नहीं गए और ना ही मुश्किलों के कारण निराशा में डूबे। जीवन ही नहीं, उनकी कविता में भी गरीब तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सवाल पूछता है और यह सवाल पूछना ही उनकी कविता और व्यक्ति दोनों की ताकत है।

मुझे जनमत के पुराने अंक में पढ़ी हुई ‘मैं आदमी हूं’ शीर्षक की उनकी एक कविता याद आती है, जिसमें उन्होंने मेहनतकश मनुष्यों की जुझारू शक्ति, शान और सौंदर्य के बारे में लिखा था। इतना ही नही, भोला ने जाने-अनजाने हमें यह सिखाया कि गरीब-मेहनतकश आदमी की निगाह से देखने से ही शासन-प्रशासन के दावों, राजनीति और विचार का असली सच समझ में आ सकता है। ‘पढ़निहार बुड़बक का जनिहें, का पढ़ावल जा रहल बा’ कविता इसी की बानगी है, जिसमें अखबार की खबरों पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि नीचा को ऊंचा और ऊंचा को नीचा बताया जा रहा है, जिन्हें शरीफ कहा जा रहा है, दरअसल लोगों की निगाह वे लुच्चे हैं। उसी कविता में आगे वे कहते हैं गरीबन के कइसे गारल जा रहल बा। अपनी आवाज के जरिए वे बकायदा गारने ( कसकर निचोड़ने) की प्रक्रिया को भी व्यक्त करते थे।

मुझे जनमत में ही सितंबर 87 में छपी भोला जी की एक और कविता की याद आती है- जान जाई त जाई, ना छूटी कभी/ बा लड़ाई इ लामा, ना टूटी कभी। और इस लंबी लड़ाई में यकीन के बल पर ही भोला ने दो टूक कहा- जनता के खीस, देखिंहे नीतीश। इसे खीस और नीतीश का तुक जोड़ना मत समझ लीजिए। सोचिए जब नीतीश सरकार द्वारा बांटे जा रहे पुरस्कारांे और सम्मानों के बोझ तले दबे साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों को जनता के इस गुस्से का अंदाजा नहीं था, किताबी ज्ञान रखने वालों या वर्गीय श्रेष्ठता के अहं से ग्रस्त रचनाकारों और बुद्धिजीवियों को भी जब नीतीश के पराजय की आशंका नहीं रही होगी, तब जनता के कवि ने उनके भविष्य का लेखा लिख दिया था। अब भी बहुत सारे साहित्यकार जनता की ताकत को मजबूत बनाने के बजाए किसी न किसी शासकवर्गीय गठबंधन की ओर उम्मीद लगाए रखते हैं, उनकी तारीफें करते हैं। जनवादी ताकतों की शिकस्त से जो रचनाकार निराशा में डूबकर किसी न किसी शासकवर्गीय राजनीति के साथ जा खड़े होते हैं, उनमें से भोला जी नहीं थे। वे लड़ाई लड़ने के लिए संकल्पबद्ध थे। पाश के लहजे में कहें तो हम लड़ेंगे जब तक लड़ने की जरूरत बाकी है। भोला की समझ थी कि जनता की लड़ाई लंबी है और इस लंबी लड़ाई में दुश्मनों और दोस्तों की पहचान लगातार होनी है। जिस तरह गरीब जनता सरकार और प्रशासन के नस-नस को जानती है, उसी तरह भोला भी उन्हें जानते-समझते थे। उनके पैमाने से अफसर और मच्छड़, हड्डा और गुंडा, नेता और कुत्ता एक ही थे। अब नेता तो जनता के संघर्ष के भी होते हैं, पर उनके लिए उनका पैमाना अलग था, यहां तो नेता साथी होते हैं। तभी तो 1987 की कविता में उन्होंने लिखा कि ‘साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल/ नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी।’ और यह नेह मरते दम तम उनके भीतर मौजूद रहा। 

कई बार खुद से सवाल करता हूं कि भोला जी की कविताएं क्या हैं? जवाब मिलता है, आम जनता का दुख-दर्द ही तो है उनमें, जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए जो लंबा संघर्ष चल रहा है, जो उसकी आजादी, बराबरी और खुदमुख्तारी का संघर्ष है, उसी के प्रति उम्मीद और भावनात्मक लगाव का इजहार ही तो है उनकी कविताएं। उन्होंने कोई पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार के लिए तो लिखा नहीं। जिस तरह कबीर कपड़ा बुनते हुए, रैदास जूते बनाते हुए कविताई करते रहे, उसी तरह भोला पान बेचते हुए कविताई करते रहे। भोला आशु कवि थे यानी ऐसे कवि जो तुरत कुछ पंक्तियां गढ़के आपको सुना देते हैं। महान कवियों के इतिहास में शायद भोला का नाम दर्ज न हो पाए, पर जिस तरह इतिहास में बहुसंख्यक जनता का नाम भले नहीं होता, लेकिन वह बनता उन्हीं के जरिए है, उसी तरह भोला की कविताएं भी हैं। वे आरा काव्य-जगत की अनिवार्य उपस्थिति थे। जसम के पहले महासचिव क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में हर साल होने वाले नुक्कड़ काव्यगोष्ठी ‘कउड़ा’ के आयोजन में भोला जी का उत्साह देखने लायक होता था। हमने देखा है कि जब भी उन्हें कार्यक्रमों में बोलने का मौका मिला, उन्होंने कम ही शब्दों में बोला, पर हमेशा उनकी कोशिश यह रही कि कुछ सारतत्व-सा सूत्रबद्ध करके रख दें। और ऐसे मौके पर अक्सर लोग उनकी कुछ ही पंक्तियों के वक्तव्य पर वाह, वाह कर उठते थे। 

डाइबिटिज की बीमारी से भी एक योद्धा की तरह उन्होंने लंबा संघर्ष किया। अस्वस्थता के कारण उनका शरीर कमजोर हो गया था। लेकिन उन्होंने अंतिम दम तक हार नहीं मानी। भोला ने अपना गोला दागना यानी कविताओं की पतली पुस्तिकाएं प्रकाशित करवाना नहीं छोड़ा। उनका लाल झोला और उसमें रखा हथौड़ा हमेशा उनके साथ रहा, जिसके बल पर वे जनता के दुश्मनों से फरिया लेने का हौसला रखते थे।

हमारे फिल्म उद्योग को धर्म-अध्यात्म के नाम पर जनता को ठगने वालों पर उंगली उठाने के लिए एलियन को गढ़ना पड़ता है, जिसे लोग समझते हैं वह नशे में है यानी पीके है। भोला जी हमारे पीके थे, लेकिन वे कोई एलियन नहीं थे, जीते-जागते इसी दुनिया के मनुष्य थे, पीके इसलिए थे कि पान के पत्ते काटने वाले कवि थे। वे पान के पत्तों के जरिए समाज को देखते-समझते थे, उनका मानना था कि अगर सड़े हुए पत्तों को बाहर नहीं फेंका गया तो वे सारे पत्तों को सड़ा देते हैं। यह संयोग है कि अभी फेसबुक पर अनिल जनविजय ने उनकी तस्वीर लगाकर पूछा कि यह किसकी तस्वीर है तो ज्यादातर लोगों ने उन्हें नागार्जुन बताया।

बेशक वे नागार्जुन नहीं थे, पर उन्होंने मिजाज उन्हीं का पाया था। वे साधारण थे इसीलिए असाधारण थे। आइए साधारण की इस सृजनात्मकता के महत्व को पहचानें, जनता की इस आवाज को सलामी दें। हर साल हम उनकी याद में आयोजन करेंगे और अगले साल से विषय भी देंगे, जिन पर उन्हीं की तरह आशुकविताओं का सृजन किया जाएगा और जनता के बीच उन्हें प्रस्तुत किया जाएगा। उनकी परंपरा इस तरह से आगे बढ़ेगी। 

उन्होंने जिस संघर्षशील जनता को अपने गीत में संबोधित किया आइए हम भी उसे गाएं- 

तोहरा नियर केहू ना हमार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा।

Wednesday, October 9, 2013

युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन पर पुलिसिया हमले की निंदा


निरंकुश पुलिसिया राज के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिवाद वक्त की जरूरत है : जन संस्कृति मंच 
नई दिल्ली: 08 अक्टूबर 2013

जन संस्कृति मंच देश के प्रतिभावान युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन की बिहार के बेगुसराय में नगर थाना प्रभारी द्वारा बर्बर पिटाई की कठोरतम शब्दों में निंदा करता है और दोषी पुलिस अधिकारी की बर्खास्तगी की मांग करता है तथा इस बर्बर पुलिसिया हमले के खिलाफ आंदोलनरत बेगूसराय के संस्कृतिकर्मियों के प्रति अपनी एकजुटता का इजहार करता है। एनएसडी से पास आउट प्रवीण कुमार गुंजन ने निर्देशन की शुरुआत ‘अंधा युग’ से की थी। उसके बाद उन्होंने मुक्तिबोध की कहानी ‘समझौता’ पर आधारित नाटक का निर्देशन किया, जो बेहद चर्चित रहा। उन्होंने शेक्सपियर के मशहूर नाटक ‘मैकबेथ’ का भी निर्देशन किया। प्रवीण द्वारा नाटकों का चुनाव और बेगुसराय जैसी जगह को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। भारत के राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित संगीत नाटक कला अकादमी का बिस्मिल्ला खां युवा पुरस्कार और बिहार सरकार का भिखारी ठाकुर युवा रंग सम्मान पा चुके इस युवा रंग निर्देशक के ऊपर पुलिस अगर बेवजह इस तरह बर्बर कार्रवाई का दुस्साहस कर सकती है, तो कल्पना की जा सकती है कि इस देश की आम जनता और आम संस्कृतिकर्मियों के साथ उसका किस तरह का रवैया रहता होगा। 
बेगूसराय से मिली सूचना के अनुसार प्रवीण कुमार गुंजन सोमवार की रात रिहर्सल के बाद रेलवे स्टेशन के पास स्थित चाय की दूकान के पास अपनी बाइक लगाकर साथी रंगकर्मियों के साथ पी रहे थे। चाय पीने के बाद वे लौटने ही वाले थे, तभी थाना प्रभारी अपने गश्ती दल के साथ पहुंचे और उनकी बाइक पर तीन सवारी होने का इल्जाम लगाया। उन्होंने कहा कि बाइक जब चल ही नहीं रही है, तो तीन सवारी कैसे हो गए? गुंजन की खूबसूरत दाढ़ी, उनका कैजुअल ड्रेस और उनके साथ कुछ रंगकर्मी युवकों का होना और पुलिसिया आतंक के आगे उनका न दबना, इतना काफी था बिहार पुलिस के लिए। थाना प्रभारी ने उन पर अपराधी होने का आरोप लगाया और उन्हें पीटना शुरू कर दिया। गुंजन ने उससे यह भी कहा कि वह अपने एसपी और जिलाधिकारी से फोन करके बात कर ले, लेकिन उसने एक नहीं सुनी और उनकी पिटाई जारी रखी। 
मंगलवार 8 अक्टूबर को जब द फैक्ट, जसम, आशीर्वाद रंगमंडल, नवतरंग से जुड़े रंगकर्मियों समेत बेगूसराय के तमाम साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने इसका प्रतिवाद किया, तो जिला प्रशासन ने थाना प्रभारी को लाइन हाजिर किया। हालांकि यह भी सूचना मिल रही है कि पुलिस अपने बचाव में प्रवीण और उनके साथियों पर फर्जी मुकदमा दर्ज करने की तैयारी कर रही है। हम इस तरह की संभावित साजिश का पुरजोर करते हैं और बिहार सरकार से यह मांग करते है कि वह तत्काल थाना प्रभारी की बर्खास्तगी की कार्रवाई करे, ताकि पुलिसकर्मियों को यह सबक मिले, कि अगर वे बेगुनाहों पर जुल्म करेंगे, तो उनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई हो सकती है। 
प्रवीण कुमार गुंजन की बर्बर पिटाई ने एक बार फिर से पुलिस राज के खिलाफ मजबूत जन प्रतिवाद की जरूरत को सामने लाया है। उन पर किए गए हमले का सही जवाब यही होगा कि देश और बिहार के संस्कृतिकर्मी सख्त पुलिस राज की वकालत करने वाली और पुलिसिया बर्बरता को शह देने वाली राजनीतिक शक्तियों, सरकारों और विचारों का भी हरसंभव और हर मौके पर अपनी कलाओं के जरिए विरोध करें। देश में बढ़ते निरंकुश पुलिसिया राज के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिवाद वक्त की जरूरत है।

Wednesday, August 21, 2013

आजाद हिन्दुस्तान के शहीदों में गिने जाएंगे डा. दाभोलकर (श्रद्धांजलि)


डा. दाभोलकर को जसम की श्रद्धांजलि 

नई दिल्ली : 21 अगस्त 2013

कल 20 अगस्त, मंगलवार के दिन पुणे में मार्निंग वाक पर निकले मशहूर अंधविश्वास-विरोधी, तर्कनिष्ठ और विवेकवादी आन्दोलनकर्ता डा. नरेन्द्र दाभोलकर की अज्ञात अपराधियों ने नृशंस ह्त्या कर दी. डा. दाभोलकर लम्बे समय से समाज में अंध-आस्था की तिजारत और राजनीति करनेवालों के निशाने पर रहे. डा. दाभोलकर की जिस दिन ह्त्या हुई , उसी दिन वे पर्यावरण की दृष्टि से हानिरहित गणेश प्रतिमाओं के आगामी त्योहारों के समय प्रयोग के लिए प्रेसवार्ता करनेवाले थे. दाभोलकर लम्बे समय से महाराष्ट्र विधानसभा में अंधविश्वास और काला-जादू विरोधी विधेयक को पास करके क़ानून बनवाने के लिए प्रयासरत थे, जिसका भारी विरोध कई तरह के साम्प्रदायिक संगठन कर रहे थे, हालांकि शिवसेना और भाजपा को छोड़कर सभी राजनीतिक दल इस विधेयक के पक्ष में थे. उनकी ह्त्या के बाद अचानक जागी पुलिस हाल के दिनों में उन्हें 'सनातन प्रभात' और 'हिन्दू जन जागृति समिति' जैसे संगठनों से मिल रही धमकियों के आरोपों की जांच कर रही है. उनकी ह्त्या काफी सुनियोजित थी क्योंकि हत्यारों को पता था कि पुणे में वे प्रायः सप्ताह के दो दिन यानी सोमवार और मंगलवार को ही रहते हैं .

डा. दाभोलकर (65) सतारा जिले में एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे जो समाजवादी आन्दोलन से जुड़ा हुआ था. पेशे से वे डाक्टर थे और लगभग 10 साल डाक्टरी पेशे में काम करने के बाद उन्होंने अपना जीवन सामाजिक चेतना निर्माण और परिवर्तन के लक्ष्य को समर्पित कर दिया. समाजवादी नेता बाबा आढव के साथ 'एक गाँव, एक कुंआ' आन्दोलन में उन्होंने 1983 से काम करना शुरू किया और 1989 में उन्होंने महाराष्ट्र अंध-श्रद्धा निर्मूलन समिति का निर्माण किया. दाभोलकर तांत्रिकों, बाबाओं, चमत्कार से रोग दूर करने का दावा करनेवाले धोखेबाजों और तमाम पिछड़ी हुई धर्मानुमोदित प्रथाओं के खिलाफ आन्दोलन को स्कूलों, कालेजों और गाँव-गाँव तक ले गए. पिछले 30 वर्षों से वे लगातार ऐसे तत्वों से जूझते तथा तर्क और विवेकशीलता की चेतना निर्मित करते हुए सक्रिय रहे. इस दरमियान उन्होंने 30 से अधिक किताबें लिखीं, मराठी साप्ताहिक 'साधना' का सम्पादन किया और सतारा नशा-मुक्ति केंद्र की स्थापना भी की. सन 2000 में उन्होंने अहमदनगर के शनि शिन्गनापुर मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश के लिए ज़बरदस्त आन्दोलन चलाया. उन्होंने निर्मला देवी और नरेन्द्र महाराज जैसे बेहद ताकतवर धर्मगुरुओं को खुली चुनौती दी. इस साल होली के ठीक पहले भयानक सूखे का सामना कर रहे महाराष्ट्र में आसाराम बापू द्वारा हजारों लीटर पेयजल से होली खेले जाने को डा. दाभोलकर ने चुनौती दी और अंततः सरकार को इस पर प्रतिबन्ध लगाना पडा. 

हमारे देश में पिछडापन और सामंती अवशेष तो अंधविश्वासों के लिए ज़िम्मेदार हैं ही, भ्रष्टाचार, सट्टे और दलाल पूंजी की मार्फ़त अमीर और ताकतवर बने मुट्ठी भर लोग अपनी चंचला पूंजी की हिफाजत की दुश्चिन्ता से घिर कर ढोंगियों और आपराधिक धर्मगुरुओं के संरक्षक बने हुए हैं . इनमें राजनेता, नौकरशाह और थैलीशाह बड़े पैमाने पर शामिल हैं जिनकी सहायता के बगैर अंधश्रद्धा का अरबों-खरबों का कारोबार एक दिन नहीं चल सकता. बौद्धिक- वर्ग का भी अच्छा- खासा हिस्सा न केवल संस्कारतः अंध-श्रद्धा की चपेट में है, बल्कि कुछ लोगों ने तो इसको पालने-पोसने में निहित स्वार्थ तक विकसित कर लिए हैं . दूसरी ओर, बड़े पैमाने पर गरीबी और बेरोज़गारी से बदहाल देश की जनता का एक बड़ा हिस्सा मानसिक राहत के लिए 'हारे को हरिनाम' की मनोदशा में ढोंगी धर्मगुरुओं, तांत्रिकों और चमत्कार से इलाज करनेवालों के चंगुल में फंसता रहता है. मीडिया बड़े पैमाने पर अंधविश्वास हर दिन परोसता है. जिस देश में आज भी अनेक स्थानों पर निर्दोष स्त्रियाँ डायन कह कर मार दी जाती हों, जहां नर-बलि तक के समाचार अखबारों की सुर्खियाँ बनते हों, जहां मनोचिकित्सा अभी भी बड़े पैमाने पर ओझा-सोखा के हवाले हो, वहां डा. दाभोलकर का काम कितना सुस्साध्य रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है. सबसे बढकर अंध-आस्था का उपयोग राजनीति और तिजारत के लिए, जनता की चेतना को दिग्भ्रमित करने के लिए ताकि वह अपनी वंचना के कारणों को जान न सके, अपने वास्तविक हक़-हुकूक के लिए लड़ न सके, किया जाता है. ऐसे में डा. दाभोलकर पूंजी की सत्ता की आँखों में भी किरकिरी बने हुए थे. उन पर हमले पहले भी होते रहे, धमकियां पहले भी मिलती रहीं, उनकी प्रेस-वार्ताओं में पहले भी उपद्रव किया जाता रहा, लेकिन विनम्रता के साथ सादगी भरा जीवन जीते हुए वे अपने काम में अडिग बने रहे.

सन 2011 में केरल युक्ति संघम के अध्यक्ष यू. कलानाथन पर टी वी शो के दौरान तब हमला किया गया जब वे तिरुवअनंतपुरम के पद्मनाभ स्वामी मंदिर की अकूत धन संपदा के सार्थक उपयोग पर बहस कर रहे थे. इसी तरह सन 2012 में मुंबई के एक चर्च में जीसस की प्रतिमा की आँखों से आंसू निकलने को चमत्कार कहे जाने के खिलाफ जब विवेकवादी चिन्तक सनल एडामरुकु ने वैज्ञानिक कारण प्रस्तुत किए तो उन पर धार्मिक विद्वेष फैलाने का मुकदमा ठोंक दिया गया. और अब तो डा. दाभोलकर की ह्त्या ही कर दी गई है. जिन दक्षिणपंथी ताकतों ने यह घृणित कारनामा अंजाम दिया है, वे यह न भूलें कि भारत में विवेकवाद और तर्क-प्रमाणवाद की भी एक परम्परा है जो हजारों साल पुरानी है. लोकायत की हजारों साल पुरानी परम्परा को बदनाम और विरूप करने, उसके ग्रंथों को नष्ट कर डालने के बाद भी वह लोक- मनीषा में नए-नए ढंग से आकार ग्रहण करती रही. डा. नरेन्द्र दाभोलकर इसी महान परम्परा की अद्यतन कड़ी हैं. वे तर्क-प्रमाणवाद, विवेकवाद के जुझारू योद्धा के बतौर आज़ाद हिन्दुस्तान में मानसिक गुलामी के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हुए.

जन संस्कृति मंच उनकी प्रेरणादाई स्मृति को तहे-दिल से सलाम करता है. 

( सुधीर सुमन, राष्ट्रीय सह-सचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी )