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Thursday, January 15, 2015

नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी (भोला जी के स्मृति दिवस पर ) : सुधीर सुमन

भोला जी को मैं अपने बचपन से नवादा थाने के इर्द-गिर्द पान की गुमटी में बैठा देखता रहा। यहीं बैठकर वे गरीब-मेहनतकशों पर जुल्म ढाने वाले थाने और कोर्ट को उड़ाने और जलाने की बात करते रहे, बेशक व्यावहारिक तौर पर नहीं, जुबानी ही सही, पर इन संस्थाओं के प्रति जनता का जो गहरा गुस्सा था, वह तो इसके जरिए अभिव्यक्त होता ही था। कितनी बार प्रशासन के अतिक्रमण हटाओ अभियान में उन्हें यहां से हटना पड़ा था, पर बार-बार वे यहीं आकर जम जाते थे। 

उनकी पान दूकान आरा में जनसंस्कृति और जनता की राजनीति से जुड़े लोगों के मेल-मिलाप का अड्डा रही। भले व्यंग्य में कभी उन्होंने खुद पर बेवकूफ पान वाले का लेबल लगा लिया था, पर वे पढ़े-लिखे और अपने ही निजी स्वार्थ की दुनिया में खोये रहने वाले समझदारों में से नहीं थे, बल्कि उन समझदारों में से थे, जिनके लिए रमता जी ने कहा था कि राजनीति सबके बूझे के बुझावे के पड़ी, देशवा फंसल बाटे जाल में छोड़ावे के पड़ी। भोला जी शहर में माले और जसम की गतिविधियों मे शिरकत करते और पान की दूकान पर बैठे हुए कांग्रेस और गैर-कांग्रेस की तमाम सरकारों को आते-जाते देखते रहे और महसूस किया कि गरीबों की पीड़ा खत्म ही नहीं हो रही है। उदाहरण के तौर पर इसी गीत को देखा जा सकता है-

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा 
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा

कांग्रेस के लंबे शासन के बाद लालू जी जो वर्णव्यवस्था और धार्मिक अंधविश्वास की आलोचना करते हुए सत्ता में आए थे, वे बहुत ही जल्दी उसी की शरण में चले गए, लेकिन भोला जी ने ऐसा नहीं किया। बल्कि अपनी पान की दूकान पर बैठकर उनकी सरकार की भी आलोचना की। जिंदगी भर वे किराये के घर में रहे, बाल-बच्चों के लिए जितना करना चाहिए था, उतना कर नहीं पाए, लेकिन वे अपनी मुश्किलों के हल के लिए किसी देवी-देवता के शरण में नहीं गए और ना ही मुश्किलों के कारण निराशा में डूबे। जीवन ही नहीं, उनकी कविता में भी गरीब तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सवाल पूछता है और यह सवाल पूछना ही उनकी कविता और व्यक्ति दोनों की ताकत है।

मुझे जनमत के पुराने अंक में पढ़ी हुई ‘मैं आदमी हूं’ शीर्षक की उनकी एक कविता याद आती है, जिसमें उन्होंने मेहनतकश मनुष्यों की जुझारू शक्ति, शान और सौंदर्य के बारे में लिखा था। इतना ही नही, भोला ने जाने-अनजाने हमें यह सिखाया कि गरीब-मेहनतकश आदमी की निगाह से देखने से ही शासन-प्रशासन के दावों, राजनीति और विचार का असली सच समझ में आ सकता है। ‘पढ़निहार बुड़बक का जनिहें, का पढ़ावल जा रहल बा’ कविता इसी की बानगी है, जिसमें अखबार की खबरों पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि नीचा को ऊंचा और ऊंचा को नीचा बताया जा रहा है, जिन्हें शरीफ कहा जा रहा है, दरअसल लोगों की निगाह वे लुच्चे हैं। उसी कविता में आगे वे कहते हैं गरीबन के कइसे गारल जा रहल बा। अपनी आवाज के जरिए वे बकायदा गारने ( कसकर निचोड़ने) की प्रक्रिया को भी व्यक्त करते थे।

मुझे जनमत में ही सितंबर 87 में छपी भोला जी की एक और कविता की याद आती है- जान जाई त जाई, ना छूटी कभी/ बा लड़ाई इ लामा, ना टूटी कभी। और इस लंबी लड़ाई में यकीन के बल पर ही भोला ने दो टूक कहा- जनता के खीस, देखिंहे नीतीश। इसे खीस और नीतीश का तुक जोड़ना मत समझ लीजिए। सोचिए जब नीतीश सरकार द्वारा बांटे जा रहे पुरस्कारांे और सम्मानों के बोझ तले दबे साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों को जनता के इस गुस्से का अंदाजा नहीं था, किताबी ज्ञान रखने वालों या वर्गीय श्रेष्ठता के अहं से ग्रस्त रचनाकारों और बुद्धिजीवियों को भी जब नीतीश के पराजय की आशंका नहीं रही होगी, तब जनता के कवि ने उनके भविष्य का लेखा लिख दिया था। अब भी बहुत सारे साहित्यकार जनता की ताकत को मजबूत बनाने के बजाए किसी न किसी शासकवर्गीय गठबंधन की ओर उम्मीद लगाए रखते हैं, उनकी तारीफें करते हैं। जनवादी ताकतों की शिकस्त से जो रचनाकार निराशा में डूबकर किसी न किसी शासकवर्गीय राजनीति के साथ जा खड़े होते हैं, उनमें से भोला जी नहीं थे। वे लड़ाई लड़ने के लिए संकल्पबद्ध थे। पाश के लहजे में कहें तो हम लड़ेंगे जब तक लड़ने की जरूरत बाकी है। भोला की समझ थी कि जनता की लड़ाई लंबी है और इस लंबी लड़ाई में दुश्मनों और दोस्तों की पहचान लगातार होनी है। जिस तरह गरीब जनता सरकार और प्रशासन के नस-नस को जानती है, उसी तरह भोला भी उन्हें जानते-समझते थे। उनके पैमाने से अफसर और मच्छड़, हड्डा और गुंडा, नेता और कुत्ता एक ही थे। अब नेता तो जनता के संघर्ष के भी होते हैं, पर उनके लिए उनका पैमाना अलग था, यहां तो नेता साथी होते हैं। तभी तो 1987 की कविता में उन्होंने लिखा कि ‘साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल/ नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी।’ और यह नेह मरते दम तम उनके भीतर मौजूद रहा। 

कई बार खुद से सवाल करता हूं कि भोला जी की कविताएं क्या हैं? जवाब मिलता है, आम जनता का दुख-दर्द ही तो है उनमें, जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए जो लंबा संघर्ष चल रहा है, जो उसकी आजादी, बराबरी और खुदमुख्तारी का संघर्ष है, उसी के प्रति उम्मीद और भावनात्मक लगाव का इजहार ही तो है उनकी कविताएं। उन्होंने कोई पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार के लिए तो लिखा नहीं। जिस तरह कबीर कपड़ा बुनते हुए, रैदास जूते बनाते हुए कविताई करते रहे, उसी तरह भोला पान बेचते हुए कविताई करते रहे। भोला आशु कवि थे यानी ऐसे कवि जो तुरत कुछ पंक्तियां गढ़के आपको सुना देते हैं। महान कवियों के इतिहास में शायद भोला का नाम दर्ज न हो पाए, पर जिस तरह इतिहास में बहुसंख्यक जनता का नाम भले नहीं होता, लेकिन वह बनता उन्हीं के जरिए है, उसी तरह भोला की कविताएं भी हैं। वे आरा काव्य-जगत की अनिवार्य उपस्थिति थे। जसम के पहले महासचिव क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में हर साल होने वाले नुक्कड़ काव्यगोष्ठी ‘कउड़ा’ के आयोजन में भोला जी का उत्साह देखने लायक होता था। हमने देखा है कि जब भी उन्हें कार्यक्रमों में बोलने का मौका मिला, उन्होंने कम ही शब्दों में बोला, पर हमेशा उनकी कोशिश यह रही कि कुछ सारतत्व-सा सूत्रबद्ध करके रख दें। और ऐसे मौके पर अक्सर लोग उनकी कुछ ही पंक्तियों के वक्तव्य पर वाह, वाह कर उठते थे। 

डाइबिटिज की बीमारी से भी एक योद्धा की तरह उन्होंने लंबा संघर्ष किया। अस्वस्थता के कारण उनका शरीर कमजोर हो गया था। लेकिन उन्होंने अंतिम दम तक हार नहीं मानी। भोला ने अपना गोला दागना यानी कविताओं की पतली पुस्तिकाएं प्रकाशित करवाना नहीं छोड़ा। उनका लाल झोला और उसमें रखा हथौड़ा हमेशा उनके साथ रहा, जिसके बल पर वे जनता के दुश्मनों से फरिया लेने का हौसला रखते थे।

हमारे फिल्म उद्योग को धर्म-अध्यात्म के नाम पर जनता को ठगने वालों पर उंगली उठाने के लिए एलियन को गढ़ना पड़ता है, जिसे लोग समझते हैं वह नशे में है यानी पीके है। भोला जी हमारे पीके थे, लेकिन वे कोई एलियन नहीं थे, जीते-जागते इसी दुनिया के मनुष्य थे, पीके इसलिए थे कि पान के पत्ते काटने वाले कवि थे। वे पान के पत्तों के जरिए समाज को देखते-समझते थे, उनका मानना था कि अगर सड़े हुए पत्तों को बाहर नहीं फेंका गया तो वे सारे पत्तों को सड़ा देते हैं। यह संयोग है कि अभी फेसबुक पर अनिल जनविजय ने उनकी तस्वीर लगाकर पूछा कि यह किसकी तस्वीर है तो ज्यादातर लोगों ने उन्हें नागार्जुन बताया।

बेशक वे नागार्जुन नहीं थे, पर उन्होंने मिजाज उन्हीं का पाया था। वे साधारण थे इसीलिए असाधारण थे। आइए साधारण की इस सृजनात्मकता के महत्व को पहचानें, जनता की इस आवाज को सलामी दें। हर साल हम उनकी याद में आयोजन करेंगे और अगले साल से विषय भी देंगे, जिन पर उन्हीं की तरह आशुकविताओं का सृजन किया जाएगा और जनता के बीच उन्हें प्रस्तुत किया जाएगा। उनकी परंपरा इस तरह से आगे बढ़ेगी। 

उन्होंने जिस संघर्षशील जनता को अपने गीत में संबोधित किया आइए हम भी उसे गाएं- 

तोहरा नियर केहू ना हमार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा।

Tuesday, October 29, 2013

कामरेड रामनरेश राम की स्मृति के साथ भोजपुर में



एक पत्रिका के लिए बाथे जनसंहार पर आए फैसले पर लेख लिखना था, लेकिन लगातार भागदौड़ मे वह लेख अब तक पूरा नहीं हो सका है। जब से बाथे जनसंहार पर हाईकोर्ट का फैसला आया है, तबसे तमाम किस्म के बहसों के बीच मुझे एक शख्सियत की सबसे ज्यादा याद आती रही, जिन्होंने भोजपुर में गरीबों के क्रांतिकारी जागरण का नेतृत्व किया और आज जबकि वे नहीं हैं, तब भी गरीब-मेहनतकशों के लिए वे जीवित संदर्भ की तरह हैं। जब भी शासकवर्गीय नजरिए से कोई हत्यारों के बचाव में भूस्वामियों पर अत्याचार की फर्जी कहानियां सुनाता है, तब साठ और सत्तर के दशक में का. रामनरेश राम और उनके साथियों द्वारा शुरू किए गए सामंतवादविरोधी संघर्ष की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की ओर ध्यान चला जाता है। सामाजिक-आर्थिक विषमता, शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ तमाम गरीब मेहनतकश समुदाय के लोगों के राजनीतिक जागरण की शुरुआत तो उन्होंने इसी व्यवस्था द्वारा निर्धारित तौर-तरीकों से की, लेकिन सामंती-वर्णवादी शक्तियों को यह मंजूर नहीं था। वे मुखिया के चुनाव में खड़े हुए। लेकिन गांव के वर्चस्वशाली लोगों ने कहा कि इस पंचायत में सर्वसम्मति से मुखिया का चुनाव होता है। जब उन्होंने चुनाव लड़ने का इरादा नहीं बदला, तब भूस्वामियों ने एक नया पैंतरा लेते हुए यह शर्त रखा कि गांव में जो पोखरा है, उसके घाट का पक्कीकरण करना है, उसमें पांच हजार रुपये लगेंगे, जो पांच हजार रुपये देगा, उसे ही सर्वसम्मति से मुखिया बनाया जाएगा। रामनरेश राम ने सीधा सवाल किया कि इसका मतलब यह है कि जिसके पास धन नहीं होगा, वह मुखिया नहीं बनेगा। उन्होंने भूस्वामियों की एक नहीं सुनीं और चुनाव में खड़े हुए और मुखिया का चुनाव जीते। दरअसल धन की राजनीति के खिलाफ जन की राजनीति करना है, यह तो उन्होंने उस वक्त ही तय कर लिया था, जब 40 के दशक के उत्तरार्ध में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए थे। कम्युनिस्ट पार्टी उस वक्त प्रतिबंधित थी. मुखिया होने से पहले वे भोजपुर में किसानों के कई लोकप्रिय आंदोलनों का नेतृत्व कर चुके थे। मुखिया के कार्यकाल के दौरान उन्हें तरह तरह के फर्जी मुकदमों में फंसाने और उनकी हत्या करने की भी कोशिश की गई, पर गरीबों के दुश्मनों को सफलता नहीं मिली। अपने जीवन के आखिर तक गरीब-मेहनतकशों के बीच वे मुखिया जी के रूप में ही मशहूर रहे। हालांकि इस बीच 1967 में सीपीआई-एम ने उन्हें सहार विधान सभा से अपना प्रत्याशी बनाया और उन्हीं के गांव एकवारी के जगदीश मास्टर, जो आरा जैन स्कूल में विज्ञान के शिक्षक थे, उनके चुनाव एजेंट बने। चुनाव के दौरान उसी गांव में भूस्वामी अपने उम्मीदवार के पक्ष में फर्जी वोटिंग कर रहे थे, जिसका जगदीश मास्टर ने विरोध किया, उसकी प्रतिक्रिया में उनलोगों ने उन पर जानलेवा हमला किया। इस बीच नक्सलबाड़ी विद्रोह की चिंगारी एकवारी पहुंची और सामाजिक उत्पीड़न व अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के हिंसक दमन के खिलाफ के खिलाफ रामनरेश राम, जगदीश मास्टर और रामेश्वर यादव के नेतृत्व में गांव के गरीबों ने अपनी मान मर्यादा, लोकतांत्रिक हक अधिकार के लिए सशस्त्र प्रतिरोध का रास्ता अख्तियार किया। भूस्वामियों के साथ पूरी राज्य मशीनरी, पुलिस और न्यायपालिका शामिल थी। गरीब-मेहनतकशों के प्रतिरोध का भीषण दमन किया गया। जगदीश मास्टर और रामेश्वर यादव समेत रामनरेश राम के कई क्रांतिकारी साथी शहीद हो गए, लेकिन उस भीषण दमन के दौर में भी भूमिगत होकर वे गरीब-मेहनतकशों के आंदोलन को आगे बढ़ाते रहे और अपने शहीद साथियों के सपनों को साकार करने में लगे रहे। 

का. रामनरेश राम ने संघर्ष के सारे मोर्चों पर एक बेमिसाल कम्युनिस्ट क्रांतिकारी के तौर पर अपनी भूमिका अदा की और हर मोर्चे को जरूरी समझा। वे अपनी पार्टी और उसके आंदोलन को 1857 से लेकर भगतसिंह और उनके साथियों, तेलंगाना, तेभागा तथा 1942 के आंदोलन में मौजूद जनप्रतिरोध की पंरपरा से जोड़ते थे। खुद अपनी पहल पर उन्होंने भोजपुर के लसाढ़ी में ब्रिटिश सैनिकों से पंरपरागत हथियारों के साथ जूझ पड़ने वाले 12 शहीदों का स्मारक बनवाया। 1857 की 150 वीं वर्षगांठ पर जगदीशपुर में उनकी पहल पर भोजपुर के संग्रामी मजदूर किसानों ने साम्राज्यवादविरोधी महासंग्राम के नायक कुंवर सिंह को याद किया। 

28 साल बाद जब विरोधी पार्टियों की तमाम साजिशों के बावजूद का. रामनरेश राम उसी सहार विधान सभा से भाकपा माले के प्रत्याशी के रूप में निर्वाचित हुए, तो फिर जीते जी उन्हें कोई परास्त नहीं कर पाया। एक विधायक के तौर पर अपनी ईमानदारी और पारदर्शी तरीके से काम करने की जो मिसाल उन्होंने कायम की, वह दुर्लभ है। उनके साथ ही बगल के संदेश विधान सभा से का. रामेश्वर प्रसाद की भी 1995 में जीत हुई थी। दरअसल मंडल-कमंडल की राजनीति के उस दौर में गरीबों की यह राजनीतिक जीत सामंती-सांप्रदायिक अवशेषों पर टिकी राजनीति को बर्दाश्त नहीं हुई। सत्ताधारी पार्टी राजद की शह पर तब रणवीर सेना का गठन हुआ और उसे भाजपा, समता (अब की जद-यू), कांग्रेस सबने संरक्षण दिया। रणवीर सेना ने बेगुनाह गरीबों, दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यकों के बेहद नृशंस तरीके से जनसंहार किए। महिलाओं और बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया। यहां तक की गर्भस्थ बच्चों की भी हत्या की गई। और रणवीर सेना सरगना ने तर्क दिया कि ये महिलाएं नक्सलियों को जन्म देती हैं और बच्चे नक्सली बनते हैं, इसलिए इनकी हत्या जायज है। जबकि शासकवर्ग की पूरी मंशा यह थी कि गरीब-मेहनतकशों का राजनैतिक आंदोलन हिंसा-प्रतिहिंसा के दुष्चक्र में फंसकर खत्म हो जाए, तब का. रामनरेश राम के नेतृत्व में भाकपा-माले ने बड़ी धैर्य से शासकवर्ग की इस बर्बर राजनैतिक चुनौती का सामना किया। बथानीटोला में जनसंहार के मृतकों का जो स्मारक बना है, वह अन्याय और जुल्म के खिलाफ गरीबों की लड़ाई के प्रति प्रतिबद्धता को ही जाहिर करता है।
इस स्मारक पर का. रामनरेश राम के शब्द दर्ज हैं कि एक जनवादी समाज और गरीब-मेहनतकशों के राज का निर्माण ही इन शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इस अनावरण के तीन माह बाद ही का. रामनरेश राम का निधन हो गया था। 26 अक्टूबर 2010 को उनकी शवयात्रा में उमड़े विशाल जनसमूह की याद अब भी ताजा है। वे सही मायने में जननेता थे।
इस बार जब मैं भोजपुर पहुंचा तो अखबारों में इसकी खूब चर्चा थी कि बिहार में नरेन्द्र मोदी की रैली होने वाली है. बड़ा हाईटेक मंच बन रहा है. कि कभी चाय बेचने वाले के रूप में मोदी की लोकप्रियता बढ़ गई है, कि नमो चाय स्टाल खुल गए हैं, कि कितनी ट्रेनें और बसें रिजर्व की गई हैं. किसी ज़माने में एक सज्जन खुद को गरीबों का बेटा कहके बिहार में सत्ता में आये थे और अपनी कुर्सी के लिए गरीबों की हत्या करने वाली सामंती साम्प्रदायिक निजी सेना को संरक्षण दिया था, वे तो घोटाले में जेल गए, पर  घोटाले और गरीबों के जनसंहार के उनके संगी साथी आज भी सत्ता की होड में लगे थे और गरीबों के प्रति उसी तरह संवेदनहीन नज़र आ रहे थे. मोदी के चाय बेचने वाले ड्रामे का गरीबों पर कोई असर नहीं दिख रहा था. वे तो सवाल कर रहे थे कि हुंकार रैली में जो करोड़ों रूपया खर्च हो रहा है, वह कहाँ से आ रहा है? धन की राजनीति साम्प्रदायिक-सामन्ती शक्तियों के हुंकार भरने की तैयारी में लगी थी, पर जन की राजनीति के पास जो कुछ संभव था उसी के जरिए अपने वास्तविक नायक को याद कर रही थी. मैंने देखा  कामरेड रामनरेश राम के स्मारक को. गरीबों को कोई फूलदान नहीं मिला तो उन्होंने एक कोल्ड ड्रिंक के दो हरे बोतलों को ही फूलदान बना दिया था.
कामरेड रामनरेश राम स्मारक, सहार, भोजपुर 
स्मारक से सोन का दृश्य 
कामरेड स्वदेश भट्टाचार्य द्वारा माल्यार्पण 
सोन के तट पर कामरेड रामनरेश राम का यह भव्य स्मारक है जिसके लिए एक गरीब कार्यकर्ता ने अपनी जमीन दी थी. हर साल 26 अक्टूबर को लोग भोजपुर के मजदूर-किसान जुटते हैं और उनके सपनों को साकार करने तथा उनके अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने का संकल्प लेते हैं। सामने ही सहार और अरवल को जोड़ने वाला पुल दिखाई देता है, जिसके निर्माण के लिए उन्होंने सड़क से लेके विधानसभा तक में कई बार आवाज़ उठाई थी. गरीब मेहनतकश जनता की मांग थी कि इसे रामनरेश राम सेतु नाम दिया जाए, पर गरीबों का जनसंहार रचाने वालों को बचाने में लगी नीतीश सरकार को यह भला कैसे मंजूर होता. नीतीश राज में सड़कों के निर्माण को बहुत बड़ी उपलब्धि बताया जाता रहा है. लेकिन हमने देखा कि सड़कें टूट रही थीं. यहाँ तक कि जो फोरलेन सड़क बन रही थी, उसे देखके उसके निर्माण में भी भारी घोटाले का अंदेशा हो रहा था. अनायास रामनरेश जी के नेतृत्व में सड़क निर्माण के लिए हुए एक लोकप्रिय आन्दोलन की याद हो आयी. एक नहर के बगल से गुजरती एक टूटीफूटी सड़क के बारे में साथ चल रहे कामरेड जितेन्द्र ने बताया कि पहली बार यह सड़क रामनरेश जी ने ही बनवाई थी, पर हाल के वर्षों में  इसकी कोई मरम्मत नहीं की गई है.  लोग उन्हें इसका श्रेय देते हैं कि उन्होंने बहुत सारे वैसे गांव जहाँ बरसात में जा पाना मुश्किल था वहां सड़कें और पुल बनवाए. सिचाई के लिए आहरों का निर्माण करवाया. गरीब बस्तियों में उन्होंने खास तौर पर प्राथमिकता के आधार पर स्कूल भवन और सामुदायिक भवन बनवाए. साथ में भाकपा- माले के राज्य सचिव का. कुणाल और केन्द्रीय कमेटी सदस्य अमर भी थे. जो न केवल पारस जी की ऐतिहासिक भूमिका के साक्षी थे, बल्कि उनके साथ लंबे समय तक काम भी किया था. पारस जी? यही तो भूमिगत दौर में रामनरेश जी का नाम था. का. अमर अक्सर बताते है कि किस तरह वे छात्र जीवन में ही उनके साथ हो लिए थे. सचमुच इस पारस के संस्पर्श ने कितने ही नौजवानों के जीवन को क्रांतिकारी उर्जा और चमक से भर दिया और उनके जीवन को न केवल खुद उनके लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए अर्थपूर्ण बना दिया.
जिस सहार विधान सभा से का. रामनरेश राम जीतते थे, परिसीमन में उसका नाम बदल दिया गया है, पर इस तरह नाम बदलने से क्रांतिकारी इतिहास पर भला कैसे पर्दा पड़ सकता है, जबकि वह आंदोलन जारी है! अब इस विधान सभा का नाम तरारी विधान सभा हो गया है.
इस साल कार्यकर्ताओं ने तरारी प्रखंड कार्यालय परिसर में भी का. रामनरेश राम के स्मारक का शिलान्यास कार्यक्रम रखा था, जिसमें हजारों लोग मौजूद थे। सत्तर के दशक से ही भोजपुर आंदोलन में का. रामनरेश राम के साथ रहे और कभी जिस पार्टी को भोजपुर की पार्टी कहा जाता था, उसे पूरे देश की पार्टी बना देने के संघर्ष में उनके अभिन्न सहयोगी भाकपा-माले पोलित ब्यूरो सदस्य का. स्वदेश भट्टाचार्य ने स्मारक का शिलान्यास किया। 
शिलान्यास स्थल पर लोगों ने भारत का एक मानचित्र बना रखा था, जिसमें कामरेड रामनरेश राम का नाम लिखा हुआ था. गरीब-मेहनतकशों की इस आकांक्षा पर मीडिया का ध्यान भला कैसे जा सकता है. उन्हें मोदी और राहुल के नाटक दिखाने से फुर्सत मिले तब न! 







अम्बेडकर छात्रावास में स्मृति सभा


इसके बाद 27 अक्टूबर को राजकीय अंबेडकर कल्याण छात्रावास में भी एक स्मृति सभा हुई, जिसे मुख्य वक्ता के बतौर का. स्वदेश भट्टाचार्य ने संबोधित किया और एकताबद्ध सामाजिक लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए छात्रों-नौजवानों का आह्वान किया। उन्होंने का. रामनरेश राम के संघर्ष को स्वाधीनता आंदोलन की विरासत से जोड़ा और कहा कि आज भी सामंती ताकतें गरीबों की आजादी, मान सम्मान और हक अधिकार को कुचल देना चाहती हैं, अदालतें अन्यायपूर्ण फैसले सुना रही हैं, ऐसे में गरीबों के राजनैतिक आंदोलन को और अधिक ताकतवर बनाना जरूरी है। का. रामनरेश राम के रास्ते पर चलकर ही गरीब अपने राजनैतिक हक अधिकार हासिल कर सकते हैं। उन्होंने विधायक के तौर पर भी उनकी भूमिका को याद किया कि किस तरह उन्होंने चार चार बार विधायक बनने के बावजूद अपने निजी हित में कुछ नहीं किया. जब उनके निधन के बाद पत्रकार उनके गांव पहुंचे तो उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि  चार बार विधायक रहने वाले किसी व्यक्ति का एक खंडहरनुमा मिट्टी का घर हो सकता है। 
आरा पहुँचने से पहले ही जुझारू नौजवान साथी मनोज मंजिल की गिरफ्तारी की सूचना मुझे मिल चुकी थी. यहाँ पता चला कि कई फर्जी मुकदमें उन पर लाद दिए गए हैं. उनसे जब सीजीएम ने पूछा कि क्या जेल में भी आन्दोलन करोगे? उनका दोटूक जवाब था कि अगर कुछ गलत हुआ तो जरूर आन्दोलन करेंगे। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि सीजीएम इस पर लाजवाब थे। मनोज मंजिल और आरा जेल में बंद अन्य साथियों के नेतृत्व में  500 बंदियों द्वारा का. रामनरेश राम की स्मृति में सभा किए जाने की सूचना भी हमें मिली। एक दिन बाद ही पटना में माले की ‘खबरदार रैली’ है। अपने निधन से पूर्व उसी गांधी मैदान में का. रामनरेश राम ने गरीबों की और भी बड़ी रैली का आह्वान किया था। उसके बाद पिछले साल जो रैली हुई, वह पहले से बड़ी रैली थी, जिसमें बिहार की गरीब-मेहनतकश, लोकतंत्रपसंद जनता ने सरकारी रैली को जबर्दस्त चुनौती दी। उम्मीद है कि माले की ‘खबरदार रैली’ पिछली रैली से भी बड़ी होगी और कारपोरेट लूट व सामंती-सांप्रदायिक घृणा व उन्माद की राजनीति को जोरदार चुनौती देगी। हजारों गरीब-मेहनतकश लोगों, छात्र-नौजवानों, महिलाओं और लोकतंत्रपसंद-इंसाफपंसद बुद्धिजीवियों व नागरिकों की आंखों में उसी स्वप्न और संकल्प को  बिहार और देश के लोग देखेंगे, जिसे साकार करने के लिए का. रामनरेश राम और उनके साथियों ने आजीवन संघर्ष किया और संघर्ष की जिस विरासत को लेकर उनके साथी आगे बढ़ रहे हैं।