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Monday, June 6, 2016

युवानीति : इसके नाटक दर्शकों को झकझोरते हैं- सुनील सरीन


युवानीति के 38 वर्ष 

आपातकाल के बाद का दौर था। लोकतंत्र की जद्दोजहद जारी थी। भारतीय शासकवर्ग की अलोकतांत्रिक प्रवृत्तियों और उसके पाखंड के खिलाफ गहरा जनविक्षोभ बरकरार था। राजनीति ही नहीं, संस्कृति के क्षेत्र में भी सत्ता की चाटुकारिता, पूंजीवादी पतनशीलता और व्यक्ति-पूजा का जोर था। इन्दिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ जो नयी सरकार आई, वह भी जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरी।  इन्हीं परिस्थितियों में अड़तीस वर्ष पूर्व 5 जून 1978 को आरा शहर के जवाहरटोला मुहल्ले की  मुसहरटोली में कथाकार मधुकर सिंह की कहानी ‘दुश्मन’ की नाट्य-प्रस्तुति के जरिए नाट्य संस्था ‘युवानीति’ ने अपने सफर की शुरुआत की थी। इस संस्था के गठन के लिए शहर के विभिन्न समुदायों के ऐसे नौजवान साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी और बुद्धिजीवी नागरिकों ने पहल की थी, जो बेहतर सामाजिक-राजनीतिक बदलाव चाहते थे, जो संस्कृतिकर्म को जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाना चाहते थे। 

पहले नाटक के रूप में ‘दुश्मन’ का चुनाव कई दृष्टियों से इस नाट्य संस्था के मकसद को स्पष्ट करता है। एक नेता जो सत्ता मे जाते ही शोषक-उत्पीड़क शक्तियों का सहयोगी बन जाता है, उसे यह कहानी ‘दुश्मन’ घोषित कर देती है, यानी सत्ता या व्यवस्था में शामिल होते ही जिनका वर्ग बदल जाता है, शुरू से उनका स्पष्ट नकार इस संस्था की दिशा थी।

जाहिर है यह रास्ता संस्कृतिकर्म के क्षेत्र में सत्ता और सत्ता के ठेकेदारों द्वारा दिए जाने वाले प्रलोभनों को ठुकराते हुए जनसहयोग के बल पर संस्कृतिकर्म करने का रास्ता था। युवानीति के कलाकारों के लिए अभावों और कम सुविधाओं के बीच काम करना कोई बाध्यता नहीं, बल्कि एक खास राजनैतिक-आर्थिक परिस्थिति में सचेत वैचारिक चुनाव था। रंगकर्मियों को सामंती आतंक और शासकीय दमन के खतरों को भी झेलने को तैयार रहना था। युवानीति ने भोजपुर के किसान आंदोलन से उर्जा ग्रहण की, गांवों में भी जाकर नाट्य प्रस्तुतियां कीं। नुक्कड़ से लेकर प्रेक्षागृृह तक में सफल प्रस्तुतियों के जरिये यह साबित किया कि अगर जनता से जुड़े सवालों और बेहतर बदलाव की जनाकांक्षा को लेकर कोई संस्था प्रतिबद्धता के साथ वैचारिक संस्कृतिकर्म करेगी, तो उसे दर्शकों का हमेशा साथ मिलेगा।

जंगीराम की हवेली, जनता पागल हो गई है, पत्ताखोर, राजा का बाजा, हत्यारे, कामधेनु, जनतंत्र के मुर्गे, सरकारी साढ़, गिरगिट, तमाशा, कफन, ये किसका लहू है कौन मरा, अंधेर नगरी चैपट राजा, तेरा नहीं मेरा नहीं सब कुछ हमारा, जरा सोचिए, खून से सना गेहूं समेत दो दर्जन से अधिक नुक्कड़ नाटकों की हजारों प्रस्तुतियां युवानीति ने की। कम संसाधनांे में युवानीति के कलाकारों ने जो रंग प्रयोग किए, उसकी चर्चा पूरे देश में रही। जबकि महानगरों में मंचीय प्रस्तुतियों के दौरान दर्शकों की कमी का रोना रोया जाता रहा, उस दौरान भी युवानीति ने पोस्टर, सिंहासन खाली है, तेतू, आदि विद्रोही स्पार्टाकस, बकरी, कामरेड का कोट, हजार चैरासी की मां, पदचाप, मास्टर साब जैसे विचारोत्तेजक और जटिल संरचना वाले नाटकों का बेहद सफल मंचन किया। तत्काल घटित घटनाओं के आधार पर युवानीति ने कई नाटको की प्रस्तुुति की, जिसमें एड्स के कुप्रचार, कुष्ट निवारण केंद्र की दुर्दशा, बाढ़ के दौरान गोली कांड और सांप्रदायिकता को आधार बनाकर कर किए गए नाटकों ने भी दर्शकों को काफी प्रभावित किया। 

युवानीति ने देश के कई शहरों में भी अपने नाटकों की प्रस्तुति की। सामूहिकता इस संस्था की खासियत रही है। सामूहिक लेखन और सामूहिक निर्देशन को महत्व देने वाली शायद ही कोई ऐसी संस्था होगी। 

बेशक ‘युवानीति’ के 38 वर्षों का सफर काफी उतार-चढ़ाव से गुजरा है। जनता के लिए रंगकर्म की दशा-दिशा और रंगकर्मियों के व्यक्तिगत जीवन के प्रश्नों के अलावा कई सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर इस संस्था के भीतर बहसें चलती रही हैं। मेरे पास कई मिनट्स बुक हैं जो उन बहसों के साक्ष्य हैं। विभिन्न आयोजनों की तस्वीरें, युवानीति के नाटकों के स्क्रिप्ट, खबरों और रिर्पोटों की कटिंग्स और जन नाट्यकर्म के लिहाज से महत्वपूर्ण इसके संग्रहणीय स्मारिकाओं में भी इसका इतिहास दर्ज हैं। 

आज जब सत्ता-प्रतिष्ठानों द्वारा संस्कृतिकर्म के क्षेत्र में करोड़ों रुपये बहाए जा रहे हों और संस्कृतिकर्म के क्षेत्र में नए-नए ठेकेदार-माफिया पैदा हो रहे हों, जब सर्वग्रासी पूंजी-तंत्र कला-संस्कृति को पूरी तरह निगल जाने को आतुर है, तब ‘युवानीति’ सत्ता के साथ आलोचनात्मक रिश्ते और अपनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता की विरासत को कैसे बचाएगी, यह एक गंभीर सवाल है। 

‘युवानीति’ की 38 वीं वर्षगांठ के अवसर पर पेश है इस संस्था के पूर्व सचिव सुनील सरीन का एक आलेख ‘रंगकर्म की गुरिल्ला लड़ाई लड़ रही है युवानीति’, जो उन्होंने इस संस्था के दस साल पूरे होने के बाद लिखा था। यह लेख 11 जनवरी 1989 को नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण में छपा था। यह आलेख ‘युवानीति’ की वैचारिक दिशा और उसकी ताकत के स्रोत को समझने के लिहाज से भी उपयोगी है।- सुधीर सुमन 


जून 1978 की पांचवी तारीख- शाम का समय- चार चैकियों को सटाकर एक मंच बनाया गया था। पीछे की ओर सटी मिट्टी की अधढही दीवार साइक्लोरामा (पीछे का परदा) के रूप में थी। मंच के बाकी तीन ओर के खुले एप्रन (मंच का अग्रभाग) में दो खंभे गाड़कर टंगे बल्बों और गैस बत्तियों (जो बिजली गुल हो जाने की आशंका से टांगी गई थीं) का प्रकाश फैला हुआ था। मुसहर टोली के...सूअरबाड़ी के चारों ओर खेलने वाले नंग-धडंग बच्चों और दुधमुंहे बालकों को अपनी गोदी में चिपकाए...महिलाओं के बीच ‘युवानीति’ ने अपनी प्रथम नाट्य प्रस्तुति की थी- मधुकर सिंह का नाटक ‘दुश्मन’। यह अवसर था जब साहित्य व कला को जनता के बीच पहुंचाने को बेचैन युवा साहित्यकारों और रंगकर्मियों की एक जमात ने कला संस्कृति को जनता और जीवन के फलसफे के रूप में स्थापित करने का ऐलान किया। पूरे भोजपुर में यही वह दौर था जब जन संस्कृति की प्रबल धारा ने वेग पकड़ना शुरू किया था। 

रंगकर्म मनोरंजन नहीं है और न ही विशुद्ध कलात्मक विद्या। वह इन स्थितियों से आगे एक कर्मक्षेत्र है, एक गुरिल्ला लड़ाई- जड़ तथा निष्क्रिय जीवन में उत्पन्न एक भूचाल। यह लोगों को क्रियोन्मुख करता है। इसकी भूमिका बदलाव की है- इस फलसफे को आत्मसात कर निरंतर प्रयासरत रही है ‘युवानीति’...। इसीलिए इसके नाटक दर्शकों को आनंदित नहीं करते, बल्कि झकझोरते हैं और उसे एक सार्थक दिशा की ओर उन्मुख करते हैं। उस दिशा की ओर जहां बदलाव और संघर्ष की ताकतें एकजुट हो रही हैं। 

यह तो बिल्कुल ही स्पष्ट है कि आज थियेटर के बारे में अलग से बात नहीं की जा सकती है, जब तक कि मूल समस्या और संपूर्ण सामाजिक संदर्भ से न जुड़ा जाए। लोग संस्कृति को समाज और जनता की आर्थिक राजनैतिक नाट्य स्थितियों का आईना मानते हैं, इसीलिए अगर आज का नाटक जनतंत्र के गुर्गों और मुर्गों के खिलाफ है। बेईमान, भ्रष्ट, निकम्मे, शोषक-शासक शक्तियों और सामान्य जनों को बांटने वाली ताकतों और वर्तमान भारतीय तंत्र के खिलाफ है तो यह स्वाभाविक है। रंगदर्शक ऐसी ही स्थितियों में रहकर अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढ रहा है। इसलिए आज की नाट्य प्रस्तुतियां जंगल की आग की तरह चैकन्नी, अधिकारों के हनन को तत्पर इस तंत्र के खिलाफ एक भूचाल की मानिंद प्रतिरोध की संस्कृति के समर्थन में उठा हुआ नाट्यांदोलन बन गई है। ‘युवानीति’ ने आरंभ से ही जनता के संकल्पों, स्वप्नों, विश्वासों और उसकी संगठित रूप से सक्रिय प्रतिरोधी चेतना को अपने नाटकों और गीतों का अंतर्वस्तु बनाया। दर्शकों के नैतिक समर्थन, दृढ़ विश्वास, सक्रिय सहयोग और प्यार का संबल पाकर इस संगठन ने रंगकर्म के क्षेत्र में अपनी पहचान कायम कर ली है।

इस वर्ष (1988) ‘युवानीति’ ने अपनी स्थापना के दस साल पूरे किए हैं। अपनी इस रंगयात्रा के दौरान इसने विभिन्न नाटकों की अब तक ढाई हजार से भी ज्यादा प्रस्तुतियां कीं। भोजपुर जिले के लगभग सभी गांवों के लोगों ने इन्हें देखा जाना है और प्यार दिया है। 

नाट्य प्रस्तुति की सूचना मिलते ही पूरे जवार के लोग उमड़ आते हैं रंगस्थल पर। सिर्फ अपने जिले में ही नहीं, बल्कि बिहार के कई नगरों, कस्बों व ग्रामीण क्षेत्रों में ‘युवानीति ने नाट्य प्रदर्शन किए हैं। भोपाल में आयोजित अखिल भारतीय नुक्कड़ रंग मेले में इसकी प्रस्तुतियों की वजह से इसकी एक अलग पहचान बन गई थी। 

दिल्ली, उत्तर प्रदेश व पश्चिम बंगाल के कई नगरों व कस्बों में ‘युवानीति’ ने मंच व नुक्कड़ों पर नाट्य प्रस्तुतियां की हैं। ‘सवा सेर गेहूँ’, ‘सरकारी साढ़’, ‘जंगी की पुकार’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ ‘जनता पागल हो गई है’, ‘कामधेनु’, ‘हत्यारे’, ‘दुश्मन’ आदि इसके नाटक गांवों में बहुत लोकप्रिय हैं। रंगमंचीय नाटकों के क्षेत्र में भी इसका प्रयास सराहनीय है। तीन-तीन दिनों तक प्रेक्षागृह में चलने वाले नाटकों में दर्शकों की अपार भीड़ रहती है, यहां तक कि टिकट ब्लैक किए जाने की घटनाएं द्रष्टव्य हैं, या फिर सीटों के भर जाने पर खड़े-खड़े नाटक देखना निश्चय ही इसकी लोकप्रियता और बेहतर रंगकर्म का प्रमाण है। प्रेक्षागृह में हुई इसकी प्रस्तुतियों में ‘सिंहासन बाकी है’, ‘तेतू’, ‘पूस की रात’, ‘पोस्टर’, ‘मारीच-संवाद’, ‘स्पार्टाकस’ आदि नाटकों का प्रदर्शन उल्लेखनीय है। 

बिहार में सर्वप्रथम नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत करने वाली संस्था संभवतः ‘युवानीति’ है। जून ’78 में ‘दुश्मन’ और ‘गिरगिट’ नाटक की प्रस्तुति आरा और पटना के नुक्कड़ों पर इसने की। इसके बाद सर्जना, हिरावल, इप्टा, प्रयास, दिशा, विशाल, नवांकुर आदि कई संस्थाएं अस्तित्व में आईं और बिहार में नुक्कड़ नाट्य प्रस्तुतियों की संख्या काफी बढ़ीं। आज 100 से भी ज्यादा नाट्य संस्थाएं बिहार में सक्रिय हैं। राजेश कुमार, गुरुशरण सिंह, असगर वजाहत, रमेश उपाध्याय, शिवराम, जन नाट्य मंच, दिल्ली आदि के दर्जनों नाटकों की प्रस्तुति के अलावा ‘युवानीति’ ने खुद कई नाटक तैयार कर प्र्र्रस्तुत किए हैं। विभिन्न अवसरों पर तथा तात्कालिक समस्या व घटनाओं पर इसने इम्प्रोवाइजेशन और झांकियां प्रस्तुत की हैं। जिसमें युवानीति के नजरिए और उसकी रंगचेतना को बखूबी समझा जा सकता है। 

यह सही है कि ‘युवानीति’ ने गांवों, कस्बों व शहरों में पतनशील संस्कृति के खिलाफ अपने नाटकों के माध्यम से कारगर हस्तक्षेप कया है, किंतु अपने इन प्रयासों के दरम्यान उसे अनेक संकटों व परेशानियों का सामना करना पड़ा है। गांवों की असुविधाओं (आने-जाने, रहने, खाने-पीने आदि) के बीच नाटक करना कोई आसान काम नहीं। कभी-कभी तो इस हद तक तक टीम को कठिनाई झेलनी पड़ी कि बरसात की उमस भरी गर्मी में कीचड़-पंक वाले खेतों की पगार (मेड़) पर कई कोस पैदल चलने के बाद कच्ची-अधपकी लिट्टियां खाकर मवेशी बांधने वाले घर में कलाकारों को सोना पड़ा। बावजूद इसके, उन्होंने नाट्य प्रदर्शनों में कहीं से भी हताशा नहीं दर्शाई न ही दर्शकों को निराश किया। 

दूसरी तरफ सामंतों, गुंडों व पुलिस वालों की हरकतों का भी कम सामना नहीं करना है इन्हें। 1984 में टीम को सहार थाने में पुलिस ने गिरफ्तार कर रात भर थाने में रखा। सुबह यह धमकी देकर उन्हें छोड़ा गया कि वे इस क्षेत्र में कभी नाटक करने नहीं आएंगे। 1982 में ‘युवानीति’ के तीन वरिष्ठ रंगकर्मियों पर झूठे मुकदमे मढ़े गए। उन पर सरकारविरोधी प्रचार का आरोप लगा। इसके अलावा अक्सर विभिन्न कार्यक्रमों में सामंती गुंडों की धमकियां, पुलिस का आतंक अक्सर झेलना पड़ता है। अभी पिछले मई माह (1988) में उत्तर बिहार में मुजफ्फरपुर जिले के मुशहरी प्रखंड में नाटक होने के पूर्व गुंडों ने हाथ में बम और राइफल लेकर गांवों में प्रचार किया था कि नाटक देखने कोई नहीं जाएगा। 

इन धमकियों व दमन के बावजूद ‘युवानीति’ के नाट्य प्रदर्शनों में ऐसी समस्याएं आड़े नहीं आतीं और ज्यादातर ऐसा होता है कि यदि सामंती गुंडे और पुलिस नाटक खेलने में कोई अवरोध उत्पन्न करते हैं तो दर्शक ही पुलिस और जमींदार से लोहा लेते हैं। पिछले ही दिनों मुजफ्फरपुर में गांव वालों ने गुंडों की धमकियों को धता बताते हुए हजारों की संख्या में ‘युवानीति’ के नाटकों के प्रदर्शन में शिरकत किया और भोजपुर के कलाकारों की जुबान से अपने जीवन और संघर्षों की दास्तान सुनी। सोनबरसा (भोजपुर जिले (अब बक्सर) के नवानगर थाने में अवस्थित) में पुलिस वालों को दर्शकों ने भगा दिया कि बीच में डिस्टर्ब मत करें। शांति आप नहीं बनाइएगा, हम बनाएंगे। बक्सर में नुक्कड़ पर नाटक होते समय बीच में हस्तक्षेप करने वाले एक हवलदार को दर्शकों ने हूट कर दिया। वह मुंह चुराकर भाग गया। इस तरह की और भी कई घटनाएं हैं। 

‘युवानीति’ की संस्कृति के प्रति स्वस्थ और वैज्ञानिक समझ का एक महत्वपूर्ण नतीजा यह भी है कि जनता की समस्याओं के समाधान व उनके हक अधिकारों को दिलाने के लिए परिवर्तनकामी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को खड़ा किया। संस्कृति व राजनीति का ऐसा सामंजस्य अनूठा है। 



Tuesday, October 29, 2013

कामरेड रामनरेश राम की स्मृति के साथ भोजपुर में



एक पत्रिका के लिए बाथे जनसंहार पर आए फैसले पर लेख लिखना था, लेकिन लगातार भागदौड़ मे वह लेख अब तक पूरा नहीं हो सका है। जब से बाथे जनसंहार पर हाईकोर्ट का फैसला आया है, तबसे तमाम किस्म के बहसों के बीच मुझे एक शख्सियत की सबसे ज्यादा याद आती रही, जिन्होंने भोजपुर में गरीबों के क्रांतिकारी जागरण का नेतृत्व किया और आज जबकि वे नहीं हैं, तब भी गरीब-मेहनतकशों के लिए वे जीवित संदर्भ की तरह हैं। जब भी शासकवर्गीय नजरिए से कोई हत्यारों के बचाव में भूस्वामियों पर अत्याचार की फर्जी कहानियां सुनाता है, तब साठ और सत्तर के दशक में का. रामनरेश राम और उनके साथियों द्वारा शुरू किए गए सामंतवादविरोधी संघर्ष की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की ओर ध्यान चला जाता है। सामाजिक-आर्थिक विषमता, शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ तमाम गरीब मेहनतकश समुदाय के लोगों के राजनीतिक जागरण की शुरुआत तो उन्होंने इसी व्यवस्था द्वारा निर्धारित तौर-तरीकों से की, लेकिन सामंती-वर्णवादी शक्तियों को यह मंजूर नहीं था। वे मुखिया के चुनाव में खड़े हुए। लेकिन गांव के वर्चस्वशाली लोगों ने कहा कि इस पंचायत में सर्वसम्मति से मुखिया का चुनाव होता है। जब उन्होंने चुनाव लड़ने का इरादा नहीं बदला, तब भूस्वामियों ने एक नया पैंतरा लेते हुए यह शर्त रखा कि गांव में जो पोखरा है, उसके घाट का पक्कीकरण करना है, उसमें पांच हजार रुपये लगेंगे, जो पांच हजार रुपये देगा, उसे ही सर्वसम्मति से मुखिया बनाया जाएगा। रामनरेश राम ने सीधा सवाल किया कि इसका मतलब यह है कि जिसके पास धन नहीं होगा, वह मुखिया नहीं बनेगा। उन्होंने भूस्वामियों की एक नहीं सुनीं और चुनाव में खड़े हुए और मुखिया का चुनाव जीते। दरअसल धन की राजनीति के खिलाफ जन की राजनीति करना है, यह तो उन्होंने उस वक्त ही तय कर लिया था, जब 40 के दशक के उत्तरार्ध में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए थे। कम्युनिस्ट पार्टी उस वक्त प्रतिबंधित थी. मुखिया होने से पहले वे भोजपुर में किसानों के कई लोकप्रिय आंदोलनों का नेतृत्व कर चुके थे। मुखिया के कार्यकाल के दौरान उन्हें तरह तरह के फर्जी मुकदमों में फंसाने और उनकी हत्या करने की भी कोशिश की गई, पर गरीबों के दुश्मनों को सफलता नहीं मिली। अपने जीवन के आखिर तक गरीब-मेहनतकशों के बीच वे मुखिया जी के रूप में ही मशहूर रहे। हालांकि इस बीच 1967 में सीपीआई-एम ने उन्हें सहार विधान सभा से अपना प्रत्याशी बनाया और उन्हीं के गांव एकवारी के जगदीश मास्टर, जो आरा जैन स्कूल में विज्ञान के शिक्षक थे, उनके चुनाव एजेंट बने। चुनाव के दौरान उसी गांव में भूस्वामी अपने उम्मीदवार के पक्ष में फर्जी वोटिंग कर रहे थे, जिसका जगदीश मास्टर ने विरोध किया, उसकी प्रतिक्रिया में उनलोगों ने उन पर जानलेवा हमला किया। इस बीच नक्सलबाड़ी विद्रोह की चिंगारी एकवारी पहुंची और सामाजिक उत्पीड़न व अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के हिंसक दमन के खिलाफ के खिलाफ रामनरेश राम, जगदीश मास्टर और रामेश्वर यादव के नेतृत्व में गांव के गरीबों ने अपनी मान मर्यादा, लोकतांत्रिक हक अधिकार के लिए सशस्त्र प्रतिरोध का रास्ता अख्तियार किया। भूस्वामियों के साथ पूरी राज्य मशीनरी, पुलिस और न्यायपालिका शामिल थी। गरीब-मेहनतकशों के प्रतिरोध का भीषण दमन किया गया। जगदीश मास्टर और रामेश्वर यादव समेत रामनरेश राम के कई क्रांतिकारी साथी शहीद हो गए, लेकिन उस भीषण दमन के दौर में भी भूमिगत होकर वे गरीब-मेहनतकशों के आंदोलन को आगे बढ़ाते रहे और अपने शहीद साथियों के सपनों को साकार करने में लगे रहे। 

का. रामनरेश राम ने संघर्ष के सारे मोर्चों पर एक बेमिसाल कम्युनिस्ट क्रांतिकारी के तौर पर अपनी भूमिका अदा की और हर मोर्चे को जरूरी समझा। वे अपनी पार्टी और उसके आंदोलन को 1857 से लेकर भगतसिंह और उनके साथियों, तेलंगाना, तेभागा तथा 1942 के आंदोलन में मौजूद जनप्रतिरोध की पंरपरा से जोड़ते थे। खुद अपनी पहल पर उन्होंने भोजपुर के लसाढ़ी में ब्रिटिश सैनिकों से पंरपरागत हथियारों के साथ जूझ पड़ने वाले 12 शहीदों का स्मारक बनवाया। 1857 की 150 वीं वर्षगांठ पर जगदीशपुर में उनकी पहल पर भोजपुर के संग्रामी मजदूर किसानों ने साम्राज्यवादविरोधी महासंग्राम के नायक कुंवर सिंह को याद किया। 

28 साल बाद जब विरोधी पार्टियों की तमाम साजिशों के बावजूद का. रामनरेश राम उसी सहार विधान सभा से भाकपा माले के प्रत्याशी के रूप में निर्वाचित हुए, तो फिर जीते जी उन्हें कोई परास्त नहीं कर पाया। एक विधायक के तौर पर अपनी ईमानदारी और पारदर्शी तरीके से काम करने की जो मिसाल उन्होंने कायम की, वह दुर्लभ है। उनके साथ ही बगल के संदेश विधान सभा से का. रामेश्वर प्रसाद की भी 1995 में जीत हुई थी। दरअसल मंडल-कमंडल की राजनीति के उस दौर में गरीबों की यह राजनीतिक जीत सामंती-सांप्रदायिक अवशेषों पर टिकी राजनीति को बर्दाश्त नहीं हुई। सत्ताधारी पार्टी राजद की शह पर तब रणवीर सेना का गठन हुआ और उसे भाजपा, समता (अब की जद-यू), कांग्रेस सबने संरक्षण दिया। रणवीर सेना ने बेगुनाह गरीबों, दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यकों के बेहद नृशंस तरीके से जनसंहार किए। महिलाओं और बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया। यहां तक की गर्भस्थ बच्चों की भी हत्या की गई। और रणवीर सेना सरगना ने तर्क दिया कि ये महिलाएं नक्सलियों को जन्म देती हैं और बच्चे नक्सली बनते हैं, इसलिए इनकी हत्या जायज है। जबकि शासकवर्ग की पूरी मंशा यह थी कि गरीब-मेहनतकशों का राजनैतिक आंदोलन हिंसा-प्रतिहिंसा के दुष्चक्र में फंसकर खत्म हो जाए, तब का. रामनरेश राम के नेतृत्व में भाकपा-माले ने बड़ी धैर्य से शासकवर्ग की इस बर्बर राजनैतिक चुनौती का सामना किया। बथानीटोला में जनसंहार के मृतकों का जो स्मारक बना है, वह अन्याय और जुल्म के खिलाफ गरीबों की लड़ाई के प्रति प्रतिबद्धता को ही जाहिर करता है।
इस स्मारक पर का. रामनरेश राम के शब्द दर्ज हैं कि एक जनवादी समाज और गरीब-मेहनतकशों के राज का निर्माण ही इन शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इस अनावरण के तीन माह बाद ही का. रामनरेश राम का निधन हो गया था। 26 अक्टूबर 2010 को उनकी शवयात्रा में उमड़े विशाल जनसमूह की याद अब भी ताजा है। वे सही मायने में जननेता थे।
इस बार जब मैं भोजपुर पहुंचा तो अखबारों में इसकी खूब चर्चा थी कि बिहार में नरेन्द्र मोदी की रैली होने वाली है. बड़ा हाईटेक मंच बन रहा है. कि कभी चाय बेचने वाले के रूप में मोदी की लोकप्रियता बढ़ गई है, कि नमो चाय स्टाल खुल गए हैं, कि कितनी ट्रेनें और बसें रिजर्व की गई हैं. किसी ज़माने में एक सज्जन खुद को गरीबों का बेटा कहके बिहार में सत्ता में आये थे और अपनी कुर्सी के लिए गरीबों की हत्या करने वाली सामंती साम्प्रदायिक निजी सेना को संरक्षण दिया था, वे तो घोटाले में जेल गए, पर  घोटाले और गरीबों के जनसंहार के उनके संगी साथी आज भी सत्ता की होड में लगे थे और गरीबों के प्रति उसी तरह संवेदनहीन नज़र आ रहे थे. मोदी के चाय बेचने वाले ड्रामे का गरीबों पर कोई असर नहीं दिख रहा था. वे तो सवाल कर रहे थे कि हुंकार रैली में जो करोड़ों रूपया खर्च हो रहा है, वह कहाँ से आ रहा है? धन की राजनीति साम्प्रदायिक-सामन्ती शक्तियों के हुंकार भरने की तैयारी में लगी थी, पर जन की राजनीति के पास जो कुछ संभव था उसी के जरिए अपने वास्तविक नायक को याद कर रही थी. मैंने देखा  कामरेड रामनरेश राम के स्मारक को. गरीबों को कोई फूलदान नहीं मिला तो उन्होंने एक कोल्ड ड्रिंक के दो हरे बोतलों को ही फूलदान बना दिया था.
कामरेड रामनरेश राम स्मारक, सहार, भोजपुर 
स्मारक से सोन का दृश्य 
कामरेड स्वदेश भट्टाचार्य द्वारा माल्यार्पण 
सोन के तट पर कामरेड रामनरेश राम का यह भव्य स्मारक है जिसके लिए एक गरीब कार्यकर्ता ने अपनी जमीन दी थी. हर साल 26 अक्टूबर को लोग भोजपुर के मजदूर-किसान जुटते हैं और उनके सपनों को साकार करने तथा उनके अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने का संकल्प लेते हैं। सामने ही सहार और अरवल को जोड़ने वाला पुल दिखाई देता है, जिसके निर्माण के लिए उन्होंने सड़क से लेके विधानसभा तक में कई बार आवाज़ उठाई थी. गरीब मेहनतकश जनता की मांग थी कि इसे रामनरेश राम सेतु नाम दिया जाए, पर गरीबों का जनसंहार रचाने वालों को बचाने में लगी नीतीश सरकार को यह भला कैसे मंजूर होता. नीतीश राज में सड़कों के निर्माण को बहुत बड़ी उपलब्धि बताया जाता रहा है. लेकिन हमने देखा कि सड़कें टूट रही थीं. यहाँ तक कि जो फोरलेन सड़क बन रही थी, उसे देखके उसके निर्माण में भी भारी घोटाले का अंदेशा हो रहा था. अनायास रामनरेश जी के नेतृत्व में सड़क निर्माण के लिए हुए एक लोकप्रिय आन्दोलन की याद हो आयी. एक नहर के बगल से गुजरती एक टूटीफूटी सड़क के बारे में साथ चल रहे कामरेड जितेन्द्र ने बताया कि पहली बार यह सड़क रामनरेश जी ने ही बनवाई थी, पर हाल के वर्षों में  इसकी कोई मरम्मत नहीं की गई है.  लोग उन्हें इसका श्रेय देते हैं कि उन्होंने बहुत सारे वैसे गांव जहाँ बरसात में जा पाना मुश्किल था वहां सड़कें और पुल बनवाए. सिचाई के लिए आहरों का निर्माण करवाया. गरीब बस्तियों में उन्होंने खास तौर पर प्राथमिकता के आधार पर स्कूल भवन और सामुदायिक भवन बनवाए. साथ में भाकपा- माले के राज्य सचिव का. कुणाल और केन्द्रीय कमेटी सदस्य अमर भी थे. जो न केवल पारस जी की ऐतिहासिक भूमिका के साक्षी थे, बल्कि उनके साथ लंबे समय तक काम भी किया था. पारस जी? यही तो भूमिगत दौर में रामनरेश जी का नाम था. का. अमर अक्सर बताते है कि किस तरह वे छात्र जीवन में ही उनके साथ हो लिए थे. सचमुच इस पारस के संस्पर्श ने कितने ही नौजवानों के जीवन को क्रांतिकारी उर्जा और चमक से भर दिया और उनके जीवन को न केवल खुद उनके लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए अर्थपूर्ण बना दिया.
जिस सहार विधान सभा से का. रामनरेश राम जीतते थे, परिसीमन में उसका नाम बदल दिया गया है, पर इस तरह नाम बदलने से क्रांतिकारी इतिहास पर भला कैसे पर्दा पड़ सकता है, जबकि वह आंदोलन जारी है! अब इस विधान सभा का नाम तरारी विधान सभा हो गया है.
इस साल कार्यकर्ताओं ने तरारी प्रखंड कार्यालय परिसर में भी का. रामनरेश राम के स्मारक का शिलान्यास कार्यक्रम रखा था, जिसमें हजारों लोग मौजूद थे। सत्तर के दशक से ही भोजपुर आंदोलन में का. रामनरेश राम के साथ रहे और कभी जिस पार्टी को भोजपुर की पार्टी कहा जाता था, उसे पूरे देश की पार्टी बना देने के संघर्ष में उनके अभिन्न सहयोगी भाकपा-माले पोलित ब्यूरो सदस्य का. स्वदेश भट्टाचार्य ने स्मारक का शिलान्यास किया। 
शिलान्यास स्थल पर लोगों ने भारत का एक मानचित्र बना रखा था, जिसमें कामरेड रामनरेश राम का नाम लिखा हुआ था. गरीब-मेहनतकशों की इस आकांक्षा पर मीडिया का ध्यान भला कैसे जा सकता है. उन्हें मोदी और राहुल के नाटक दिखाने से फुर्सत मिले तब न! 







अम्बेडकर छात्रावास में स्मृति सभा


इसके बाद 27 अक्टूबर को राजकीय अंबेडकर कल्याण छात्रावास में भी एक स्मृति सभा हुई, जिसे मुख्य वक्ता के बतौर का. स्वदेश भट्टाचार्य ने संबोधित किया और एकताबद्ध सामाजिक लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए छात्रों-नौजवानों का आह्वान किया। उन्होंने का. रामनरेश राम के संघर्ष को स्वाधीनता आंदोलन की विरासत से जोड़ा और कहा कि आज भी सामंती ताकतें गरीबों की आजादी, मान सम्मान और हक अधिकार को कुचल देना चाहती हैं, अदालतें अन्यायपूर्ण फैसले सुना रही हैं, ऐसे में गरीबों के राजनैतिक आंदोलन को और अधिक ताकतवर बनाना जरूरी है। का. रामनरेश राम के रास्ते पर चलकर ही गरीब अपने राजनैतिक हक अधिकार हासिल कर सकते हैं। उन्होंने विधायक के तौर पर भी उनकी भूमिका को याद किया कि किस तरह उन्होंने चार चार बार विधायक बनने के बावजूद अपने निजी हित में कुछ नहीं किया. जब उनके निधन के बाद पत्रकार उनके गांव पहुंचे तो उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि  चार बार विधायक रहने वाले किसी व्यक्ति का एक खंडहरनुमा मिट्टी का घर हो सकता है। 
आरा पहुँचने से पहले ही जुझारू नौजवान साथी मनोज मंजिल की गिरफ्तारी की सूचना मुझे मिल चुकी थी. यहाँ पता चला कि कई फर्जी मुकदमें उन पर लाद दिए गए हैं. उनसे जब सीजीएम ने पूछा कि क्या जेल में भी आन्दोलन करोगे? उनका दोटूक जवाब था कि अगर कुछ गलत हुआ तो जरूर आन्दोलन करेंगे। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि सीजीएम इस पर लाजवाब थे। मनोज मंजिल और आरा जेल में बंद अन्य साथियों के नेतृत्व में  500 बंदियों द्वारा का. रामनरेश राम की स्मृति में सभा किए जाने की सूचना भी हमें मिली। एक दिन बाद ही पटना में माले की ‘खबरदार रैली’ है। अपने निधन से पूर्व उसी गांधी मैदान में का. रामनरेश राम ने गरीबों की और भी बड़ी रैली का आह्वान किया था। उसके बाद पिछले साल जो रैली हुई, वह पहले से बड़ी रैली थी, जिसमें बिहार की गरीब-मेहनतकश, लोकतंत्रपसंद जनता ने सरकारी रैली को जबर्दस्त चुनौती दी। उम्मीद है कि माले की ‘खबरदार रैली’ पिछली रैली से भी बड़ी होगी और कारपोरेट लूट व सामंती-सांप्रदायिक घृणा व उन्माद की राजनीति को जोरदार चुनौती देगी। हजारों गरीब-मेहनतकश लोगों, छात्र-नौजवानों, महिलाओं और लोकतंत्रपसंद-इंसाफपंसद बुद्धिजीवियों व नागरिकों की आंखों में उसी स्वप्न और संकल्प को  बिहार और देश के लोग देखेंगे, जिसे साकार करने के लिए का. रामनरेश राम और उनके साथियों ने आजीवन संघर्ष किया और संघर्ष की जिस विरासत को लेकर उनके साथी आगे बढ़ रहे हैं।