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Thursday, February 5, 2015

साथी पत्रकारों की यादों में कृष्ण मुरारी किशन : अजय कुमार, एम जे अकबर, कन्हैया भेलारी

प्रभात खबर एक ऐसा अखबार रहा जिसने कृष्ण मुरारी किशन को उस प्रमुखता से याद किया जिसके वे हक़दार थे. यहाँ उसमें प्रकाशित तीन पत्रकारों की यादें पेश हैं-


एक उम्दा इनसान व लाजवाब फोटोग्राफर 

अजय कुमार

कोई डिग्री नहीं थी उनके पास. किसी संस्थान में उन्होंने फोटो की पढ़ाई नहीं की थी. पर, उनके पास वह नजर थी जो दूसरों के पास नहीं थी.जीवन संघर्ष के जरिये उन्होंने वह खास नजर पायी थी. कैमरे तो बहुत सारे लोगों के पास होते हैं, मगर वह नजर कुछ लोगों के पास ही होती है. कृष्ण मुरारी किशन उन्हीं कुछ लोगों में से एक थे. आज वह हमारे बीच नहीं रहे. कंधे पर बड़ा-सा बैग लटकाये स्कूटर से चलनेवाला एक उम्दा इनसान और लाजवाब फोटोग्राफर अब हमारी स्मृतियों का हिस्सा बन चुका है.

जब फोटो उतारने वह निकले, तो पास में एक साधारण कैमरा और साइकिल थी. पटना के डाकबंगला चौराहे पर किसी जुलूस का फोटो उतारने पहुंचे, तो किसी ने उनका कैमरा हवा में उछाल दिया. मुरारी को लगा, किसी ने उनकी इज्जत हवा में उछाल दी. उछल कर कैमरे को अपने कब्जे में किया. शायद तब उन्होंने यह भी सोचा होगा-फोटो खींचने को वह नयी पहचान देंगे. यह 1974 की घटना है, जिसे हमने अपने सीनियर से सुनी है. बिहार आंदोलन के दौरान की हजारों तसवीरें उन्होंने उतारीं. लोकनायक जयप्रकाश नारायण की उनकी उतारी कई तसवीरें राजनीतिज्ञों के यहां देखी जा सकती हैं. जीवंत और अद्भुत फोटो. जाबिर साहब के पास एक तसवीर है. उसमें लोकनायक हैं. जाबिर साहब भी हैं. दिवंगत राजनीतिज्ञों कपरूरी ठाकुर, भागवत झा आजाद, सत्येंद्र नारायण सिन्हा की कई चर्चित तसवीरें उन्होंने उतारी थीं.

मुख्यमंत्री रहे डॉ जगन्नाथ मिश्र, रामसुंदर दास, लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के राजनैतिक कैरियर के हर मोड़ की तसवीर उनके पास है.वाकई केएम किशन ने फोटो जर्नलिज्म को नयी पहचान दी. उसकी ताकत का एहसास कराया. बिहार की जमीन पर किसी तरह की कोई भी घटना हो और वहां सबसे पहले पहुंचनेवालों में मुरारी न हों, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता था. देश की कोई भी पत्र-पत्रिका हो, वह किशन जी के फोटो के बगैर अधूरी थी. वह छोटी-बड़ी घटनाओं के गवाह रहे. राजनीतिक उथल-पुथल का दौर हो या छात्र आंदोलन. गांवों में किसान आंदोलन हो या नरसंहार, उन पर पहला क्लिक मुरारी जी का ही होता था. वह जनता और समाज की नजर से फोटो उतारते रहे. बाढ़-सुखाड़ में आम आदमी की जिंदगी के दर्द को बाकी दुनिया उनकी ही तसवीरों से महसूस करती थी. उन दिनों कोलकाता से निकलनेवाली ‘रविवार’ पत्रिका की धूम थी. एंटी एस्टैब्लिशमेंट के स्वर ने उस पत्रिका को हिंदीपट्टी में काफी उंचाई दी थी. उन दिनों रविवार के कवर पेज पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे का फोटो काफी चर्चित हुआ था. वह फोटो राज्य की राजनैतिक समझ पर बड़ी टिप्पणी थी. फोटो छपने के बाद मुरारी जी को कोप भी सहना पड़ा था. दिनमान, साप्ताहिक हिंदुस्तान, संडे मेल, चौथी दुनिया, इंडिया टुडे जैसी नामी पत्रिकाओं में बिहार से मुरारी जी की ही तसवीरें होती थीं. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हो या अटल बिहारी वाजपेयी, बिहार दौरे के ऐतिहासिक क्षण मुरारी जी के कैमरे में कैद हैं. 1990 के अक्तूबर महीने में प्रभात खबर में मैंने ट्रेनी जर्नलिस्ट के तौर पर काम शुरू किया था. प्रेस कान्फ्रेंस हो या कोई घटना, हम जहां भी जाते, वहां मुरारी जी हाजिर होते थे. हम उम्र में उनसे काफी छोटे थे, पर मौके पर पहुंचनेवालों में वह सबसे पहले होते थे. 

कई बार हम ङोंप भी जाते थे, यह सोच कर कि हमें यहां पहले आना चाहिए था. मुरारी जी को आज तक हमने किसी से नाराज होते नहीं देखा. जब भी मिलते, मुसकुराते हुए पूछते, कैसे हो? कैसा काम चल रहा है? मुरारी जी सबको बॉस कह कर बोलते थे. कितना भी बड़ा कोई नेता हो, वह मुरारी जी को देखते ही ज्यादा चौकस और सतर्क हो जाया करता था. क्या पता किस एंगल से वह फ्लैश चमका दें और वह खबर बन जाये? पुरानी तसवीरों का खजाना तो उनके ही पास है. अस्सी के दशक में नक्सली आंदोलन उफान पर था. आंदोलन और भूमिगत नेताओं के बारे में उन तक खबर पहुंच जाती थी. और उस घटना की तसवीर मुरारी जी के पास.

एक पत्रकार के लिए उसका नेटवर्क ही सब कुछ होता है. मुरारी जी ने अपनी लगन से इसे खड़ा किया था. कुछ साल पहले पैट टूट जाने के बाद ठीक हुए, तो भी उसी तरह सक्रिय रहे. बीते 30-35 सालों के दौरान किस बड़े नेता से उनकी पहचान नहीं थी. लेकिन, हमने कभी नहीं सुना कि किसी के पास कोई पैरवी लेकर पहुंचे हों. पटना की सड़कों पर गुजरते हुए स्कूटर से मुरारी जी को आते-जाते देखा जा सकता था. वह अपने काम के प्रति बेहद जुनूनी थे. सुबह-शाम, रात-बिरात, सब उनके लिए एक जैसे थे. उन्हें किसी घटना की खबर मिलने की देर होती थी, वह निकल पड़ते. अपने काम के प्रति ऐसी निष्ठा, समर्पण, ईमानदारी मुरारी जी में ही हो सकती थी. कोई अहंकार नहीं. किसी बात का घमंड नहीं. वरिष्ठता का गुरूर नहीं. साधारण परिवार में पले-बढ़े मुरारी जी की उस नजर से हम सब वंचित हो गये, जो बिहार की वास्तविकताओं व सच्चाइयों का प्रतीक बन गयी थी.


फोटो बनाने की थी उनके अंदर एक आग 

एमजे अकबर
बात साल 1976 की है. मैं संडे मेल में काम करता था. इसी सिलसिले में पटना आया था. मेरे साथ वरिष्ठ पत्रकार जनार्दन ठाकुर भी थे. कृष्ण मुरारी किशन से सबसे पहले यहीं मिला. वह आये और कहा, कुछ तसवीरें लाया हूं. उनके जज्बातों को देख कर मैंने उन्हें मौका दिया. उनकी आंखों में पत्रकारिता की गजब की आग और लगन थी. आपातकाल के दिन थे. 
उस समय का उनका साहस मुझे आज तक याद है. उन दिनों किशन की आमदनी नहीं के बराबर थी, शायद मैकेनिक थे वह. लेकिन, जबरदस्त जलन था दिल में. एक आग थी कि फोटो बने. मुङो याद नहीं, उनके पास कैमरे किस तरह के थे. उनकी एनर्जी और चीजों को गंभीरता से देखने के उनके निर्णय ने मुङो प्रभावित किया और मैंने ‘संडे’ के लिए हां कह दी. उन्होंने जो भी तसवीरें भेजीं, वे गजब की थीं. डॉ जगन्नाथ मिश्र की हर अंगुली में अंगूठी और जेल में बंद काली पांडेय की जीवंत तसवीरें. जयप्रकाश नारायण का आंदोलन, 1977 का आम चुनाव, सारी चीजें बेमिसाल थीं. वह सब आज मुङो उसी तरह याद है. 
जब चुनाव कैंपेन आरंभ हुआ, तो उन दिनों दूरदर्शन का जमाना था. इतने समाचार चैनल नहीं थे. सरकारी चैनल होने के कारण दूरदर्शन पर सिर्फ सरकारी खबरें और इंदिरा गांधी व कांग्रेस नेता देवकांत बरूआ की तसवीरें दिखायी जाती थीं.
एक किशन ही थे, जो जेपी, चंद्रशेखर और कपरूरी ठाकुर जैसे विपक्ष के दिग्गज नेताओं की तसवीरों को देश-दुनिया तक पहुंचा रहे थे. जेल से बाहर आने के बाद जॉर्ज फर्नाडीस की भी तसवीरें उन्होंने भेजीं, जो अद्भुत थीं. मेरा मानना है कि किशन की वे तसवीरें तत्कालीन माहौल में एक चिनगारी, आग लगानेवाली साबित हुई थीं. जनता सरकार बनी. उन दिनों की तसवीरों का किशन का अलबम ऐतिहासिक है. सच कहिए तो किशन फोटाग्राफर नहीं, बल्कि ग्राफिक हिस्टोरियन थे.
बिहार के इतिहास में उनसे बड़ा कोई दूसरा फोटोग्राफर नहीं देखा. धनबाद के माफिया की तसवीरें हों या किसी राजनेता की, किशन हमेशा सबसे आगे रहे.
कई मुख्यमंत्री और सत्ता शीर्ष उनके खास दोस्त रहे. वे उनके जितने भी करीब रहे हों, किशन की तसवीरें भी उतनी ही सच्ची होती थीं. आज तो दुनिया भर में उनकी तसवीरें प्रकाशित होती हैं. उन दिनों एक लैंब्रेटा स्कूटर था उनके पास. उनके स्कूटर पर पीछे बैठने का मुझे भी सौभाग्य मिला. मैं जब भी पटना आया, किशन मेरे साथ रहे. किशन के स्कूटर पर बैठ कर पटना से निकल कर जेपी के आश्रम तक चला जाता था. एक जमाने में जब मैं बिहार से लोकसभा का चुनाव लड़ रहा था, किशन हमेशा मेरे साथ रहे. पिछली बार मैं पटना आया, तो उन्होंने कहा, खाना आप मेरे ही घर खायेंगे. वे बहुत बहादुर, निडर और बेधड़क थे. एक बार गोली भी उन पर चली थी. गोली से तो वह बच गये, मगर इस बार वह हार गये.

मैं ऊपरवाले का शुक्रगुजार हूं कि किशन जैसे सज्जन व्यक्ति से मेरा संबंध बना. वह पूरी तरह सजग और ईमानदार रहे. मेरे दोस्त थे, छोटे भाई का संबंध था. बिहार सरकार को किसी-न-किसी रूप में किशन को याद करना चाहिए.

(prabhat khabar ब्यूरो प्रमुख मिथिलेश से बातचीत पर आधारित)




फोटोग्राफी में उनके नाम से जाना जाता था बिहार

कन्हैया भेलारी

कृष्ण मुरारी किशन से 1976-77 में मेरी मुलाकात हुई थी. शुरुआती दिनों में वह साइकिल से चलते थे. एयरपोर्ट जाना और फिर आकर तसवीरें भेजना. गजब का साहस और धैर्य था. पत्रकारिता जगत में खासकर फोटोग्राफी में उनके नाम से बिहार जाना जाता था. हमने भी अपनी मैगजीन के लिए उनको अनुबंधित किया था. जब मैं द वीक पत्रिका से जुड़ा, तो उसके दक्षिण भारतीय प्रबंधन ने किशन का नाम लेते हुए कहा था कि यदि वह हमलोगों के साथ आ जायेंगे, तो पत्रिका अच्छी चल जायेगी. गहन बेहोशी में जाने के पहले तक वे अपने प्रोफेशन से जुड़े रहे. मेहनती थे.

तसवीर राजनीति से जुड़ी हो या अन्य दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण, किशन ने कभी कोताही नहीं बरती. हाल के दिनों में उनके पैर में खराबी आ गयी थी. इसके बावजूद उनके काम करने की गति में कहीं से आंच नहीं आयी. फोटो जर्नलिस्ट थे, मृदुभाषी थे और खास यह कि गुस्सा नहीं करते थे. एक बार वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा से मुलाकात हुई. उन्होंने कहा कि फोटो आप सिर्फ किशन से ही लेना, वही एक फोटोग्राफर हैं. उन्होंने कहा था ‘बिहार का मतलब किशन और किशन का मतलब बिहार’. बिंदेश्वरी दूबे मुख्यमंत्री थे. उनके चिकन खाने की तसवीरें हिट थीं. उनका नहीं रहना एक बड़ी रिक्तता है. एमजे अकबर जैसे वरिष्ठ पत्रकार जब भी बिहार आते, किशन उनके साथ होते थे.

प्रभात खबर से साभार

कृष्ण मुरारी किशन ने बिहार के सच को अपनी तस्वीरों में दर्ज किया


कृष्ण मुरारी किशन वैकल्पिक मीडिया और जनांदोलनों के साथी छायाकार थे

समकालीन जनमत और जन संस्कृति मंच की ओर से श्रद्धांजलि 

1987 में जनमत में छपा इंटरव्यू 
समकालीन जनमत के नए अंक की तैयारी के सिलसिले में इलाहाबाद में था। तभी सूचना मिली कि 1 फरवरी की रात में बिहार के मशहूर प्रेस फोटोग्राफर कृष्ण मुरारी किशन का दिल्ली के मेदांता हास्पीटल में निधन हो गया। पिछले दिसंबर में प्रतिरोध का सिनेमा, पटना फिल्मोत्सव में उनसे आखिरी बार मुलाकात हुई थी। उस रोज फिल्मोत्सव में ढेर सारे छोटे-छोटे बच्चे आए थे। फिल्मोत्सव में एक पेटिंग कार्यशाला भी आयोजित थी। बच्चे अभी दो कतारों में बैठकर कागज पर पेंसिल और रंग के जरिए अपनी कल्पनाओं को आकार देने की शुरुआत ही कर रहे थे, कि तभी अचानक कृष्ण मुरारी किशन नजर आए और आते ही उनका कैमरा उमंग और उत्साह से भरे नन्हें कलाकारों पर टिक गया, मानो फिल्मोत्सव का सबसे खास दृश्य वही हो। फिल्मकारों के प्रेस कांफ्रेस वगैरह से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण उनके लिए बच्चे थे। 

यूं तो हमलोग बचपन से ही अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में उनकी तस्वीरें देखते रहे। लेकिन मैंने उन्हें सबसे ज्यादा समकालीन जनमत में छपी उनकी तस्वीरों से जाना था। चाहे वे गरीब-दलित, खेत मजदूर और भूमिहीन किसानों के जनसंहारों और बिहार में उभरते एक नए किसान आंदोलन की तस्वीरें हों या मुर्गा खाते मुख्यमंत्री विंदेश्वरी दूबे की तस्वीर या बोफोर्स तोप घोटाले के खिलाफ उभरे जबर्दस्त जनांदोलन की तस्वीरें, सबकी याद आने लगी। बैक कवर पर भी कई बार उनके द्वारा ली गई ऐसी तस्वीरें छपती थीं, जिनसे आम आदमी की जीवन स्थिति और जनविरोधी तंत्र का असली चेहरा उजागर हो जाता था। 

समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने बताया कि ‘‘कृष्ण मुरारी किशन जिन अखबारों से जुड़े हुए थे, उन्होंने ‘बेलछी कांड’ से संबंधित फोटो को छापने की हिम्मत नहीं दिखाई थी। बाद में जनमत ने उन्हें छापा था। इस कारण वे कहते थे कि जनमत जनता की पत्रिका है, इसे जब भी जरूरत होगी, मैं बिना पारिश्रमिक के तस्वीरें दूंगा। और अपने इस वायदे को उन्होंने आजीवन निभाया। पटना से जब समकालीन जनमत साप्ताहिक निकलती थी, तब अक्सर उनके द्वारा खींची गई तस्वीरें उसमें छपती थीं। कई अंकों के आवरण भी उन तस्वीरों से बनाए गए थे।’’ 

एक गरीब परिवार में पले-बढ़े छायाकार कृष्ण मुरारी किशन आम आदमी की जिंदगी और उसके संघर्षों के प्रति बेहद संवेदनशील थे। सिर्फ राजधानी पटना ही नहीं, बल्कि पिछले तीस सालों में बिहार-झारखंड की लगभग तमाम चर्चित घटनाओं, जनांदोलनों, प्राकृतिक आपदाओं, पुलिसिया दमन, गरीब-मेहनतकशों के जनसंहार, सामंती जुल्म के खिलाफ सुलगते जनप्रतिरोध और आम जनजीवन के अनेक अछूते दृश्यों को उन्होंने अपने कैमरे की आंख से देखा और अपनी तस्वीरों में उन्हें दर्ज किया। अस्सी के दशक में समकालीन जनमत के संपादक मंडल के सदस्य रहे पत्रकार विष्णु राजगढि़या उन्हें जिंदगी को कैमरे की नजर से देखने वाले आम आदमी के छायाकार के बतौर ही याद करते हैं। संपादक मंडल के दूसरे सदस्य पत्रकार चंद्रभूषण ने बताया कि अपने साथी छायाकारों से वे हमेशा यह कहते थे कि सिर्फ अपनी आंख से देखकर फोटो मत खींचो, कैमरे की आंख से देखो। उन्होंने यह भी बताया कि जनमत के हर अंक की सामग्री तैयार हो जाने के बाद जिस तरह के फोटो की जरूरत होती थी, उसके बारे में उन्हें बताया जाता था और वे उसके अनुसार तस्वीरें उपलब्ध करा देते थे। 

1987 में समकालीन जनमत में छपे एक इंटरव्यू में कृष्ण मुरारी किशन ने बताया था कि 1974 में छात्रों के आंदोलन से वे जुड़े हुए थे। छात्रों के बर्बर दमन की तस्वीरें अखबारों से गायब रहती थीं। उन्हें लगा कि जो तस्वीरें उनमें छपती हैं, वे हकीकत से काफी दूर हैं। वे चाहते थे कि एक्शन तस्वीरें छपे, इसलिए उन्होंने अपने हाथों में कैमरा थामा। जयप्रकाश आंदोलन के चर्चित फोटोग्राफरों में उनकी गिनती होती थी।

जनमत के इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि डाक टिकट जमा करना उनकी हाॅबी थी। डाक टिकट बेचकर ही उन्होंने 1974 में एक साधारण कैमरा खरीदा था और 1977 तक उसी से फोटोग्राफी करते रहे। उन्होंने यह भी बताया था कि उस समय वे पैसे के लिए फोटोग्राफी नहीं करते थे, बल्कि ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च चलाते थे। उसी समय बिहार में आए बाढ़ और 1979 के जमशेदपुर दंगों की तस्वीरें उन्होंने खींची। कृष्ण मुरारी किशन का कहना था कि ‘‘वह दंगा जनता रिजिम की देन था। सरकार कह रही थी कि 10 लोग मारे गए हैं, लेकिन सच तो यह है कि कुल 300 लोग से कम नहीं मरे थे। कभी मुस्लिम के घर में और कभी हिंदू के घर रात को रुककर मैंने दंगे की तस्वीर उतारी थी।’’

1980 में कृष्ण मुरारी किशन ने पटना के दैनिक ‘आर्यावर्त’ को ज्वाइन कर लिया। फिर रविवार से जुड़े, जिसमें पत्रकार अरुण रंजन और छायाकार कृष्ण मुरारी किशन की जोड़ी बहुत चर्चित रही। दिनमान, साप्ताहिक हिंदुस्तान, इंडिया टुडे, संडे मेल, चौथी दुनिया आदि देश के तमाम पत्र-पत्रिकाओं, समाचार एजेंसियों और बीबीसी और रायटर समेत कई अंतर्राष्ट्रीय प्रसारण संस्थाओं में भी उनकी तस्वीरों को जगह मिली। कई पुरस्कार और सम्मान भी मिले। सत्ता, राजनीति और नौकरशाही की दुनिया में सब उन्हें जानते थे, लेकिन इस जान-पहचान और संपर्क से उत्पन्न किसी विशिष्टता का गुमान उन्हें कभी नहीं रहा। देश-दुनिया में काफी मकबूलियत के बावजूद वे उतने ही सहज और आम जन के उतने ही करीब थे, जैसा फोटोग्राफी की शुरुआती दिनों में थे। कंधे पर झोला और टूटही साइकिल से उनके छायाकार के सफर की शुरुआत हुई थी, जो स्कूटर से होते हुए एक पुरानी कार तक पहुंची। कार की जरूरत भी उन्हें तब पड़ी जब उनके पैरों में तकलीफ रहने लगी थी।

मैं तो हकीकत को सामने भर लाना चाहता हूँ
कृष्ण मुरारी किशन जोखिम से कभी नहीं डरे। 1980 में तो पटना हाईकोर्ट में सीआरपी वालों ने उन्हें सिर्फ इसलिए घसीट-घसीटकर मारा कि वे सच्चाई को सामने लाना चाहते थे। बिहार में सांमती शक्तियों और पुलिस द्वारा दलितों और खेत मजदूरों की उत्पीड़न की अनेक घटनाओं और उनके संगठित होते आंदोलन को उन्होंने कवर किया। कोई इसके लिए उनकी तारीफ करता तो बहुत ही सहज अंदाज में हंसते हुए वे कहते थे- ‘मैं तो हकीकत को सामने भर लाना चाहता हूं।’ हकीकत को सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध कृष्ण मुरारी किशन पर लगभग डेढ़ दशक पहले मुजफ्फरपुर से रात में पटना लौटते वक्त हमला हुआ था और उन्हें गोली मार दी गई थी। उस वक्त भी उन्हें इलाज के लिए दिल्ली भेजा गया था और तब उन्होंने जिंदगी की जंग जीत ली थी। लेकिन इस बार वे हम सबसे हमेशा के लिए जुदा हो गए। 

कृष्ण मुरारी किशन ने बी. काॅम तक पढ़ाई की थी। लेकिन उन्होंने कैमरे के जरिए बिहार के जिस सच को तस्वीरों में दर्ज किया, वह आने वाले समय में न केवल फोटोग्राफी, बल्कि जन माध्यमों, जन संस्कृति और जनराजनैतिक आंदोलनों से जुड़े तमाम लोगों के लिए एक नजीर रहेगा, वह बेमिसाल काम आने वाली पीढि़यों के लिए भी एक प्रेरणा बना रहेगा। वे चाहते थे कि प्रेस फोटोग्राफर प्रेस कांफ्रेस में ही सारा समय न व्यतीत करें, वे गांवों में जाएं। उन्होंने बिहार के गांवों में पल रहे दर्द और आम आदमी की जिंदगी की जिजीविषा को अपनी तस्वीरों में जगह दी। गांवों से शहर आकर मेहनत-मजदूरी करने वाले लोगों की जिंदगी तक भी उनके कैमरे की निगाह पहुंची। 

हमारे लिए वे समकालीन जनमत के अनन्य सहयोगी तो थे ही, जन सांस्कृतिक आंदोलन के भी एक अनिवार्य अंग थे। जन संस्कृति मंच और हिरावल समेत पटना के अधिकांश साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों के आयोजनों मेें वे अपने कैमरे के साथ मौजूद रहते थे और उसे पूरी दिलचस्पी से कवर करते थे। सांवले चेहरे पर सजी उनकी सौम्य मुस्कुराहट और सबके साथ बहुत अपनापे से उनका पेश आना हमेशा याद आएगा। वैकल्पिक मीडिया और जनसांस्कृतिक-जनराजनीतिक आंदोलनों ने सचमुच आज अपने एक सच्चे हमदर्द और साथी को खो दिया है। उनके परिजनों के शोक में हम सब शामिल हैं। समकालीन जनमत और जन संस्कृति मंच की ओर से उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि!