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Thursday, February 19, 2015

दुश्मन (कहानी) : मधुकर सिंह


दुश्मन 
                                            मधुकर सिंह

पुलिया पर जवानों के अलावे बूढ़े भी थे और सूअर के छौने जैसे दर्जनों बच्चे। बाड़े के भीतर से सूअरों का रिरियाना शोरगुल को अंदर-अंदर चीरता हुआ आकाश में ऊपर निकल जाता था। खुशी के मारे औरतें बीता-भर जमीन के भीतर खुरपी धंसाकर हांफती हैं और भूख को पेट के भीतर दबाए जा रही हैं। भीखम ने लड़कों को डपटकर कहा, ‘जा, भाग जा यहां से। जगेसर मोटर में आएगा। कुचलकर साले चींटी की तरह मर जाओगे।’

लड़के तालियां पीटकर खूब हंसते हैं। मगर सबको भीखम की सुर्ख आंखों से बड़ा डर लगता है। वे खुशियां कुचलते हुए पुलिया के नीचे उतर जाते हैं। 

‘अगवानी कौन करेगा?’ कोई युवक पूछता है।

‘मैं करूंगा, और कौन?’

भीखम ने मुस्कुराकर सुर्ख आंखें छिपा ली हैं। टोले के लोग भीखम को तब समझेंगे जब देखेंगे कि वह भी जगेसर की मोटर में आ रहा है। मगर माथा ठनका। परसों-चौथे रोज बी.डी.ओ. ने पर्चे की बात चलाई थी और तकरीबन सबसे दरखास्त मांग ले गया है। ठाकुर का साला कल रात कुछ लठैतों के साथ धमकी दे गया, अगर बासगीत जमीन की फिर से बात चली तो खून की धारा चलेगी। किसने कहा यह जमीन गैरमजरुआ मालिक है, हमने सालों के पुरखों को बसाया था, जब चाहेंगे निकाल देंगे।

‘क्या सचमुच ठाकुर का साला हमारी बहुओं की छाती काटेगा?’ भीखम ने हवा में सवाल को फेंक दिया है। 

‘संयोग समझो कि उसी जमीन पर जगेसर का भी नया मकान बन रहा है। यही तो देखना है कि जगेसर अपने को अलग कैसे कर लेता है।’

‘घटना टाली नहीं जा सकती न?’

‘जगेसर साथ दे दे, हम लाठी-बर्छे के साथ तैयार हैं। फिर ताकत की बात रह जाएगी कि कौन किसकी छाती काट लेता है।’

भीखम का निश्चय पहले हवा में घुल रहा है। धूप फैलते जगेसर गांव पहुंचेगा। मगर धूप काफी ऊपर छलांग मार चुकी है। जगेसर की गाड़ी का कहीं पता नहीं है। मिनिस्टर होने की वजह से ही तो देर नहीं कर रहा है। 

‘जगेसर होगा, औरत होगी, लौंडे होंगे- और...?...और...?’

‘दो-चार चपरासी। क्या बी.डी.ओ को कभी नहीं देखा?’

‘बी.डी.ओ तो नंबरी है। यह भी तो ठाकुर और मुखिया के ही जमात का है।’

‘आएगा, जगेसर का नाम सुनेगा तो आएगा- उसका बाप आएगा।’

इस टोल में कैसे कोई संभव है। थाना, पुलिस, गांव, शहर, पंचायत, सरकार और जगेसर- सब तो एक ही शैतान का नाम है। 

‘जगेसर जब से राजनीति में गया, एक भी चिट्ठी नहीं दी।’ 

‘सबको चिट्ठी लिखना संभव कैसे है? यहां बी.डी.ओ से पता नहीं चलता कि कितना काम रहता है? जीप की हालत खराब रहती है।’

‘मगर जगेसर इतना तो कर सकता है कि तुम्हारी चिट्ठी में सबको याद कर ले। ऐसा वह क्यों नहीं करता?’ रह-रहकर लोगों में गुस्सा उठता है। मगर यह गुस्सा किस पर है? जगेसर तो अपना है, अपना हिस्सा- अभिन्न और खून।

‘खुशबूदार गंध आ रही है।’ लड़के चहकते हैं। 

‘साले भूखड़ कहीं के!’ भीखम उन्हें डांटता है।’ भीखम उन्हें डांटता है। 

‘दो सूअर और एक मन भात जगेसर काका अकेले खाएगा?’

‘नहीं तो क्या तेरा बाप खाएगा?’

लड़कों की आंखें फट जाती हैं, बाप रे! जगेसर काका मिनिस्टर है कि राकस। वे लोग इतना खा जाते हैं? इसी तरह के बीस-पच्चीस मिनिस्टर हो गए तो गांव-जवार के सब सूअर और भात खाएंगे। 

‘सारे गांव को वे लोग हजम कर जाएंगे तो हम रहेंगे कहां?’ एक युवक बहुत सोच-विचार के बाद पूछता है।

‘रहना जगेसर के ठेंगा पर।’

कोई वयस्क लड़कांे को डांटता है, ‘अब हटो यहां से। हंसी-मजाक का समय नहीं। हमलोग कुछ गंभीर बात कर रहे हैं।’

लड़के गदगद होकर उधर खेत में उतर जाते हैं और मछली की तरह भूख से छटपटाने लगते हैं- जगेसर काका की प्रतीक्षा सही नहीं जा रही है। 

उससे एक बात जरूर पूछनी है- ‘आदमी सरकार होने के बाद आदमी क्यों नहीं रह जाता?’

‘खान-पान बदलने से खून बदल जाता है।’

‘तुम लोगों ने कुछ सुना है? ठाकुर हमारे सर्वनाश के लिए किसान-सम्मेलन और जुलूस-प्रदर्शन कराएगा। दो सौ रुपये आदमी बिक रहा है।’

‘हमें धरती और दुनिया से बेदखल करेगा?’

‘नहीं, खाली गोली से मार देंगे।’

‘जगेसर से कौल लेना है कि हमारा साथ देगा या नहीं?’

सारी तैयारी खत्म हो चुकी है। इंतजामकर्ता भीखम से पूछने के लिए दौड़ा आ रहा है। उनके पास अब कोई काम नहीं है। उन्हें अब क्या करना चाहिए? जगेसर बाबू नहीं आएगा क्या? वह सबको सब्र और धीरज देकर लौटता है, ‘जगेसर बाबू जरूर आएगा। तुम सब जाते क्यों नहीं? पुलिया पर मैं अकेला रहूंगा।’

‘यहीं हमलोग उसे मोटर से उतार लेंगे और कंधे पर गांव ले चलेंगे। अधिकांश लोगों की ऐसी इच्छा है।’

‘पुलिया से गांव तक जो सड़क हमने जगेसर बाबू के लिए बनाई है अपना जगेसर उसी सड़क से आएगा। देखना है, बी.डी.ओ. रास्ता नहीं होने का कैसे बहाना करता है और पर्चे ठाकुर के दरवाजे पर बुलाकर देता है?’

‘जगेसर कंधे पर होता तो बड़ा मजा आता।’ कोई बूढ़ा बोलता है। 

‘धत्’ भीखम चिल्लाता है, ‘जिंदगी-भर करमहीन रहोगे। हमने जो सड़क बनवाई है आखिर उस पर चलेगा! ठाकुर सारी दुनिया को अंधकार में रखता है कि हमारे जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है। बासगीत जमीन के लिए दरखास्त नहीं लिए जाएंगे! जगेसर को इस रास्ते से जाना ही होगा।’

‘जगेसर हमारे साथ खाएगा न!’

‘उसका बाप खाएगा। सरकार की तरह नहीं, आदमी की तरह खाएगा।’ भीखम पुलिया पर अकेला नहीं हो पाता है। अकेले में बहुत तरह की बातें दिमाग को सताती हैं। जगेसर को भी हमारे खिलाफ नफरत तो नहीं है! यहां आता तो देखता जगेसर कि लोग उसके नाम पर कितना जिंदा और ताजा हैं। सब काम-धंधा छोड़ आए हैं। औरतें व्रतमुद्रा में बैठी हैं। मगर अब सब कुछ बेमजा हो रहा है। उसने जेब से कागज और कलम काढ़ी है और दो-चार सवाल जगेसर के लिए नोट करता जा रहा है। उसे जवाब देना पड़ेगा, वरना वह भी हमारा दुश्मन है। एक सवाल बराबर उसे चोट मारता है, अगर ठाकुर जगेसर को बेदखल नहीं कर सकता तो और लोगों को कैसे कर सकता है! भीखम बेचैनी में पुलिया से नीचे उतरता है और पानी के ऊपर ईंट के टुकड़े उठाकर फेंकता जा रहा है। मगर वह किसको मारता है! दो-चार मछलियां नजर आती हैं। भीखम को हंसी आती, लोगों के साथ मछलियां ही पकड़ी जातीं। क्या किया जाए? जगेसर को अगर ऐसी व्यस्तता थी तो खबर भेज देनी चाहिए थी। वह तो शहर में जाकर जगेसर से निपट सकता है, मगर इनका क्या होगा! 

लोगों का दूसरा झुंड फिर चला आ रहा है। उसे संदेह होता है, कहीं जगेसर किसी दूसरे रास्ते से तो नहीं पहुंच गया। वह रास्ता कहां है! 

‘फिर क्यों चले आए तुम लोग?’ वह भूख और गुस्से से तिलमिला रहा है। 

‘तुम पहले चलकर खा लो, भूख लगी होगी।’

‘सब लोग मिलकर खाएंगे।’

भीखम नदी से पानी पीकर उनके पास जाता है और एक की गर्दन को पंजे से रगड़ते हुए कहता है, ‘तुम सब वहीं क्यों नहीं रहते! जगेसर के साथ मैं चला जाऊंगा। ऐसा क्यों नहीं सोचते कि वह सरकार है?’

लोगों का थका हुआ झुंड फिर लौटता है।

भीखम को गुस्सा बहुत चढ़ता है और खत्म भी हो जाता है। इंतजार इतना तनता जा रहा है कि वह गालियां बकता है। उसकी गाड़ी तो आ ले, छूटते ही पहला सवाल करता, ‘अच्छा जगेसर यह तो बताओ, बी.डी.ओ भी तुम्हारे साथ आएगा?’

‘आना पड़ेगा’, जगेसर जवाब देता।

‘हमारे न्योता पर बी.डी.ओ आता क्यों नहीं?’

‘वह शाकाहारी होगा।’

‘बहुत ठीक। जगेसर भाई बहुत ठीक। तुम तो हमारे घर के आदमी हो, अपने सवांग हो। तुम्हारा इंतजार हमें क्यों है?’

भीखम के सवाल के जवाब में भीखम के मुंह से ही आवाज निकलती है, ‘वह साला क्या बताएगा, वह तो बी.डी.ओ का चचा निकल गया। तरह-तरह की बातें बताएगा। क्या कहेगा, सो सबको जानकारी है।’ ‘अच्छा एक बात और। ठाकुर की ड्योढ़ी में हजारों मन गेहूं क्यों है!’ इतना बड़ा मजाक शायद जगेसर नहीं सह सके। मजाक सहने के पहले ही वह मिनिस्टर बन गया है। गांव के लोगों जैसा मजाक सहना पड़े तो बैलून की तरह फट जाए।

कड़ी धूप की हवा उसे जला रही है। दूर से आती हुई बैलगाडि़यों से यही लगता कि धूल उठाती जगेसर की मोटर आ रही है। वह बीड़ी में मन को लगाता है। उसने जगेसर को बढि़या सिगरेट पीते हुए देखा है। खुशबू से तबीयत भर जाती है। बहुत आग्रह के बाद भी भीखम उसका सिगरेट नहीं छूता। बराबर उसकी कोठी पर जाता-आता रहता है। पी.ए. ती.ए. सब उसे पहचानते हैं। बाभन पी.ए. है- लंबी चुटिया और तिलक वाला। बहुत लोग तो उसे जगेसर का भाई समझ लेते हैं। गांव चलने के लिए पूछने पर कहता है, चलता- मगर लड़के वहां बिगड़ जाएंगे। वहां कोई सुसायटी नहीं है। आ तो जाए, खूब मजा आएगा।

उसने देखा कि लोग फिर इकट्ठा हो रहे हैं, मगर यहां नहीं, वहां सड़क पर जिसे उन्होंने जगेसर के लिए बनाई थी। वे लोग जगेसर को कंधे पर उठाने की बात को फिर से तो नहीं सोच रहे हैं? एकदम गलत बात है। आखिर वे बेवकूफ उसे भगवान बनाने पर क्यों तुले हुए हैं? अगर भगवान बन गया तो फिर कभी हाथ नहीं आ सकता। अब तक यही होता रहा है। 

उसका माथा सोचने से उड़ने लगता है, जैसे माथा, माथा नहीं- चूल्हे का तवा हो। लोग जगेसर के लिए नारे लगा रहे हैं। क्रोध चढ़ने लगता है- सालों को एक-एक कर बताऊंगा। उन्हें मना किया है कि जगेसर नारों से बहक जाएगा। फिर तो उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा। लोग वहीं काम कर रहे हैं जिसमें कि जगेसर उसका नहीं रहे। वह चिल्लाता जा रहा है, मगर शोरगुल और नारों के बीच कोई नहीं सुनता। वह झोंक से दौड़ जाता है। 

‘बंद करो नारे।’ उसके काले चेहरे के भीतर गुस्सा सिकुड़ा हुआ है। 

‘जगेसर हमारा नेता है।’

‘मगर नारा और फूलमालाओं के लिए तो मना किया था न? मेरी बात क्यों नहीं समझे।’

वह देखता है कि बहुत पीछे आकाश में धूल उठ रही है और लोग अपनी खुशी को संभाल नहीं पा रहे हैं। भीखम के क्रोध के भीतर से अचानक मुस्कुराहट फूट जाती है। वह उन्हें समझाता है- दोनों तरफ कतार बांधकर खड़े हो जाओ। जगेसर खुद गाड़ी रोक देगा। मगर वे उसकी समझ और काबू के बाहर थे। धूल देह से लिपट गई है और मोटर उसमें डूब गई है। भीखम उसे रोकने के लिए बीच में खड़ा हो जाता है। वे धूल में ताकने की कोशिश करते हैं। लड़कों की आंखें भर गई हैं और वे बहुत दूर भाग रहे हैं। और लोग खेतों में उतर जाते हैं। कोशिश करता है, मोटर के लोग उसे पहचान लें। मगर बीच में धूल काफी मोटी हो गई है। वह जोर से आवाज लगाता है। एक हाथ मुर्दों की तरह बाहर लटकता दिखलाई पड़ता है और मोटर चलती जाती है। वह उनसे आग्रह करता है, ‘सब लोग मिलकर चलो। सारा प्रोग्राम एक साथ करेंगे।’ मगर सुनता कौन है? सब-के-सब भाग रहे हैं। वे मोटर से भी आगे भागना चाहते हैं- आपस में विचित्र किस्म की होड़ है। 

भीखम का सब किया-किराया बंटाधार हो गया। वह गालियां बकता हुआ एकदम मंथर चलने लगता है, ‘जा ससुरा सबके लिए जगेसर शहर से ठेंगा ले आया है। आफत पड़ने पर हमारे पास आए तो बांस कर दूंगा?’

जगेसर अच्छी तरह जान गया है कि सबसे अलग-अलग बात की जाती है। लोग सामूहिक बात पसंद नहीं करते हैं। उन्हें बराबर एहसास रहता है कि हमें कितना पूछ रहा है। उसके भीतर का जगेसर बड़ी कुटिलता से उन्हें भांप गया है। इसीलिए जगेसर की कुटिलता जगेसर से पूछती है, ‘कब चलोगे यहां से?’

‘सूरज के अस्त होने के पहले।’

‘गांव के सुख-दुख में फंस तो नहीं जाओगे?’

‘बिल्कुल नहीं, तुम्हारी कसम।’

‘इनके कितने सवालों का जवाब दोगे?’

‘बेचारे कितने भोले हैं।’

‘भोले नहीं, उल्लू हैं।’

‘यहां गाली मत बको, उधर खूब मजाक उड़ाना।’

उसके पीछे किसी ने कुर्सी लाकर रख दी है और जगेसर उस पर बैठ गया है। धीरे-धीरे सभी जगह पर बैठते जा रहे हैं। उन्होंने देखा कि जगेसर पहाड़ की नोंक पर बैठा है और वे दूर तक घाटियों में फैलते जा रहे हैं। कौन गांव की बात शुरू करे, भीखम तो अभी तक आया नहीं है। जगेसर उन लोगों से क्या बात कर सकता है? लोग उस चुप्पी को तोड़ने के लिए पीछे घूमकर देखते हैं कि औरतें-लड़कियां किस प्रकार बेपर्द होकर जगेसर को घूर रही हैं। या, फिर लड़कों को आंख दिखा रहे हैं कि शोरगुल हुआ तो उठाकर फेंक देंगे। 

‘कहो भरोसा भाई, अच्छे हो?’ जगेसर सन्नाटा तोड़ता है। 

‘अच्छा हूं, भइया।’ हालांकि भरोसा से जगेसर तीन साल छोटा है। 

‘और क्या नाम है तुम्हारा...?’

‘दुखित।’

‘दुखित, तुम कोई नौकरी चाहते हो?’ वह कुटिलता से विचार करता है, थोड़ी देर में यही कहेगा कि नौकरी दिला दो। 

‘पूरे टोल पर आफत है।’

‘और, तुम मानिक दादा...?’

‘परमात्मा से यही प्रार्थना है कि दुनिया में सबसे गरीब और छोटा नाम हटा दो।’

‘सोमारू ठीक से रहता है?’

‘उसकी जवानी में घुन लग गई है।’

वह वक्र होकर बूढ़े को ताक रहा था।

भीखम आया तो आश्चर्य से उसकी आंखें फट गईं। जगेसर के साथ ये लोग कैसे आए हैं। तो क्या इसीलिए उसने गाड़ी नहीं रोकी, उसके साथ ठाकुर और बी.डी.ओ बैठे थे? चलो अच्छा हुआ, ठाकुर और बी.डी.ओ. की कंठी टूट तो गई- (वे लोग इस टोल में आ गए)। फिर भी वह जगेसर को देखकर हंसा। कोई कुर्सी खाली नहीं थी। जगेसर, ठाकुर और बी.डी.ओ बैठे थे। तब भीखम कहां बैठे? वह कुर्सी पकड़कर जगेसर के पीछे खड़ा हो गया। वह इंतजार करने लगा कि जगेसर उससे कुछ कहे। परेशानी तो सबके लिए एक ही है जो काल बनकर यहां तक पहुंच गई है। 

‘तुम भी बैठते क्यों नहीं? पीछे काहे खड़े हो?’ बी.डी.ओ. ने उसे टोका। 

‘हां भीखम, कहीं बैठ क्यों नहीं जाते?’

भीखम ने आंखें तरेरकर जगेसर को देखा। क्या जगेसर कुर्सी छोड़कर नीचे नहीं बैठ सकता था? या, फिर तीनों जमीन पर बैठते, सब लोग बैठे रहे हैं। इनके मकान में कुर्सियों की क्या कमी है?

ससुरे लोग कितने उल्लू हैं। किसी ने प्रतिकार तक नहीं किया। सबकी छाती पर माधो ठाकुर फिर यहां आ गया है। जैसे ठाकुर बाभन हो गया है। वह भी जमीन पर नहीं बैठ सकता।

‘बैठ न, भीखम।’ जैसे जगेसर ने उसे अपनी आवाज से पकड़कर नीचे दबा दिया हो। उसी के पैर के नीचे धम-से बैठ गया। 

‘और बोलो, कैसा कट रहा है?’

‘हम लोग तो भारी आफत में पड़ गए हैं।’

‘वहां भी सरकार आफत में ही चल रही है।’

जगेसर ने देखा कि सब अपने-अपने घर से लोटा लाकर गोलाकार बैठ गए हैं। उसे हंसी आती है। बाप रे! ये लोग कितने भुक्खड़ हैं! भरसक लोग इनसे घृणा नहीं करते। 

मगर वे काफी भूखे थे। जगेसर के लिए और भीखम के लिए जगह छोड़कर सभी बैठे थे। वे पत्तल में भात को जगेसर बुझकर बहुत सहमे हुए थे। भीखम बोला, ‘लोगों ने शौक से तुम्हारे लिए मांस-भात पकाया है। सब लोग और बच्चे भी तुम्हारे लिए व्रत रह गए हैं। वे पत्तल पर कब से तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।’

‘मेरा खाना तो ठाकुर जी के यहां बना है।’ वह सहज भाव से कह गया। लेकिन लोग सकते में आ गए। 

‘तब इनके व्रत का खाना क्या होगा?’

‘और मिनिस्टर होने के बाद मैंने मांस भी छोेड़ दिया है।’ उसने तीन गज लंबा जनेऊ कमीज के भीतर से निकालकर लोगों को हैरत में डाल दिया। 

‘क्या तुम सचमुच हरिजन नहीं रहे?’

भीखम गज-भर जमीन ताकने लगा, जो अपनी होती और फट जाती। ससुर जगेसर राम की गर्दन पकड़कर उसी में समा जाता, मगर ऐसी धरती कहां है? कौन है धरती जो भीखम को और टोले को अपमान से बचाने के लिए फटेगी? सभी जगह तो इसका- उसका पंजा है। सब खूंखार और शैतान है। उसने चिल्लाकर कहा, भाई रे! अपना मिनिस्टर बाबू भी बड़ा आदमी हो गया है- माधो ठाकुर। इसके जय-जयकार से आकाश को चीर दो। ऐसा जोर लगाओ कि तुम्हारे पैर की धरती फटकर बेेकाम हो जाए, जहां जगेसर को दुबारा नहीं आना पड़े।

जगेसर माधो ठाकुर के दरवाजे की ओर जा चुका था। उन्होंने जगेसर को जिंदा रखने के लिए जोर से नारे लगाए। उन्हें जोरों से यही चिंता सताए जा रही थी, जगेसर अपना नहीं रह गया है। धत्तेरे की! आदमी भी जमीन की तरह पराया हो सकता है!

लोगों के पास अभी तक ख्वाहिश जिंदा थी कि वे उसकी मोटर के पीछे-पीछे बहुत दूर तक जाते। मगर उन्हें भूख बेबस कर चुकी थी। भीखम ने उन्हें ललकारा, ‘दुश्मन के लिए हमें इतना मोह क्यों है? जो दुश्मन होगा वही हमारे साथ खाना नहीं खाएगा।’ 



Saturday, June 22, 2013

अंधेरे दौर में जनविमर्श : सुधीर सुमन




अनंत कुमार सिंह, अच्युतानंद मिश्र और कुमार मुकुल की किताबों पर  एक निगाह 


एक ऐसे दौर में जब अखबारों के संपादक प्रगतिशील जनवादी आकांक्षाओं वाले साहित्य को छापने के बजाए उसका उपहास उड़ाने को अहमियत दे रहे हों और पूरी नई पीढ़ी के भीतर सर्वनकार और आत्मश्लाघा की प्रवृत्ति को खूब प्रोत्साहित किया जा रहा हो, तब उन साहित्यकारों की आकांक्षाओं की थाह लेना ज्यादा सार्थक प्रतीत होता है, जो साहित्य को आज भी बदलाव का माध्यम समझते हैं और जो विचारधारात्मक मूल्यों की पहचान, उन मूल्यों को बचाए रखने की चिंता और नए जनपक्षधर मूल्यों की तलाश को ज्यादा अहमियत देते हैं। 

हाल में मुझे तीन पुस्तकें मिलीं। पहला कहानी संग्रह है कथाकार अनंत कुमार सिंह का- ब्रेकिंग न्यूज। शीर्षक कहानी खुद ही एक ऐसे साहित्यकार के बारे में है जिसकी एक इलेक्ट्रानिक चैनल का एक्सीक्यूटिव प्रोड्यूसर बनने के बाद साहित्य की दुनिया में भी पूछ बढ़ जाती है, पर वह अपनी सामाजिक नैतिकता खो देता है। औरतें सिर्फ उसके लिए उपभोग हैं और मीडिया महज मालिक के कारोबार का माध्यम। अपने पारिवारिक सामाजिक रिश्तों से भी वह पूरी तरह कट जाता है। 

शिक्षा (लपटें), खेती (मुआर नहीं), कृषि संस्कृति (भुच्चड़), शहरी मेहनतकशों की जिंदगी (पहियों पर पहाड़, वाह रे! आह रे! चैधरी मुरारचंद्र शास्त्री) के प्रति लेखक गहरे तौर पर संवेदित है। ये अपने ही अहं और कुंठा में डूबे आत्मकेंद्रित मध्यवर्गीय व्यक्ति की कहानियां नहीं हैं। और ऐसा नहीं है कि पुराने समाज के प्रति कोई अंधमोह है इनमें, वहां के शोषण और उत्पीड़न की स्मृतियां, खासकर अपने हक अधिकार से वंचित लोगों और अपने प्रेम से वंचित स्त्रियों (बसंती बुआ, मुखड़ा-दुखड़ा-टुकड़ा!) की बहुत मार्मिक स्मृतियां हैं, जो पाठक की चेतना को लोकतांत्रिक बनाती हैं। शहर और गांव और संगठित और असंगठित श्रमिकों को एकताबद्ध करने का स्वप्न (रात जहां मिलती है) भी इनमें है। कहानी संग्रह का समर्पण भी गौर करने लायक है- इस धरती को जहां रहता हूं मैं अपने शब्दों के साथ।

अपनी धरती और धरतीपुत्रों से जुड़कर उनकी व्यथाओं को कविता में लाने की ऐसी ही चिंता अच्युतानंद मिश्र के पहले कविता संग्र्रह ‘आंख में तिनका’ की कविताओं में दिखाई देती है। इसमें बदलते हुए खतरनाक समय की पूरी पहचान है और अपनी भूमिका की तलाश भी। संग्रह की पहली ही कविता है- मैं इसलिए लिख रहा हूं/ कि मेरे हाथ तुम्हारे हाथ से जुड़कर/ उन हाथों को रोकें/ जो इन्हें काटना चाहते हैं।

अच्युतानंद की कविताओं को पढ़ते हुए प्रगतिशील क्रांतिकारी काव्य धारा की मुहावरा सी बन गई कई पंक्तियों की याद आती है, पर यह नकल नहीं, बल्कि उस काव्य पंरपरा का जबर्दस्त प्रभाव है। जो चीज इन कविताओं को उन कविताओं से अलगाती है, वह है इनमें मौजूद अपने समय के संकट की शिनाख्त। एक कविता का शीर्षक ही है- इस बेहद संकरे समय में। समय जो है वह मनोनुकूल नहीं है, चीजें सारी बेतरतीब हैं, जिनके बीच एक सलीके की तलाश है कवि को, सड़कें बहुत तंग हैं, पर कवि का मानना है कि ‘बड़े सपने तंग सड़कों/पर ही देखे जाते हैं।’ जाहिर है समय के संकटों का अहसास तो है पर वैचारिक पस्ती नहीं है, क्योंकि संकरे समय में रास्ते की तलाश भी है। 

बेशक, वर्तमान से कवि संतुष्ट नहीं है, पर आस्थाहीनता की आंधी में वह बहने को तैयार नहीं है, उसे पूरा भरोसा है कि मेहनतकश हाथों से ही ‘दुनिया का नक्शा’ बदलेगा। इन कविताओं में शहर हैं, जो बस्तियों की छाती पर पैर रख जवान हुए हैं, देश है, जिसमें बच्चे भूखे ठिठुर रहे हैं, ‘किसान’ धीरे-धीरे नष्ट किए जा रहे हैं, नौजवान मरने को अभिशप्त हैं, औरतें उदास, उत्पीडि़त और पराधीन हैं, बच्चे उपेक्षित हैं। लेकिन शासकवर्ग देश ही नहीं, पूरी पृथ्वी की ही रक्षा का नाटक करता है। लेकिन त्रासदी यह है कि इस नाटक के बीच ‘डूबते किसान को कुछ भी नहीं पता/ डूबती हुई पृथ्वी के बारे में’ (आखिर कब तक बची रहेगी पृथ्वी)। 

‘एकालाप’ महज किसी लंबी कविता का शीर्षक ही नहीं है, बल्कि हर कविता मानो खुद से भी जिरह है। यही अगर इस संग्रह का शीर्षक भी होता, तो शायद ज्यादा उचित होता। यह एक ऐसी कविता है जिसमें कवि की वैचारिक बेचैनियों के कई स्तर नजर आते हैं और साथ ही एक जनधर्मी काव्य मुहावरा विकसित करने की जद्दोजहद भी- ‘सुरक्षित था जीवन/ आरक्षित था मन/ केंद्रित था पतन/ और ठगा जा रहा था वतन।’ 

संग्रह के फ्लैप पर आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने सही ही लिखा है कि अच्युतानंद पर्यवेक्षक कवि नहीं, अतटस्थ रचनाकार हैं। 

पर्यवेक्षण और परिवर्तन की चाहत का ऐसा ही द्वंद्व कुमार मुकुल की आलोचनात्मक लेखों के संग्रह ‘अंधेरे में कविता के रंग’ में दिखाई देता है। कवि से कर्ता होने का उनका आग्रह रहता है। वे श्रम की कीमत बताने तक कवि की भूमिका नहीं मानते, बल्कि श्रम की लूट को नष्ट करने का तरीका बताने का भी आग्रह करते हैं। राजनीतिक कविताआंे की जरूरत, अनिर्णयों का अरण्य बनती हिंदी कविता, अंधेरे में की पुनर्रचना जैसे लेख हिंदी कवियों से निर्णायक भूमिका की अपेक्षा रखते हैं। आलोचक का जो वैचारिक आग्रह कवि से है, वही समाज से भी है, इसलिए भी कि कविता को समाज से अलग करके वह कहीं नहीं देखता। इसलिए कविता में आलोचक को स्त्रीविरोधी कोई स्वर भूले से भी मंजूर नहीं है। रघुवीर सहाय और धूमिल से इसी कसौटी पर कुमार मुकुल अपनी असहमति जाहिर करते हैं। सविता सिंह, अनामिका, निर्मला पुतुल आदि कवियत्रियों की कविताओं के मूल्यांकन के दौरान स्त्रियों के प्रति उनकी संवदेनशीलता और उनकी मुक्ति के प्रति अटूट पक्षधरता दिखाई पड़ती है। अंधविश्वास, अवैज्ञानिकता, तथ्यहीनता और तर्कहीनता आदि के वे मुखर विरोधी हैं और इस आधार पर अपने प्रिय कवियों की पंक्तियों की भी आलोचना करने से नहीं चूकते। किसी आलोचक द्वारा अपने पसंद-नापसंद को भी निरंतर जांचना और अपनी आलोचनात्मक समझ को दुरुस्त करते रहना सकारात्मक प्रवृत्ति है, जो आजकल के कम आलोचकों में दिखाई पड़ती है। फिर दूसरों की समझ और राय को भी महत्व देने और अपने आलोचनात्मक विवेक के निर्माण में उसे भी जगह देने की जो आदत है, वह भी उनकी आलोचना पद्धति की खासियत है। वे प्रगतिशील जनवादी शब्दावलियों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम करते हैं, पर उनकी आलोचना में निहित जो वैचारिक आकांक्षा है, वह निःसंदेह प्रगतिशील-जनवादी है, आधुनिक है। उनके आलोचक ने विचारों और सपनों में यकीन नहीं खोया है। 

कुमार मुकुल की आलोचना बहस के लिए उकसाती है। खासकर दो या कभी कभी तीन कवियों को आमने सामने रखकर तुलना करते हुए जो निर्णय वे सुनाते हैं, उसमें अच्छी कविता और बुरी कविता का जो वर्गीकरण होता है, उस वर्गीकरण से बहसें रह सकती हैं। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि उनकी आलोचना पाठक को हिंदी कविता के व्यापक संसार से परिचित कराती जाती है। जिन कवियों और कविताओं को कुमार मुकुल परशुरामी मुद्रा में ध्वस्त करते हैं, उनके प्रति भी एक जिज्ञासा पनपती है कि जरा उस कविता को देखा जाए एक बार, जिससे मुकुल इतना क्षुब्ध हैं। कुल मिलाकर ‘अंधेरे में कविता के रंग’ की आलोचना पाठक को हिंदी कविता और अपने समय के जरूरी सवालों और बहसों से जुड़ने को उकसाती है, यही इस किताब की खासियत है।




ब्रेकिंग न्यूज (कहानी संग्रह)

अनंत कुमार सिंह

भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली

मूल्य: 120 रुपये

आंख में तिनका (कविता संग्रह)

अच्युतानंद मिश्र

यश पब्लिकेशंस, दिल्ली

मूल्य: 150 रुपये

अंधेरे में कविता के रंग (आलोचना)

कुमार मुकुल

नई किताब, दिल्ली-92

295 रुपये
                                        (समकालीन जनमत जून २०१३ से साभार)