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Thursday, September 21, 2017

न्‍यायदंड : कुमार मुकुल

हम हमेशा शहरों में रहे
और गांवों की बावत सोचा किया
कभी मौका निकाल
गांव गए छुटि्टयों में
तो हमारी सोच को विस्तार मिला
पर मजबूरियां बराबर
हमें शहरों से बांधे रहीं



ये शहर थे
जो गांवों से बेजार थे
गांव बाजार
जिसके सीवानों पर
आ-आकर दम तोड़ देता था
जहां नदियां थीं
जो नदी घाटी परियोजनाओं में
बंधने से
बराबर इंकार करती थीं
वहां पहाड़ थे
जो नक्सलवादियों के पनाहगाह थे



गांव
जहां देश (देशज) शब्द का
जन्म हुआ था
जहां के लोग
यूं तो भोले थे
पर बाज-बखत
भालों में तब्दील हो जाते थे
गांव, जहां केन्द्रीय राजनीति की
गर्भनाल जुड़ी थी
जो थोड़ा लिखकर
ज्यादा समझने की मांग-करते थे



पर शहर था
कि इस तरह सोचने पर
हमेशा उसे एतराज रहा
कि ऐसे उसका तिलस्म टूटता था
वहां ऊचाइयां थीं
चकाचौंध थी
भागम-भाग थी
पर टिकना नहीं था कहीं
टिककर सोचना नहीं था
स्वावलंबन नहीं था वहां
हां, स्वतन्त्रता थी
पर सोचने की नहीं



बाधाएं
बहुत थीं वहां
इसीलिए स्वतन्त्रता थी
एक मूल्य की तरह
जिसे बराबर
आपको प्राप्त करना होता था
ईमान कम था
पर ईमानदारी थी
जिस पर ऑफिसरों का कब्जा था
जिधर झांकते भी
कांपते थे
दो टके के चपरासी



वहां न्यायालय थे
और थे जानकार बीहड़-बीहड़
न्याय प्रक्रिया के
शहर से झगड़ा सुलझाने
सब वहीं आते थे
और अपनी जर-जमीन गंवा
पाते थे न्याय



न्याय
जो बहुतों को
मजबूर कर देता
कि वे अपना गांव छोड़
शहर के सीमांतों पर बस जाएं
और सेवा करें
न्यायविदों के इस शहर की
पर ऐसा करते
वे नहीं जान रहे होते थे
कि जहां वे बस रहे हैं
वह जमीन न्याय की है
और प्रकारांतर से अन्याय था यह
और उन्हें कभी भी बेदखल कर
दंडित किया जा सकता था
और तब
जबकि उनके पास
कोई जमापूंजी नहीं होती थी
उनके लिए न्याय भी नहीं होता था



हां, न्याय के पास
दया होती थी थोड़ी
और दृष्टि भी
जिससे उनका इस तरह बसना वह
लंबे समय तक अनदेखा करता था
बदले में थोड़ा सा श्रम
करना होता था उन्हें
जिससे न्यायालय तक जाने का रास्ता
चौड़ा और पक्का होता जाता था
और न्याय प्रक्रिया के
अलंबरदारों के लिए
रेस्तरां-भवन-दफ्तर
तैयार होते जाते थे



अब उन आलीशान भवनों से
न्याय की तेज रफ्तार सफेद गाडि़यां
जब भागती थीं सड़कों पर
और अपने सीमांतो का
मुआयना करती थीं
तो वहां बसे वाशिन्दे
उन्हें धब्बों की तरह लगते थे
जिन्हें मिटाने की ताकीद वे
पुलिस-प्रशासन से करते
और लगे हाथ उसकी
मुनादी भी कर दी जाती थी
इस तरह
न्यायपूर्ण शहरों की सीमाएं
बार-बार उजाड़कर
पीछे धकेल दी जाती थीं
और बार-बार
न्याय की दया दृष्टि उन्हें आगे
नए सीमांतों पर टिकने की
मोहलत देती थी



शहर की जो न्याय प्रक्रिया थी
उसमें भी
सोचने-समझने की मनाही थी
इसीलिए आधी सदी से वे
नहीं सोच पा रहे थे
कि हिन्दोस्तां के
इन गर्म इलाकों में



सालों क्यूंकर
गर्म काला चोगा उठाए फिरते हैं
कि क्यों हिन्दी-उर्दू-तेलुगू-तमिल की
इस जमीन पर
अंग्रेजी-फारसी-संस्कृत
डटाए फिरते हैं



जैसे-शहर
एक तिलस्म की तरह था
उसकी न्याय प्रक्रिया भी
एक मिथक की तरह थी
और एक मिथक यह था
कि सोचने-विचारने के मामले में
अन्धी है वह
और जब-तक उसके कान के पास आकर
कोई अपनी फरियाद नहीं दुहराता
उसे कुछ मालूम नहीं पड़ता
इसके लिए उसके पास
ऊंची आवाज में विचरने वाले
हरकारे थे
जो सीमांत के बाशिंदों से
लंगड़ा संवाद बना पाते थे
ये हरकारे
न्यायप्रियता के ऐसे कायल थे
कि मुनादी के वक्त
आंखे मूंदकर
उसके आदेशों को प्रचारित करते थे
न्याय प्रक्रिया के
इस दोहरे अन्धेपन का लाभ
सीमान्त की डंवाडोल जमीन के
बाशिन्दे लेते थे
और उनकी खुसुर-पुसुर देखते-देखते
विचारधाराओं का रूप ले लेती थीं
और जब तक वे
अन्धे कानून को छू नहीं लेती थीं
उसे इसका इल्म तक नहीं होता था
कि उसकी नाक के नीचे
कैसी-कैसी विचारधाराओं ने
अपने तम्बू डाल रखे हैं
ऐसे में परेशान न्यायदंड
तुरत-फुरत
अपनी धाराओं की सेवाएं लेता था
मजेदार बात यह थी
कि न विचारधारा साफ दिखती थी
न धारा
स्थिति की गम्भीरता का पता
तब चलता था
जब दोनों टकराती थीं
और उसकी आवाज
न्याय के ऊंचे दंडों तक जाती थी



अब एक बार फिर
वही पुराना न्याय
दुहराया जाता था
जिसमें अच्छी कीमत अदाकर
विचारधाराओं को
थोड़ी मोहलत दी जाती थी
कि वे अपना तेवर सुधार सकें



न्यायदंड के आस-पास
उसकी सहूलियत के
सारे साजो-सामान भी थे
यथा जेलें थीं
आदर्श कारागृह
वहां बुद्ध की
ऊंची पत्थर की मूर्ति थी
क्योंकि वहीं वह सुरक्षित थी
और कारागृह के निवासियों को
उसकी छाया में शान्ति मिलती थी
जो मोबाइल-चैनल्स-सुरा-सुन्दरी
और मनोरम उत्तर-आधुनिक अपराधों का
सेवन करते
वहीं टेक लेते
बिरहा और चैता का गायन सुनते
लोकगीतों के रसिक सीएम, पीएम
अपने काफिलों के साथ
महीनों वहीं छुट्टियाँ मनाते थे
इसके लिए उन्हें न्यायदंड की
धाराओं की
सेवाएं लेनी पड़ती थीं
फिर जेलों से बाहर आते ही वे
जेल प्रशासन की मुस्तैदी की
समीक्षा करते थे
कारागृहों का यह रूप देखकर
उत्तर रामकथा वाचकों का मन भी
विचलित हो जाता था
और धन-बल-पशुओं को
गीता का उपदेश देने
वे भी वहां जा धमकते थे




न्यायदंड के आस-पास
बिखरे हुए थाने थे
जो पूंजी-प्रसूतों को रास आते थे
बावजूद इसके ये थाने
ढहती लोककला के अद्भुत नमूने थे
जिसकी दीवार के पलस्तर के भीतर से
लाल ईंटें
अपना बुरादा झारती रहती थीं
और रात में जिन्हें
लालटेन की नीम रोशनी रास आती थी
न्यायदंड की सुरक्षा के लिए तैनात
ये थाने थे
जिनकी जीपें
जनता के उस खास वर्ग की
सेवा में जाती थीं
जो कि उसमें पेट्रोल भरा पाती थीं
जहां वैसी मुट्ठी गर्म करने वाली
जनता नहीं थी
वहां पुलिस भी नहीं थी
इसीलिए विकल्प की तरह वहां
आतंकवादी थे



राजभाषा के सारे कवि
न्यायदंड के पास ही निवास करते थे
अपनी अटारियों से वे
पृथ्वी-पृथ्वी चिल्लाते थे
पर पृथ्वी से उनका साबका इतना ही था
जितनी कि उनके गमलों में मिट्टी थी
जिसे सुबह-शाम पानी देते
वे निहारते थे हसरत से



ये कवि थे
और काले बादलों को देख
इनका खून
भय से सफेद पड़ जाता था
ये कवि थे जो न्यायदंड से
अपना प्रेमपत्र बचाने की
याचना किया करते थे



और न्यायदंड प्रेमपत्र तो नहीं
उन कवियों को जरूर बचा लेता था



वह उन्हें कीमती जूते प्रदान करता था
जो न्यायदंड को देखते ही
खुशी से मचमचाने लगते थे
वह उनकी कमरों को
बल (लोच) प्रदान करता था
जिस पर कलाबाजी खाते वे
विचारों को
महामारी की तरह देखते थे
और खुद को उससे बचाने की जुगत
भिड़ाते रहते थे
इनका एक काम
जनता की कारगुजारियों से
न्यायदंड को आगाह करना भी था



इन शहरों में
सार्वभौम कला की तरह
तोंदें थीं
जिसके हिसाब से मोटर कम्पनियां
अपनी डिजाइनें बदलती रहती थीं
नतीजतन सड़कों पर
डब्बे की शक्लवाली
बूमों-मन्तरों-काटिज आदि गाडियाँ
बढ़ती जा रही थीं
यहां अपहरण और नरसंहार
एक उद्योग था
जिसकी रिर्पोटिंग को
पत्रकारिता कहते थे
और पत्रकार खबरें नहीं लिखते थे
विवस्‍त्र रक्तिम लाशें गींजते थे
उनकी जातियों का हिसाब लगाते थे
और जनता सुर्खियों में तब आती थी
जब वह गोलबन्द हो
रैलियों में हिस्सा लेने आ धमकती थी
राजनेताओं के बाद प्रेस
चििड़याखानों के जीवों की
गतिविधि बताना
ज्यादा जरूरी समझते थे
क्योंकि उसका नगर के पर्यावरण पर
सीधा असर पड़ता था



बन्दूक पर निशाना साधते-साधते
हत्यारों-अपहत्ताओं और
निजी सेनाओं के स्त्री-शिशु संहारकों की
एक आंख कमजोर हो गई थी
इसीलिए मीडिया में जब भी
उसकी तस्वीर उभरती थी
तो उसकी एक आंख और आधा चेहरा
गमछे से ढंका होता था



इस बारे में लोगों के
जुदा-जुदा खयालात थे
कि ऐसा वे पहचाने जाने के
भय से करते थे
पर जनमत की राय यह थी कि
खौफ को सार्वजनिक करने के लिए
वे ऐसा करते थे



बुद्ध के बाद गांधी
हत्यारों की पहली पसन्द थे
मीडिया पर इश्तेहारों में
हिंसा को वे मजबूरी बतलाते
और मीडियाकर (दलाल) उनमें
गांधी की अकूत सम्भावनाएं तलाशते
थकते नहीं थे !

Saturday, June 22, 2013

अंधेरे दौर में जनविमर्श : सुधीर सुमन




अनंत कुमार सिंह, अच्युतानंद मिश्र और कुमार मुकुल की किताबों पर  एक निगाह 


एक ऐसे दौर में जब अखबारों के संपादक प्रगतिशील जनवादी आकांक्षाओं वाले साहित्य को छापने के बजाए उसका उपहास उड़ाने को अहमियत दे रहे हों और पूरी नई पीढ़ी के भीतर सर्वनकार और आत्मश्लाघा की प्रवृत्ति को खूब प्रोत्साहित किया जा रहा हो, तब उन साहित्यकारों की आकांक्षाओं की थाह लेना ज्यादा सार्थक प्रतीत होता है, जो साहित्य को आज भी बदलाव का माध्यम समझते हैं और जो विचारधारात्मक मूल्यों की पहचान, उन मूल्यों को बचाए रखने की चिंता और नए जनपक्षधर मूल्यों की तलाश को ज्यादा अहमियत देते हैं। 

हाल में मुझे तीन पुस्तकें मिलीं। पहला कहानी संग्रह है कथाकार अनंत कुमार सिंह का- ब्रेकिंग न्यूज। शीर्षक कहानी खुद ही एक ऐसे साहित्यकार के बारे में है जिसकी एक इलेक्ट्रानिक चैनल का एक्सीक्यूटिव प्रोड्यूसर बनने के बाद साहित्य की दुनिया में भी पूछ बढ़ जाती है, पर वह अपनी सामाजिक नैतिकता खो देता है। औरतें सिर्फ उसके लिए उपभोग हैं और मीडिया महज मालिक के कारोबार का माध्यम। अपने पारिवारिक सामाजिक रिश्तों से भी वह पूरी तरह कट जाता है। 

शिक्षा (लपटें), खेती (मुआर नहीं), कृषि संस्कृति (भुच्चड़), शहरी मेहनतकशों की जिंदगी (पहियों पर पहाड़, वाह रे! आह रे! चैधरी मुरारचंद्र शास्त्री) के प्रति लेखक गहरे तौर पर संवेदित है। ये अपने ही अहं और कुंठा में डूबे आत्मकेंद्रित मध्यवर्गीय व्यक्ति की कहानियां नहीं हैं। और ऐसा नहीं है कि पुराने समाज के प्रति कोई अंधमोह है इनमें, वहां के शोषण और उत्पीड़न की स्मृतियां, खासकर अपने हक अधिकार से वंचित लोगों और अपने प्रेम से वंचित स्त्रियों (बसंती बुआ, मुखड़ा-दुखड़ा-टुकड़ा!) की बहुत मार्मिक स्मृतियां हैं, जो पाठक की चेतना को लोकतांत्रिक बनाती हैं। शहर और गांव और संगठित और असंगठित श्रमिकों को एकताबद्ध करने का स्वप्न (रात जहां मिलती है) भी इनमें है। कहानी संग्रह का समर्पण भी गौर करने लायक है- इस धरती को जहां रहता हूं मैं अपने शब्दों के साथ।

अपनी धरती और धरतीपुत्रों से जुड़कर उनकी व्यथाओं को कविता में लाने की ऐसी ही चिंता अच्युतानंद मिश्र के पहले कविता संग्र्रह ‘आंख में तिनका’ की कविताओं में दिखाई देती है। इसमें बदलते हुए खतरनाक समय की पूरी पहचान है और अपनी भूमिका की तलाश भी। संग्रह की पहली ही कविता है- मैं इसलिए लिख रहा हूं/ कि मेरे हाथ तुम्हारे हाथ से जुड़कर/ उन हाथों को रोकें/ जो इन्हें काटना चाहते हैं।

अच्युतानंद की कविताओं को पढ़ते हुए प्रगतिशील क्रांतिकारी काव्य धारा की मुहावरा सी बन गई कई पंक्तियों की याद आती है, पर यह नकल नहीं, बल्कि उस काव्य पंरपरा का जबर्दस्त प्रभाव है। जो चीज इन कविताओं को उन कविताओं से अलगाती है, वह है इनमें मौजूद अपने समय के संकट की शिनाख्त। एक कविता का शीर्षक ही है- इस बेहद संकरे समय में। समय जो है वह मनोनुकूल नहीं है, चीजें सारी बेतरतीब हैं, जिनके बीच एक सलीके की तलाश है कवि को, सड़कें बहुत तंग हैं, पर कवि का मानना है कि ‘बड़े सपने तंग सड़कों/पर ही देखे जाते हैं।’ जाहिर है समय के संकटों का अहसास तो है पर वैचारिक पस्ती नहीं है, क्योंकि संकरे समय में रास्ते की तलाश भी है। 

बेशक, वर्तमान से कवि संतुष्ट नहीं है, पर आस्थाहीनता की आंधी में वह बहने को तैयार नहीं है, उसे पूरा भरोसा है कि मेहनतकश हाथों से ही ‘दुनिया का नक्शा’ बदलेगा। इन कविताओं में शहर हैं, जो बस्तियों की छाती पर पैर रख जवान हुए हैं, देश है, जिसमें बच्चे भूखे ठिठुर रहे हैं, ‘किसान’ धीरे-धीरे नष्ट किए जा रहे हैं, नौजवान मरने को अभिशप्त हैं, औरतें उदास, उत्पीडि़त और पराधीन हैं, बच्चे उपेक्षित हैं। लेकिन शासकवर्ग देश ही नहीं, पूरी पृथ्वी की ही रक्षा का नाटक करता है। लेकिन त्रासदी यह है कि इस नाटक के बीच ‘डूबते किसान को कुछ भी नहीं पता/ डूबती हुई पृथ्वी के बारे में’ (आखिर कब तक बची रहेगी पृथ्वी)। 

‘एकालाप’ महज किसी लंबी कविता का शीर्षक ही नहीं है, बल्कि हर कविता मानो खुद से भी जिरह है। यही अगर इस संग्रह का शीर्षक भी होता, तो शायद ज्यादा उचित होता। यह एक ऐसी कविता है जिसमें कवि की वैचारिक बेचैनियों के कई स्तर नजर आते हैं और साथ ही एक जनधर्मी काव्य मुहावरा विकसित करने की जद्दोजहद भी- ‘सुरक्षित था जीवन/ आरक्षित था मन/ केंद्रित था पतन/ और ठगा जा रहा था वतन।’ 

संग्रह के फ्लैप पर आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने सही ही लिखा है कि अच्युतानंद पर्यवेक्षक कवि नहीं, अतटस्थ रचनाकार हैं। 

पर्यवेक्षण और परिवर्तन की चाहत का ऐसा ही द्वंद्व कुमार मुकुल की आलोचनात्मक लेखों के संग्रह ‘अंधेरे में कविता के रंग’ में दिखाई देता है। कवि से कर्ता होने का उनका आग्रह रहता है। वे श्रम की कीमत बताने तक कवि की भूमिका नहीं मानते, बल्कि श्रम की लूट को नष्ट करने का तरीका बताने का भी आग्रह करते हैं। राजनीतिक कविताआंे की जरूरत, अनिर्णयों का अरण्य बनती हिंदी कविता, अंधेरे में की पुनर्रचना जैसे लेख हिंदी कवियों से निर्णायक भूमिका की अपेक्षा रखते हैं। आलोचक का जो वैचारिक आग्रह कवि से है, वही समाज से भी है, इसलिए भी कि कविता को समाज से अलग करके वह कहीं नहीं देखता। इसलिए कविता में आलोचक को स्त्रीविरोधी कोई स्वर भूले से भी मंजूर नहीं है। रघुवीर सहाय और धूमिल से इसी कसौटी पर कुमार मुकुल अपनी असहमति जाहिर करते हैं। सविता सिंह, अनामिका, निर्मला पुतुल आदि कवियत्रियों की कविताओं के मूल्यांकन के दौरान स्त्रियों के प्रति उनकी संवदेनशीलता और उनकी मुक्ति के प्रति अटूट पक्षधरता दिखाई पड़ती है। अंधविश्वास, अवैज्ञानिकता, तथ्यहीनता और तर्कहीनता आदि के वे मुखर विरोधी हैं और इस आधार पर अपने प्रिय कवियों की पंक्तियों की भी आलोचना करने से नहीं चूकते। किसी आलोचक द्वारा अपने पसंद-नापसंद को भी निरंतर जांचना और अपनी आलोचनात्मक समझ को दुरुस्त करते रहना सकारात्मक प्रवृत्ति है, जो आजकल के कम आलोचकों में दिखाई पड़ती है। फिर दूसरों की समझ और राय को भी महत्व देने और अपने आलोचनात्मक विवेक के निर्माण में उसे भी जगह देने की जो आदत है, वह भी उनकी आलोचना पद्धति की खासियत है। वे प्रगतिशील जनवादी शब्दावलियों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम करते हैं, पर उनकी आलोचना में निहित जो वैचारिक आकांक्षा है, वह निःसंदेह प्रगतिशील-जनवादी है, आधुनिक है। उनके आलोचक ने विचारों और सपनों में यकीन नहीं खोया है। 

कुमार मुकुल की आलोचना बहस के लिए उकसाती है। खासकर दो या कभी कभी तीन कवियों को आमने सामने रखकर तुलना करते हुए जो निर्णय वे सुनाते हैं, उसमें अच्छी कविता और बुरी कविता का जो वर्गीकरण होता है, उस वर्गीकरण से बहसें रह सकती हैं। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि उनकी आलोचना पाठक को हिंदी कविता के व्यापक संसार से परिचित कराती जाती है। जिन कवियों और कविताओं को कुमार मुकुल परशुरामी मुद्रा में ध्वस्त करते हैं, उनके प्रति भी एक जिज्ञासा पनपती है कि जरा उस कविता को देखा जाए एक बार, जिससे मुकुल इतना क्षुब्ध हैं। कुल मिलाकर ‘अंधेरे में कविता के रंग’ की आलोचना पाठक को हिंदी कविता और अपने समय के जरूरी सवालों और बहसों से जुड़ने को उकसाती है, यही इस किताब की खासियत है।




ब्रेकिंग न्यूज (कहानी संग्रह)

अनंत कुमार सिंह

भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली

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आंख में तिनका (कविता संग्रह)

अच्युतानंद मिश्र

यश पब्लिकेशंस, दिल्ली

मूल्य: 150 रुपये

अंधेरे में कविता के रंग (आलोचना)

कुमार मुकुल

नई किताब, दिल्ली-92

295 रुपये
                                        (समकालीन जनमत जून २०१३ से साभार)