Showing posts with label मधुकर सिंह. Show all posts
Showing posts with label मधुकर सिंह. Show all posts

Friday, July 15, 2016

मधुकर सिंह : जनता का दोस्त जिसे दुश्मनों की पहचान थी


वे पैर जो देश के कई शहरों को नापकर आ गए थे, जो आरा और पटना के साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों, मित्रों, परिचितों के यहां कब मुड़ जाएंगे, इसका कोई निश्चित समय नहीं था, जो पूरे आत्मीय हक के साथ हमारे घरों के भीतर दाखिल होते थे और जिनके साथ आती थीं जाने कितनी खबरें, साहित्यिक-सांस्कृतिक दुनिया की हलचलें, देश-समाज की कुछ गंभीर चिंताएं और कुछ गाॅसिप भी, वे थम गए थे। मधुकर जी आते थे तो हम सबके लेखन और परिवार के सदस्यों का भी हालचाल लेते थे। आरा में जो नाटक की टीम है युवानीति, 1978 में उसकी शुरुआत शहर की एक मुसहर बस्ती में उन्हीं की कहानी ‘दुश्मन’ की नाट्य प्रस्तुति से हुई थी। युवानीति के संदर्भ में वे हमेशा संस्कृतिकर्मियों के बीच ‘पारिवारिकता’ की बात करते थे यानी सामूहिकता। इस परिवार के मधुकर सिंह बेहद प्यारे बुजुर्ग थे, हमेशा नौजवानी की ऊर्जा से भरे बुजुर्ग। लेखन के शुरुआती दौर में तो वे गीतकार और रंगकर्मी के रूप में ही लोकप्रिय थे। 1963 में प्रकाशित उनकी पहली पुस्तक ‘रुक जा बदरा’ भोजपुरी गीतों का संग्रह है। जिन लोगों ने उन्हें गाते हुए सुना है, वे उनकी आवाज में मौजूद लोक की करुणा और उसके माधुर्य को कभी भूल नहीं सकते। मैंने 1993 में उनके नाटक ‘लाखो’ में खलनायक की भूमिका की थी। उस नाटक में भी कई गीत थे। ‘तनी जाग ना जवान गांवा-गांई के/ काहे सुतल चदरिया तानि के’ उनका प्रिय गीत था। 
महुआ गीत (रुक जा बदरा)
‘महुआ का गीत’ उनका एक मशहूर गीत था, जिसे कवि-सम्मेलनों में हाल के वर्षों तक, जब तक वे स्वस्थ थे, सुनाने की हमलोग उनसे जरूर फरमाइश करते थे। बहुत मर्मस्पर्शी है वह गीत और मधुकर जी की आवाज में वह और गहरा असर छोड़ता था। छह साल पहले जब उन पर लकवा का आघात हुआ था, उसके बाद से फिर मैंने वह गीत नहीं सुना। पटना और आरा में कई जगहों पर उनका इलाज हुआ, पर उनके पैरों की ताकत वापस नहीं आई, धीरे-धीरे वे चलने-फिरने में असमर्थ हुए, अंतिम दिनों में उनकी श्रवण शक्ति भी जाती रही। जब भी मैं दिल्ली से आरा जाता, तो एकदम नियम की तरह उनके घर जाकर मिलता था, जब सुनने में उन्हें मुुश्किल होने लगी तो हमलोग उनसे लिखकर बात करने लगे। आवाज पर भी लकवे का असर पड़ा था, पर किसी के जाने पर वे बेहद उत्साह और खुशी से भर जाते थे और खूब बतियाते थे। बात करते-करते तीन-तीन चार-चार पन्ने भर जाते। हर बार विदा होते वक्त वे पूछते थे कि अगली बार कब आइएगा। एक दिन मुझसे कहा कि जसम और युवानीति की बैठक किसी दिन बुलाइए, मैं भी उसमें रहना चाहता हूं। व्यस्तताओं और मां के निधन के कारण दो-तीन महीने बाद इस जनवरी (2014) में जब उनसे मिला, तो उन्होंने एक काॅपी मुझे भेंट में दी, जो उन्होंने नवंबर से ही मेरे जन्मदिन पर देने के लिए रखी हुई थी। बीमारी और शारीरिक अक्षमता से उनके लेखक ने आखिर आखिर तक हार नहीं मानी। इसी साल दूरदर्शन की पत्रिका ‘दृश्यांतर’ में उनकी दो कहानियां छपीं। जब वह पत्रिका उन्हें देने गया, तब दिल्ली से लेकर पटना, आरा हर जगह के लोगों के बारे में पूछते रहे। इस बार कुछ घरेलू व्यस्तताओं में फंसा रह गया। सोच रहा था कि एक-दो दिन में उनसे मिलूंगा, तभी अचानक 15 जुलाई को शाम पांच बजे उनके अधिवक्ता बेटे अनिल का फोन आया कि थोड़ी देर पहले वे नहीं रहे।

मधुकर सिंह का जन्म 2 जनवरी 1934 को बंगाल के मिदनापुर में हुआ था। वहां उनके पिता जेल में पुलिस की नौकरी करते थे। लगभग दस साल की उम्र में ही वे अपनी मां के साथ अपने गांव चले आए। उनके जीवन का ज्यादा समय धरहरा गांव और आरा शहर में ही गुजरा। मधुकर सिंह, धरहरा, आरा यही पता उनकी रचनाओं के साथ छपता रहा। आरा में ही उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई। किशोर उम्र से ही उनके पिता की अपेक्षा थी कि वे अर्थोपार्जन में लगें, लेकिन मधुकर सिंह पढ़ना चाहते थे। बचपन में शादी होने के कारण मैट्रिक में ही वे पिता बन गए। अपने परिवार की जिम्मेवारियां भी सामने थीं। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों में उन्होंने न केवल बी.ए. किया, बल्कि साहित्य-संस्कृतिकर्म के प्रति रुझान भी उसी दौर में उनमें विकसित हुआ।

मधुकर सिंह जिस माहौल में जन्मे थे, वहां दूर-दूर तक परिवार और रिश्तेदारों में लिखित साहित्य की कोई परंपरा नहीं थी। अगर कोई विरासत थी, तो वह थी मौखिक साहित्य की। मधुकर जी ने लिखा है कि उनकी मां उन्हें बचपन में ‘बाउल’ लोकगीत तथा बंगाल और भोजपुर की लोककथाएं सुनाती थीं। 1950 में जब वे मैट्रिक में थे, तब पहली बार पटना से प्रकाशित ‘नवराष्ट्र’ में उनका नाटक ‘सरस्वती का मंदिर’ छपा। उन्होंने अपने गांव में नाटक मंडली बनाई, जो पर्व-त्योहारों के अवसर पर नाटकों का मंचन करती थी। धरहरा प्राइमरी पाठशाला से ही उनके सहपाठी रहे, उनके बालसखा कवि श्रीराम तिवारी बताते हैं कि उन लोगों ने गांवों में साहित्यिक नाटकों का मंचन किया। पचास के ही दशक में निराला, पंत, महादेवी से ये लोग इलाहाबाद जाकर मिल आए। साहित्यिक यायावरी उन्होंने जीवन भर की। बंबई, दिल्ली, कलकत्ता, इलाहाबाद, लखनऊ, रांची, जमशेदपुर, हजारीबाग, बनारस समेत कई शहरों में उनका आना-जाना लगा रहा। लेकिन जीवन का केंद्र उनका गांव धरहरा ही रहा।

विगत इक्कीस साल से मधुकर सिंह से मेरा घनिष्ठ संबंध था। 1998 में उन्होंने ‘इस बार’ पत्रिका का पुर्नप्रकाशन शुरू किया, तो उन्होंने एक तरह से संपादन की पूरी जिम्मेवारी ही मुझे दे दी। रचनाओं के चुनाव की पूरी स्वतंत्रता उन्होंने दे रखी थी। खुद भी जो रचनाएं लाते थे, उसके बारे में उनका कहना था कि अगर पसंद न आए तो मत दीजिएगा। ‘इस बार’ का जो पुर्नप्रकाशित पहला अंक था, उसमें विनोद मिश्र, नागार्जुन और नक्सलबाड़ी और हिंदी कहानी पर सामग्री थी। उसके एक-दो अंकों के कवर भी मैंने बनाए, जो पसंद किए गए। यूं ही युवा रचनाकार उनको पसंद नहीं करते थे। वे एक बड़े साहित्यकार थे, लेकिन अपनी महानता का बोझ युवाओं पर कभी नहीं डालते थे। उनकी छिपी हुई प्रतिभा को सामने लाने के मौके वे पैदा करते थे। उन पर यकीन करते थे। 1997 में हमने मिलकर महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘मास्टर साब’ का नाट्य रूपांतर किया। मुझे लंबे संवाद पसंद नहीं थे। मैंने संवादों को छोटा किया। मधुकर जी ने एक बार भी ऐतराज नहीं किया। वह उपन्यास भोजपुर के उस इंकलाबी शख्सियत पर था, जिस पर उन्होंने खुद उपन्यास और कहानियां लिखीं। किशोर उम्र में जब मैं आरा आया था, तो मेरे ननिहाल में मेरे संस्कृतिकर्मी मामा ने उनके उपन्यास ‘अर्जुन जिंदा है’ के बारे में बताया था कि वह जगदीश मास्टर पर है यानी भोजपुर आंदोलन की नींव रखने वाले जगदीश मास्टर- रामेश्वर अहीर और रामनरेश राम के अभिन्न साथी। 1998 के जनवरी में ‘मास्टर साब’ नाटक का तीन दिवसीय मंचन हुआ। चित्रकार राकेश दिवाकर ने उसके प्रचार के लिए बड़े-बड़े वाॅल पेंटिंग बनाए थे, खूब वाल राइटिंग भी की गई थी। मधुकर जी का कहना था कि युवानीति के कलाकारों ने इस नाटक के मंचन को आंदोलन का रूप दे दिया है। उसी साल जब हमलोग गांवों में उस नाटक का मंचन करने गए, तो मधुकर जी भी हमारे साथ थे, संदेश में भी और सहार में भी, जो जनराजनीतिक संघर्षों के लिहाज से पिछले चालीस साल से चर्चा में रहे हैं। 

मधुकर सिंह ने अपने एक साक्षात्कार में यह स्वीकार किया है कि उनके लेखन की जमीन को व्यापक फलक देने का काम उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं ने भी किया है। शुरू-शुरू में उनका जुड़ाव सोशलिस्ट पार्टी से हुआ। दाम बांधो काम दो और अंग्रेजी हटाओ जैसे नारों ने उन्हें आकर्षित किया। 1957 के आम चुनाव में उन्होंने प्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी और जनकवि रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’ के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार दीपनारायण सिंह के प्रचार में गांव-गांव खंजड़ी बजा-बजाकर गीत भी गाए। लेकिन उनके अनुसार ‘जमींदाराना मिजाज के बौद्धिक सोशलिस्टों’ के कारण उनका वहां से मोहभंग हुआ। इसके बाद वे कम्युनिस्ट पार्टी, छात्र संगठन एआईएसफ और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े। साठ के दशक में उन्होंने कुछ अखबारों और स्कूलांे में नौकरी की और रोजी-रोटी के संघर्ष के दौरान उन संस्थानों में मौजूद जाति भेद को महसूस किया। उन्होंने लिखा है कि अपनी एक कहानी की ब्राह्मणवादी मिजाज से की गई आलोचना की वजह से उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी और प्रगतिशील लेखक संघ से अपनी सदस्यता स्थगित कर दी। इसके बाद वे कमलेश्वर द्वारा चलाए गए समांतर आंदोलन में शामिल हुए। बाद में जब जन संस्कृति मंच बना, तो उससे जुड़े। उसके राष्ट्रीय परिषद और कार्यकारिणी में रहे। कई वर्षों तक वे जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे। नब्बे के दशक में जबकि देश-दुनिया में मार्क्सवाद के अंत की घोषणाएं हो रही थीं, तब उन्होंने भाकपा-माले की सदस्यता ली और आजीवन इसके सदस्य रहे।

1964 में श्रीपत राय की पत्रिका ‘कहानी’ में उनकी पहली कहानी ‘बंद पानी का सैलाब’ प्रकाशित हुई। उसके बाद से ‘कहानी’ में उनकी करीब दो दर्जन कहानियां प्रकाशित हुईं। अपने समय की कहानी की लोकप्रिय पत्रिका ‘सारिका’ में भी वे खूब छपे। ‘सारिका’ के जरिए वे बड़े पाठक वर्ग तक पहुंचे। दूसरी ओर व्यावसायिक पत्रिकाओं के खिलाफ वैचारिक संघर्ष चलाने वाली चंद्रभूषण तिवारी की पत्रिका ‘वाम’ में उनकी मशहूर कहानी ‘दुश्मन’ प्रकाशित हुई। उस समय जो बहसें चल रही थीं, उसमें ‘समांतर कहानी’ के ‘आम आदमी’ की यह कहकर आलोचना की गई कि वह अमूर्त, निराकार और रूपहीन तत्व है, आम आदमी के प्रति पक्षधरता किसके विरोध में है, यह पता नहीं चलता। यह आलोचना शायद कई कहानियों के प्रति जायज भी होगी। लेकिन खुद मधुकर सिंह ने समांतर साहित्य को परिभाषित करते हुए जो लेख लिखा उसका शीर्षक दिया- यथास्थिति के विरुद्ध परिवर्तनकामी लेखन। स्वाधीनता आंदोलन में जनभागीदारी और उसके नेतृत्व की सत्तालोलुपता से उन्होंने उस लेख की शुरुआत की है। उन्होंने लिखा है कि ‘गांधीजी जैसे नेताओं ने सामान्य लोगों की चेतना को जरूर उकसाया, मगर देश के धनवान, जमींदार और सामंत पूरी तरह उनके ऊपर फैलते गए।...नेताओं के दिमाग में यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं था कि गुलामी से मुक्ति के बाद अपने देश में व्याप्त विषमताओं के विरुद्ध लड़ने के लिए कौन-सा रास्ता अपनाएंगे अथवा नए समाज का स्वरूप क्या होगा?’ आगे वे लिखते हैं कि आजादी मिलते ही धनवानों और बनिया वृत्ति के लोगों ने सत्ता हथिया ली। फिर वे सामंतवाद और पूंजीवाद के गठजोड़, हरिजनों, पिछड़ी जातियों, खेतिहर मजदूरों को वोट देने के अधिकार और विकास योजनाओं के लाभ से वंचित किए जाने तथा सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न की चर्चा करते हैं और उनसे जुड़ी अपनी दो कहानियों की चर्चा करते हैं। इसमें एक कहानी ‘भुनेसर मास्टर’ जगदीश मास्टर पर केंद्रित है। कहने का मतलब यह है कि समांतर आंदोलन के उस दौर में वे जो कहानियां लिख रहे थे उन पर भोजपुर के क्रांतिकारी जनवादी आंदोलन का असर था। 

समांतर साहित्य वाले लेख में वे जिस दूसरी कहानी का जिक्र करते हैं, उसका शीर्षक है- ‘लहू पुकारे आदमी’। कहानी नगीनाराम मुसहर और भैरवनाथ तिरपाठी की है, जो एक ही साथ काॅलेज में पढ़ते हैं। वे गांव में लोगों की चेतना के विकास के लिए ‘समाजवादी युवक मंच’ बनाते हैं। लेकिन नगीनाराम मुसहर को महामंत्री और कैलाश तिरपाठी को सहायक मंत्री बनाए जाने का प्रस्ताव ब्राह्मण युवकों को मंजूर नहीं होता। अधिकांश लोग इस्तीफा दे देते हैं और जवाब में ‘गांधीवादी युवक मंच’ बनाते हैं। कैलाश तिरपाठी उसका अध्यक्ष बन जाता है। इसके बाद तनाव बढ़ता है। विपत चमार, जिसके पिता कैलाश के हलवाहा हैं और दो चार जुलाहे और लुहार भी कैलाश के दबाव-प्रभाव में उसी का साथ देते हैं। कैलाश और विपत काॅलेज से लौटते वक्त नगीना और भैरवनाथ पर हमला करते हैं। लेकिन नगीना के हाथों कैलाश और भैरवनाथ के हाथों विपत मार खाकर भागने को विवश हो जाते हैं। उसके बाद नगीना और भैरव के बीच जो संवाद होता है, वह गौरतलब है-

-अब क्या होगा, भैरव बाबा? अब तो मुसहरों का गांव के पास रहना मुश्किल हो जाएगा।...

-हिम्मत रखो, नगीना।

-सो तो रखनी पड़ेगी।

-तब क्या बात है?

-कैलाश शैतान है- हमारा नंबर वन का दुश्मन!

-मगर गांव के सभी तो ऐसे नहीं हैं।

-मुझे डर नहीं लगता। मगर चौबीस वर्षों की आजादी ने कितने सही लोगों को पैदा किया है? 

जाहिर है यह सवाल आजादी के बाद के समाज और व्यवस्था पर एक गहरी टिप्पणी है।

कहानी की अंतिम पंक्तियां हैं- ‘वे लोग जब गांव पहुंचे तो मुसहर टोली में आग लगी हुई थी और तमाम बच्चे, औरतें, मर्द चिल्लाते हुए गांव छोड़कर भाग रहे थे, नगीना राम और भैरव तिरपाठी बहुत ऊंचे तूफान को सीने के अंदर रोककर गांव के किनारे सड़क पर रुके हुए थे।’

यह ऊंचा तूफान सामंती-वर्णवादी समाज के खिलाफ गहरे गुस्से और उसे बदलने के संकल्प से पैदा हुआ है। इस लिहाज से देखा जाए तो यह कहानी बाबा नागार्जुन की ‘हरिजन गाथा’ कविता से पहले समाज को बदलने वाले एक संभावित तूफान की ओर संकेत करती है। 

हालांकि अपने पहले संग्रह ‘पूरा सन्नाटा’ जिसमें 1960 से 1966 उनकी कहानियां संकलित हैं, से ही मधुकर सिंह की छवि एक जनपक्षधर कहानीकार की बन चुकी थी। इन कहानियों में आजादी से मोहभंग साफ तौर पर महसूस होता है। नेता, नौकरशाही, डाॅक्टर, प्रोफेसर, वकील, भूस्वामी, पूँजीपति, पत्रकार- सबका जनविरोधी चेहरा इनमें दर्ज है। सरकार की जालसाजों, रिश्वतखोरों और कालाबाजारियों के साथ गहरी यारी है। आम अवाम में व्यवस्था के प्रति गहरा विक्षोभ और आक्रोश दिखता है और उसके दमन के लिए पुलिस तैयार खड़ी नजर आती है। 1966 में लिखी गई उनकी कहानी ‘इन दिनों’ में आम आदमी का एक प्रतिनिधि शासकवर्ग के प्रतीक चेयरमैन की मूर्ति की गरदन मरोड़ देता है और पुलिस उसकी ओर बेनट ताने हुए आगे बढ़ती नजर आती है। संयोग यह है कि इसके एक साल बाद ही 1967 में नक्सलबाड़ी विद्रोह हुआ और उसकी चिंगारी भोजपुर में गिरी। भोजपुर मेहनतकश किसानों और खेत मजदूरों के क्रांतिकारी आंदोलन की आंच से सुलग उठा। 

1975 में प्रकाशित मधुकर सिंह के पहले उपन्यास ‘सबसे बड़ा छल’ में भी इस आंदोलन का प्रभाव दिखाई पड़ता है। इस उपन्यास के नायक देवनाथ सिंह, जो कलकत्ता में हजारों मजदूरों के एकछत्र नेता रहते हैं, वे जब गांव लौटते हैं, तो उन्हें खेतिहरों का संघर्ष की जरूरत महसूस होती है। वे तीव्रता से महसूस करते हैं कि ‘‘भूमि की हदबंदी केवल मृगतृष्णा है। कोई भी सरकार सच्चे दिल से इसके लिए उतारू नहीं है....अभी तक जो भी नियम हैं गरीबों को चूसने के लिए हैं। हरित क्रांति से फायदा बड़े किसानों को छोड़कर किसे हुआ है?’’ जमीन किस तरह कुछ लोगों की ताकत का स्रोत है और किस तरह वे सामंती शोषण-दमन को बनाए रखना चाहते हैं, इसे यह उपन्यास बखूबी दिखाता है। 

भूस्वामियों का जो वर्चस्व है उसे बरकरार रखने में पूरी ब्राह्मणवादी सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था सहयोगी दिखती है। पूंजीवाद भी सामंती संरचना को ध्वस्त करने के बजाय उससे गठजोड़ किए हुए है और वही गठजोड़ लोकसभा, विधानसभा और सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं पर काबिज है। सोनभद्र की राधा, सबसे बड़ा छल, सीताराम नमस्कार, जंगली सुअर, मेरे गांव के लोग, समकाल, कथा कहो कुंती माई, अगिन देवी, अर्जुन जिंदा है आदि उनके अधिकांश उपन्यासों की कथाभूमि सामंती और वर्णवादी व्यवस्था की क्रूरताओं और अमानवीयताओं के खिलाफ प्रतिवाद और प्रतिरोध से ही संबंधित हैं। 

सामाजिक यथास्थिति के पक्षधर लोग मधुकर सिंह पर जातिवादी होने का आरोप लगाते रहे, लेकिन उन्होंने हमेशा यह कहा कि वे जातिवादी नहीं हैं, बल्कि ब्राह्मणवाद के विरोधी हैं? गौर से देखें तो मधुकर सिंह की कहानियों में गरीबों, खेत मजदूरों, मेहनतकश स्त्रियों के साथ सवर्ण समुदाय से आने वाला एक प्रबुद्ध हिस्सा हमेशा नजर आता है। हिंदी कथा साहित्य में दलित विमर्श के शुरू होने से दो-ढाई दशक पहले मधुकर सिंह ने दलितों की वर्गीय मुक्ति के प्रश्न को कथा साहित्य का केंद्रीय प्रश्न बनाया। आज के दलित कथा साहित्य के विपरीत उनकी कहानियों और उपन्यासों में दलितों की सामाजिक-आर्थिक मुक्ति का सवाल जमीन पर उनके अधिकार के आंदोलन से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ नजर आता है। ‘मेरे गांव के लोग’ में तो वे कहते भी हैं कि ‘जाति, धर्म-संप्रदाय सबकी बुनियाद जमीन है।’ दलित जाति से आने वाले नौकरशाह, मंत्री उनकी कहानियों और उपन्यासों के नायक नहीं हैं और न ही दलित मध्यवर्ग की जिंदगी उनके केंद्र में है। उनकी कहानियों के दलित नायक बुनियादी तौर पर खेत-मजदूर और भूमिहीन किसान हैं या उनके आंदोलनों के नेता है, जो पूरे समाज और सामंती व्यवस्था के साथ-साथ राजकाज का चेहरा बदलने के लिए संघर्ष करते हैं। इसी कारण सामंती-वर्णवादी शक्तियों को शूद्रों का राज आने का भय सताता है।

बेशक भोजपुर का आंदोलन सामाजिक-राजनीतिक सत्ता को बदलने का आंदोलन था। उसके नेतृत्वकारी जगदीश मास्टर मधुकर सिंह के साथ ही आरा के जैन स्कूल में शिक्षक थे। वे 1972 में शहीद हुए थे। ‘जगदीश कभी नहीं मरते’ महज मधुकर सिंह के किसी उपन्यास का नाम नहीं है, बल्कि यह रचनाकार की पहचान भी है। इस उपन्यास का पूर्वाध आजादी के आंदोलन पर केंद्रित है। ‘अर्जुन जिंदा है’ उपन्यास में जो अर्जुन है वह जगदीश बन जाता है। दरअसल इस नाम परिवर्तन की भी एक कथा है। ‘अर्जुन जिंदा है’ जब 1984 में प्रकाशित हुआ था, तब तक भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी लेनिनवादी) भूमिगत थी। तब सीधे उसके नायकों पर लिखना आसान नहीं था। यही उपन्यास 2010 में ‘जगदीश कभी नहीं मरते’ नाम से प्रकाशित हुआ। ‘जगदीश कभी नहीं मरते’ साठ और सत्तर के दशक के भोजपुर आंदोलन को आजादी के आंदोलन से अनिवार्य रूप से जोड़ता है। आजादी के आंदोलन में भी एक जगदीश हैं, जो लेखक की कल्पना की देन हैं, लेकिन इसके जरिए सच्ची आजादी की उस धारा की जद्दोजहद को ही उन्होंने दिखाया, जो साम्राज्यवाद के साथ ही सामंतवाद और वर्णवाद के खिलाफ भी संघर्षरत थी। अकारण नहीं है कि मधुकर सिंह के साहित्य में जनता अपने संघर्षों के दौरान भगतसिंह से प्रेरणा लेती है और गांधीवाद का इस्तेमाल प्रायः शोषक शक्तियां करती हैं। रामविलास भाई, हरिजन सेवक, भाई का जख्म आदि कई कहानियों में गांधीवादी या तो सामंती शक्तियों के सामने अक्षम नजर आते हैं या उनके साथ खड़े होते हैं। भगतसिंह ने आखिरी दिनों में जेल से नौजवान कार्यकर्ताओं के लिए जो कार्यक्रम दिया था, उसमें पहला जोर सामंतवाद को समाप्त करने पर था। वे लगातार राजनीतिक कार्यकताओं से किसानों-मजदूरों के बीच जाने की वकालत करते हैं। 1947 की आजादी के बाद जगदीश मास्टर और उनके साथी मानो उसी कार्यभार को पूरा करने के लिए अपनी जान की बाजी लगा देते हैं। उपन्यास ‘समकाल’, जो 1942 से लेकर नक्सलबाड़ी आंदोलन तक के राजनैतिक-सामाजिक आंदोलनों पर केंद्रित है, उसके नायक की छवि भी जगदीश मास्टर से प्रभावित लगती है। 

सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर मौजूद मेहनतकशों की सामाजिक-आर्थिक मुक्ति वर्ग-समन्वय के किसी रास्ते से संभव नहीं है, मधुकर सिंह की कहानियां बार-बार इस समझ को सामने लाती हैं। यही कारण है कि सामंतवाद और वर्णव्यवस्था के ढांचे के नाश के लक्ष्य को छोड़कर उसी की गोद में बैठ जाने वाली राजनीति पर उनकी कहानियां उंगली उठाती हैं। उनकी चर्चित कहानी ‘दुश्मन’ इसी सचाई को सामने लाती है कि इस तरह का दलित नेतृत्व बहुसंख्यक दलितों, जो कि ग्रामीण मजदूर और गरीब हैं, उनके लिए दुश्मन सरीखा ही सिद्ध होता है। 

मधुकर सिंह के उपन्यासों और कहानियों में स्त्रियां सामंती पितृसत्ता, जात-पांत को चुनौती देने के लिए जो रास्ता चुनती हंै वह सामाजिक-राजनीतिक बदलाव के आंदोलनों से होकर गुजरता है। वे अपनी मुक्ति की प्रक्रिया में सामाजिक गैरबराबरी के खिलाफ चल रहे आंदोलनों के करीब आती हैं, उसमें शिरकत और उसका नेतृत्व करती हैं, और इस रास्ते में स्त्री-पुरुष दोनों उसके सहयोगी होते हैं। यही नहीं, गरीब-मेहनतकशों का आंदोलन कुंती माई जैसी आम महिलाओं को सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का नेतृत्वकारी बना देता है। इसी आंदोलन में शामिल होकर ‘बेनीमाधो तिवारी की पतोहू’ जैसी स्त्रियों सामंतवाद के घेरे को तोड़ती हैं और अपनी एक नई सामाजिक पहचान को हासिल करती हैं। 1982 में प्रकाशित उपन्यास ‘अगिन देवी’ की दलित नायिका अगिन की शादी पति की मृत्यु के बाद 40 वर्षीय रामरतन से कर दी जाती है। लेकिन वह उस शादी को मंजूर नहीं करती। वह अपने बचपन के दोस्त ममदू मियां के साथ जीवन भर रहने का फैसला करती है। और उसका पिता दुखित रैदास भरी पंचायत में कहता है- ‘‘सुन लो पंचो। गरीब की न कोई जाति होती है, न धर्म। ममदू और अगिन पति-पत्नी हैं। इन्हें गांव से कोई नहीं निकाल सकता। ये जब तक जिंदा हैं। इसी गांव में रहेंगे।’’ इस गांव में जमींदार जमुना सिंह और मुचकुल बाबू सामंती शोषक जमात के प्रतिनिधि हैं। मजदूरों का शोषण और उन पर जुल्म करना वे अपना जन्मजात अधिकार समझते हैं। मजदूरों की स्त्रियों को अपने हवस का शिकार बनाना उनका शौक है। लेकिन समाज में एक नई स्त्री जो उभर रही है, वह इसका प्रतिरोध करती है। जब मजदूर दाउद की बेटी नूरी को मुचकुल बाबू के कारिंदे उठा ले जाते हैं और उसके साथ बलात्कार होता है, तब अगिन मजदूरों को ललकारती है- ‘‘हम सभी के हाथ में हंसुआ है न? जैसे हम धान के डंठल काट रहे हैं, वैसे क्यों जुलुम की गर्दन नहीं काट सकते?’’ ‘उत्तरगाथा’ उपन्यास की रेवती भी इसी तरह जमींदार शिवजी मलिक को चेतावनी देती है- ‘‘मैं ऐसे खानदान की बेटी हूं जो जुलुम के समय इसी तरह हंसुआ उठा लेता है। हिम्मत हो तो आओ पकड़ लो न गट्टा।’’ इतिहास गवाह है कि गरीबों और मजदूरों की स्त्रियों की मान-मर्यादा से खेलने वालों को अपने किए की सजा मिली और उन्हें अपने सामंती व्यवहार पर अंकुश लगाना पड़ा। 

मधुकर सिंह ने अपनी कहानियों में वामपंथ के साथ भी बहस की। उनकी कहानी ‘पाठशाला’ की नायिका मेधा मिश्रा का आकलन है कि ‘सत्ता ने कम्युनिस्ट आंदोलन को भ्रमित किया है।’ वामपंथ से वे सामंतवाद और वर्ण-व्यवस्था के नाश की अपेक्षा करते थे। वामपंथी पार्टियों की सारी कमजोरियों के बावजूद उन्हें उम्मीद मार्क्सवाद से ही लगती थी। ‘समकाल’ उपन्यास का नायक महेंद्र सिंह का कहना है कि ‘दरिद्र देशों में दरिद्रता के खिलाफ एक ही अस्त्र है- मार्क्सवाद’, ‘कम्युनिस्टों का जबर्दस्त बेस हो सकता है हमारे यहां। मगर कोई जमीनी नेता इमर्ज नहीं कर रहा है।’ जनता के आंदोलन और प्रतिरोध से जुड़े जमीनी नेताओं की कहानियां और उपन्यास लिखना उन्हें प्रिय था। यहां तक कि जब उन्हें एक फेलोशिप के तहत उपन्यास लिखने का मौका मिला, तो उन्होंने प्रसिद्ध आदिवासी योद्धा- सिद्धू और कान्हू के संघर्ष पर ‘बाजत अनहद ढोल’ सरीखा उपन्यास लिखा। हालांकि इस उपन्यास को लिखते वक्त भी भोजपुर का किसान आंदोलन उनके अवचेतन पर छाया रहा होगा, ऐसा लगता है।

मधुकर सिंह ने बच्चों और नवसाक्षरों के लिए भी कहानियां और उपन्यास लिखे। भोजपुरी की लोकप्रिय फिल्म ‘दुल्हा गंगा पार के’ की पटकथा भी उन्होंने लिखी। भिखारी ठाकुर की जिंदगी पर आधारित नाटक ‘कुतुब बाजार’ और सामंती-वर्णवादी वर्चस्व को चुनौती देते प्रेम और स्त्री के प्रतिरोध को दर्शाता लोकशैली का नाटक ‘लाखो’ भी जनता की सृजनात्मक ऊर्जा और संघर्ष के प्रति उनके जुड़ाव का उदाहरण है। उनका रेडियो नाटक ‘बाबू जी का पासबुक’ काफी चर्चित रहा। 

मधुकर सिंह साहित्य और संस्कृति की परिवर्तनकारी भूमिका के आग्रही थे। यह आग्रह उनकी कहानियों और उपन्यासों में बार-बार नजर आता है। प्रारंभिक दौर के उनके उपन्यास ‘सोनभद्र की राधा’ से लेकर ‘बेनीमाधव तिवारी की पतोह’ तक में राजनैतिक-सामाजिक आंदोलनों के साथ संस्कृतिकर्म का अभिन्न और अटूट रिश्ता देखा जा सकता है। ग्यारह कहानी संग्रहों और बीस उपन्यासों में जमीन, आजादी, बराबरी के लिए संघर्षरत दलित-वंचित और मेहनतकश-गरीब लोगों के प्रति मधुकर सिंह की जो पक्षधरता है, उसके लिए वे हमेशा प्रासंगिक बने रहेंगे। याद आता है कि जब बथानीटोला जनसंहार के समय लेखकों से बिहार सरकार के सम्मान को ठुकराने की अपील की गई थी, तब मधुकर सिंह बिहार विधान परिषद सभागार के बाहर खड़े होकर सम्मान लेने वालों के विरोध में अपना प्रतिवाद दर्ज करा रहे थे। लखनऊ में आयोजित कथाक्रम पत्रिका के एक आयोजन की मुझे याद है। उसमें शायद ‘कथा में गांव’ विषय पर चर्चा थी। मधुकर जी ने गांवों पर लिखने वालों की उपेक्षा की प्रवृत्ति की जबर्दस्त आलोचना की। राजेेंद्र यादव वहां मौजूद थे। बथानी जनसंहार के विरोध में सम्मान ठुकराने की अपील के बावजूद वे सम्मान ले चुके थे, मधुकर सिंह इसे भूले नहीं थे, उन्होंने वहां मंच से ही उनकी आलोचना की। जिस वर्ग के लिए मधुकर सिंह ने लिखा, उसके साथ कभी गद्दारी नहीं की। यहां तक कि नवसाक्षरों के लिए लिखी गई एक पुस्तिका में भी जनसंहार करने वालों के विरोध में और सामाजिक बदलाव की लड़ाई लड़ने वालों के पक्ष में लिखा।

जैन स्कूल से रिटायरमेंट के बाद दो दशक से अधिक समय मधुकर सिंह ने अखबारों और पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन करते हुए गुजारा। जीवन के आखिरी दिनों में उनकी काफी लालसा थी कि कहीं से कोई नियमित आर्थिक मदद मिल जाए, ताकि ‘इस बार’ पत्रिका फिर से प्रकाशित हो सके, लेकिन ऐसा न हो पाया। मधुकर सिंह को सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड, फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार के अलावा बिहार राजभाषा परिषद का गंगाशरण सिंह और जननायक कर्पूरी ठाकुर पुरस्कार मिला था। यह अलग से कहने की जरूरत नहीं है कि वे बिहार के गौरव थे। लेकिन जिन समुदायों की वर्गीय मुक्ति लिए उन्होंने वर्णव्यवस्था और सामंतवाद के खिलाफ आजीवन लेखन किया, उन्हीं समुदायों के नाम पर सत्ता हासिल करने वालों ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। पंद्रह वर्ष तक दलितों-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को सामाजिक न्याय दिलाने के नाम पर एक शासन चला, जिसमें उन्होंने बथानीटोला जनसंहार के विरोध में सरकारी सम्मान ठुकराने की अपील की, उसके बाद न्याय के साथ विकास और महादलितों-अतिपिछड़ों के उत्थान का सपना दिखाने वाला शासन आया, जिसने उनके साथ और भी मजाक किया। वे चलने-फिरने में असमर्थ थे और सरकार के राजभाषा विभाग की ओर से उनके नाम का चयन जोहान्सबर्ग विश्व हिंदी सम्मेलन में जाने वाले सदस्य के रूप में कर दिया गया। मधुकर जी ने मीडिया से कहा कि सरकार जोहान्सबर्ग जाने के लिए जो पैसा देगी, वह उन्हें दे दे, ताकि अपना इलाज करा सकें। सरकार की बड़ी किरकिरी हुई, तो उसके निर्देश पर प्रशासन ने लगभग एक सप्ताह के लिए उन्हें इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान भेज दिया। वहां से वे फिर वापस अपने गांव लौट आए। अगर मधुकर सिंह अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता छोड़कर इन पार्टियों में शामिल हो गए होते, तो शायद वे भी विधान पार्षद होते या किसी अकादमी के अध्यक्ष-वध्यक्ष का पद सुशोभित कर रहे होते, लेकिन मधुकर सिंह ने ऐसा नहीं किया। इसलिए भी कि उनके भीतर के अर्जुन यानी जगदीश कभी नहीं मरे।

सितंबर 2013 में आरा शहर के नागरिकों, साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने मधुकर सिंह के सम्मान में एक समारोह का आयोजन किया था, जिसमें उनके साहित्यिक योगदान पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई थी और जसम की ओर से उन्हें जन संस्कृति सम्मान से सम्मानित किया गया था। उस समारोह में देश के विभिन्न शहरों से साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी और पत्रकार जिस तरह अपने खर्चे पर आरा आए थे उससे उनके प्रति लोगों का गहरा प्रेम ही जाहिर हुआ था। जीवन में ऐसा अपनापा और सम्मान कम लोगों को हासिल होता है।...

मधुकर जी के निधन के बाद किसी शासकवर्गीय राजनीतिक पार्टी, सरकार और प्रशासन का कोई प्रतिनिधि उनके गांव शोक संवेदना जाहिर करने नहीं पहुंचा। किसी का बयान भी नहीं आया। मधुकर जी तो रेणु जी के साथ 1974 के आंदोलन में शामिल भी हुए थे। लालू यादव और नीतीश कुमार के लिए वे अपरिचित न थे। मालूम नहीं महादलित मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी उन्हे जानते थे या नहीं! उन्हें यह पता है या नहीं कि मधुकर सिंह ने चार दशक पहले ‘लहू पुकारे आदमी’ कहानी में महादलित समुदाय के एक शिक्षित नौजवान की निगाह से समाज में मौजूद भेदभाव और उत्पीड़न को दर्शाया था और उस समाज को बदल देने की जरूरत पर जोर दिया था! वह कोई अपवाद कहानी नहीं थी। दलित-महादलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक समुदाय के गरीब-मेहनतकश मर्द और औरत ही तो उनके उपन्यासों और कहानियों के संघर्षशील नायक-नायिका हैं। भूमि पर अपने अधिकार के लिए लड़ने वाली उत्पादक शक्तियां ही तो उनकी रचनाओं के केंद्र में हैं। शायद इसीलिए लगातार भूमि सुधार को टालने वाली सरकारों, पार्टियों और ‘दुश्मन’ कहानी के जगेसर की तरह उत्पीड़क-शोषक शासकवर्ग के साथ जा मिलने वाले नेताओं ने हमेशा उनकी उपेक्षा की। साहित्य-संस्कृति के नाम पर बनी अकादमियों के लोग भी वहां नहीं पहुंचे।

16 जुलाई को मधुकर सिंह की अंतिम यात्रा माले के आरा कार्यालय से होकर गुजरी जहां साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों और माले के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। माले के बिहार राज्य सचिव कुणाल, पोलित ब्यूरो सदस्य अमर, केंद्रीय कमेटी सदस्य नंदकिशोर प्रसाद, राज्य कमेटी सदस्य संतोष सहर और सुदामा प्रसाद समेत कई जिला स्तरीय नेता-कार्यकर्ता भी अंतिम यात्रा में शामिल थे। उनके गांव धरहरा की माले ब्रांच कमिटी की ओर से उनके सम्मान में कफन में लिपटे उनके शव पर पार्टी का लाल झंडा भी रखा गया था। आरा के साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों और नागरिकों ने बिहार के मुख्यमंत्री से उनकी प्रतिमा बनवाने, उनके नाम पर सड़क का नाम रखने तथा उनके समग्र साहित्य का प्रकाशन करने तथा स्कूल-काॅलेजों के सिलेबस में उनकी रचनाएं शामिल करने की मांग की है। देखना है कि बिहार की सरकार इस मांग पर ध्यान देती है या उसके द्वारा जनता के लेखक की उपेक्षा जारी रहती है। 

मधुकर सिंह के निधन के बाद आरा, पटना, इलाहाबाद, रांची, मधुबनी, गिरिडिह, समस्तीपुर, दरभंगा, बेगूसराय, लखनऊ, दिल्ली समेत कई जगहों पर श्रद्धांजलि सभाएं हुईं, जिनमें मैनेजर पांडेय, आलोकधन्वा, रामधारी सिंह दिवाकर, नीरज सिंह, रामजी राय, प्रणय कृष्ण, मदन कश्यप, रविभूषण, अनंत कुमार सिंह, श्रीकांत, नवेंदु, श्रीराम तिवारी, जितेंद्र राठौर, सुरेंद्र प्रसाद सुमन, दीपक सिन्हा, अनिल अंशुमन, संतोष झा, रवींद्रनाथ राय, बलभद्र, ब्रजकुमार पांडेय, नचिकेता, जितेंद्र कुमार, अशोक कुमार सिन्हा, केदार पांडेय, कौशल किशोर, चंद्रेश्वर, प्रेमकुमार मणि, रामनिहाल गुंजन, जगदीश नलिन, सुरेश कांटक, डाॅ. विंधेश्वरी समेत कई साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने उनसे जुड़ी यादों को साझा किया और उनके साहित्यिक महत्व को रेखांकित किया। उन पर स्मृति लेख लिखने का भी सिलसिला जारी है।

मधुकर सिंह सम्मान समारोह में रविभूषण जी ने भोजपुर यथार्थवादी कथा स्कूल की चर्चा करते हुए उन्हें उसका पहला कथाकार कहा था। हिंदी साहित्य में मधुकर सिंह भोजपुर और बिहार की पहचान तो रहेंगे ही, ग्रामीण समाज के जनवादीकरण की आकांक्षा और उसके लिए जारी क्रांतिकारी राजनीतिक संघर्ष को अपने उपन्यासों और कहानियों का केंद्र बनाने के लिए भी उनका महत्व रहेगा। शासकवर्गीय पाखंड, अवसरवाद और जनविरोधी विरोधी राजनीति का उन्होंने सिर्फ विरोध ही नहीं किया, बल्कि उसके खिलाफ जनता के संघर्ष और प्रतिरोध की राजनीति को बनाने में भी अपनी अहम भूमिका निभाई। मधुकर सिंह जनांदोलनों से लेखकों का प्रत्यक्ष सरोकार जरूरी समझते थे। उन्होंने अपने एक आत्मकथ्य में यह लिखा है कि वे इस यकीन के साथ लिखते रहे हैं कि उनकी कहानियां बदलाव में भागीदार बन सकती हैं। हमारे दौर में इस यकीन को पाना और उस पर कायम रहना ही मधुकर जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 
(मेरा यह लेख शंकर द्वारा संपादित पत्रिका 'परिकथा' में प्रकाशित हुआ था)





Thursday, February 19, 2015

दुश्मन (कहानी) : मधुकर सिंह


दुश्मन 
                                            मधुकर सिंह

पुलिया पर जवानों के अलावे बूढ़े भी थे और सूअर के छौने जैसे दर्जनों बच्चे। बाड़े के भीतर से सूअरों का रिरियाना शोरगुल को अंदर-अंदर चीरता हुआ आकाश में ऊपर निकल जाता था। खुशी के मारे औरतें बीता-भर जमीन के भीतर खुरपी धंसाकर हांफती हैं और भूख को पेट के भीतर दबाए जा रही हैं। भीखम ने लड़कों को डपटकर कहा, ‘जा, भाग जा यहां से। जगेसर मोटर में आएगा। कुचलकर साले चींटी की तरह मर जाओगे।’

लड़के तालियां पीटकर खूब हंसते हैं। मगर सबको भीखम की सुर्ख आंखों से बड़ा डर लगता है। वे खुशियां कुचलते हुए पुलिया के नीचे उतर जाते हैं। 

‘अगवानी कौन करेगा?’ कोई युवक पूछता है।

‘मैं करूंगा, और कौन?’

भीखम ने मुस्कुराकर सुर्ख आंखें छिपा ली हैं। टोले के लोग भीखम को तब समझेंगे जब देखेंगे कि वह भी जगेसर की मोटर में आ रहा है। मगर माथा ठनका। परसों-चौथे रोज बी.डी.ओ. ने पर्चे की बात चलाई थी और तकरीबन सबसे दरखास्त मांग ले गया है। ठाकुर का साला कल रात कुछ लठैतों के साथ धमकी दे गया, अगर बासगीत जमीन की फिर से बात चली तो खून की धारा चलेगी। किसने कहा यह जमीन गैरमजरुआ मालिक है, हमने सालों के पुरखों को बसाया था, जब चाहेंगे निकाल देंगे।

‘क्या सचमुच ठाकुर का साला हमारी बहुओं की छाती काटेगा?’ भीखम ने हवा में सवाल को फेंक दिया है। 

‘संयोग समझो कि उसी जमीन पर जगेसर का भी नया मकान बन रहा है। यही तो देखना है कि जगेसर अपने को अलग कैसे कर लेता है।’

‘घटना टाली नहीं जा सकती न?’

‘जगेसर साथ दे दे, हम लाठी-बर्छे के साथ तैयार हैं। फिर ताकत की बात रह जाएगी कि कौन किसकी छाती काट लेता है।’

भीखम का निश्चय पहले हवा में घुल रहा है। धूप फैलते जगेसर गांव पहुंचेगा। मगर धूप काफी ऊपर छलांग मार चुकी है। जगेसर की गाड़ी का कहीं पता नहीं है। मिनिस्टर होने की वजह से ही तो देर नहीं कर रहा है। 

‘जगेसर होगा, औरत होगी, लौंडे होंगे- और...?...और...?’

‘दो-चार चपरासी। क्या बी.डी.ओ को कभी नहीं देखा?’

‘बी.डी.ओ तो नंबरी है। यह भी तो ठाकुर और मुखिया के ही जमात का है।’

‘आएगा, जगेसर का नाम सुनेगा तो आएगा- उसका बाप आएगा।’

इस टोल में कैसे कोई संभव है। थाना, पुलिस, गांव, शहर, पंचायत, सरकार और जगेसर- सब तो एक ही शैतान का नाम है। 

‘जगेसर जब से राजनीति में गया, एक भी चिट्ठी नहीं दी।’ 

‘सबको चिट्ठी लिखना संभव कैसे है? यहां बी.डी.ओ से पता नहीं चलता कि कितना काम रहता है? जीप की हालत खराब रहती है।’

‘मगर जगेसर इतना तो कर सकता है कि तुम्हारी चिट्ठी में सबको याद कर ले। ऐसा वह क्यों नहीं करता?’ रह-रहकर लोगों में गुस्सा उठता है। मगर यह गुस्सा किस पर है? जगेसर तो अपना है, अपना हिस्सा- अभिन्न और खून।

‘खुशबूदार गंध आ रही है।’ लड़के चहकते हैं। 

‘साले भूखड़ कहीं के!’ भीखम उन्हें डांटता है।’ भीखम उन्हें डांटता है। 

‘दो सूअर और एक मन भात जगेसर काका अकेले खाएगा?’

‘नहीं तो क्या तेरा बाप खाएगा?’

लड़कों की आंखें फट जाती हैं, बाप रे! जगेसर काका मिनिस्टर है कि राकस। वे लोग इतना खा जाते हैं? इसी तरह के बीस-पच्चीस मिनिस्टर हो गए तो गांव-जवार के सब सूअर और भात खाएंगे। 

‘सारे गांव को वे लोग हजम कर जाएंगे तो हम रहेंगे कहां?’ एक युवक बहुत सोच-विचार के बाद पूछता है।

‘रहना जगेसर के ठेंगा पर।’

कोई वयस्क लड़कांे को डांटता है, ‘अब हटो यहां से। हंसी-मजाक का समय नहीं। हमलोग कुछ गंभीर बात कर रहे हैं।’

लड़के गदगद होकर उधर खेत में उतर जाते हैं और मछली की तरह भूख से छटपटाने लगते हैं- जगेसर काका की प्रतीक्षा सही नहीं जा रही है। 

उससे एक बात जरूर पूछनी है- ‘आदमी सरकार होने के बाद आदमी क्यों नहीं रह जाता?’

‘खान-पान बदलने से खून बदल जाता है।’

‘तुम लोगों ने कुछ सुना है? ठाकुर हमारे सर्वनाश के लिए किसान-सम्मेलन और जुलूस-प्रदर्शन कराएगा। दो सौ रुपये आदमी बिक रहा है।’

‘हमें धरती और दुनिया से बेदखल करेगा?’

‘नहीं, खाली गोली से मार देंगे।’

‘जगेसर से कौल लेना है कि हमारा साथ देगा या नहीं?’

सारी तैयारी खत्म हो चुकी है। इंतजामकर्ता भीखम से पूछने के लिए दौड़ा आ रहा है। उनके पास अब कोई काम नहीं है। उन्हें अब क्या करना चाहिए? जगेसर बाबू नहीं आएगा क्या? वह सबको सब्र और धीरज देकर लौटता है, ‘जगेसर बाबू जरूर आएगा। तुम सब जाते क्यों नहीं? पुलिया पर मैं अकेला रहूंगा।’

‘यहीं हमलोग उसे मोटर से उतार लेंगे और कंधे पर गांव ले चलेंगे। अधिकांश लोगों की ऐसी इच्छा है।’

‘पुलिया से गांव तक जो सड़क हमने जगेसर बाबू के लिए बनाई है अपना जगेसर उसी सड़क से आएगा। देखना है, बी.डी.ओ. रास्ता नहीं होने का कैसे बहाना करता है और पर्चे ठाकुर के दरवाजे पर बुलाकर देता है?’

‘जगेसर कंधे पर होता तो बड़ा मजा आता।’ कोई बूढ़ा बोलता है। 

‘धत्’ भीखम चिल्लाता है, ‘जिंदगी-भर करमहीन रहोगे। हमने जो सड़क बनवाई है आखिर उस पर चलेगा! ठाकुर सारी दुनिया को अंधकार में रखता है कि हमारे जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है। बासगीत जमीन के लिए दरखास्त नहीं लिए जाएंगे! जगेसर को इस रास्ते से जाना ही होगा।’

‘जगेसर हमारे साथ खाएगा न!’

‘उसका बाप खाएगा। सरकार की तरह नहीं, आदमी की तरह खाएगा।’ भीखम पुलिया पर अकेला नहीं हो पाता है। अकेले में बहुत तरह की बातें दिमाग को सताती हैं। जगेसर को भी हमारे खिलाफ नफरत तो नहीं है! यहां आता तो देखता जगेसर कि लोग उसके नाम पर कितना जिंदा और ताजा हैं। सब काम-धंधा छोड़ आए हैं। औरतें व्रतमुद्रा में बैठी हैं। मगर अब सब कुछ बेमजा हो रहा है। उसने जेब से कागज और कलम काढ़ी है और दो-चार सवाल जगेसर के लिए नोट करता जा रहा है। उसे जवाब देना पड़ेगा, वरना वह भी हमारा दुश्मन है। एक सवाल बराबर उसे चोट मारता है, अगर ठाकुर जगेसर को बेदखल नहीं कर सकता तो और लोगों को कैसे कर सकता है! भीखम बेचैनी में पुलिया से नीचे उतरता है और पानी के ऊपर ईंट के टुकड़े उठाकर फेंकता जा रहा है। मगर वह किसको मारता है! दो-चार मछलियां नजर आती हैं। भीखम को हंसी आती, लोगों के साथ मछलियां ही पकड़ी जातीं। क्या किया जाए? जगेसर को अगर ऐसी व्यस्तता थी तो खबर भेज देनी चाहिए थी। वह तो शहर में जाकर जगेसर से निपट सकता है, मगर इनका क्या होगा! 

लोगों का दूसरा झुंड फिर चला आ रहा है। उसे संदेह होता है, कहीं जगेसर किसी दूसरे रास्ते से तो नहीं पहुंच गया। वह रास्ता कहां है! 

‘फिर क्यों चले आए तुम लोग?’ वह भूख और गुस्से से तिलमिला रहा है। 

‘तुम पहले चलकर खा लो, भूख लगी होगी।’

‘सब लोग मिलकर खाएंगे।’

भीखम नदी से पानी पीकर उनके पास जाता है और एक की गर्दन को पंजे से रगड़ते हुए कहता है, ‘तुम सब वहीं क्यों नहीं रहते! जगेसर के साथ मैं चला जाऊंगा। ऐसा क्यों नहीं सोचते कि वह सरकार है?’

लोगों का थका हुआ झुंड फिर लौटता है।

भीखम को गुस्सा बहुत चढ़ता है और खत्म भी हो जाता है। इंतजार इतना तनता जा रहा है कि वह गालियां बकता है। उसकी गाड़ी तो आ ले, छूटते ही पहला सवाल करता, ‘अच्छा जगेसर यह तो बताओ, बी.डी.ओ भी तुम्हारे साथ आएगा?’

‘आना पड़ेगा’, जगेसर जवाब देता।

‘हमारे न्योता पर बी.डी.ओ आता क्यों नहीं?’

‘वह शाकाहारी होगा।’

‘बहुत ठीक। जगेसर भाई बहुत ठीक। तुम तो हमारे घर के आदमी हो, अपने सवांग हो। तुम्हारा इंतजार हमें क्यों है?’

भीखम के सवाल के जवाब में भीखम के मुंह से ही आवाज निकलती है, ‘वह साला क्या बताएगा, वह तो बी.डी.ओ का चचा निकल गया। तरह-तरह की बातें बताएगा। क्या कहेगा, सो सबको जानकारी है।’ ‘अच्छा एक बात और। ठाकुर की ड्योढ़ी में हजारों मन गेहूं क्यों है!’ इतना बड़ा मजाक शायद जगेसर नहीं सह सके। मजाक सहने के पहले ही वह मिनिस्टर बन गया है। गांव के लोगों जैसा मजाक सहना पड़े तो बैलून की तरह फट जाए।

कड़ी धूप की हवा उसे जला रही है। दूर से आती हुई बैलगाडि़यों से यही लगता कि धूल उठाती जगेसर की मोटर आ रही है। वह बीड़ी में मन को लगाता है। उसने जगेसर को बढि़या सिगरेट पीते हुए देखा है। खुशबू से तबीयत भर जाती है। बहुत आग्रह के बाद भी भीखम उसका सिगरेट नहीं छूता। बराबर उसकी कोठी पर जाता-आता रहता है। पी.ए. ती.ए. सब उसे पहचानते हैं। बाभन पी.ए. है- लंबी चुटिया और तिलक वाला। बहुत लोग तो उसे जगेसर का भाई समझ लेते हैं। गांव चलने के लिए पूछने पर कहता है, चलता- मगर लड़के वहां बिगड़ जाएंगे। वहां कोई सुसायटी नहीं है। आ तो जाए, खूब मजा आएगा।

उसने देखा कि लोग फिर इकट्ठा हो रहे हैं, मगर यहां नहीं, वहां सड़क पर जिसे उन्होंने जगेसर के लिए बनाई थी। वे लोग जगेसर को कंधे पर उठाने की बात को फिर से तो नहीं सोच रहे हैं? एकदम गलत बात है। आखिर वे बेवकूफ उसे भगवान बनाने पर क्यों तुले हुए हैं? अगर भगवान बन गया तो फिर कभी हाथ नहीं आ सकता। अब तक यही होता रहा है। 

उसका माथा सोचने से उड़ने लगता है, जैसे माथा, माथा नहीं- चूल्हे का तवा हो। लोग जगेसर के लिए नारे लगा रहे हैं। क्रोध चढ़ने लगता है- सालों को एक-एक कर बताऊंगा। उन्हें मना किया है कि जगेसर नारों से बहक जाएगा। फिर तो उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा। लोग वहीं काम कर रहे हैं जिसमें कि जगेसर उसका नहीं रहे। वह चिल्लाता जा रहा है, मगर शोरगुल और नारों के बीच कोई नहीं सुनता। वह झोंक से दौड़ जाता है। 

‘बंद करो नारे।’ उसके काले चेहरे के भीतर गुस्सा सिकुड़ा हुआ है। 

‘जगेसर हमारा नेता है।’

‘मगर नारा और फूलमालाओं के लिए तो मना किया था न? मेरी बात क्यों नहीं समझे।’

वह देखता है कि बहुत पीछे आकाश में धूल उठ रही है और लोग अपनी खुशी को संभाल नहीं पा रहे हैं। भीखम के क्रोध के भीतर से अचानक मुस्कुराहट फूट जाती है। वह उन्हें समझाता है- दोनों तरफ कतार बांधकर खड़े हो जाओ। जगेसर खुद गाड़ी रोक देगा। मगर वे उसकी समझ और काबू के बाहर थे। धूल देह से लिपट गई है और मोटर उसमें डूब गई है। भीखम उसे रोकने के लिए बीच में खड़ा हो जाता है। वे धूल में ताकने की कोशिश करते हैं। लड़कों की आंखें भर गई हैं और वे बहुत दूर भाग रहे हैं। और लोग खेतों में उतर जाते हैं। कोशिश करता है, मोटर के लोग उसे पहचान लें। मगर बीच में धूल काफी मोटी हो गई है। वह जोर से आवाज लगाता है। एक हाथ मुर्दों की तरह बाहर लटकता दिखलाई पड़ता है और मोटर चलती जाती है। वह उनसे आग्रह करता है, ‘सब लोग मिलकर चलो। सारा प्रोग्राम एक साथ करेंगे।’ मगर सुनता कौन है? सब-के-सब भाग रहे हैं। वे मोटर से भी आगे भागना चाहते हैं- आपस में विचित्र किस्म की होड़ है। 

भीखम का सब किया-किराया बंटाधार हो गया। वह गालियां बकता हुआ एकदम मंथर चलने लगता है, ‘जा ससुरा सबके लिए जगेसर शहर से ठेंगा ले आया है। आफत पड़ने पर हमारे पास आए तो बांस कर दूंगा?’

जगेसर अच्छी तरह जान गया है कि सबसे अलग-अलग बात की जाती है। लोग सामूहिक बात पसंद नहीं करते हैं। उन्हें बराबर एहसास रहता है कि हमें कितना पूछ रहा है। उसके भीतर का जगेसर बड़ी कुटिलता से उन्हें भांप गया है। इसीलिए जगेसर की कुटिलता जगेसर से पूछती है, ‘कब चलोगे यहां से?’

‘सूरज के अस्त होने के पहले।’

‘गांव के सुख-दुख में फंस तो नहीं जाओगे?’

‘बिल्कुल नहीं, तुम्हारी कसम।’

‘इनके कितने सवालों का जवाब दोगे?’

‘बेचारे कितने भोले हैं।’

‘भोले नहीं, उल्लू हैं।’

‘यहां गाली मत बको, उधर खूब मजाक उड़ाना।’

उसके पीछे किसी ने कुर्सी लाकर रख दी है और जगेसर उस पर बैठ गया है। धीरे-धीरे सभी जगह पर बैठते जा रहे हैं। उन्होंने देखा कि जगेसर पहाड़ की नोंक पर बैठा है और वे दूर तक घाटियों में फैलते जा रहे हैं। कौन गांव की बात शुरू करे, भीखम तो अभी तक आया नहीं है। जगेसर उन लोगों से क्या बात कर सकता है? लोग उस चुप्पी को तोड़ने के लिए पीछे घूमकर देखते हैं कि औरतें-लड़कियां किस प्रकार बेपर्द होकर जगेसर को घूर रही हैं। या, फिर लड़कों को आंख दिखा रहे हैं कि शोरगुल हुआ तो उठाकर फेंक देंगे। 

‘कहो भरोसा भाई, अच्छे हो?’ जगेसर सन्नाटा तोड़ता है। 

‘अच्छा हूं, भइया।’ हालांकि भरोसा से जगेसर तीन साल छोटा है। 

‘और क्या नाम है तुम्हारा...?’

‘दुखित।’

‘दुखित, तुम कोई नौकरी चाहते हो?’ वह कुटिलता से विचार करता है, थोड़ी देर में यही कहेगा कि नौकरी दिला दो। 

‘पूरे टोल पर आफत है।’

‘और, तुम मानिक दादा...?’

‘परमात्मा से यही प्रार्थना है कि दुनिया में सबसे गरीब और छोटा नाम हटा दो।’

‘सोमारू ठीक से रहता है?’

‘उसकी जवानी में घुन लग गई है।’

वह वक्र होकर बूढ़े को ताक रहा था।

भीखम आया तो आश्चर्य से उसकी आंखें फट गईं। जगेसर के साथ ये लोग कैसे आए हैं। तो क्या इसीलिए उसने गाड़ी नहीं रोकी, उसके साथ ठाकुर और बी.डी.ओ बैठे थे? चलो अच्छा हुआ, ठाकुर और बी.डी.ओ. की कंठी टूट तो गई- (वे लोग इस टोल में आ गए)। फिर भी वह जगेसर को देखकर हंसा। कोई कुर्सी खाली नहीं थी। जगेसर, ठाकुर और बी.डी.ओ बैठे थे। तब भीखम कहां बैठे? वह कुर्सी पकड़कर जगेसर के पीछे खड़ा हो गया। वह इंतजार करने लगा कि जगेसर उससे कुछ कहे। परेशानी तो सबके लिए एक ही है जो काल बनकर यहां तक पहुंच गई है। 

‘तुम भी बैठते क्यों नहीं? पीछे काहे खड़े हो?’ बी.डी.ओ. ने उसे टोका। 

‘हां भीखम, कहीं बैठ क्यों नहीं जाते?’

भीखम ने आंखें तरेरकर जगेसर को देखा। क्या जगेसर कुर्सी छोड़कर नीचे नहीं बैठ सकता था? या, फिर तीनों जमीन पर बैठते, सब लोग बैठे रहे हैं। इनके मकान में कुर्सियों की क्या कमी है?

ससुरे लोग कितने उल्लू हैं। किसी ने प्रतिकार तक नहीं किया। सबकी छाती पर माधो ठाकुर फिर यहां आ गया है। जैसे ठाकुर बाभन हो गया है। वह भी जमीन पर नहीं बैठ सकता।

‘बैठ न, भीखम।’ जैसे जगेसर ने उसे अपनी आवाज से पकड़कर नीचे दबा दिया हो। उसी के पैर के नीचे धम-से बैठ गया। 

‘और बोलो, कैसा कट रहा है?’

‘हम लोग तो भारी आफत में पड़ गए हैं।’

‘वहां भी सरकार आफत में ही चल रही है।’

जगेसर ने देखा कि सब अपने-अपने घर से लोटा लाकर गोलाकार बैठ गए हैं। उसे हंसी आती है। बाप रे! ये लोग कितने भुक्खड़ हैं! भरसक लोग इनसे घृणा नहीं करते। 

मगर वे काफी भूखे थे। जगेसर के लिए और भीखम के लिए जगह छोड़कर सभी बैठे थे। वे पत्तल में भात को जगेसर बुझकर बहुत सहमे हुए थे। भीखम बोला, ‘लोगों ने शौक से तुम्हारे लिए मांस-भात पकाया है। सब लोग और बच्चे भी तुम्हारे लिए व्रत रह गए हैं। वे पत्तल पर कब से तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।’

‘मेरा खाना तो ठाकुर जी के यहां बना है।’ वह सहज भाव से कह गया। लेकिन लोग सकते में आ गए। 

‘तब इनके व्रत का खाना क्या होगा?’

‘और मिनिस्टर होने के बाद मैंने मांस भी छोेड़ दिया है।’ उसने तीन गज लंबा जनेऊ कमीज के भीतर से निकालकर लोगों को हैरत में डाल दिया। 

‘क्या तुम सचमुच हरिजन नहीं रहे?’

भीखम गज-भर जमीन ताकने लगा, जो अपनी होती और फट जाती। ससुर जगेसर राम की गर्दन पकड़कर उसी में समा जाता, मगर ऐसी धरती कहां है? कौन है धरती जो भीखम को और टोले को अपमान से बचाने के लिए फटेगी? सभी जगह तो इसका- उसका पंजा है। सब खूंखार और शैतान है। उसने चिल्लाकर कहा, भाई रे! अपना मिनिस्टर बाबू भी बड़ा आदमी हो गया है- माधो ठाकुर। इसके जय-जयकार से आकाश को चीर दो। ऐसा जोर लगाओ कि तुम्हारे पैर की धरती फटकर बेेकाम हो जाए, जहां जगेसर को दुबारा नहीं आना पड़े।

जगेसर माधो ठाकुर के दरवाजे की ओर जा चुका था। उन्होंने जगेसर को जिंदा रखने के लिए जोर से नारे लगाए। उन्हें जोरों से यही चिंता सताए जा रही थी, जगेसर अपना नहीं रह गया है। धत्तेरे की! आदमी भी जमीन की तरह पराया हो सकता है!

लोगों के पास अभी तक ख्वाहिश जिंदा थी कि वे उसकी मोटर के पीछे-पीछे बहुत दूर तक जाते। मगर उन्हें भूख बेबस कर चुकी थी। भीखम ने उन्हें ललकारा, ‘दुश्मन के लिए हमें इतना मोह क्यों है? जो दुश्मन होगा वही हमारे साथ खाना नहीं खाएगा।’ 



Friday, July 18, 2014

मधुकर होने का मतलब : प्रेम भारद्वाज

जब मधुकर सिंह ने लिखना शुरू किया तब वह नेहरू युग से मोहभंग के बाद आक्रोश, नाराजगी और जनांदोलनों का दौर था. वह दिल्ली माने सत्ता, माने सुविधा, माने तिकड़म से इसलिए दूर रहे, क्योंकि उन्होंने जो रास्ता चुना वह दिल्ली नहीं पहुंचता था.
एदुआदरे गालीआनो ने लिखा है, ‘इस दुनिया में वर्गीकरण की एक अजीब सनक है. और इस वजह हम सबके साथ कीड़ों की तरह व्यवहार होता है.’ मधुकर सिंह के 15 जुलाई को अचानक चले जाने पर अगर ये पंक्तियां सहसा जेहन में कौंधी तो जरूर इसका कोई मतलब है. मतलब दोहरा है, एक उनके लिए, जिनके बारे में मधुकर सिंह जिंदगी की आखिरी सांस तक लिखते रहे. दूसरे खुद लेखक के मुताल्लिक, जिसे कीड़ा नहीं तो ‘कुजात’ जरूर समझा गया. यह एक मधुकर सिंह नहीं, हाशिये का दर्द और उपेक्षा का दंश ङोलनेवाले हिंदी के बहुत सारे ‘मधुकरों’ की तल्ख हकीकत है. हमारे समय में मधुकर सिंह होने का अर्थ क्या है, यह कथाकार मधुकर सिंह के संघर्ष और उनकी व्यथा-कथा की कुछ झलकियों से जाना-समझा जा सकता है.
अंत के पहले तक अंत नहीं मानने की जिद ही किसी लेखक को मधुकर सिंह बनाती है. कायदे से मुङो लिखना चाहिए कि मधुकर सिंह हिंदी कथा साहित्य के महान लेखक थे. उनके निधन से साहित्य के एक युग का अंत हो गया. एक अपूरणीय क्षति हुई है.
लेकिन, मैं ऐसा न लिख कर सिर्फ वहीं बातें करूंगा जो हिंदी समाज में मधुकर सिंह के बनने, होने और मिट जाने की वजहें रही हैं और जिसे हमने भीष्मीय-अश्वत्थामीय आभिशप्तता के रूप में स्वीकार कर लिया है. हमने कबूल लिया है कि जो दिल्ली से दूर रहेगा, वह साहित्य की प्रारंभिक नागरिकता से भी दूर होगा. जो किसी महंत का शिष्यत्व नहीं स्वीकारेगा, वह हाशिये पर ही रहेगा. जो हिंदी में प्रचलित कलावाद की तलवारें नहीं चमकायेगा, उसके जीवन में अंधकार बना रहेगा.
मधुकर सिंह ने अपने एक आत्मकथात्मक लेख में कहा, ‘पुलिसमैन पिता मुङो दारोगा बनाना चाहते थे, लेकिन मैं बन गया लेखक. उन्होंने बचपन में ही मेरी शादी कर दी. जब मैं मैट्रिक में पढ़ता था, तभी बाप भी बन गया. तभी से दो पीढ़ी के बापों का संघर्ष जारी रहा. मेरी ‘तक्षक’ कहानी इसी तनाव की गाथा है. सुराजियों को बर्फ की सिल्ली पर भी वंदे मातरम गाते हुए सुनता था. पुलिस और सरकार के खिलाफ मैंने बराबर लिखा.’ असल में उन्होंने बहुत पहले ही समझ लिया था कि उन्हें करना क्या है. जिस पुलिसिया जुल्म के खिलाफ उनकी कहानियां चीत्कार करती हैं, उस पुलिस व्यवस्था का हिस्सा वह कैसे बन सकते थे. संघर्ष उनकी धमनियों में लहू बन कर जिंदगी की आखिरी सांस तक दौड़ता रहा. संघर्ष उनके जीवन में भी रहा और लेखन में भी.
2 जनवरी, 1934 को बंगाल प्रांत के मिदनापुर में जन्मे मधुकर सिंह दस साल की अवस्था में भोजपुर जिले के धरहरा गांव आ गये. शोषण, विषमता और संघर्ष से मधुकर सिंह का गहरा रिश्ता रहा. बचपन में ही उन्होंने अंगरेजों के विरुद्ध सुराजियों को आजादी के लिए संघर्ष करते देखा. जवान हुए तो आजाद देश में गरीबों-वंचितों, भूमिहीनों, किसानों, मजदूरों के शोषण चक्र में बदलाव नहीं आया. आजादी के चमकते सूरज के उगने के बावजूद जुल्म का स्याह अंधेरा बरकरार रहा. मधुकर सिंह जानते थे कि अंधेरे को दूर करने का एक ही रास्ता है- रोशनी. वे बेजुबानों की जुबान बन कर रचनाओं के जरिये चीखे, तो उन पर तरह-तरह के आरोप लगे. यहां तक कि उन्हें नक्सली लेखक भी कहा गया.
साठ के दशक में जब मधुकर सिंह ने लिखना शुरू किया, तब वह नेहरू युग से मोहभंग के बाद आक्रोश, नाराजगी और जनांदोलनों का दौर था. वह दिल्ली माने सत्ता, माने सुविधा, माने तिकड़म से इसलिए दूर रहे क्योंकि उन्होंने जो रास्ता चुना वह दिल्ली नहीं पहुंचता था. उन्होंने दलितों, पिछड़ों के संघर्ष और उनकी जिजीविषा को अपनी रचनाओं का केंद्रीय विषय बनाया. अगर भोजपुर क्षेत्र के किसानों की व्यथा-कथा, वहां के समाज, राजनीतिक संघर्ष को जानना हो तो मधुकर सिंह के कथा साहित्य में उसे ढूंढ़ा जा सकता है. वह साधारण आदमी थे.
उनकी छोटी जरूरतें थीं, मामूली इच्छाएं. सपना भी खुद के लिए नहीं, उन गरीब किसानों, मजदूरों के लिए देखा जो उनकी कहानियों के पात्र थे. सोवियत लैंड जैसा पुरस्कार जरूर लिया, पर पुरस्कार की राजनीति से दूर रहे. वह सहज, सरल और साधरण थे, जो शायद उनका अपराध बन गया और सजा के तौर पर उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे.
अंत में यान ओत्शानेक की पंक्तियां याद आ रही हैं, ‘कुछ लोगों को अक्सर याद किया जाता है, कुछ हैं जिन्हें हमेशा के लिए भुला दिया जाता है. कुछ ऐसे भी हैं जिनका जिक्र कोई नहीं करता. वे बिना शब्दों के जीवित रहते हैं, मुंह के पीछे, आंखों के पीछे वे पुराने घरों में अविरल गिरते प्रवाहमान इतिहास का आंगन होते हैं.’ मधुकर सिंह उन लोगों में हैं, जिनके रचे शब्द उनकी हमेशा याद दिलाते रहेंगे. खास कर तब जब किसी गरीब किसान की आंखों में आंसू होंगे और वह अपना दर्द बयान करने में गूंगा साबित कर दिया जायेगा.
By Prabhat Khabar | Publish Date: Jul 17 2014 6:02AM | 

Saturday, September 14, 2013

इस लेखकीय जिजीविषा को सलाम : मधुकर सिंह से मुलाकात



युवावस्था में



13 सितंबर, आज कथाकार मधुकर जी से मिला। अपने सम्मान समारोह में दिया जाने वाला वक्तव्य उन्होंने लिखवाया, ताकि उसकी छपी हुई प्रति भी उस दिन लोगों को उपलब्ध हो। वे आजकल दूसरों की आवाज नहीं सुन पाते, पर उनकी याददाश्त बिल्कुल दुरुस्त है। उन्होंने एकदम सधे हुए तरीके से एक सहज सा वक्तव्य लिखवाया। जब मैंने उनके एक मित्र का नंबर पूछा, तो उन्होंने थोड़ा रुक रुककर उसे एकदम ठीक ठीक बताया। मेरे सामने ही अपने पोते को कई लिफाफों के साथ पोस्ट ऑफिस भेजा। मालूम हुआ कि उन लिफाफों में कहानियां हैं। उनका वक्तव्य तो समारोह के ही दिन पढ़ा जाएगा, लेकिन उनकी लेखकीय जिजीविषा कमाल की है, यह इस मुलाकात में भी महसूस हुआ। 
मधुकर जी की पत्नी यशोदा जी 
नहर से लेकर मधुकर जी के घर तक का रास्ता सीमेंटेड हो गया है, वे इससे बहुत खुश हैं और सोच रहे हैं कि समारोह के रोज अपने दरवाजे से ही गाड़ी में बैठके आयोजन स्थल तक जा पाएंगे। उन्होंने लगभग 100 मीटर के इस रास्ते का नाम अपनी पत्नी यशोदा जी के नाम पर रख दिया है और उन्होंने तय कर लिया है कि इस रास्ते को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली लगभग 200-250 मीटर की जो सड़क भविष्य में बनेगी, उसका नाम मधुकर सिंह पथ होगा।

सोवियत लैंड नेहरु अवार्ड 






राजभाषा विभाग के प्रशस्तिपत्र के ही डब्बे में सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड भी पड़ा हुआ है, जिसके बारे में मधुकर जी द्वारा सुनाया गया किस्सा बहुत चर्चित है कि किस तरह किसी को यह एवार्ड मिला तो उन्होंने कहा कि यह कैसे मिलता है, यह मुझे पता है, अगले साल इसे लेकर मैं दिखा दूंगा और सचमुच उन्हें अगले साल यह अवार्ड मिल गया।
रुक जा बदरा : मधुकर सिंह 
उनका एकमात्र भोजपुरी गीत संग्रह ‘रुक जा बदरा’ लगभग अप्राप्य है। खोजते खोजते एक प्रति मिली, जिसका आवरण और कुछ पन्ने गायब थे। उनके पास अपनी सारी किताबों का सेट भी नहीं है। 
अर्जुन जिन्दा है : मधुकर सिंह 




लेकिन शब्द और भावनाएं सिर्फ किताबों में ही तो नहीं बची रहतीं, जिस तरह शहादत के बावजूद ‘जगदीश कभी नहीं मरते’, उसी तरह मधुकर सिंह इसमें पूरा यकीन रखते हैं कि जो लेखक जनता के लिए लिखेगा वही इतिहास में बना रहेगा, यही तो उन्होंने अपने वक्तव्य के अंत में कहा है। ‘जगदीश कभी नहीं मरते’ कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित उनका उपन्यास है, जो ‘अर्जुन जिंदा है’ उपन्यास का परिवर्धित संस्करण है, जो दिखाता है कि सामाजिक बदलाव और जुल्म के राज से मुक्ति की जो लड़ाई आजादी के आंदोलन के दौरान लड़ी गई, वह 1947 में खत्म नहीं हो गई, बल्कि वह जारी रही। जगदीश मास्टर और उनके सहयोगियों ने उस लड़ाई को आगे बढ़ाया। 


दस प्रतिनिधि कहानियां : मधुकर सिंह 
समकाल : मधुकर सिंह 
आंचलिक कहानियाँ : मधुकर सिंह 
धर्मपुर की बहु : मधुकर सिंह 
असाढ़ का एक दिन : मधुकर सिंह 
कथा कहो कुंती माई : मधुकर सिंह 

Add caption
सहदेव राम का इस्तीफा : मधुकर सिंह 
अगिन देवी : मधुकर सिंह 
माई : मधुकर सिंह 
भिखारी ठाकुर : मधुकर सिंह 
माइकल जैक्सन की टोपी : मधुकर सिंह 

लाखो : मधुकर सिंह 



22 सितंबर को आरा नागरी प्रचारिणी सभागार में मधुकर जी का सम्मान समारोह हो रहा है। भीषण उमस और कई किस्म की व्यस्तताओं के बीच आरा के साहित्यकार इस सम्मान समारोह की तैयारी में लगे हुए हैं। आमंत्रण पत्र छप चुका है, पर वह अंतिम नहीं है। कुछ लोगों का नाम न चाहते हुए भी संपर्क न हो पाने के कारण छूट गया है। हमने खासकर यह कोशिश की है कि वे सारे लोग जो मधुकर जी के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित रहे हैं, बल्कि इस दौरान समय निकालकर उनके गांव जाकर उनसे मिलते रहे हैं, वे जरूर इस समारोह में शामिल हों। आमंत्रण पत्र छप जाने के बाद हमें सूचना मिली है कि सुभाष शर्मा, रामधारी सिंह दिवाकर, सत्येंद्र कुमार और शिवकुमार यादव भी समारोह में शिरकत करेंगे। अभी पटना से और भी लोग शामिल हो सकते हैं। मधुकर जी ने बताया कि सुभाष जी अभी कुछ ही रोज पहले उनसे मिलकर गए हैं।
हमारी कोशिश है कि अधिकांश लोगों को मधुकर जी के बारे में अपने विचार व्यक्त करने का मौका मिले। बस यह जरूर अपेक्षा है कि जो लोग भी आ रहे हैं, उनके आने की सूचना हमें पहले मिल जाए और अपना वक्तव्य रखते हुए वे दूसरे वक्ताओं की संख्या का भी ख्याल रखें। जो रचनाकार सम्मान समारोह में शामिल होना चाहते हैं, वे सम्मान समारोह समिति के संयोजक जितेंद्र कुमार को मोबाइल नंबर 09931171611 पर इसकी सूचना दे दें, तो हमें समारोह को व्यवस्थित रूप से संचालित करने में सहूलियत होगी।
जिस तरीके से भी इस समारोह की सूचना आप तक पहुंचे उसे आप आमंत्रण ही समझें। आप आएं और मधुकर सिंह के प्रति अपनी भावनाओं को साझा करें।