Saturday, May 5, 2018

मार्क्स का पोस्टर (कविता) : सुधीर सुमन


(यह कविता जब मैंने लिखी थी, तब हिंदी साहित्य में बाजार का विमर्श जोरों पर चल रहा था। इसमें जो तिलकधारी है, वह किसी जाति
विशेष को ध्यान में रखकर मैंने नही लिखा था, बल्कि वह तमाम पोंगापंथी और धंधेबाज लोगों का प्रतीक है। व्यक्तिगत जीवन की मुश्किलें-अभाव अपनी जगह थे। मुझे लग रहा था कि किसी भी विचारक को संपूूर्णता में जानने-समझने का माहौल नहीं है। खासकर, विवेकानंद पर दक्षिणपंथियों से तीन साल पहले काफी बहस हो चुकी थी।

हालांकि इस कविता में काव्यात्मकता शायद नहीं है, क्योंकि जिस पत्रिका का मैं बाद में संपादक बना, उसी से साथी इरफान के हस्ताक्षर वाले पत्र के साथ यह लौट आई थी। फिर मैंने कहीं नहीं भेजा। अब भी किसी साथी की कविता जब नहीं छाप पाता और उसकी शिकायत आती है, तो यही कहता हूं कि कविता न छपी, तो आप भविष्य में संपादक जरूर बन सकते हैं। खैर, यह तो हुई मजाक की बात।

आज मार्क्स की 200 जयंती पर मुझे इस कविता की याद आई, सो इसे ब्लाॅग पर लगा रहा हूं। यह खतरा उठाते हुए कि ‘ मार्क्स  का पोस्टर/ बड़ा ही खूबसूरत/ बेचता है एक तिलकधारी’ को आधार बनाकर जाति को ही विमर्श का केंद्र बनाये रखने वालों को  मार्क्सवाद को गरियाने का एक और मौका मिल जाए, क्योंकि संपूर्णता में देखने की उनकी भी आदत नहीं है। खैर, मेरा मानना है कि कविता में तिलकधारी जो है वह हर जाति-समुदाय के भीतर हैं। यह जरूर है कि कुछ जातियों-समुदायों के भीतर ज्यादा है। )



चक्कर लगाता हूं

दिन-रात

इच्छाओं के बाजार में

तौलता हूं जेब

छांटता हूं

सपनों को तोड़-तोड़

फिर भी

नहीं होती कम

भूख।

क्या खरीदूं

क्या छोड़ दूं

कशमकश में

गुजरता है हर दिन।

एक सनातन प्रश्न

चिपटा रहता है साथ

दुनिया ऐसी क्यों है?

सदियों से इतने बंधे हाथ

ऐसा क्यों है?

विचार, सुंदर विचार

खोकर रह गए

दिमाग की अनंत गहराइयों में

व्यवसायी हावी रहे

विचारों के संसार में

और आम आदमी

नहीं उबर सका

उपभोक्तापन से।

जो बिकता अधिक

वही बेचते वे

संशोधन के साथ।

बिकते हैं शिखर चित्र

ऊंचे-ऊंचे दामों में

बिकते हैं विचारक

कटे-छंटे रूपों में।

मैंने तो

देखा एक अजीब सपना

मार्क्स का पोस्टर

बड़ा ही खूबसूरत

बेचता है एक तिलकधारी।

जेब टटोलती उंगलियां

शरम से हो जातीं पानी-पानी

अगर आंखें नहीं खुलती।

तमन्नाएं मारती हैं जोर

चाहिए एक पोस्टर

सूनी दीवार पे

पता है मुझे

खरीद नहीं सकता

खरीद भी लूं तो

नहीं हो सकता संतुष्ट

सौदे से

मजबूरन उठा के पेंसिल

खींच देता हूं

एक दाढ़ी वाली तस्वीर

क्या फर्क पड़ता है

छायाप्रति नहीं है तो

छायाएं तो धोखा देती हैं

मैंने कर दिया- पुनर्सृजन

और चिपका दी तस्वीर

दीवार पे।

Thursday, April 19, 2018

रिटायरमेंट के बाद बनवारी जी ने भोजपुरी में एम.ए. किया था

कवि बनवारी राम को आरा शहर के साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं की ओर से श्रद्धांजलि 


कवि बनवारी राम के निधन पर आरा शहर के साहित्यकारों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। 17 अप्रैल 2018 को देर रात आरा के न्यू प्रकाशपुरी मुहल्ले में उनका निधन हो गया। श्रद्धांजलि देने वालों में वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन, वरिष्ठ कवि जगदीश नलिन, कथाकार नीरज सिंह, आलोचक रवींद्रनाथ राय, कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार, जनपथ पत्रिका के संपादक अनंत कुमार सिंह, कवि बलभद्र, कवि जनार्दन मिश्र, सुमन कुमार सिंह, अरुण शीतांश, हरेंद्र सिन्हा, सुनील श्रीवास्तव, सुधीर सुमन, सुनील चौधरी, आशुतोष कुमार पांडेय, चित्रकार राकेश दिवाकर, कवि रविशंकर सिंह, रंगकर्मी श्रीधर, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्त्ता दीनानाथ सिंह और दिलराज प्रीतम आदि प्रमुख हैं। 

बनवारी राम के सहज और मिलनसार स्वभाव को सबने शिद्दत से याद किया। रामनिहाल गुंजन ने बताया कि बनवारी राम बिहार सरकार के सहकारिता विभाग में अंकेक्षक की नौकरी करते थे। गंभीर पाठक थे और उनकी पाठकीय अभिरुचि में पर्याप्त वैविध्य था। नौकरी के दौरान जब पटना में थे तब वहां की और जब आरा लौटे तो आरा की साहित्यिक गोष्ठियों में उनकी अनिवार्य उपस्थिति रहती थी। वे भोजपुरी की अपनी कविताओं का संग्रह छपवाना चाहते थे, पर उनकी वह इच्छा अधूरी रह गई। बलभद्र के अनुसार भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका के पुराने अंकों में भी उनकी रचनाएं छपी थीं। सुनील श्रीवास्तव ने जानकारी दी कि रिटायरमेंट के बाद बनवारी जी ने भोजपुरी में एम.ए. किया था। उनकी कविताएं स्वतःस्फूर्त होती थीं। वे बड़े ही सहज कवि थे। सुमन कुमार सिंह ने उन्हें आशु कवियों की परंपरा का एक सचेत कवि बताते हुए कहा कि उन्हें अपनी कविताएं याद होती थीं। मातृभाषा भोजपुरी की उनकी कविताओं में व्यंग्य व हास्य का पुट होता था, जो श्रोताओं को सहज ही आकर्षित किया करता था। 
दैनिक भास्कर 
आरा शहर में होने वाली नुक्कड़ कविता-गोष्ठियों के साथ-साथ गंभीर, विचार-गोष्ठियों, वैचारिक सेमिनारों और सांस्कृतिक आयोजनों में कवि बनवारी राम अक्सर मौजूद रहते थे। अब साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी कमी खलेगी। 

विचारधाराएं भी सत्ता के चरित्र पर असर डालती हैं


संगोष्ठी रिपोर्ट 
"धर्म और जातीय अंधवाद के दौर में लोकतंत्र की चुनौतियां (सन्दर्भ : संविधान, स्त्री और राष्ट्र)” 


15 अप्रैल, 2018 को मऊभंडार (घाटशिला) में आई.सी.सी. मजदूर यूनियन के हाल में प्रलेसं और भारतीय महिला फेडरेशन की घाटशिला इकाईयों ने संयुक्त रूप से बैठक सह गोष्ठी का आयोजन किया. गोष्टी का विषय था "धर्म और जातीय अंधवाद के दौर में लोकतंत्र की चुनौतियां (सन्दर्भ : संविधान, स्त्री और राष्ट्र)”. बेहद अनौपचारिक तरीके से विषय पर मुक्त रूप से बोलने और बातचीत के अंदाज गोष्ठी चलेगी, ऐसा फॉर्म अनायास ही बन गया था. कुर्सियां गोल घेरे में लगा ली गयीं और बातचीत का आगाज़ हुआ. शेखर मल्लिक ने सूत्रधार का दायित्व ले लिया और भूमिका देते हुए कहा कि आज हम डॉ. आंबेडकर को याद कर रहे हैं. कठुआ और उन्नाव की जघन्य घटनाएँ हमारे समय में घटित हो रही हैं. ये समय किस तरह मानवीयता के प्रतिकूलता का है ! दलितों और हाशिये के समाज और वर्गों की बात नहीं, हिन्दू और अन्य जातियों की बात नहीं... धीरे धीरे ये उन्माद सबको खा जायेगा. रविश कुमार ठीक कहते हैं कि हमारे बच्चे हत्यारे बन रहे हैं या हत्या(रों) के समर्थक ! स्त्रियों की कोई जगह ही नहीं है, वे वस्तुएं हैं. वे राजनीति के लिए इस्तमाल किये जाने वाली डिस्पोजल वस्तुएं हैं ! 

कॉमरेड शशि कुमार ने अपनी बात की शुरुआत इस तरह की कि दुनिया में दो तरह के दर्शन हैं - गिरने का दर्शन, जैसे नीच, अधम और पतित... मिथकों में जैसा जिक्र है कि द्वापर युग, त्रेता युग और कलयुग जिसमें उत्तरोत्तर आदमी और पतित हो जायेगा. दूसरा है वैज्ञानिक दृष्टि कि ज्ञान विज्ञान से प्रगति होगी और समाज को बेहतर बनाया जा सकता है. उनके अनुसार हिंदू धर्म निरंतर गिरते जाने का दर्शन है, जो विभिन्न युगों के माध्यम से यह बताता है कि मनुष्य का निरंतर पतन हो रहा है, जबकि ठीक इसके विपरीत वैज्ञानिक दर्शन है, जो यह बताता है कि मनुष्य ने ज्ञान-विज्ञान के बल पर प्रगति की है, जो यह यह विश्वास जगाता है कि समाज जिस रूप है उसे उससे बेहतर बनाया जा सकता है। अगर हमारे यहाँ राजतन्त्र भी रहा हो तो उसका एक कायदा कानून होना चाहिए. लेकिन हमने देखा है कि सांस्कृतिक रूप से स्त्रियों के साथ हमेशा भेदभाव वाला रवैया ही हमारे यहाँ रहा है. सांस्कृतिक मानसिकता से ही ऊँच नीच का पता चलता है जैसे हमारे यहाँ जो गालियां हैं, वे या तो जाति के नाम से या फिर स्त्री के अंगों से जोड़कर दी जाती हैं। शूद्रों को (दलितों को) वेद पढ़ना-सुनना निषिद्ध कर दिया गया, सुन लिया तो कानों में पिघला शीशा डाल दो, कंठस्थ कर लिया तो उसकी जीभ चीर दो जैसे सज़ा के प्रावधान तय किए गए। जब आपने उन्हें (शूद्रों को) अपना माना ही नहीं, तो फिर उस पर अधिकार क्यों जताते हैं ? शशि जी के मत में, ब्राह्मणों से नहीं ब्राह्मणवाद से लड़ना है. उन्होंने कहा कि सब बातों का एक अर्थशास्त्रीय पहलू है, वह विवेचना भी होना लाज़मी है. सचमुच आज विस्फोटक स्थिति है. बाबरी मस्ज़िद गिरी और उधर चुपके से उदारीकरण लागू हो गया. पोखरण में विस्फोट कर सीना चौड़ा करते रहे, उधर मल्टीनेशनल कम्पनियाँ पिछले दरवाजे से घुसा दी गयीं. सांप्रदायिक, जातिवादी और लैंगिक उत्पीड़न के पीछे मौजूद आर्थिक कारकों की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा कि 1991 के बाद देश को सांप्रदायिक आग में झोंककर नई आर्थिक नीति लाई गई, देश की पूरी संपदा पर कब्जा करने की होड़ लग गई। अब तो पूरी राज्यसत्ता भेड़ियों की संस्कृति में तब्दील हो गई है। वह तर्क और विवेक के बजाय अंधआस्था, उन्माद, नृशंसता और भेदभाव को बढ़ावा दे रही है। ऐसे में अलग-अलग उससे लड़ने के बजाए एकजुट होकर लड़ना होगा। दलितों-स्त्रियों-आदिवासियों सबको मनुवादी-ब्राह्मणवादी ताकतों और खुद अपने भीतर मौजूद उसके प्रभावों से लड़ना होगा। टुकड़ों में लड़ाई लड़ने के बजाए संपूर्णता में मानवमुक्ति की लड़ाई लड़नी होगी। जिस तरह के समाज का सपना संविधान निर्माता अंबेडकर ने देखा था, भाजपा तो उसकी विरोधी है ही, दूसरी पूंजीवादी पार्टियां और मायावती या रामविलास पासवान का भी उससे सरोकार नहीं है।

समकालीन जनमत के संपादक सुधीर सुमन ने कहा कि अगर धर्म का मकसद समाज को बेहतर बनाना है तो वह अलग बात है लेकिन अगर घर्म की आड़ में मनुष्यता छीनी जा रही है, और लोकतंत्र में वह बाधक है तो जरुर उससे लड़ाई है. आज प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि अम्बेडकर न होते तो वे भी न होते. वे ऐसा भी कह सकते थे कि मैं आंबेडकर बनना चाहता था !! लेकिन विडम्बना देखिये कि अम्बेडकर यूँ ही मनुस्मृति के खिलाफ नहीं थे, संविधान बनने के बाद आरएसएस का जो मुखपत्र है ऑर्गेनाज़र, उसने ने लिखा, "स्पार्टा के लायकरगस और पर्शिया के सोलोन से भी पहले, मनु की विधि लिखी जा चुकी थी. आज भी मनुस्मृति में दिए गए उनके कानून पूरी दुनिया की प्रसंशा पाते हैं और लोग उनका पालन करने के लिए तत्पर रहते हैं." तो ये दुःख संविधान बनने के समय है ! आज मनुस्मृति को पढने की बात नहीं है. अपने संस्कारों की जांच करें और मनुस्मृति से मिलाएं. अगर वह मिलता है तो वह खतरनाक है. 


आज कोई कहता है (कठुआ के सन्दर्भ में) कि हादसे को राजनीतिक रंग मत दीजिये. अगर राजनीतिक रंग 'है' तो उस रंग को न दिखाना खतरनाक है. सुधीर सुमन ने कहा कि स्त्री मुक्ति को अंबेडकर जाति उन्मूलन के लिए अत्यंत जरूरी समझते हैं और जाति उन्मूलन को राष्ट्रवाद की बुनियादी शर्त मानते हैं। आजादी के आंदोलन के दौरान डॉ. अंबेडकर, भगतसिंह और प्रेमचंद ने जोर देकर यह सवाल उठाया कि जो नया राष्ट्र होगा, वह किसका राष्ट्र होगा, वह कैसा राष्ट्र होगा? आज जो लोग तिरंगा लेकर नृशंस बलात्कारियों के पक्ष में जुलूस निकाल रहे हैं, जो नफरत, भेदभाव और शोषण-उत्पीड़न पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के निर्लज्ज पक्षधर बने हुए हैं, जो धर्म की आड़ लेकर इंसानियत पर कहर ढा रहे हैं और राष्ट्रीयता के नाम पर विभिन्न समुदायों और मेहनतकशों और आदिवासियों के लोकतांत्रिक आधिकारों को रौंद रहे हैं, दमनकारी कानूनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे भगत सिंह और अंबेडकर के सपनों की हत्या कर रहे हैं, वे राष्ट्रभक्त नहीं हो सकते। अंबेडकर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को लोकतंत्र की बुनियाद मानते थे, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि 'अगर हिन्दू राज स्थापित होता है तो वह इस देश के लिए एक बहुत बड़ा संकट होगा। हिन्दू चाहे जो भी कहें परंतु यह एक तथ्य है कि हिन्दू धर्म, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए खतरा है। वह प्रजातंत्र का दुश्मन है। हमें हिन्दू राज को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए।'

सुधीर सुमन ने उदय प्रकाश की बहुचर्चित कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ के एक संदर्भ के हवाले से कहा कि विचारधाराएं भी सत्ता के चरित्र पर असर डालती हैं। विचारधाराएँ भी सत्ता के चरित्र को परिभाषित करती हैं. आज भाजपा-आरएसएस के सत्ता पर काबिज होने के बाद अकारण ही दलितों-स्त्रियों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों पर हमले नहीं बढ़ गए हैं. अकारण अवैज्ञानिकता, अंधआस्था और उन्माद को बढ़ावा नहीं मिल रहा है। यह सबकुछ योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है। देश की बच्चियां और स्त्रियां इतनी असुरक्षित कभी न थीं, आज किसान ही नहीं नौजवान भी बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं. श्रमिकों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा हैं। इसके खिलाफ किसान, छात्र-नौजवान, दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक मजदूर सब संघर्ष कर रहे हैं। मौजूदा फासिस्ट निजाम चाहे जितना षड्यंत्र करे, जितना दमन ढाए, उसे एक रोज खत्म होना होगा। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और अंधराष्ट्रवाद की राजनीति के बल पर तानाशाही लंबे समय तक नहीं चलेगी। दुनिया में हिटलर और मुसोलिनी का क्या अंजाम हुआ था, उसे नहीं भूलना चाहिए। 


सुधीर सुमन ने कहा कि भगत सिंह, अंबेडकर, राहुल सांकृत्यायन सरीखे चिंतकों-विचारकों ने राजनैतिक-आर्थिक बदलाव के साथ-साथ भेदभाव पर आधारित सामाजिक ढांचे को बुनियादी रूप से बदलने की बात की थी। इंसान विरोधी धर्म और जाति के क्षय का आह्वान किया था। लेकिन आरएसएस है जो मनुस्मृति के प्रावधानों और वर्णव्यवस्था को कट्टरता से लागू करने की पक्षधर रही है। संविधान में मनुस्मृति के कानूनों को जगह नहीं देने पर उसका विरोध तो था ही, उसने स्त्रियों के लोकतांत्रिक अधिकारों से संबंधित हिंदू कोड बिल का तीव्र विरोध किया था।


ये कौन लोग हैं, एक पुराने समाज को बचाए रखना चाहते हैं ? अम्बेडकर ने 1948 में कानून मंत्री रहते हुए हिन्दू कोड बिल का संशोधित-परिवर्द्धित ड्राफ्ट सदन के सामने रखा, लेकिन लगभग पचास घंटे की बहस के बाद सरकार ने उसे एक साल के लिए ठंढे बस्ते में डाल दिया। बाद में नेहरू ने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि विवाह और तलाक से संबन्धित 55 धाराओं को पारित करवा लिया जाए, बाकी क़ानूनों को प्रथम आम चुनाव के बाद गठित नई सरकार द्वारा पारित करवाएगी।लेकिन आखिरकार 55 में से 3 धाराओं को पारित करने पर सहमति बनी, जिससे क्षुब्ध होकर अंबेडकर ने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफ़ा देते हुए उन्होंने कहा था, "वर्गों के बीच, लिंगों के बीच असमानता, जो हिन्दू समाज की आत्मा है, को ज्यों का त्यों अनछुआ छोड़ दिया जाय और आर्थिक समस्याओं से सम्बन्धित कानून दर कानून पास किये जांय, तो इसका मतलब होगा हमारे संविधान का प्रहसन बना देना और गोबर के ढेर पर महल बनाना."


सुधीर जी ने आगे बातचीत में कहा कि कोई भी समाज और कोई भी देश लंबे समय तक उन्माद की स्थिति में नहीं रह सकता. लेकिन बेहतर है कि बहुत ज्यादा गंवाने से पहले उसे होश आ जाए. उसकी तैयारी हमलोगों को करनी है, यही बड़ी चुनौती है. प्राकृतिक संसाधनों की जो भीषण लूट हो रही है, उसके खिलाफ लड़ना होगा। पर्यावरण की रक्षा करनी होगी। इसकी वजहों को समझाना होगा कि नौजवान और किसान क्यों आत्महत्याएं कर रहे हैं ? क्यों कोई ईश्वर उन्हें नहीं बचा रहा है ? राहुल सांकृत्यायन के उद्धरण का जिक्र करते हुए उन्होने कहा कि ये समस्याएं, अगर आप मानते हों ईश्वर ने पैदा किया है तो जान लीजिए किसी ईश्वर ने इन्हे नहीं पैदा किया। इन्हें मनुष्यों ने पैदा किया है और मनुष्य ही इन्हें हल कर सकते हैं. उन्होंने युवा कवि विहाग वैभव की कविता को उद्धृत किया-


"यह सही समय है,

जगत की पुनर्रचना की

मुनादी पिटवा कर इसी दम

सृष्टि की सभी कार्यवाहियां स्थगित की जांय...

...यह सही समय है मनुष्यता की पुनर्रचना की." 


मतलब पुनर्रचना बहुत जरूरी है. भीषण यथास्थिति में रुका हुआ, दर्शक बना हुआ समाज है. जैसा कि कवि और टीवी प्रोड्यूसर कुबेर दत्त ने अपनी कविताओं में यह संकेत किया था कि टेलीविजन में मौजूद भेड़िये दर्शकों को भेड़ियों में तब्दील कर रहे हैं। 

उन्होंने कहा कि आग लगाने के चंद तीलियाँ भी काफी होती हैं, तो उस आग की जरूरत है इस समाज को, अगर इस समाज को बचना है तो। क्योंकि बर्बरता या फिर समाजवाद- यही चुनाव है उसके सामने। जाहिर है हमें बर्बरता के विरुद्ध समाजवाद के विकल्प के लिए संघर्ष करना है। 

कवियत्री डॉ. सुनीता देवदूत सोरेन ने कहा कि स्त्री को अपनी ताकत पहचाननी होगी. ये सबसे पहली और जरूरी बात है. समाज में औरत को अपनी सोच को आज़ाद करना होगा. संकीर्णताओं से उबरना होगा. आज सत्ता का काम अम्बेडकर को हथियाना है, लेकिन उनकी विचारधारा से इन्हें कोई लेना देना नहीं है. हमारा संविधान एक सम्प्रभुतावादी, पंथ निरपेक्ष संविधान है और आज इसी पर चोट की जा रही है. संविधान की हम बात करें तो इसमें सबके लिए न्याय है, विचार आदि की आज़ादी है. मगर आज वास्तविकता ठीक इसके उलट है. आज हमें (आज की पीढ़ी को) संविधान को जानने की जरूरत है. जो इसे सच्चे अर्थों में जानेगा वह समानता और न्याय की बात करेगा. संकट इस बात का है कि वैधानिक प्रावधानों का महत्त्व और उसकी इफेक्टिव्नेस को समाप्त कर दिया गया है. डॉ. सुनीता ने कहा कि वर्तमान माहौल में संविधान की मूल आत्मा के साथ ही छेड़छाड़ किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय में भी ऐसे लोग बैठे हैं, जो दलितों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों का दर्द नहीं समझते - जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। संविधान ने हमें भले ही बराबरी का अधिकार दिया हो, पर वह अधिकार हमें हासिल कितना होता रहा है और अब तो स्थिति अधिक खराब होती जा रही थी। हाल के दिनों में दलित-स्त्री-आदिवासी का उत्पीड़न बढ़ा है। इनके लिए बनाए गए तमाम प्रावधानों को निष्प्रभावी बनाया जा रहा है। जहां तक स्त्रियों की बात है, तो अभी भी बराबरी और आजादी उनके लिए दूर की कौड़ी है। उन्हें आगे बढ़कर सोचना होगा कि उन्हें किस तरह के समाज की जरूरत है। वे सही प्रतिनिधि चुनकर भी लोकतंत्र पर मंडरा रहे खतरों से एक हद तक लड़ सकती हैं। 

आज स्त्रियों की बात करें तो वहां जो मर्दों की हिप्पोक्रेसी है, वह घातक है. चुनाव जो लोकतंत्र की आधार तंतु है, उसमें देख लें कि किस प्रकार का लैंगिक भेदभाव और दोहरापन है. असल में पुरुष डोमिनेंस है. वहां अगर महिला चुनाव लड़ रही है, जीत भी गयी है, तब भी निर्णयों पर उसका अधिकार नहीं. वे उसके घर के मर्द द्वारा तय किये जायेंगे ! मर्दों से ही उसका काम संचालित होगा, जैसा कि उसका जीवन. ये एक ‘टर्म’ इधर बहुत प्रचलित है - पी.एम्. यानि 'मुखिया पति'. वास्तविक और अंतिम फैसले यही मुखिया पद पर चुनी गयी स्त्री का पति लेगा, चूँकि स्त्री को तो वह क्षमता ही नहीं है ! स्त्री किसी भी स्तर पर स्वतंत्र नहीं है. यह भयानक बात है. जबकि स्त्रियों को अपनी 'इज्जत' से जोड़कर हिंसा पर उतारू समाज जो करता है, वह गलत है. दलितों और आदिवासियों के शोषण में भी इनकी स्त्रियों का उत्पीड़न बड़ा है और इस ओर देखना होगा. हम यानि समाज भूल जाता है कि यह स्त्री और पुरुष दोनों से मिलकर बनता है. 


डॉ. सुनीता ने आव्हान स्वरूप दुष्यंत की पंक्तियाँ '... इसी हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए. मेरे दिल में न सही, तुम्हारे दिल में सही. हो कहीं भी आग मगर जलनी चाहिए.' सुनाईं. 

चूँकि यह गोष्ठी मुक्त सत्र की भांति चली अत: श्रोताओं से अपनी बात रखने के लिए आग्रह किया गया और गोष्ठी परस्पर संवाद में बदली तो डॉ. देवदूत सोरेन ने कहा कि ये जो कुछ भी हो रहा है वह भयानक तो है, मगर मैं चाहता हूँ कि इसकी इंतिहा हो जाय. तब लोग खुद जागेंगे और सब पलट जायेगा. इस पर शशि जी ने कहा कि हाँ ये तो ठीक है मगर डर है कि कहीं बहुत ज्यादा खोने के बाद न जगें ! 


सुधीर सुमन ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन समाज की कूपमंडूकता के खिलाफ बेहद आक्रामक थे। भगतसिंह ने यथास्थिति के शिकंजे से मुक्ति के लिए क्रांतिकारी भावना की जरूरत पर ज़ोर दिया था। आज लोकतंत्र वाकई खतरे में है, नौकरियां खतरे में हैं. हमारी बच्चियां और स्त्रियाँ खतरे में हैं. 

अंत में श्रोताओं के सवाल लिए गए. युवा छात्र शुभम के मन में कई प्रश्न घुमड़ रहे थे. उसने पूछा कि आज का युवा किधर जाये ? कौन सी विचारधारा और झंडे के नीचे रहे ? आज तो युवाओं के समक्ष निराशा में आत्महत्या जैसी स्थितियां हैं. शुभम को जबाव देते हुए सुधीर सुमन ने कहा कि पहले तो आप टीवी के कंज्यूमर न बनें ! टीवी बस आपको उपभोक्ता बना रहा है. वो जो देता है आप लेते हैं. अगर जेएनयू का सच जानना है तो जेएनयू में जाकर कुछ दिन रहिये. वो सारा सच सामने आ जाएगा. जेएनयू कैसे बेहतर है, यह समझ जाइएगा। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव से बताया कि एक दफे इलाहाबाद में वाम दलों ने सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ एक संयुक्त कार्यक्रम रखा था और जैसा कि आज हम देख रहे हैं कि वकीलों में भी साम्प्रदायिकता घर कर गयी है. उस सभा में उन्हीं में से किसी ने 'पाकिस्तान जिंदाबाद' कहा. और वामपन्थियों को देशद्रोही बताते हुए हमला कर दिया. सच तो ये है कि वामपंथी ऐसा नारा लगाने की सोच भी नहीं सकते ! फासिस्ट व्यवस्था से आपको लड़ना पड़ेगा. आप गांधीवादी तरीके से लड़ेंगे तब भी वे हमले करेंगे। आपको दोस्त खुद खोजना होगा. स्वयं परखो और अपनी राह तय करो। 


कॉमरेड शशि ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आज नौजवानों को विचार से तय करना होगा. आज जो व्यवस्था है उसमें जो कारण हैं, कारणों में जायेंगे तो सही जगह पहुंचेंगे. समाज कैसा होना चाहिए ? क्या जैसा है वैसा ठीक है? तो फिर खाइये, पीजिये, मौज से रहिये और अगर लगता है कि इसे बेहतर होना चाहिए तो सोचिये कैसे, किस रास्ते से ? वर्तमान समाज को युवा समझें. 

सुधीर सुमन ने कहा कि गाँव में हमारे पड़ोसी मुस्लिम थे. उन्होने मेरा कभी अहित नहीं किया। नब्बे के दशक में मैं हिन्दुओं से पूछता था कि दुनिया की छोड़ो, क्या तुम्हारे पड़ोसी मुसलमान ने तुम्हारा कोई अहित किया है. तो वे बोलते थे- नहीं. फिर ? युवा रेशनल बनें. तर्क करें। हम सब अपने अनुभवों से, संघर्षों से यहाँ पहुंचे हैं. हम आपको कोई बना बनाया रास्ता नहीं दे सकते। आपको खुद चुनना है. प्रेमचंद को पढिए, भगत सिंह को पढ़िए. राहुल सांकृत्यायन को पढिए। "राग दरबारी'" ही पढ़िए, जो बहुत रोचक भी है, तो आप शासकवर्ग के पाखंड और आज की स्थिति समझ जाएंगे। शशि जी ने पकिस्तान की लेखिका फौजिया सईद के संस्मरण के हवाले से कहा कि उन्होंने लिखा है कि वे लाहौर के वेश्यालयों में गयी तो छेड़ी नहीं गयीं, बदतमीजी का शिकार नहीं हुईं, लेकिन सभ्य शहर में उन्हें पुरुषों के घटियापन का सामना करना पड़ा. तो ये स्थिति है, जिसे समझना है. 

(रिपोर्ट: ज्योति मल्लिक )

Tuesday, March 20, 2018

पटना में दो दिवसीय ‘समय का गीत और प्रतिरोध का सिनेमा’ आयोजन संपन्न


फ्रेंच मानवविज्ञानी निकोलस जाउल की दलित संघर्ष पर केंद्रित फिल्म ‘संघर्ष’ का प्रदर्शन 
दलित उत्पीड़न समेत सरकार के तमाम जनविरोधी कार्रवाइयों के प्रतिरोध में रचे गए गीतों की प्रस्तुति

पटना में 16-17 मार्च को ‘‘समय का गीत और प्रतिरोध का सिनेमा’ आयोजन हुआ। हिरावल और प्रतिरोध का सिनेमा द्वारा आयोजित इस आयोजन की शुरुआत छज्जूबाग, पटना में गीत-संगीत की वीडियो-आॅडियो सीडी ‘समय का गीत’ के लोकार्पण से हुई। लोकार्पण फ्रेंच मानवविज्ञानी निकोलस जाउल और जसम के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने किया। संतोष सहर, कवि कृष्ण समिद्ध, जसम पटना के संयोजक कवि राजेश कमल, हिरावल के सचिव संतोष झा, प्रीति प्रभा, राजन कुमार ने भी लोकार्पण में हिस्सा लिया। हिरावल की इस सीडी में रोहित वेमूला की संस्थानिक हत्या, हाजीपुर की अपराजिता की बलात्कार के बाद हत्या, गोरक्षा के नाम पर उना में किए गए उत्पात और उसके बाद भड़के दलित प्रतिरोध, नोटबंदी से उत्पन्न संकट, गोरखपुर और धर्मपुर में बच्चों की हत्या से संबंधित गीत हैं। हिरावल के कलाकारों ने इनमें से कई गीतों की प्रस्तुति भी की और पिछले चार वर्षों में सरकार की जनविरोधी कार्रवाइयों पर केंद्रित जोगीरा भी सुनाया गया। आवाज संतोष झा, सुमन कुमार, राजन कुमार, प्रीति प्रभा, भारती नारायण, रेशमा, पलक और पीहू आदि ने दी। 

दूूसरे सत्र में निकोलस जाउल की डाक्यूूमेंटरी फिल्म ‘संघर्ष’ का प्रदर्शन हुआ। निकोलन जाउल कोई पेशेवर फिल्मकार नहीं हैं, बल्कि मानव विज्ञानी हैं और फ्रेंच नेशनल सेंटर फाॅर साइंटिफिक रिसर्च में कार्यरत हैं। कानपुर के आसपास के दलित-मजदूर बस्तियों के जनजीवन पर उन्होंने पीएच.डी रिसर्च किया था। रिसर्च के दौरान वे 1997 से लेकर 2001 तक वहां की सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों को अपने कैमरे के जरिए दर्ज करते रहे। उसके कई वर्षो बादं लगभग सौ घंटे की दृश्य-श्रव्य सामग्री के संपादन के बाद उनकी डाक्यूूमेंटरी फिल्म ‘संघर्ष’ बनी। इस फिल्म में संगीत और ध्वनि हिरावल के संतोष झा और एफटीआईआई पासआउट साउंड इंजीनियर विस्मय चिंतन ने दिया है। निकोलस की फिल्म बाबा साहब अंबेडकर के विचारों के आलोक में दलित आंदोलन के एक खास दौर के राजनीतिक-सामाजिक इतिहास को समेटती है। संतोष सहर ने निकोलस जाउल का परिचय कराते हुए कहा कि निकोलस नब्बे के दशक से ही भारत आते रहे हैं और यहां के आम अवाम, नागरिकों, बुद्धिजीवियों और कलाकारों से मिलते रहे हैं। यह एक फ्रेंच नागरिक का भारतीय नागरिकों से रिश्ता है, खासकर यहां के हाशिये की जनता के जीवन और संघर्ष से उनका गहरा रिश्ता रहा है। यह फिल्म भी इसका उदाहरण है। उन्होंने बताया कि निकोलस भोजपुर के एकवारी समेत संघर्ष के इलाकों में भी गए थे। वे एक बेहतरीन फोटोग्राफर भी हैं। उन्होंने कई कामरेडों और भोजपुर जिले के खूबसूरत लैंडस्केप की तस्वीरें भी खींची हैं। 
पहले दिन आयोजन में वरिष्ठ माले नेता पवन शर्मा, एडवोकेट जावेद अहमद, सामाजिक कार्यकर्ता जौहर, रोहित किशोर, सूूबेदार आनंद, विधायक महबूब आलम, ऐपवा की मीना तिवारी, सरोज चैबे, लोकयुद्ध के संतलाल, मंजु, हिरावल के राम कुमार और प्रकाश आदि समेत कई महत्वपूर्ण लोग मौजूद थे। 
दूसरे दिन डाॅ. भीमराव अंबेडकर सेवा एवं शोध संस्थान, दारोगा राय पथ में आयोजन की शुरुआत हिरावल के राजन कुमार की आवाज में दलित रिसर्च स्काॅलर रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या के खिलाफ रचे गए गीत से हुई। उसके बाद फिल्म ‘संघर्ष’ का प्रदर्शन किया गया। ‘संघर्ष’ ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय अध्ययन तथा आंदोलनों की दृष्टि से एक महत्वपूूर्ण फिल्म है। वे कौन सी सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक वजहें थीं, जिनमें अंबेडकरवादी विचारधारा का असर दलित समुदायों के भीतर बढ़ा, इसको इस फिल्म ने बखूूबी दिखाया। शिक्षा, सांप्रदायिकता, धार्मिक अंधविश्वास, वर्ग आदि विभिन्न पहलुओं से यह फिल्म दलित आंदोलन को जानने-समझने की कोशिश करती है और बारीक संकेतों के जरिए बाबा साहब अंबेडकर के विचारों की प्रासंगिकता को सामने लाती है। फिल्म में बसपा का झंडा, दलित पैंथर से जुड़े अंबेडकरवादी कार्यकत्र्ता-नेता और सुभाषिणी अली भी नजर आते हैं, पर उनके बारे अलग से कुछ नहीं बताया जाता, बल्कि आंदोलन के दौरान जो सवाल केंद्र में हैं, बाबा साहब के विचारों के अनुरूप समाज में बदलाव की जो कोशिशें की जाती हैं, उसी पर फिल्मकार का ध्यान कंेद्रित रहा है। निकोलस जाउल ने अपनी ओर से कोई अतिरिक्त संदेश नहीं दिया है और न ही फिल्म में वैचारिक हस्तक्षेप किया है, बल्कि फिल्म के विभिन्न दृश्यों में जो वास्तविक चरित्र हैं और जो घटनाएं हैं, उनके जरिए ही अंबेडकरवादी आंदोलन की जरूरत और उसकी चुनौतियों से दर्शक वाकिफ हो जाते हैं। भारतीय समाज में जो यथास्थिति है, जिस तरह की भीषण प्रतिक्रियावादी, सांप्रदायिक और अंधविश्वासी धारणाएं इसके भीतर गहरे तक धंसी हुई हैं और शिक्षित नौकरीपेशा वर्ग का उत्पीड़ित, अभावग्रस्त और भेदभाव के शिकार लोगों के प्रति उपेक्षित व संवेदनहीन व्यवहार है, वह अंबेडकरवादी विचारधारा के लिए भी बड़ी चुनौती है, इसे भी फिल्म दिखाती है। दलित-वंचित लोगों की शिक्षा और संगठन तथा सत्ता में हिस्सेदारी के साथ-साथ सांप्रदायिक सौहार्द और तर्कशीलता सामाजिक बदलाव के लिए कितना जरूरी है, इसे यह फिल्म बखूबी दर्शाती है। 
दोनों दिन फिल्म के प्रदर्शन के बाद निकोलस जाउल से दर्शकों की विचारोत्तेजक बातचीत हुई। पूर्व डीजीपी जीपी दोहरे, जो कानपुर क्षेत्र के ही हैं, उन्होंने जमीन पर जाकर इतनी महत्वपूर्ण फिल्म बनाने के लिए निकोलस जाउल को बधाई दी। कुछ सुझाव भी आए, जैसे कि दलित के बजाए बहुजन शब्द का इस्तेमाल किया जाए। हिंदू धर्म को छोड़कर बौद्ध हो जाने के सुझाव पर बहस भी हुई। संजय किशोर का कहना था कि दलित हर रोज जिन समस्याओं का सामना करते हैं, यह फिल्म उसे ही दिखाती है। लेकिन इसका संदेश आम लोगों तक ज्यादा प्रभावशाली तरीके से संप्रेषित हो सके, इस लिहाज से इस पर और काम किया जाना चाहिए। निकोलस जाउल का कहना था कि लोगों की ग्रहणशीलता के स्तर भी अलग-अलग होते हैं, यह डाक्यूमेंटरी फिल्म है और यह इसका फाइनल रूप है। इसमें अब और संपादन संभव नहीं है। उन्होंने अंबेडकरवादी आंदोलन को जिस रूप में देखा उसे दिखलाया है। आयोजन के दूसरे दिन पूर्व डीजीपी जीपी दोहरे के अतिरिक्त फिल्म दर्शकों में माले पोलित ब्यूरो सदस्य का. धीरेंद्र झा, बीएसएनएल कर्मचारी यूनियन के धनंजय कुमार और रामलखन चौधरी, आईटीआई, दीघा, कर्मचारी यूनियन के अशोक चौधरी, आरक्षण बचाओ, संविधान बचाओ मोर्चा के अध्यक्ष हरकेश्वर राम, कमर्चारी संगठन गोप गुट के राज्य सचिव प्रेमचंद सिन्हा, बीएसपीबी के प्रदेश महासचिव नकुल प्रसाद, गौतम बुद्ध विहार के आनंद भंते, समता सैनिक दल के प्रदेश महासचिव संतोष कुमार, एडवोकेट महंत मांझी, पोस्टल कर्मचारी यूनियन के नेता आर. एन. पासवान, भूपेद्र राम, इलेक्शन वाच के राजीव कुमार, नटमंडल के विवेक कुमार, रंगकर्मी मृत्युंजय प्रसाद आदि भी मौजूद थे। (Photos by Krishna Samiddh)

Tuesday, February 20, 2018

कब याद में तेरा साथ नहीं (रिपोर्ट)





घाटशिला में 17 फरवरी को प्रलेस की ओर से होने वाले ‘जश्ने फैज’ आयोजन की सूचना मिली, तो सोचा कि हर हाल में इस आयोजन में शामिल होना है। घाटशिला में साहित्यिक-सांस्कृतिक सक्रियता के पीछे कथाकार शेखर मल्लिक की अहम भूमिका रहती है। इस आयोजन की सूचना भी पहले उन्हीं के एसएमएस से मिली। इधर रविवार होने के बावजूूद मेरी दूूसरी व्यस्तताएं भी थीं, लेकिन जो जिम्मेवारी थी उसे निबटा कर प्राचार्या से इजाजत लेकर मैं निकल पड़ा। बीच राह में संतोष कुमार सिंह की गाड़ी में सवार होना था। संतोष खुद को साहित्यकार नहीं मानते, पर हर तरह का साहित्य पढ़ते हैं और कई रचनाकारों से साहित्य की बेहतर समझ रखते हैं। फेसबुक पर उनकी धारदार टिप्पणियों के कारण मैं उनसे प्रभावित रहा हूं। खैर, बस में लोकल पैसेंजर चढ़ाने-उतारने के कारण हो रही देरी से झल्लाता हुआ मिलने की तय जगह पर उतरा। कुछ ही देर बाद उनकी गाड़ी आई। उनके साथ मनोज सिंह भी थे। हम तीनों चल पड़े घाटशिला और नियत समय पर पहुंच गए। यूनियन आॅफिस के भीतर अहाते में कुर्सियां लगी हुई थीं। मंच भी बना हुआ था। ‘बोल की लब आजाद हैं तेरे’- फैज की नज्म की यह पंक्ति जो इस वक्त पिछले किसी भी वक्त से ज्यादा मौजूं है, आयोजन की थीम थी। 

‘लोकचेतना’ के संपादक रविरंजन भी आजकल घाटशिला में ही अध्यापन कार्य कर रहे हैं। उन्हीं से फैज अहमद फैज पर वक्तव्य की शुरुआत हुई। उन्होंने फैज को पूरी प्रगतिशील परंपरा का अगुआ कवि बताया और कहा कि भारतीय कविता पर उनका गहरा प्रभाव रहा है। उधर सूरज डूब रहा था इधर हम सबके महबूब शायर के ख्यालात चमक रहे थे। श्रोताओं की संख्या बहुत अधिक नहीं थी, पर जो लोग थे वे गंभीर श्रोता लग रहे थे। एक ओर मित्रेश्वर अग्निमित्र, प्रो. नरेश कुमार, प्रो. सुबोध कुमार जैसे वरिष्ठ अध्यापक और एक विद्यालय के प्राचार्य संजय मल्लिक थे, तो दूसरी ओर राजीव जैसे युवा अध्यापक। और वे नौजवान संस्कृतिकर्मी तो थे ही जिनका आकर्षण मुझे वहां खींच ले गया था। सोशल मीडिया पर इस आयोजन का जो आमंत्रण था, उसमें फैज की गजलों और नज्मों के गायन की सूचना भी थी। मुझे यह बहुत जरूरी लगता है कि जहां भी संभव हो, ऐसे शायरों और कवियों की रचनाओं को गाया जाए, पढ़ा जाए। कुछ ऐसा किया जाए कि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों के जीवन में सहजता से रच-बस जाए। 

कई बार सोचता हूं कि हर गजल के बारे में कुछ बात हो और फिर उसे गाया जाए या पहले उसे गाया जाए, फिर उस पर बात हो। आयोजकों ने मुझे भी मंच पर बैठा दिया, तो मैं समझ गया कि मुझे बोलना भी होगा। तुरत फैज की गजल की पंक्ति याद आई- कब याद में तेरा साथ नहीं/ कब हाथ में तेरा हाथ नहीं। इस दौर के तरक्कीपसंद और इंकलाबी साथियों की तरह मेरे दिलो-दिमाग पर भी उनकी रचनाओं का गहरा असर रहा है। लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि इतने से बात नहीं बनेगी, आज व्यापक जनसमुदाय तक फैज को पहुंचाने की जरूरत है। अमीर खुसरो से लेकर फैज और फराज तक शायरों की जो लंबी परंपरा है, उसे हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों को भी अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाना चाहिए। मैंने एक प्रसंग सुनाया कि कैसे मुझे एक नौजवान ने, जिसका साहित्य से कोई गहरा रिश्ता नहीं है, फैज की पंक्तियां ह्वाट्स ऐप से भेजी- लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है। फिर मुझे साथी प्रणय कृष्ण के एक लेख की याद आई- फैज को कैसे पढ़ें? खासकर, उस मशहूर नज्म के संदर्भ में उनका विश्लेषण, जिसे इकबाल बानो जनरल जिया की तानाशाही के खिलाफ गाया था- लाजिम है कि हम भी देखेंगे। कैसे सामान्य धार्मिक भावबोध के भीतर इंकलाबी विचारों के लिए फैज जगह बनाते हैं। ‘जब राज करेगी खल्के खुदा’ के आगे वे कहते हैं- जो मैं भी हूं और तुम भी हो। 

एक वाकया जो संभवतः कुलदीप नैयर की किताब में है, उसका भी मैंने जिक्र किया कि कैसे एक किशोर ने एक खिड़की से सांडर्स की हत्या के बाद क्रांतिकारियों को वहां से निकलते हुए देखा था। बाद में वही किशोर फैज हुआ। फिर ‘आज बाजार में पा-ब-जौला चलो’ और सू-ए-दार की चर्चा हुई। रविरंजन ने शमशेर को याद किया था। शमशेर ने जो फैज पर लिखा है, मैंने भी उसे याद किया और याद किया शमशेर की उस मशहूर पंक्ति को- ’ हकीकत को लाए तखैयुल से बाहर, मेरी मुश्किलों का जो हल कोई लाए/ कहीं सर्द खूं में तड़पती है बिजली, जमाने का रद्दोबदल कोई लाए।’ जाहिर है जो बेहतर समाज, मनुष्य और व्यवस्था की कल्पना है, उसे हकीकत में बदलने की जद्दोजहद वाली शायरी फैज की है, उनका जीवन भी इसी के लिए समर्पित रहा। नाउम्मीदी, अवसाद, मोहभंग, शिकस्त का अहसास- यह सब भी है फैज की शायरी में, पर वह निष्क्रिय नहीं करता, बल्कि बेचैनी से भरता है। घाटशिला आया तो लगा कि कुछ तो रौशनी बाकी है, हरचंद के कम है। हालांकि इस बार जगह-जगह से जश्ने-फैज के आयोजन की खबरें यह भी इशारा कर रही हैं, रौशनी से रौशनी के मिलने का सिलसिला भी चल रहा है। 

संतोष कुमार सिंह ‘सारे सुखन हमारे’ लेते आए थे। मैंने पांच-छह गजलों और नज्मों की पृष्ठ संख्या नोट की थी, पर एक ही गजल ‘ढाका से वापसी पर’ सुनाया। वही नायरा नूर वाले अंदाज में। ‘हम के ठहरे अजनबी इतनी मुलाकातों के बाद’- लिखी भले यह ढाका से वापसी पर गई हो, पर इसे गाते और सुनते हुए आज मुल्कों, समुदायों, भाषाओं के बीच जो अजनबीयत पैदा कर दी गई है, जिस किस्म के हिंसक उन्मादी टकराव हो रहे हैं, उन सबसे पैदा दर्द का मानो एक साथ इजहार होता है और सवाल गूंजता रहता है- खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद!

संतोष कुमार सिंह ने मार्के की बात कही कि हर शख्स जो इश्क करना चाहता है, जो बेड़ियों को तोड़न चाहता है, जो आजादी चाहता है, जो अम्नपसंद है, फैज उसके प्रिय शायर हैं। उन्होंने फैज की नज्म ‘ख्वाब बसेरा’ सुनाया।

वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता बास्ता सोरेन की बहू सुनीता जो पेशे से डाॅक्टर हैं, वे खास तौर से फैज के इस आयोजन में शामिल होने पहुंची। उन्होंने ‘बोल की लब आजाद हैं तेरे’ सुनाया। 

मुख्य वक्ता का. शशि कुमार ने बताया कि जिन दिनों वे मजदूरी करते थे, उन दिनों दो गीत उनकी जुबान पर रहते थे। एक तो मजाज का- बोल अरी ओ धरती बोल राजसिंहासन डांवाडोल और दूसरा फैज का तराना- दरबारे वतन में जाने वाले... ऐ खाक नशीनों उठ बैठो अब वक्त करीब आ पहुंचा है...जो दरिया झूम के उट्ठे हैं, तिनकों से न टाले जाएंगे। उनका कहना था कि बहुत सारे कवि और शायर हैं, जिनको पढ़ने और पढ़ाने वाले लोग होते हैं, पर कुछ ऐसे शायर होते हैं, जिन्हें जीने वाले लोग भी होते हैं। फैज वैसे ही शायर हैं। फैज आम आदमी की जिंदगी के, उसकी मुक्ति के शायर हैं। वे धार्मिक बिंबों के भीतर भी इंकलाब की बात करते हैं। अहले सफा मरदूदे हरम मसनद पर तो तभी बैठाए जाएंगे जब इंकलाब होगा। वे आज के लेखकों के लिए आदर्श हैं। वे कहते हैं कि चश्मेनम जान-ए-शोरीदा काफी नहीं/आज बाजार में पा-ब-जौला चलो। शशि कुमार ने फैज को कालजयी लेखक बताते हुए उनकी पंक्तियों के जरिए उम्मीद बंधाई- ‘‘यूं ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से खल्क/ न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई/ यूं ही हमेशा खिलाए हैं हमने आग में फूल/ न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई।’’

आयोजन के दूसरे सत्र में फैज की गजलों और नज्मों की संगीतमय पेशकश हुई। शेखर मल्लिक के गायक रूप से भी हम आशना हुए। उन्होंने ‘मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग’ और ‘हम देखेंगे लाजिम है कि हम भी देखेंगे’ को गाया। छीता हांसदा ने ‘गुलों की बात करों’ को बड़े ही सधे स्वर में गाया। गजल गायिकी के लिहाज से उनकी आवाज काफी संभावनापूर्ण लगी। शेखर मल्लिक साथ उन्होंने ‘कब याद में तेरा साथ नहीं’ भी गाया। ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे’ को गिटार के संगीत पर साधने की कोशिश सोमनाथ ने की। प्रो. इंदल पासवान और शेखर ने ‘गुलों में रंग भरे’ को थोड़े नए अंदाज में पेश किया। तबले पर तुहिन मंडल और सिंथेसाइजर पर सोमनाथ ने साथ निभाया। 

छोटे बच्चे-बच्चियों ने हमें इकबाल बानो के उस एलबम की आॅडियो सीडी हमें भेंट में दी, जिसमें उनकी आवाज में फैज की रचनाओं की एक घंटे से अधिक की रिर्काडिंग है। 

अपने ठिकाने पर पहुंचते-पहुंचते घड़ी के सूइयां दस को पार कर चुकी थीं। शरीर थका था, पर मन उर्जा से भरा हुआ था। 

यह रिपोर्टनुमा जो कुछ है, उसे लिखते हुए शेखर मल्लिक का मेल मिला, जिसके अनुसार आयोजन में अनुमंडल पदाधिकारी अरविंद लाल, मादल नाट्य दल के रंगकर्मी गणेश मुर्मू, बलराम, भागवत दास, डाॅ. देवदूत सोरेन, लतिका पात्र, वादिनी चंद्रा, भवानी सिन्हा, स्नेहज, भारती, राजकमल और कई मजदूर साथी भी मौजूद थे। 



कब याद में तेरा साथ नहीं

घाटशिला में 17 फरवरी को होने वाले ‘जश्ने फैज’ आयोजन की सूचना मिली, तो सोचा कि हर हाल में इस आयोजन में शामिल होना है। घाटशिला में साहित्यिक-सांस्कृतिक सक्रियता के पीछे कथाकार शेखर मल्लिक की अहम भूमिका रहती है। इस आयोजन की सूचना भी पहले उन्हीं के एसएमएस से मिली। इधर रविवार होने के बावजूूद मेरी दूूसरी व्यस्तताएं भी थीं, लेकिन जो जिम्मेवारी थी उसे निबटा कर प्राचार्या से इजाजत लेकर मैं निकल पड़ा। बीच राह में संतोष कुमार सिंह की गाड़ी में सवार होना था। संतोष खुद को साहित्यकार नहीं मानते, पर हर तरह का साहित्य पढ़ते हैं और कई रचनाकारों से साहित्य की बेहतर समझ रखते हैं। फेसबुक पर उनकी धारदार टिप्पणियों के कारण मैं उनसे प्रभावित रहा हूं। खैर, बस में लोकल पैसेंजर चढ़ाने-उतारने के कारण हो रही देरी से झल्लाता हुआ मिलने की तय जगह पर उतरा। कुछ ही देर बाद उनकी गाड़ी आई। उनके साथ मनोज सिंह भी थे। हम तीनों चल पड़े घाटशिला और नियत समय पर पहुंच गए। यूनियन आॅफिस के भीतर अहाते में कुर्सियां लगी हुई थीं। मंच भी बना हुआ था। ‘बोल की लब आजाद हैं तेरे’- फैज की नज्म की यह पंक्ति जो इस वक्त पिछले किसी भी वक्त से ज्यादा मौजूं है, आयोजन की थीम थी। 

‘लोकचेतना’ के संपादक रविरंजन भी आजकल घाटशिला में ही अध्यापन कार्य कर रहे हैं। उन्हीं से फैज अहमद फैज पर वक्तव्य की शुरुआत हुई। उन्होंने फैज को पूरी प्रगतिशील परंपरा का अगुआ कवि बताया और कहा कि भारतीय कविता पर उनका गहरा प्रभाव रहा है। उधर सूरज डूब रहा था इधर हम सबके महबूब शायर के ख्यालात चमक रहे थे। श्रोताओं की संख्या बहुत अधिक नहीं थी, पर जो लोग थे वे गंभीर श्रोता लग रहे थे। एक ओर मित्रेश्वर अग्निमित्र, प्रो. नरेश कुमार, प्रो. सुबोध कुमार जैसे वरिष्ठ अध्यापक और एक विद्यालय के प्राचार्य संजय मल्लिक थे, तो दूसरी ओर राजीव जैसे युवा अध्यापक। और वे नौजवान संस्कृतिकर्मी तो थे ही जिनका आकर्षण मुझे वहां खींच ले गया था। सोशल मीडिया पर इस आयोजन का जो आमंत्रण था, उसमें फैज की गजलों और नज्मों के गायन की सूचना भी थी। मुझे यह बहुत जरूरी लगता है कि जहां भी संभव हो, ऐसे शायरों और कवियों की रचनाओं को गाया जाए, पढ़ा जाए। कुछ ऐसा किया जाए कि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों के जीवन में सहजता से रच-बस जाए। 

कई बार सोचता हूं कि हर गजल के बारे में कुछ बात हो और फिर उसे गाया जाए या पहले उसे गाया जाए, फिर उस पर बात हो। आयोजकों ने मुझे भी मंच पर बैठा दिया, तो मैं समझ गया कि मुझे बोलना भी होगा। तुरत फैज की गजल की पंक्ति याद आई- कब याद में तेरा साथ नहीं/ कब हाथ में तेरा हाथ नहीं। इस दौर के तरक्कीपसंद और इंकलाबी साथियों की तरह मेरे दिलो-दिमाग पर भी उनकी रचनाओं का गहरा असर रहा है। लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि इतने से बात नहीं बनेगी, आज व्यापक जनसमुदाय तक फैज को पहुंचाने की जरूरत है। अमीर खुसरो से लेकर फैज और फराज तक शायरों की जो लंबी परंपरा है, उसे हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों को भी अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाना चाहिए। मैंने एक प्रसंग सुनाया कि कैसे मुझे एक नौजवान ने, जिसका साहित्य से कोई गहरा रिश्ता नहीं है, फैज की पंक्तियां ह्वाट्स ऐप से भेजी- लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है। फिर मुझे साथी प्रणय कृष्ण के एक लेख की याद आई- फैज को कैसे पढ़ें? खासकर, उस मशहूर नज्म के संदर्भ में उनका विश्लेषण, जिसे इकबाल बानो जनरल जिया की तानाशाही के खिलाफ गाया था- लाजिम है कि हम भी देखेंगे। कैसे सामान्य धार्मिक भावबोध के भीतर इंकलाबी विचारों के लिए फैज जगह बनाते हैं। ‘जब राज करेगी खल्के खुदा’ के आगे वे कहते हैं- जो मैं भी हूं और तुम भी हो। 

एक वाकया जो संभवतः कुलदीप नैयर की किताब में है, उसका भी मैंने जिक्र किया कि कैसे एक किशोर ने एक खिड़की से सांडर्स की हत्या के बाद क्रांतिकारियों को वहां से निकलते हुए देखा था। बाद में वही किशोर फैज हुआ। फिर ‘आज बाजार में पा-ब-जौला चलो’ और सू-ए-दार की चर्चा हुई। रविरंजन ने शमशेर को याद किया था। शमशेर ने जो फैज पर लिखा है, मैंने भी उसे याद किया और याद किया शमशेर की उस मशहूर पंक्ति को- ’ हकीकत को लाए तखैयुल से बाहर, मेरी मुश्किलों का जो हल कोई लाए/ कहीं सर्द खूं में तड़पती है बिजली, जमाने का रद्दोबदल कोई लाए।’ जाहिर है जो बेहतर समाज, मनुष्य और व्यवस्था की कल्पना है, उसे हकीकत में बदलने की जद्दोजहद वाली शायरी फैज की है, उनका जीवन भी इसी के लिए समर्पित रहा। नाउम्मीदी, अवसाद, मोहभंग, शिकस्त का अहसास- यह सब भी है फैज की शायरी में, पर वह निष्क्रिय नहीं करता, बल्कि बेचैनी से भरता है। घाटशिला आया तो लगा कि कुछ तो रौशनी बाकी है, हरचंद के कम है। हालांकि इस बार जगह-जगह से जश्ने-फैज के आयोजन की खबरें यह भी इशारा कर रही हैं, रौशनी से रौशनी के मिलने का सिलसिला भी चल रहा है। 

संतोष कुमार सिंह ‘सारे सुखन हमारे’ लेते आए थे। मैंने पांच-छह गजलों और नज्मों की पृष्ठ संख्या नोट की थी, पर एक ही गजल ‘ढाका से वापसी पर’ सुनाया। वही नायरा नूर वाले अंदाज में। ‘हम के ठहरे अजनबी इतनी मुलाकातों के बाद’- लिखी भले यह ढाका से वापसी पर गई हो, पर इसे गाते और सुनते हुए आज मुल्कों, समुदायों, भाषाओं के बीच जो अजनबीयत पैदा कर दी गई है, जिस किस्म के हिंसक उन्मादी टकराव हो रहे हैं, उन सबसे पैदा दर्द का मानो एक साथ इजहार होता है और सवाल गूंजता रहता है- खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद!

संतोष कुमार सिंह ने मार्के की बात कही कि हर शख्स जो इश्क करना चाहता है, जो बेड़ियों को तोड़न चाहता है, जो आजादी चाहता है, जो अम्नपसंद है, फैज उसके प्रिय शायर हैं। उन्होंने फैज की नज्म ‘ख्वाब बसेरा’ सुनाया।

वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता बास्ता सोरेन की बहू सुनीता जो पेशे से डाॅक्टर हैं, वे खास तौर से फैज के इस आयोजन में शामिल होने पहुंची। उन्होंने ‘बोल की लब आजाद हैं तेरे’ सुनाया। 

मुख्य वक्ता का. शशि कुमार ने बताया कि जिन दिनों वे मजदूरी करते थे, उन दिनों दो गीत उनकी जुबान पर रहते थे। एक तो मजाज का- बोल अरी ओ धरती बोल राजसिंहासन डांवाडोल और दूसरा फैज का तराना- दरबारे वतन में जाने वाले... ऐ खाक नशीनों उठ बैठो अब वक्त करीब आ पहुंचा है...जो दरिया झूम के उट्ठे हैं, तिनकों से न टाले जाएंगे। उनका कहना था कि बहुत सारे कवि और शायर हैं, जिनको पढ़ने और पढ़ाने वाले लोग होते हैं, पर कुछ ऐसे शायर होते हैं, जिन्हें जीने वाले लोग भी होते हैं। फैज वैसे ही शायर हैं। फैज आम आदमी की जिंदगी के, उसकी मुक्ति के शायर हैं। वे धार्मिक बिंबों के भीतर भी इंकलाब की बात करते हैं। अहले सफा मरदूदे हरम मसनद पर तो तभी बैठाए जाएंगे जब इंकलाब होगा। वे आज के लेखकों के लिए आदर्श हैं। वे कहते हैं कि चश्मेनम जान-ए-शोरीदा काफी नहीं/आज बाजार में पा-ब-जौला चलो। शशि कुमार ने फैज को कालजयी लेखक बताते हुए उनकी पंक्तियों के जरिए उम्मीद बंधाई- ‘‘यूं ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से खल्क/ न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई/ यूं ही हमेशा खिलाए हैं हमने आग में फूल/ न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई।’’

आयोजन के दूसरे सत्र में फैज की गजलों और नज्मों की संगीतमय पेशकश हुई। शेखर मल्लिक के गायक रूप से भी हम आशना हुए। उन्होंने ‘मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग’ और ‘हम देखेंगे लाजिम है कि हम भी देखेंगे’ को गाया। छीता हांसदा ने ‘गुलों की बात करों’ को बड़े ही सधे स्वर में गाया। गजल गायिकी के लिहाज से उनकी आवाज काफी संभावनापूर्ण लगी। शेखर मल्लिक साथ उन्होंने ‘कब याद में तेरा साथ नहीं’ भी गाया। ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे’ को गिटार के संगीत पर साधने की कोशिश सोमनाथ ने की। प्रो. इंदल पासवान और शेखर ने ‘गुलों में रंग भरे’ को थोड़े नए अंदाज में पेश किया। तबले पर तुहिन मंडल और सिंथेसाइजर पर सोमनाथ ने साथ निभाया। 

छोटे बच्चे-बच्चियों ने हमें इकबाल बानो के उस एलबम की आॅडियो सीडी हमें भेंट में दी, जिसमें उनकी आवाज में फैज की रचनाओं की एक घंटे से अधिक की रिर्काडिंग है। 

अपने ठिकाने पर पहुंचते-पहुंचते घड़ी के सूइयां दस को पार कर चुकी थीं। शरीर थका था, पर मन उर्जा से भरा हुआ था। 

यह रिपोर्टनुमा जो कुछ है, उसे लिखते हुए शेखर मल्लिक का मेल मिला, जिसके अनुसार आयोजन में अनुमंडल पदाधिकारी अरविंद लाल, मादल नाट्य दल के रंगकर्मी गणेश मुर्मू, बलराम, भागवत दास, डाॅ. देवदूत सोरेन, लतिका पात्र, वादिनी चंद्रा, भवानी सिन्हा, स्नेहज, भारती, राजकमल और कई मजदूर साथी भी मौजूद थे। 


Sunday, October 29, 2017

रमाकांत द्विवेदी रमता के गीत



हो गइले दीवाना
सुरजवा के कारण छैला हो गइले दीवाना
खद्दर पहिर के धइले भेस फकिराना
लाठी सहे, हंटर सहे, लाख-लाख गाली सहे
पुलिस-दारोगा के सहेले तीखे ताना
देखि के जुलुम बैमान अंगरेजवन के
बागी बन के गावेलें आजादी के तराना
चेत-चेत भारत के भाई हो-बहिनिया हो
तोड़ ई हुकूमत सुंदर आइल बा जमाना
कहे रमाकांत राज होई पंचाइत के
जरि जइहें आग में कचहरी अवरू थाना
19.1.1942


विद्रोही

रूढ़िवाद का घोर विरोधी, परिपाटी का नाशक हूं
नई रोशनी का उपासक, विप्लव का विकट उपासक हूं
प्राचीनता की चिता-भस्म से प्रतिमा नई बनाता हूं
नई कल्पना के सुमनों से रच-रच उसे सजाता हूं
मैं तो चला आज, जिस पथ पर भगत गए, आजाद गए
खुदीराम-सुखदेव-राजगुरु-बिस्मिल रामप्रसाद गए
ममता शेष नहीं जीवन की बीत मृदुल अरमान गए
मैं तो आज बना विद्रोही, जग के झूठे मान गए
सिंधु सलिल को क्षार करूं, वह बड़वानल की ज्वाला हूं
शंकर का भी कंठ जला दूं, काल कूट का प्याला हूं
हंसी उड़ाऊं कानूनों की, वह बांका मतवाला हूं
शासन सत्ता की आंखों में सदा खटकने वाला हूं
कठिन पंथ है मेरे आगे, पर इसकी परवाह नहीं
मुझे जरूरत है वीरों की, भयभीतों की चाह नहीं
असंतोष की आग नहीं, यह विप्लव की तैयारी है
आए मेरे साथ कि जिसको सजा मौत की प्यारी है
भस्मसात कर दूं दुनिया को, धूमकेतु का तारा हंू
पल में बरस बहा दूं जग को, प्रलय जलद की धारा हूं
जोश फूंक दूं मुर्दों में, वह महाक्रांति का नारा हूं
दुश्मन दल की ताकत पर आघात कराल करारा हूं
नहीं कल्पना के घोड़े पर बैठ हवाखोरी करता
उससे घृणा असीम, मौत से बिना लड़े ही जो मरता
मैं न हवाई महल बनाता, ठोस काम भाता मुझको
सुलह-बुझारत नहीं सुहाती, लड़ना बस आता मुझको
1943



नई जिंदगी
हम मरते नई जिंदगी पर, तस्वीर पुरानी रहने दे
नस-नस में भरी जवानी है, शमशीर पुरानी रहने दे

तूफान छुपाये कानों को, रुनझुन से बहलाना कैसा
हम झाड़ जिसे आये पथ में, जंजीर पुरानी रहने दे
रे कलम चलाने वाले, अब बेकार सभी कोशिश तेरी
निर्माण हमारे कदमों में, तकदीर पुरानी रहने दे
24.4.1950


गांव के बतकही
गांव-गांव के लोग आज बस इहे बात बतिआवत बा
बीती दुख के समय, जमाना मन लायक आवत बा
उहे बनी मालिक जमीन के, जे हर-फार चलावत बा
अपना हाथे कुटी काटि के भोरे बैल खिलावत बा
उहे बनी मालिक मशीन के चक्का जवन चलावत बा
किसिम-किसिम के चीज बनाके कहां-कहां पहुंचावत बा
अब अइसन अन्हेर ना रही कि केहू खटते खटत मरी
केहू मुफुते बाबू बनि के शान बघारी-मउज करी
11.12.51

किसान
जहवां न उजहल खगड़ा-धमोइया, ओही खेते उपजेला धान
ओही खेते गेहूं-बूंट-रहर-मटरन-जव, ओही खेते गड़ेला मचान
छिछिलेदर फूंटिया सियरवो ना पूछे, बांस नियन मकई के थान
जेकर पसेना बूंन मोती झरि लावेला, सभे के जियावेला किसान
खेतही मड़इया मड़उवे के छाजन, बांसवा के उटुंग मचान
सावन-भदउआ के रतिया भेयावन, लउर लेके सूतेला चितान
सनसन पुरवा के लरहा झटासेला, तबहूं ना जागेला नादान
‘पट’ सेनी ओही आरी करेला सहिलिया, चिहुंकि के फानेला जवान
हंसुआ-खुरुपिया-कुदारी-हर-हेंगा लेके, दिन में करेला घमसान
ठेहा पर चूकामूका बइठेला गंड़ासी लेके, जसही होखेला मुंह लुकान
मंस-डंस, पिलुआ-पताई के ना फिकिर करे, छनकल राखेला बथान
पिछिली पहर लोही लागेले पहिलकी, ओही राति जागेला किसान
जेठ के झरक, झाराझरी चाहे सावन के, माघ के टुसार मारे जान
कवनो जुगुतिये दइब बिलमावे, जनमे से मेहनत के बान
एही रे धरतिया प बाप-दादा रहले, दूधे-दही कइले असनान
कवन कमाई राम, आजु चूक गइलीं कि फुटहा के छछने किसान
जेकरा धरमे चमकत बाटे ईंटा-ईंटा, गछियोले ऊंचे-ऊंच मकान
धरती से बड़ी दूर, बदरियो से ऊपर, चिल्हि अइसन उड़ता विमान
आदिमी के हुकुम बजावेले मशीनिया कि रोजे रोजे बढ़े बिगेयान
कवनि कमाई राम, आजु चूकि गइलीं कि देखि-देखि तरसे किसान
जेकरा धरमे बसे शहर-बजरिया, दिने दिन बढ़ती प शान
जेकरा धरमे अनमन रंग चीजवा से चमचम चमके दोकान
जेकरा धरमे झारि लामी-लामी धोतिया आदमी कहावे बबुआन
कवनि कमाई राम, आजु चूकि गइलीं कि गंवंई में दुखिया किसान
30.7.52


बेयालिस के साथी
साथी, ऊ दिन परल इयाद, नयन भरि आइल ए साथी
गरजे-तड़के-चमके-बरसे, घटा भयावन कारी
आपन हाथ आपु ना सूझे, अइसन रात अन्हारी
चारों ओर भइल पंजंजल, ऊ भादो-भदवारी
डेग-डेग गोड़ बिछिलाइल, फनलीं कठिन कियारी
केहि आशा वन-वन फिरलीं छिछिआइल ए साथी
हाथे कड़ी, पांव में बेड़ी, डांड़े रसी बन्हाइल
बिना कसूर मूंज के अइसन, लाठिन देह थुराइल
सूपो चालन कुरुक करा के जुरुमाना वसुलाइल
बड़ा धरछने आइल, बाकी ऊ सुराज ना आइल
जवना खातिर तेरहो करम पुराइल ए साथी
भूखे-पेट बिसूरे लइका, समुझे ना समुझावे
गांथि लुगरिया रनिया, झुखे, लाजो देखि लजावे
बिनु किवांड़ घर कूकुर पइसे, ले छुंछहंड़ ढिमिलावे
रात-रात भर सोच-फिकिर में आंखों नींन न आवे
ई दुख सहल न जाइ कि मन उबिआइल ए साथी
क्रूर-संघाती राज हड़पले, भरि मुंह ना बतिआवसु
हमरे बल से कुरसी तूरसु, हमके आंखि देखावसु
दिन-दिन एने बढ़े मुसीबत, ओने मउज उड़ावसु
पाथर बोझल नाव भवंर में, दइबे पार लगावसु
सजगे! इन्हिको अंत काल नगिचाइल ए साथी
8.6.53



हरवाह-बटोही संवाद
हरवा जोतत बाड़े भइया हरवहवा कि आग लेखा बरिसेला घाम
तर-तर चूबेला पसेनवा रे भइया कि तनिए सा करिले आराम
चुप रहु, बुझबे ना तेहूं रे बटोहिया कि राहे-राहे धरती के ताल
जइसे चूवे तन के पसेना रे बटोहिया कि ओइसे बढ़े धरती के हाल
हरवा जोतत बाड़े भइया हरवहवा कि सहि-सहि बरखा ले घाम
कबहूं ना भरिपेट खइले करमजरूआ कि झूलि गइले ठटरी के चाम
हरवा जोतत मोरि जिनिगि सिरइली कि हरवा से नान्हें पिरीति
भरी छुधा जिनिगी में कहियो ना खइलीं कि इहे तोरा देशवा के रीति
खेतवा में बोईं ले जे बारहो बिरिहिनी कि लागेला जम्हार लेखा चास
कवना करमवां के चूक भइया हितवा, कि बाले-बचे सूतीं ले उपास
जोत-कोड़ कमती ना गंगा बढ़िअइली कि परुए से भइल ना सुखार
कवना करमवां में चूकलीं रे दइबा, कि तेहू पर रहलीं भिखार
देशवा के नांव लेले भइया हरवहवा, कि देशवा में बड़का के राज
हमनी का भइलीं रामा गुलर के पिलुआ कि बड़का भइले दगाबाज
भइल बाटे तलफी भुंभरिया रे भइया कि हाली-हाली डेगवा बढ़ाउ
बोलिया जे बोलले पिरीतिया के भइया कि छंहरी बइठि बतिआउ
जेठ-बइशाखवा के अइन दुपहरिया कि रोएं-रोएं मार तारे धाह
मोरा लेखे भइया रे, दुनिया उलटली कि तोरा लेखे बबुरी तर छांह
14.8.54

कुंवर सिंह
झांझर भारत के नइया खेवनहार कुंवर सिंह
आजादी के सपना के सिरिजनहार कुंवर सिंह

इतिहास के होला सांपे लेखा टेढ़टाढ़ चाल
कभी सूतेला निहाल, कभी उठेला बेहाल
बढ़ल आपस के फूट, देश हो गइल पैमाल
गांवे-नगरे फएल गइल कंपनी के जाल

मने-मने करत रहन सब विचार कुंवर सिंह
अपना देश खातिर पोसत रहन प्यार कुंवर सिंह

देखत-देखत ढाका-काशी के उजार हो गइल
लंकाशायर-मैनचेस्टर के सुतार हो गइल
अने-धने भरल-पुरल, से भिखार हो गइल
भूखड़ टापू इंगलैंड गुलजार हो गइल

चुपे चुपे होत रहन तइयार कुंवर सिंह
खीसी जरत रहन एंड़ी से कपार कुंवर सिंह

जब अनमोल कलाकार के अंगूठा कटाई
आ, बलाते जब सोहागिनी के जेवर छिनाई
दिने दूपहर सड़क पर जबकि इज्जत लुटाई
अइसन के होइ, करेजा जेकर फाट ना जाई

आंख फार के देखले लूट-मार कुंवर सिंह
कान पात के सुनले हाहाकार कुंवर सिंह

भारत माता के अचक्के में पुकार हो गइल
खीस दबल रहे भीतर से उघार हो गइल
बाढ़ आइल अइसन जोश के, दहार हो गइल
बात बढ़त-बढ़त आखिर में जूझार हो गइल

देशी फउज के बनले सरदार कुंवर सिंह
अपना देश के भइले रखवार कुंवर सिंह

रहे मोछ ना, उ बरछी के नोक रहे रे
तरूआरे अइसन तेगा अइसन चोख रहे रे
कसल सोटा अइसन देह, मन शोख रहे रे
अइसन वीर जनमावल, धनी कोख रहे रे

ओह बुढ़ारी में जवानी के उभार कुंवर सिंह
अलबेला रे बछेड़ा असवार कुंवर सिंह
गइल जिनिगी अनेर, जब निशानी ना रहल
सवंसार के जवान प’ कहानी ना रहल
जिअल-मुअल दूनों एक, जब बदानी ना रहल
छिया-छिया रे जवानी, जबकि पानी ना रहल
हुंहुंकार के सुनवले ललकार कुंवर सिंह
रने वन मचवले धुआंधार कुंवर सिंह

होश बड़े-बड़े वीर के ठेकाने ना रहल
तोप, गोला के, बनूक के कवनो माने ना रहल
केकरो हाथ, गोड़, नाक, केकरो काने ना रहल
लागल एको झापड़, ओकरा तराने ना रहल

छपाछप फेरसु चारो ओर दुधार कुंवर सिंह
नीचे खून के बहवले पवनार कुंवर सिंह
होला ईंट के उत्तर पत्थर से देवे के जबाना
कस के दुशमन से बदला लेवे के जबाना
कभी छिप के, कभी परगट लड़े के जबाना
कभी हटे के, आ, कबहीं बढ़े के जबाना

रहन अइसन फन में खूबे हुंसियार कुंवर सिंह
राते रात करस अस्सी कोश ले पार कुंवर सिंह
अधिकार पा के मुरुख मतवाला हो जाला
रउआ कतनो मनाई, सुर्तवाला हो जाला
देश जागेला त दुनिया में हाला हो जाला
कंपनी का? परलामेंट के देवाला हो जाला

एह विचार के सिखवले बेवहार कुंवर सिंह
जगदीशपुर के माटी के सिंगार कुंवर सिंह

खांव गेहूं चाहे रहे एहूं दूनों सांझे पेट
दान मुटठी खोल के होय, चाहे खाली रहे टेंट
बांह देश के उधारे, चाहे गंगाजी के भेंट
मान कायम रहे, जीवन लीला ले समेट

अस्सी बरिस के भोजपुरी चमत्कार कुंवर सिंह
लक्ष्मीबाई-तंतिया-नाना के इयार कुंवर सिंह
23. 4. 55


टपान
बाटे टपान बस इहे, कदम बढ़ा के चल

आवे दे, का भइल अगर तूफान आ गइल
बिछिली भइल अन्हार में, बरखा बरिस गइल
बिजुरी सुझाई राह, तनि नोंह गड़ा के चल
साथी-समाज ना छूटे, कसिके हंकार ले
के दो गिरे-गिरे भइल, धइले-संभार ले
नइ के उठाउ, अब बा, कान्हा चढ़ाके चल


खेवा-खरच ओरा गइल, चिंता के बात का
पेटे भइल पहाड़ त, शिव के जमात का
हिम्मत न हार, जान के बाजी लड़ाके चल

फाटी कुहेस, सब घरी अन्हार ना रही
फहरी निशान जय के, झुर-झुर पवन बही
जिनिगी के बिपत-बिघिन के, कबड्डी पढ़ाके चल

24.8.56


जिंदा शहीद

अरे नौजवान, तुम्हें क्या बताएं
कि किन मुश्किलों से आजादी ले आए

गजब जुल्म की आधियां चल रही थीं
कयामत की उमड़ी थीं सौ-सौ घटाएं
जमीं धंस रही, आसमां फट रहा
जान पर आ पड़ी, कांपती थीं दिशाएं

मगर हम थे ऐसे कि चट्टान जैसे
अड़े रह गए, ना तनिक डगमगाए

अजब बेरहम हो गई थी हुकूमत
अजब बेबसी का था जालिम जमाना
हम अपने ही घर से बेदखल यूं हुए थे
कि मरघट में भी था न अपना ठिकाना

जो थे गैर, वे तो भले गैर थे ही
जो अपने भी थे, हो गए थे पराए

मिटे जा रहे थे घरों के घिरौंदे
कुटुंब और कबीले छुटे जा रहे थे
मगर एक धुन के हजारों दीवाने
कहीं एक लय पर जुटे जा रहे थे

तमन्ना थी, गोरी हुकूमत मिटा के
गरीबों की देशी हुकूमत बनाएं

सभा चल रही थी, जुलूस चल रहा था
अहिंसा का आदर्श भी चल रहा था
चले जा रहे थे बढ़े डेपुटेशन
सुलह का परामर्श भी चल रहा था

मगर हमने देखा कि बेकार है सब
तो आखिर बगावत का झंडा उठाए

सजा कर के बलिवेदियां अपने हाथों से
सर पे लपेटे कफन हम खड़े थे
फिरंगी उधर था मशीनों के पीछे
इधर शाम में हम निहत्थे अड़े थे

बरसती थी गोली धुआंधार लेकिन
बढ़े पांव हमने न पीछे हटाए

अभी हाथ में चिह्न हैं हथकड़ी के
अभी पांव में बेड़ियों के हैं घट्ठे
कभी देख लेना खुला जब बदन हो
कि हैं बेंत के दाग कितने इकट्ठे

मगर यह न समझो कि हम रो पड़े थे
सदा मौज में हम रहे, गीत गाए

बढ़े जा रहे हों नए टैक्स दिन-दिन
कि लाचार जनता मरी जा रही हो
करोड़ों को रोटी-लंगोटी न हो, पर
अमीरों की थैली भरी जा रही हो

बताओ तुम्हीं नौजवानों, कि ऐसे में
कैसे कोई रह सके चुप लगाए

जहां न्याय नीलाम होता हो खुल कर
जहां रिश्वतों का ही हो बोलबाला
हर आॅफिस जहां डाकुओं का हो अड्डा
औ’ कानून का पिट गया हो दिवाला

थी ऐसी हुकूमत की साया से नफरत
हम ऐसी हुकूमत की धज्जी उड़ाए

29.4.59


नक्सलबाड़ी की जय

चला दमन का चक्र, छेड़ सोता सिंह जगाओ
धरती के भूखे कृषकों तक, राजनीति पहुंचाओ

लाठी-गोली-जेल-सेल से, जनता नहीं डरेगी
छोटी चिनगारी सारे, जंगल को क्षार करेगी

जमींदार-सेठों के टुकड़खोर, तुम्हारी क्षय हो
धरती के बेटों की जय, नक्सलबाड़ी की जय हो

8.8.67


सरकारी हिंसा हिंसा न भवति                                                                                                                          
भुनते रोज गोलियों से सौ-सौ भूखे मजदूर-किसान
भुनते रोज गोलियों से अन्याय विरोधी छात्र-जवान
नारि-पुरुष, बच्चे-बूढ़े तक घेर जलाए जाते हैं
अक्सर गांव-नगर में लंकाकांड रचाए जाते हैं

लेकिन यह सरकारी हिंसा, तो कानूनी हिंसा है
चाहे जितनी गर्दन काटो, सौ फीसदी अहिंसा है

मगर दूसरे उबल पड़ें तो कुल विकास रुक जाते हैं
मिट जाती एकता, देश पर खतरे आ मड़राते हैं
सत्ता के सारे ही भोंपू, पहले से रहते तैयार
गला फाड़ चिल्ला उठते हैं, ‘‘प्रजातंत्र डूबा मझधार’’

4.2.75



धनवान इजाजत ना देगा
जीने के लिए कोई बागी बने, धनवान इजाजत ना देगा
कोई धर्म इजाजत ना देगा, भगवान इजाजत ना देगा

रोजी के लिए-रोटी के लिए, इज्जत के लिए कानून नहीं
यह दर्द मिटाने की खातिर, मिल्लत के लिए कानून नहीं
कानून नया गढ़ने के लिए, जिंदगी की तरफ बढ़ने के लिए
गद्दी से चिपककर फूला हुआ शैतान इजाजत ना देगा

जो समाज बदलने को निकले, बे-पढ़ो में चले, पिछड़ों में चले
फुटपाथ पे सोनेवालों में, और उजड़े हुए झोंपड़ों में चले
कुर्सी-टेबुल-पंखे के लिए जो कलमफरोशी करता है
बदलाव की खातिर सोच की वह विद्वान इजाजत ना देगा

20.4.82


रे कुचाली

थोरे दिनवां ना रे कुचाली, थोरे दिनवां ना
जनाले आपन जारी रे, थोरे दिनवां ना

डाका-चोरी, छीना-छोरी, लूट-मार-हत्यारी रे
सब अबगुन आगर जनमवलस कइसन बाप मतारी रे

लुच्चा-लंपट-लुकड़-पियक्कड़, सबके खातिरदारी रे
दुनिया भर के गुंडन खातिर तोरे घर ससुरारी रे

तोरा घर में अड्डा मारे पुलिस, लंठ, व्याभिचारी रे
निमन सिखावन सीखत होइहें बेटा, बेटी, नारी रे

खल से प्रीति, बैर भल मन से, जनता से बरिआरी रे
देशभक्त पर, जनसेवक पर हमला, निंदा, गारी रे

गांव-जवार, पड़ोसा-टोला सबके दुश्मन भारी रे
जे भी आपन हक पद चिन्हे, कहिदे नक्सलवारी रे

का करिहें बंदूक-रायफल, बडीगार्ड सरकारी रे
तोरा कुल के जरि से कोड़ी पीजल लाल कुदारी रे

4.2.83

अइसन गांव बना दे
अइसन गांव बना दे, जहां अत्याचार ना रहे
जहां सपनों में जालिम जमींदार ना रहे

सबके मिले भर पेट दाना, सब के रहे के ठेकाना
कोई बस्तर बिना लंगटे- उघार ना रहे
सभे करे मिल-जुल काम, पावे पूरा श्रम के दाम
कोई केहू के कमाई लूटनिहार ना रहे

सभे करे सब के मान, गावे एकता के गान
कोई केहू के कुबोली बोलनिहार ना रहे

18.3.83


त हम का करीं
क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब
केहू का ना सोहाला त हम का करीं
लाल झंडा हवा में उड़़इबे करब
केहू जरिके बुताला त हम का करीं

केहू दिन-रात खटलो प’ भूखे मरे
केहू बइठल मलाई से नाश्ता करे
केहू टुटही मड़इया में दिन काटता
केहू कोठा-अटारी में जलसा करे

ई ना बरम्हा के टांकी ह तकदीर में
ई त बैमान-धूर्तन के करसाज ह
हम ढकोसला के परदा उठइबे करब
केहू फजिहत हो जाला त हम का करीं

ह ई मालिक ना, जालिम जमींदार ह
खून सोखा ह, लंपट ह, हत्यार ह
ह ई समराजी पूंजी के देशी दलाल
टाटा-बिड़ला ह, बड़का पूंजीदार ह

ह ई इन्हने के कुकुर वफादार ह
देश बेचू ह, सांसद ह, सरकार ह
सबके अंगुरी देखा के चिन्हइबे करब
केहू सकदम हो जाला त हम का करीं

सौ में पंचानबे लोग दुख भोगता
सौ में पांचे सब जिनिगी के सुख भोगता
ओही पांचे के हक में पुलिस-फौज बा
दिल्ली-पटना से हाकिम-हुकुम होखता

ओही पांचे के चलती बा एह राज में
ऊहे सबके तरक्की के राह रोकता
ऊहे दुश्मन ह, डंका बजइबे करब
केहू का धड़का समाला त हम का करीं
30.1.83


भारत जननि तेरी जय हो
(राग वागेश्वरी, झपताल)

भारत जननि! तेरी जय, तेरी जय हो

हों वीर, रणधीर तेरी सु-संतान
तेरी सभी संकटों पर विजय हो

आजाद, अस्फाक, बिस्मिल, खुदीराम
उधम, भगत सिंह का फिर उदय हो

चारू की, राजू की, किस्टा-भुमैया की
जौहर की आवाज गुंजित अभय हो

जनगण हों आजाद, कायम हो जनवाद
सत्ता निरंकुश का अंतिम प्रलय हो
18.2.1984

भटकल गायक
गाव गान कि जन-जन जगे आत्मसम्मान मितवा
अब तू रचे चल जनमन के हिंदुस्तान मितवा

कबले भटक-भटक भटकइब, कब ले गीत अनर्गल गइब
कबले सरस्वती के बेचब वरदान मितवा

कबही वन में रास रचवल, कबही झूठा जगत बतवल
कबही पत्थर पर बलिदान चढ़वल प्रान मितवा

अबले बात न्याय के दूरे, हक जे भेंटल, उहो अधूरे
जेकर ढोल बजवल, डुबा चुकल ईमान मितवा

कब से ग्राह पकड़ले बाटे, फंदा चल देश के काटे
कबले राह चितइब, ना अइहें भगवान मितवा
13.5.84

राजनीति सब के बुझे के बुझावे के परी                                                                                                  राजनीति सब के बुझे के बुझावे के परी
देश फंसल बाटे जाल में, छोड़ावे के परी

सहि के लाखों बरबादी, मिलल नकली आजादी
एहके नकली से असली बनावे के परी

कवनो वंशे करी राज, या कि जनता के समाज
जतना जलदी, जइसे होखे, फरियावे के परी

बड़-बड़ सेठ-जमींदार, पुलिस-पलटनिया हतेयार
सब लुटेरन, हतेयारन के मिटावे के परी

रूस, अमरीका से यारी, सारी दुनिया के बीमारी
अपना देश के एह यारी से बचावे के परी

कहीं देश फिर ना टूटे, टूटल-फूटल बा से जुटे
सबके हक के झंडा ऊंचा फहरावे के परी

सौ में पांचे जहां सुखिया, भारत दुनिया ऊपर दुखिया
घर-घर क्रांति के संदेशा पहुंचावे के परी
25.9.1984


नौजवान भइया

रोजे रोज बटिया हम जोहिले तोहार
नौजवान भइया! देशवा के तूही करनधार

कहिया ले चारों ओर एकता बनइब
कहिया ले जुलुमिन के जुलुम मेटइब
कहिया ले देब नया युग के विचार

कहिया ले जाई अपना देश से बेकारी
कहिया ले छूटी भूखल पेट के बेमारी
कहिया ले सहल जाई महंगी के मार

कहिया ले होई हमनी के सुनवाई
कहिया ले धन के गुलामी मिट जाई
कहिया ले बनी हमनी के सरकार

तूहीं कुछ सोचब, त, सूझी कवनो राह
तू ही कुछ करब त, होई कुछ छांह
तोहरे पर लागल बाटे आसरा हमार
30.4.85

मैं तो नक्सलवादी

मैं तो नक्सलवादी वंदे! मैं तो नक्सलवादी रे
मुझसे तनिक सही ना जाए अब घर की बरबादी रे

लूटे मेरा देश विदेशी जंगखोर साम्राजी
साथ-साथ सामंत रिजाला, पूंजीवाला पाजी
सबके मन सहकाए, जो बैठे दिल्ली की गद्दी रे

खट-खट के खलिहान-खेत में, मिल में और खदान में
मर-मर सब सुख साज सजावे गांव-नगर-मैदान में
दो रोटी के लिए बने वह द्वार द्वार फरियादी रे

भ्रष्टाचार-भूख-बेकारी दिन-दिन बढ़े सवाई
अत्याचार विरोधी को सरकार कहे अन्यायी
यह कैसा जनतंत्र देश में, यह कैसी आजादी रे

मैं तो वंदे! अग्नि-पंथ का पंथी दूर मुकामी
मेरे संगी-साथी ये अंतिम जुझार संग्रामी
रोटी-आजादी-जनवाद हेतु जो करें मुनादी रे

30.4.85


हमनी साथी हईं
हमनी देशवा के नया रचवइया हईंजा
हमनी साथी हईं, आपस में भइया र्हइंजा

हमनी हईंजा जवान, राहे चलीं सीना तान
हमनी जुलुमिन से पंजा लड़वइया हईंजा

सगरे हमनी के दल, गांव-नगर हलचल
हमनी चुन-चुन कुचाल मेटवइया हईंजा

झंडा हमनी के लाल, तीनों काल में कमाल
सारे झंडा ऊपर झंडा उड़वइया हईंजा

बहे कइसनो बेयार, नइया होइये जाई पार
हमनी देशवा के नइया के खेवइया हईंजा
1.5.85



शहीदों का गीत                                                                                                                                             भगत-आजाद- ऊधम का जो फिर अवतार हो जाए
तो बेशक जालिमों का अंत अबकी बार हो जाए

गए गोरे, मगर अंग्रेज काले जड़ जमा बैठे
कोई तदबीर हो, इनका भी बंटाधार हो जाए

जो रोटी और इज्जत चाहते, क्यों कत्ल होते हैं
ये कैसा रोग है, इसका सही उपचार हो जाए

हमें इस जुल्म की बुनियाद से ऐसे निबटना है
कि अगला हर कदम उस पै करारा वार हो जाए
फंसी तूफान में किश्ती हमारे देश भारत की
जवानो! बल लगाओ तुम तो बेड़ा पार हो जाए

14.8.86

                                                                                                                                                           हामार सुनीं

काहे फरके-फरके बानीं, रउरो आईं जी
हामार सुनीं, कुछ अपनो सुनाईं जी

जब हम करींले पुकार, राउर खुले ना केवांर
एकर कारन का बा, आईं समुझाईं जी

जइसन फेर में बानी हम, ओहले रउरो नइखीं कम
कवनो निकले के जुगुति बताईं जी

सोचीं, कइसन बा ई राज, कुछ त रउरो बा अंदाज
देहबि कहिया ले एह राज के दोहाई जी

जवन सांसत अबहीं होता, का-का भोगिहें नाती-पोता
एह पर रउरो तनि गौर फरमाईं जी

अब मत फरके-फरके रहीं, सब कुछ संगे-संगे सहीं
संगे-संगे करीं बचे के उपाई जी

सभे आइल, रउरो आईं, संगे रोईं-संगे गाईं
हम त रउरे हईं, रउरा हमार भाई जी

9.11.86


रोटी के गीत

जगत में रोटी बड़ी महान!

बिन रोटी क्या पूजा-अर्चा-तीरथ-बरत-नहान
छापा-तिलक-जनेऊ-कंठी-माला कथा-पुरान

बिन रोटी सब सूना-सूना घर-बाहर-मैदान
मंदिर-मस्जिद-मठ-गुरुद्वारा-गिरजाघर मसान

रोटी बढ़कर स्वर्ग लोक से, रोटी जीवन प्राण
रोटी से बढ़कर ना कोई देव-दनुज-भगवान

सो रोटी उपजे खेती से, खेती करे किसान
जो किसान का साथ निबाहे, सो सच्चा इंसान

15.6.88

( ये गीत समकालीन प्रकाशन से 1996 में प्रकाशित रमता जी के हिंदी-भोजपुरी गीतों के एकमात्र संग्रह ‘हामार सुनीं’ से लिए गए हैं। )

Friday, October 27, 2017

रमता जी के बारे में कुछ भी जानने से पहले उनके गीतों को जाना : बलभद्र

रमता जी (छाया- राकेश दिवाकर) 
रमता-स्मरण 
रमाकांत दिवेदी 'रमता' भोजपुरी और हिंदी के एक महत्वपूर्ण कवि। 30 अक्टूबर 1917 उनकी जन्मतिथि। यह उनके जन्म का सौवां साल है। भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में उनकी महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय भूमिका रही है। आजादी के बाद भी 'स्वराज को सुराज' में बदलने का उनका संघर्ष जारी रहता है। गांधीजी के विचारों से प्रभावित रमताजी आगे चलकर समाजवादी विचारों से जुड़ते हैं। पर, यहां भी वे ठहरते नहीं, आगे बढ़कर वामपंथी विचारधारा से जुड़ते हैं। फिर, आगे बढ़कर जनता और देश की स्थितियों महसूसते हुए वाम की क्रांतिकारी धारा सीपीआई-एमएल से जुड़कर जनांदोलनों में खुद को साझीदार बनाते हैं। हर दौर-हर अनुभव- को उन्होंने कविताओं में दर्ज किया है। भोजपुरी और हिंदी के ये पॉवरफुल कवि हैं। इस अवसर पर 29 अक्टूबर 2017 को आरा में जसम के जन भाषा समूह की तरफ से एक कार्यक्रम का आयोजन होने वाला है। 


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रमताजी की एक कविता 'भोजपुरी' भाषा पर है, जिसका शीर्षक है 'भोजपुरी'। उनकी यह कविता 15-11-1952 की है। भोजपुरी भाषा और भोजपुरिया जवान पर भोजपुरी में कई कवियों की कविताएं हैं। उन पर यहां कोई टिप्पणी देना ठीक नहीं। आप सब रमता जी की यह कविता पढ़ें। यह कविता संतोष सहर से प्राप्त हुई है। "नागिचा ना रहे इस्कूल, आ, गरीबी गुने/ बारी रे समयिया गइल बीत!/ अचके में हवा बहल गंवई के सुधि लेके/ लागल भोजपुरी पिरीत! गिटपिट 'हिन्दुई' बुझाला न झरेला लो'के/ मोर मन करेला ये मीत।। भरि पेट रोईं-मुसुकाई भोजपुरिये में/ गाईं भोजपुरिये में गीत।' 



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रमता जी के बारे में कुछ भी जानने से पहले उनके गीतों को जाना। वह 1988 का साल होगा जब पहली बार अपने गांव में भगेला यादव के चौपाल पर रमता जी का एक गीत सुना। वह गीत था- "क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब केहू का न सोहाला त हम का करीं।" इस चौपाल पर गांव के किसानों-मजदूरों की एक मीटिंग हो रही थी। कॉमरेड चंद्रमा प्रसाद आये थे। मेरे गाँव की अपने टाइप की यह पहली मीटिंग थी। लोगों से बातचीत के बाद चंद्रमा जी ने यह गीत सुनाया। मेरे गाँव की ही नहीं, मेरे लिए भी यह पहली मीटिंग थी। चंद्रमा जी ने तब कवि का नाम भी बताया था, लेकिन मैं तब कवि से बिल्कुल ही अपरिचित था। कविता भी उनकी पहली बार ही सुनने को मिली थी। उनका गीत दूसरी बार सुनने का अवसर अपने बगल के सिकरिया गांव में मिला। इस गांव के गरीब किसान-मजदूर (दलित) ढोल-झाल के साथ गा रहे थे- "हमनी गरीबवन के दुखवा अपार बा।" संत शिवनारायण की जयंती थी और शिवनारायनी की धुन में ही यह गीत है। गाने वालों को पता नहीं था कि यह किसका गीत है। वे तो गा रहे थे कि इसमें वे अपने को पा रहे थे। अपने दुख-तकलीफों को अपनी उपेक्षाओं को। बाद में पता चला कि यह रमता जी का गीत है। तब सिकरिया में राजेंद्र राम, विजय राम, उदय पासवान, बिलगू जी, साहेबजी आदि सक्रिय थे। 



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आर्थिक तंगहाली एवं पारिवारिक दबावों के कारण सिकरिया गांव के ये उभरते हुए कार्यकर्ता रोजी-रोजगार की तलाश में बाहर निकलते गए। ये गीत-गवनई में रुचि रखने वाले युवा थे। साहेब तो बाजा पार्टी भी चलाते थे। उदय और राजेंद्र भी उस पार्टी में थे। भर लगन ये शादी-विवाह में सट्टे पर जाते थे। इससे इन लोगों को कुछ कमाई हो जाती थी और खेती के मौके पर ये अपनी थोड़ी- सी खेती संभाल कर दूसरों के यहां मजदूरी भी किया करते थे। राजनीतिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। लगन के अवसरों पर ये लोग फूहड़-अश्लील गीतों को गाने-बजाने से बच-बचाकर चलते थे। फगुआ-चैता में जब ताल ठोका जाता था, तब भी ये सचेत रहते थे। गोरख पाण्डेय, रमता जी, विजेंद्र अनिल, दुर्गेन्द अकारी, कृष्ण कुमार निर्मोही के गीत इन लोगों खूब याद थे। ये अपने से भी गीत बनाना सीख चुके थे। ये इनके ही गीतों को गाया करते थे। फगुआ-चैता में भी, लगन के अवसरों पर भी, पार्टी-कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार में भी। तब इंडियन पीपुल्स फ्रंट का समय था। लेकिन इन लोगों कौन गीत किसका लिखा हुआ है, यह नहीं मालूम था। इनको यह पता था कि इन्हें इन गीतों को गाना है।इसके चलते इनके गांव और आस पास के तथाकथित बड़े लोग , खासकर बड़ी जाति के, काफी नाराज रहा करते थे। 



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ये लोग रमता जी के इस गीत को भी खूब गाते थे-'हमनी देसवा के नया रचवइया हई जा/ हमनी साथी हई आपस में भइया हई जा।' गोरख के 'समाजवाद' और 'शुरू भइल हक के लड़इया' वाले गीत को भी जमकर गाते थे। इसमे थोड़ा अपनी ओर से संशोधन कर गाते थे। 'हक' की जगह 'किसान' कर लेते थे। 89 के चुनाव में 'अकारी' के गीत 'चोर राजीव गांधी घुसखोर राजीव गांधी/ बिदेसी सौदा में पकरईल कमीशन खोर राजीव गांधी।' बोफोर्स घोटाले पर यह लिखा गया था। उस चुनाव के समय का यह सुपर-डुपर हिट गीत था। 'ए बबुआ टोपी सिया ल चुनाव में' भी खूब चला। यह विजेंद्र अनिल का गीत है। निर्मोही का 'जबले न रुकी भइया शोषण जुलुमवा कांरवा बढ़ते रही' भी गाया जाता था। इन गीतों के अलावे भी और कई गीत थे जो खूब गाये गये। आज कोई यकीन नही करेगा कि गांव-गांव में इन गीतों को गाने वाले थे। पार्टी के धुर विरोधी भी मन ही मन इन गीतों की लाइनों को गुनगुनाने को मजबूर थे। कभी-कभार तो बकझक करते या मजाक उड़ाते भी इन गीतों की एक-दो लाइनों को बोल जाते थे। ये गीत एक कार्यकर्ता की भूमिका में होते थे। एक मास्टर साहब थे हाई स्कूल जादोपुर के- ओझा जी, वे उस दौर के गानों और नारों को चिढ़ के कारण लोगों के बीच अक्सर सुनाया करते थे। बड़ी बड़ी रैलियों और जुलूसों में मंच से गीत होते थे। 10 मार्च 1989 की रैली जो पटना के गांधी मैदान में आयोजित थी, उसकी पूर्व संध्या पर मैंने नरेंद्र कुमार को गांधी मैदान के मंच से गाते देखा-सुना था। गीत था-'माई गोहरवे मोर ललनवा हो।' 1992 के बाद बनारस एबी होस्टल कमच्छा में रहते इनसे निकटता बनी। आज वो इस धरा-धाम पर नहीं हैं। यह गीत उनके गीतों-गजलों के संग्रह 'कब होगी बरसात' में है। नरेंद्र को भी रमताजी और विजेंद्र अनिल के गीत याद थे। इन गीतों को लोग आज भी गाते हैं। 'हिरावल', पटना के गायक और रंगकर्मी बड़े मन से इन गीतों को गाते हैं। लेकिन क्या कि गांव -गांव गाने वाली बात अब नहीं रही। आंदोलन तो हैं, पर गीत कम हैं। 


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89 के लोकसभा चुनाव में आरा लोकसभा क्षेत्र से आईपीएफ के कॉ. रामेश्वर प्रसाद की जीत हुई थी। इसके बाद बिहार विधान सभा के लिए चुनाव था। शाहपुर विधान सभा क्षेत्र के आईपीएफ के प्रत्याशी थे चंद्रमा प्रसाद। शाहपुर बाजार में एक आम सभा होने वाली थी। उस सभा को संबोधित करने आए थे सांसद रामेश्वर प्रसाद और रमता जी। प्रत्याशी चंद्रमा जी को तो रहना ही था। मैं भी उस सभा में था और मेरे गाँव के कुछ युवक भी थे और पार्टी समर्थक अन्य गांवों के भी आए थे। इन वक्ताओं के संबोधन से पहले गीत गाये जा रहे थे। गीत सिकरिया के उदय गा रहे थे। एक पर एक और एक से एक। गोरख, रमताजी, विजेंद्र अनिल के लिखे। उदय अच्छा गाते थे। गोरख पांडेय की एक कविता मैंने भी सुनाई थी। वह कविता थी 'हुआ यह है'। उसकी एक लाइन है- 'जिनको हिरासत में होना चाहिये उनका इशारा संविधान है/ और हम हैं कि खुली सड़कों पर कैद हैं'। है न यह आज पूरापुरी मौजूं। रामजी भाई ने इस लाइन को दो-तीन दिन हुआ, फेसबुक वाल पर डाला था। तो इस कविता को सुनने के बाद रमताजी ने सभा सम्पन्न होने पर मुझसे बातचीत की। उनके करीब बैठने औऱ बोलने-बतियाने का यह पहला अवसर था। मैंने इस सभा मे स्थानीय मुद्दों को केंद्रित करते एक छोटा-सा भाषण भी दिया था। शाहपुर से बिहिया आना था। यहां भी एक सभा होनी थी। यहां भी गीत गाये गये। गीत हमारे संगठन की पहचान बन गए थे। सभा के बाद हमलोग चाय पीने के लिये एक जगह बैठे। रमताजी से यहां भी कुछ बातें हुईं। बीच में आकर चंद्रमा जी ने रमताजी से कहा कि ये साथी बलभद्र जी हैं, इस अंचल में पार्टी कामकाज में हैं। उन्होंने कहा कि ये संतोष सहर के बडे भाई हैं। यह सुन वे और प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि आरा पार्टी ऑफिस में हमलोग मिलते हैं। रामेश्वर जी से पहले से अच्छी जान-पहचान थी। रमताजी और रामेश्वर जी हाथ मिला जगदीशपुर के लिए रवाना हुए। 


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तो रमता जी और कामरेड रामेश्वर प्रसाद जी बिहिया से जगदीशपुर के लिये रवाना हुए। बिहिया से थोड़ी ही दूरी पर है जगदीशपुर- बाबू कुंवर सिंह वाला जगदीशपुर। बताते चलें कि बाबू कुंवर सिंह पर रमता जी ने भोजपुरी में एक बड़ी अच्छी कविता लिखी है। कुंवर सिंह पर लिखी गयी कविताओं में यह अपनी एक अलग विशिष्ट पहचान रखती है। शाहपुर की सभा को संबोधित करते रमता जी बहुत ही सहज के साथ साथ तथ्यों के विश्लेषण में सन्तुलित और धारदार लगे। कांग्रेसी हुकूमत की कारगुजारियों का सहज ढंग से विश्लेषण किया। आज मैं जितना याद कर पा रहा हूँ, भाषण को बातचीत की शैली में वे रखते थे, जैसे कि भोजपुरी की अपनी कोई कविता सुना रहे हों। एक हाथ की ताली को दूसरे हाथ की ताली से मासूम स्पर्श कराते हुए। धोती कुरता गमछा और झोले वाले रमताजी। आज याद कर रहा हूँ सभा को सम्बोधित करते रमता जी को, एक हाथ की ताली को दूसरे हाथ की ताली से मासूम स्पर्श कराते, तो उनकी इस कविता की याद बारम्बार आ रही है- "खाके किरिया समाजवाद के खानदानी हुकूमत चले/ जइसे मस्ती में हाथी सामन्ती निरंकुश झूमत चले/ खाके के गोली गिरल परजातन्तर कि मुसकिल इलाज हो गइल/ चढ़के छाती पर केहू राजरानी, त केहू युवराज हो गइल।" यह 1984 की कविता है। इस कविता को सुनाने के अंदाज में वो सभा संबोधित कर रहे थे। "हक-पद खोजे से फँसावे आपन गरदन, ऐंठत चले अत्याचारी"। कविता के इन्ही तथ्यों को कविता सुनाने की शैली के बिल्कुल आसपास सुना रहे थे। तब मैं इनकी कविताओं का पाठक नही बन पाया था। तो कहां से जानता रमता जी को कायदे से। मुझे याद है कि किसी कार्यक्रम में शामिल होने आरा गया था तो पुरबवारी रेलवे गुमटी के पास जो पार्टी आफिस(cpi-ml) है, भीतर रमता जी थे। उन्होंने पूछा कि "आप भी कुछ लिखते हैं, कविता, कहानी?" मैंने तब हाँ-ना कुछ भी नही कहा था। फिर पूछा बाबा ने कि नाम के साथ कुछ लिखते हैं क्या जैसे मैं रमता लिखता हूँ, जैसे संतोष अपने नाम के साथ सहर लिखते हैं। मैंने कहा था कि ऐसा कुछ सोचा जरूर था, पर मन को भाया नहीं। फिर जितेंद्र जी ने चाय मंगा दी। भोजपुर के साथियों के बीच रमता जी के लिए जो प्यारा सा संबोधन था वो बाबा था। साहित्य जगत में, खासकर हिंदी में, नागार्जुन को बाबा कहाने का गौरव प्राप्त है। 


8 

30 अक्टूबर 1917 रमता जी का जन्म दिन है। 24 जनवरी 2008 को उन्होंने अपने जीवन की आखिरी सांसें ली। इस तरह यह उनका जन्म शती वर्ष है। जन-सुराज के संघर्षों के सहयात्री कवि थे रमता जी। पूरा नाम- रमाकांत द्विवेदी 'रमता'। बिहार के भोजपुर जिला का महुली घाट(बड़हरा) उनका जन्म स्थान था। यह बाढ़ -बूडाव वाला इलाका है। बाढ़ के चलते इसकी स्थिति काफी बदल चुकी है। बाढ़ ,सुखाड़ और अपने बड़हरा पर भी उन्होंने कविताएं लिखी हैं। उनके लिखे 'गंगाजी के बाढ़ में डुबकियां मारेला खूब/ जिला शाहाबाद भ में खाल बा बड़हरा।' पहले भोजपुर जिला शाहाबाद में था। शाहाबाद के दो भाग हुए-1.भोजपुर और 2.रोहतास। अब तो भोजपर और रोहतास के भी विभाजन हो गए हैं। इस कविता में कवि बड़हरा की भौगोलिक अवस्थिति बताने के साथ-साथ वहां की बदहाली के लिए बाढ़ जैसे प्राकृतिक प्रकोप के साथ-साथ आजादी के बाद की सरकारी नीतियों और अफसरशाही को जिम्मेवार मानता है। वह बड़हरा की बेहाली को गीत का विषय बनाता है। जो तथाकथित भक्त(सत्ता भक्त) किस्म के लोग हुआ करते हैं, उनको ऐसी कविताएं क्योंकर पसंद आएंगी। वे तो आज की तारीख में और मुँहजोर हैं। कहेंगे कि देखो जहां जन्म लेता है, वहीं की शिकायत करता है। राष्ट्रद्रोही है। और खुद जाकर बी डी ओ से मिल-बतियाकर फण्ड का पैसा मजे में हजम करने में जरा भी नहीं शर्माएंगे। तभी तो किसी एक कार्यक्रम के दौरान बड़हरा में ही वहां जमीदारों और उनके लठैतों को रमता जी पर हाथ चलाने में जरा भी संकोच नही हुआ। नहीं संकोच हुआ कि यह आदमी आजादी का लड़ाका भी रहा है। आजादी के लिये इसे रन-वन छिछियाना भी पड़ा है। रमता जी स्वतंत्रता आंदोलन के विचारशील योद्धा थे। आजादी के बाद भी सत्ता- संरचनाओं की पेंचों को समझने और उसकी न केवल आलोचना करने वाले, बल्कि जनआंदोलनों के साथ होकर सच्चे सुराज को संभव करने हेतु जूझते रहने वाले योद्धा थे। किसानों-मजदूरों और नौजवानों के साथ जुलूसों में चलते थे और जुलूसों के लिए गीत भी लिखते थे। बतियाते हुए गीत और ललकारते हुए गीत और चेत कराते हुए गीत। वे किसानों पर कविता लिखते हैं, पर किसान नहीं थे। कहना जरूरी है कि विजेंद्र अनिल भी इसी धारा के कवि हैं, किसान-मजूर उनकी कविताओं और कहानियों के पात्र और विषय हैं, पर वे भी किसान नहीं थे। दुर्गेन्दर अकारी भी इसी धरती की उपज हैं। उन्होंने शुरू -शुरू में मजदूरी भी की थी। बाद में उन्होंने खुद कहा- "मत कर भाई बनिहारी तू सपन में"। अकारी जी पार्टी के हर कार्यक्रम में सक्रिय रूप में मौजूद रहते थे। जनता के बीच बिना माइक-बिना मंच स्वरचित गीतों को गाते-सुनाते दिख ही जाते थे। अकारी जी की एक काव्य पुस्तिका है 'चाहे जान जाये'। उसकी भूमिका रमता जी की लिखी हुई है। भोजपुर और भोजपुरी कविता की यह एक त्रयी है। 

October 27

9

रमता, विजेंद्र अनिल और दुर्गेन्दर अकारी की त्रयी को संग्रामी त्रयी कहना ठीक होगा। इनके बाद इस धारा में आते हैं निर्मोही। सुरेश काँटक, जितेंद्र कुमार, निर्मोही, सुमन कुमार सिंह के साथ-साथ संतोष सहर की कविताओं और गीतों को इस त्रयी की नई कड़ी कहने या नया स्वर कहने में मुझे कोई हिचक या संकोच नहीं। सुरेश काँटक इनमें सबसे अधिक सक्रिय और पहले हैं।विजेंद्र अनिल के बहुत करीब के हैं। इस त्रयी पर अगर कोई बात होगी तो 'युवानीति', जो कि सांस्कृतिक मोर्चे पर सक्रिय युवाओं की एक टीम थी, जिसकी धमक सुदूर गांव-देहातों से लेकर कस्बों और नगरों-महानगरों तक पहुंच चुकी थी, की चर्चा के बगैर बात पूरी नहीं हो पाएगी। युवानीति में तब सुनील सरीन, अजय, धनन्जय, नीरू, राजू, कृष्णेन्दू, संतोष सहर, सुधीर सुमन, शमशाद प्रेम, अरुण आदि कई पूरे प्राणप्रण से सक्रिय थे। नाटकों के साथ-साथ ये इनके गीतों को बड़े प्रभावशाली अंदाज में मंच पर और चौक-चौराहों पर प्रस्तुत किया करते थे। गोरख के गीतों को भी खूब गाते थे। केशव रत्नम के गीत 'हाथों में होगी हथकड़ियां' की याद तो होगी ही सुनील सरीन को। इन गीतों को जन -जन तक पहुंचाने का जरूरी काम युवानीति के साथियों ने किया। मुझे युवानीति के अनेक प्रोग्रामों को देखने का अवसर मिला है। टीम के साथ कई जगहों पर जाने का। टीम के अभ्यासों को भी देखने का। आज की तारीख में 'हिरावल' के साथी यह भूमिका निभा रहे हैं। अनिल अंशुमन , निर्मल नयन की भूमिका भी उल्लेखनीय है। इन लोगों के पास भी रमताजी और विजेंद्र जी की अनेक स्मृतियां होंगी। मुझे याद है कि आरा के कुछ मित्रों ने मिल-जुलकर भोजपुरी की एक पत्रिका निकाली थी, जिसका एक ही अंक आ पाया। वह पत्रिका थी 'हिलोर'। उसमें रमता जी कविताएं छपी थीं और याद आ रहा है कि उसमें सुधीर सुमन का एक लेख भी था रमताजी पर। उस पत्रिका के संपादन से पहले चंद्रभूषणजी ने योजना के बारे में बताया भी था। कृष्णेन्दु, निलय उपाध्याय, चन्द्रभूषण,शमशाद प्रेम का उसमें सहयोग था। शमशाद जी ने बताया था कि इस पत्रिका की पूरी योजना कृष्णेन्दु की थी । पैसे की व्यवस्था में कृष्णेन्दु ही थे। पत्रिका की प्रति मुझे कृष्णेन्दु ने ही दी थी। मैं उनके पकड़ी, आरा वाले घर पे गया हुआ था। याद आ रहा है, झिलमिल-झिलमिल कि आरा के नागरी प्रचारिणी के सभागार में कोई एक कार्यक्रम आयोजित था। सभागार में रमता जी मौजूद थे। वे रामजी राय के साथ बतियाते बाहर निकले, नागरी प्रचारिणी के पूरब के गेट से। रामजी भाई उनकी एक कविता सुन रहे थे। गौर कर सुना था मैंने भी--'सुलहा सुराज ई कुराज हो गइल/ रहे जेकरा प आसा-भरोसा ऊ नेता दगाबाज हो गइल।' रमताजी को अथवा इस त्रयी के किसी एक को याद करने का मतलब मेरे लिए इन सबको और इन तमाम बातों को याद करना है।मेरी स्मृतियों में यह सब एकमुश्त बसे हुए हैं। ढोलक-झाल, हारमोनियम, कैसियो, अपना गांव-जवार। वो चंदा मांगना, यहां-वहां भटकना। 

October 28