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Thursday, June 11, 2015

हत्याओं के मामले में सगुन अच्छा नहीं है



(जितेन्द्र कुमार की दो नई पुस्तकों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी)

कवि-आलोचक-समीक्षक जितेंद्र कुमार की दो पुस्तकें आई हैं- ‘जिदंगी के रंग अनेक’ और ‘मेरा शब्द संसार’। ‘जिंदगी के रंग अनेक’ 1992 से लेकर 2001 तक की उनकी डायरी के चुने हुए अंशों पर आधारित है। इसमें काफी वैविध्य है। पुस्तकों, अखबारों और अखबारों को पढ़ने के दौरान उपजी प्रतिक्रियाओं और उनसे संबंधित नोट्स; साहित्यिक आयोजनों, संगठनों और साहित्यकारों से संबंधित अनुभव, रचनाओं के प्लाॅट, वामपंथी राजनीति के विविध आयाम, शहर में हो रहे भौगोलिक-आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव, जमीन का कारोबार और गांव से लेकर शहरी मुहल्लों तक गैरजनवादी बसावट आदि से संबंधित कई प्रसंग इस पुस्तक में दर्ज हैं। पारिवारिक जीवन के भी कुछ प्रसंग हैं, जो कि व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भाें से ही जुड़े हुए हैं। कुछ प्रसंग आॅफिस की जिंदगी के भी हैं। लेखक के अपने वैचारिक और अनुभवजन्य आग्रहों को भी स्पष्टता से महसूस किया जा सकता है। कई जीवित चरित्र अपने पूरे परिचय के साथ इसमें मौजूद हैं, उनसे संबंधित वर्णन और अनुभवों पर एकाध लोगों को आपत्ति भी हो सकती है। लेकिन इस पुस्तक की जो सबसे बड़ी खासियत है वह है- बेबाकी। दूसरी यह कि पुस्तक एक तरह से बीसवीं सदी के आखिरी दशक और इक्कीसवीं सदी के शुरुआत के समय के समाज, परिवार, साहित्य, संस्कृति, संगठन, विचारधारा आदि से जुड़े यथार्थ को दस्तावेजीकृत करती है। जितेंद्र कुमार ने लिखा है- ‘‘मेरी डायरी में सिर्फ मैं नहीं हूं, मेरा संपूर्ण परिवेश है, व्यवस्था है, साहित्य है, साहित्यकार हैं, राजनीति है, राजनीतिज्ञ हैं, आम जीवन की कशमकश है, जीवन-संघर्ष है, जिजीविषा है, आक्रमण है, आत्म-रक्षा की कोशिशें हैं। जिंदगी की तलाश है।’ जाहिर है जिंदगी की यह तलाश भी पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करेगी। कहीं-कहीं चलते-फिरते मैं भी इसमें नजर आ गया हूं। लेकिन यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि यह पुस्तक वर्तमान का आकलन करते हुए भविष्य की आशंकाओं से हमारा साक्षात्कार कराती है। पारिवारिक जमीन जायदाद के बंटवारे के दौरान हुई हत्याओं और प्रेम में उत्पन्न बाधा के कारण प्रेमी द्वारा की गयी हत्या के प्रसंग में जितेंद्र कुमार ने लिखा है- इक्कीसवीं सदी का प्रथम वर्ष है और हत्याओं के मामले में सगुन अच्छा नहीं है। 

दूसरी पुस्तक ‘मेरा शब्द संसार’ में जितेंद्र कुमार के आलोचनात्मक लेख और समीक्षाएं संकलित हैं। शमशेर, रेणु, नागार्जुन, सुरेंद्र चैधरी, भीष्म साहनी, नलिन विलोचन शर्मा, चंद्रभूषण तिवारी, पाश, विजेंद्र, विजेंद्र अनिल, मदन कश्यप, निलय उपाध्याय से लेकर युवा कवि संतोष चतुर्वेदी, ओमप्रकाश मिश्र तक की रचनाओं का उन्होंने मूल्यांकन किया है। पहली पुस्तक में भी पाश की कविताओं से संबंधित नोट्स मौजूद हैं। विजेंद्र की कविताओं पर इस पुस्तक में तीन लेख हैं। मुझे लगता है कि यह लगाव से लेखक की वैचारिक प्रतिबद्धता की ओर स्पष्ट तौर पर संकेत करता है। 

ये दोनों पुस्तकें पिछले लगभग ढाई दशक में एक लेखक के निर्माण की प्रक्रिया और उसकी वैचारिक जद्दोजहद को भी दर्शाती हैं। जो लोग लेखक बनना चाहते हैं, उनके लिए भी ये दोनों पुस्तकें काम की हो सकती हैं। सहज वर्णनात्मकता, वैचारिक आवेग और बहसतलब होना इन दोनों पुस्तकों की खासियत है। सबसे बड़ी बात यह है कि अराजनीतिकरण और वैचारिक अनास्थाओं के दौर में ये दोनों पुस्तकें साहित्य के प्रति आस्था जगाती हैं, उसे जरूरी बताती हैं। ‘मेरा शब्द संसार’ की भूमिका में जितेंद्र कुमार ने लिखा है- ‘‘मैं समझता हूं कि अधिक से अधिक बुद्धिजीवियों को अपने देश के सांस्कृतिक उन्नयन के लिए एवं सामाजिक संवेदना के प्रतिरक्षण के लिए साहित्य का गहरा अध्ययन करना चाहिए। रोजी-रोटी के लिए हम कहीं भी कार्यरत हों, साहित्य के पठन-पाठन के लिए समय का एक अंश अवश्य देना चाहिए।’’