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Monday, September 28, 2015

आरा में कवि वीरेन डंगवाल को श्रद्धांजलि दी गई





नाउम्मीदी भरे समय में वीरेन को उम्मीद का कवि बताया साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने


मशहूर कवि वीरेन डंगवाल के निधन पर 28 सितंबर 2015 को आरा में भाकपा-माले जिला कार्यालय के परिसर में शहर के साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने एक श्रद्धांजलि सभा की। वीरेन डंगवाल जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थे। पांच अगस्त 1947 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में उनका जन्म हुआ था। बरेली के एक काॅलेज में वे हिंदी के प्रोफेसर थे। इसी दुनिया में, दुष्चक्र में स्रष्टा और स्याही ताल उनके प्रकाशित कविता संग्रह हैं। उन्होंने पाब्लो नेरूदा, नाजिम हिकमत और ब्रेख्त सरीखे महान क्रांतिकारी कवियों की रचनाओं का अनुवाद किया था। कैंसर की बीमारी से उन्होंने लंबा संघर्ष किया। अंततः आज सुबह चार बजे उनकी सांसें थम गईं। मृत्यु से एक सप्ताह पहले वे अपनी कर्मभूमि बरेली लौट आए थे। वीरेन डंगवाल को साहित्य अकादमी सम्मान (2004) समेत कई पुरस्कार और सम्मान मिले। उन्होंने कई यादगार संस्मरण भी लिखे। युवा रचनाकारों से उनकी बहुत गहरे आत्मीय रिश्ते थे। उनकी काव्य पंक्तियों पर पोस्टर भी खूब बनाए गए। उन्होंने अमर उजाला का संपादन किया और कई युवा पत्रकारों और रचनाकारों को प्रोत्साहित करने में अहम भूमिका निभाई।  
उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन ने उन्हें आवेगमयी काव्यपरंपरा का कवि बताया। वीरेन डंगवाल की चर्चित कविता ‘राम सिंह’ के हवाले से हत्यारे शासकवर्ग पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि ‘वे माहिर लोग हैं राम सिंह/ वे हत्या को भी कला में बदल देते हैं।’ उन्होंने उनकी कविता की भाषा की खासियतों की चर्चा की तथा कहा कि वे सामान्य विषयों पर असाधारण कविता लिखने वाले कवि थे। वीरेन डंगवाल की ‘कवि’ शीर्षक कविता की पंक्तियां भी उन्होंने सुनाईं- मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूं/ और गुठली जैसा/ छिपा शरद का उष्म ताप/ मैं हूं वसंत में सुखद अकेलापन... 
कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार ने कहा कि वीरेन डंगवाल की कविताओं को पढ़ते हुए यह अहसास होता है कि वे सामाजिक-परिवर्तन की चेतना के कवि हैं। उनकी कविताओं में जो सामान्य चीजें हैं, वे उपेक्षित जनता की प्रतीक भी हैं। उनकी कविताएं सामान्य लोगों के भीतर की रचनाशीलता को उजागर करती हैं, जिनके बगैर यह दुनिया पूरी नहीं होती। जितेंद्र कुमार ने वीरेन डंगवाल की कविता ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’ की पंक्तियों के हवाले से उनकी वैचारिक दृष्टि को रेखांकित किया। 
प्रलेस, बिहार के महासचिव रवींद्रनाथ राय ने कहा कि वीरेन डंगवाल की कविताएं बताती हैं कि जीवन में जो साधारण और सहज है, वही महत्वपूर्ण है। उन्होंने उनकी कविता ‘परंपरा’ का पाठ भी किया। 
जसम, बिहार के अध्यक्ष सुरेश कांटक ने कहा कि वीरेन डंगवाल का जाना एक सदमे की तरह है। उनकी कविताएं अंधेरे में रोशनी दिखाती हैं। उन्होंने वैसी चीजों पर लिखा, जो आम आदमी की जिंदगी से जुड़ी होती हैं। जनपथ संपादक अनंत कुमार सिंह ने कहा कि जनपक्षधर रचनाकारों के लिए वे हमेशा अनुकरणीय रहेंगे। युवा कवि सुमन कुमार सिंह ने कहा कि उनकी कविताओं में हमारी पीढ़ी को अपनी अभिव्यक्ति मिली और हमने उनके जरिए अपने समय को अच्छी तरह समझा। उन्होंने उनकी कविता 'हमारा समाज' का पाठ किया। कवि ओमप्रकाश मिश्र ने कहा कि वीरेन डंगवाल की कविताओं में एक अनोखापन है, जो उन्हें अन्य कवियों से अलग करता है। वे छोटे-मोटे प्रसंगों पर बड़ी कविताएं लिखने वाले कवि हैं। कवि सुनील चौधरी ने कहा कि वीरेन डंगवाल में कविता, जीवन और जनता के प्रति गहरी प्रतिबद्धता नजर आती है। उनकी कविता में बेघर, बेदाना, बेपानी, बिना काम के लोगों के क्षुब्ध हाहाकार के संदर्भ में कही गई पंक्ति ‘घनीभूत और सुसंगठित होनी है उनकी वेदना अभी’ को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि यही वेदना बदलाव का हथियार बनती है और इसी से बदलाव की जिजीविषा पैदा होती है।
चित्रकार राकेश दिवाकर ने वीरेन डंगवाल को आज के नाउम्मीदी भरे समय में उम्मीद का कवि बताते हुए कहा कि पाश और गोरख पांडेय के बाद वही ऐसे कवि हैं, जिनकी कविताओं में हमारे भावों की अभिव्यक्ति मिली, इसी कारण उनकी कविताओं के पोस्टर भी अधिक बनाए गए। माले नेता सत्यदेव ने कहा कि उनकी कविताएं सामाजिक-बदलाव में लगे लोगों को संघर्ष की ताकत प्रदान करती हैं। माले नेता जितेंद्र कुमार सिंह ने वीरेन डंगवाल को जनता की लड़ाइयों का सहयोद्धा रचनाकार बताया। 
संचालन जसम राज्य सचिव सुधीर सुमन ने किया। 
जनवादी लेखक संघ के नगर सचिव रविशंकर सिंह और आशुतोष कुमार पांडेय ने भी वीरेन डंगवाल को श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर दिलराज प्रीतम, मिथिलेश कुमार, राजनाथ राम आदि भी मौजूद थे।

Sunday, June 14, 2015

आरवी मिलीजुली तहजीब, जबान और अदब के एक बड़े नुमाइंदे थे : जसम


शीन मीम आरिफ माहिर आरवी को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि 

आरा: 13 जून 


शीन मीम आरिफ माहिर आरवी
photo : Imtiyaz Ahmad (Danish) के फेसबुक वाल से साभार 
मशहूर शायर शीन मीम आरिफ माहिर आरवी का 11 जून को पटना में इलाज के दौरान इंतकाल हो गया। उन्होंने नब्बे साल से अधिक की उम्र पाई। जन संस्कृति मंच से जुड़े साहित्यकारों ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा है कि वे भारत की मिलीजुली तहजीब, जबान और अदब के एक बड़े नुमाइंदे थे। उनका निधन सिर्फ उर्दू साहित्य के लिए ही नहीं, बल्कि उस साझी साहित्यिक परंपरा के लिए भी बड़ी क्षति है, जिसे लिपियों के फर्क, अंगरेजों की साजिशों और फिरकापरस्त सियासत की तिकड़मों की वजह से विभाजित करने की हरसंभव कोशिश की गई। 

अजीमुल्ला खान रचित गीत ‘हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा’, जो कि 1857 के महासंग्राम का झंडागीत था, वह उर्दू के अखबार ‘पयामे आजादी’ में छपा था, जिसे हिंदी-उर्दू दोनों जबानों के बोलने वाले अपना मानते हैं। जिस तरह गालिब, मीर, दाग, मोमिन, नजीर, इकबाल, जोश, फैज, जिगर, मजाज, फिराक सरीखे शायरों से जुड़ाव के बगैर हिंदी का साहित्यिक मिजाज मुकम्मल नहीं होता, उसी तरह आरा में रचे गए उर्दू साहित्य के बेमिसाल इतिहास को जाने बगैर आरा के साहित्यिक इतिहास को मुकम्मल तौर पर नहीं समझा जा सकता। शीन मीम आरिफ माहिर आरवी ने अपनी किताब ‘आरा: एक शहर-ए-सुखन’ में 1747 से 1947 तक के आरा के गजलकारों का परिचय और उनकी गजलों को संकलित किया है। यह एक ऐतिहासिक काम है। इसे पढ़कर यह जाना जा सकता है कि आरा उर्दू अदब का एक ऐतिहासिक केंद्र था। शीन मीम आरिफ आरवी ने ‘आरा : जो एक शहर है’ नामक किताब में आरा शहर के इतिहास को भी दर्ज किया है। यह भी उनका एक महत्वपूर्ण काम है। ‘शायरी के अलिफ बे’ और महान शायर गालिब पर जमीन पर रची गई गजलों और लेखों का संग्रह ‘खस्ता-ए-तेग सितम’ नामक उनकी दो और  महत्वपूर्ण किताबें प्रकाशित हुई थीं।

जसम के राष्ट्रीय सहसचिव जितेंद्र कुमार ने कहा कि उम्रदराज और काफी दुबले-पतले होने के बावजूद रिक्शे से वे खुद साहित्यकारों के घर पहुंच जाते थे। उनमें गजब की ऊर्जा और लोगों से मिलने-जुलने के प्रति दिलचस्पी थी। चार-पांच बार रिक्शे से वे उनके घर भी आए थे। शायरों के घर और साहित्यिक आयोजनों में भी उनसे कई बार मुलाकातें हुईं थीं।

जसम के बिहार राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन ने वेदनंदन सहाय और उनकी गहरी दोस्ती का हवाला देते हुए बताया कि उन्होंने वेदनंदन सहाय के निधन के बाद ‘वेद भाई : स्कूल से चिता तक’ शीर्षक से जो संस्मरण लिखा है, उसमें दोनों की साहित्यिक अभिरुचि के विकसित होने का इतिहास भी दर्ज है। वेदनंदन सहाय जिला स्कूल में दसवीं के छात्र थे और शीन मीम आरिफ माहिर आरवी नौंवी के। उसी दौरान उन लोगों ने ‘साहित्य संगम’ के नाम से फुलस्केप साइज के कागज को बीच के हिस्से से बांटकर एक पत्रिका निकालना शुरू किया, जिसमें दायीं तरफ उर्दू और बायीं तरफ हिंदी और अंगरेजी की रचनाएं होती थीं। उर्दू हिस्सा आरवी साहब लिखते थे और हिंदी का हिस्सा वेदनंदन जी। उस पत्रिका के आठ-दस अंक निकले। इसके बाद फिर एक अंतराल आया। आरवी साहब स्कूल की फुटबाल टीम में खेलने लगे और वेदनंदन जी मैट्रिक के परीक्षा की तैयारी में मसरूफ हो गए। इसके बाद काॅलेज में वे फिर मिले। काॅलेज में ‘कला मंडल’ बनाया और नाटकों का मंचन किया। अपनी-अपनी नौकरी के सिलसिले में दोनों फिर जुदा हुए और 1955 में पुनः एक बार आरा रेलवे प्लेटफार्म पर डेली पैसेंजर के तौर पर दोनों की मुलाकात हुई। उसके बाद वेदनंदन जी ने उर्दू और आरवी साहब ने हिंदी सिखना शुरू किया। वेदनंदन जी ने उन्हें ‘महाभारत’, ‘रामायण’, ‘गुरु ग्रंथ’ और ‘गीता’ के उर्दू अनुवाद उपलब्ध कराए और उन्होंने उन्हें ‘कुरान शरीफ’ का हिंदी अनुवाद उपलब्ध कराया। शीन मीम आरिफ माहिर आरवी साहब ने लिखा है- ‘‘एक-दूसरे की त्योहारों, शादी-ब्याह और दूसरी तकरीबात में शरीक होकर मैं उनका फैमिली मेंबर हो गया।’’ रामनिहाल गुंजन ने कहा कि आज फिरकापरस्त सियासत के उन्मादी दौर में शीन मीम आरिफ माहिर आरवी और वेदनंदन सहाय की दोस्ती की याद हमें समाजी-सियासी माहौल को बदलने और उसे खुशगवार बनाने की प्रेरणा देती है। 

श्रद्धांजलि देने वालों में जनमत के संपादक सुधीर सुमन, कवि सुमन कुमार सिंह, कवि सुनील चौधरी और चित्रकार राकेश दिवाकर भी शामिल थे।

Thursday, June 11, 2015

हत्याओं के मामले में सगुन अच्छा नहीं है



(जितेन्द्र कुमार की दो नई पुस्तकों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी)

कवि-आलोचक-समीक्षक जितेंद्र कुमार की दो पुस्तकें आई हैं- ‘जिदंगी के रंग अनेक’ और ‘मेरा शब्द संसार’। ‘जिंदगी के रंग अनेक’ 1992 से लेकर 2001 तक की उनकी डायरी के चुने हुए अंशों पर आधारित है। इसमें काफी वैविध्य है। पुस्तकों, अखबारों और अखबारों को पढ़ने के दौरान उपजी प्रतिक्रियाओं और उनसे संबंधित नोट्स; साहित्यिक आयोजनों, संगठनों और साहित्यकारों से संबंधित अनुभव, रचनाओं के प्लाॅट, वामपंथी राजनीति के विविध आयाम, शहर में हो रहे भौगोलिक-आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव, जमीन का कारोबार और गांव से लेकर शहरी मुहल्लों तक गैरजनवादी बसावट आदि से संबंधित कई प्रसंग इस पुस्तक में दर्ज हैं। पारिवारिक जीवन के भी कुछ प्रसंग हैं, जो कि व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भाें से ही जुड़े हुए हैं। कुछ प्रसंग आॅफिस की जिंदगी के भी हैं। लेखक के अपने वैचारिक और अनुभवजन्य आग्रहों को भी स्पष्टता से महसूस किया जा सकता है। कई जीवित चरित्र अपने पूरे परिचय के साथ इसमें मौजूद हैं, उनसे संबंधित वर्णन और अनुभवों पर एकाध लोगों को आपत्ति भी हो सकती है। लेकिन इस पुस्तक की जो सबसे बड़ी खासियत है वह है- बेबाकी। दूसरी यह कि पुस्तक एक तरह से बीसवीं सदी के आखिरी दशक और इक्कीसवीं सदी के शुरुआत के समय के समाज, परिवार, साहित्य, संस्कृति, संगठन, विचारधारा आदि से जुड़े यथार्थ को दस्तावेजीकृत करती है। जितेंद्र कुमार ने लिखा है- ‘‘मेरी डायरी में सिर्फ मैं नहीं हूं, मेरा संपूर्ण परिवेश है, व्यवस्था है, साहित्य है, साहित्यकार हैं, राजनीति है, राजनीतिज्ञ हैं, आम जीवन की कशमकश है, जीवन-संघर्ष है, जिजीविषा है, आक्रमण है, आत्म-रक्षा की कोशिशें हैं। जिंदगी की तलाश है।’ जाहिर है जिंदगी की यह तलाश भी पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करेगी। कहीं-कहीं चलते-फिरते मैं भी इसमें नजर आ गया हूं। लेकिन यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि यह पुस्तक वर्तमान का आकलन करते हुए भविष्य की आशंकाओं से हमारा साक्षात्कार कराती है। पारिवारिक जमीन जायदाद के बंटवारे के दौरान हुई हत्याओं और प्रेम में उत्पन्न बाधा के कारण प्रेमी द्वारा की गयी हत्या के प्रसंग में जितेंद्र कुमार ने लिखा है- इक्कीसवीं सदी का प्रथम वर्ष है और हत्याओं के मामले में सगुन अच्छा नहीं है। 

दूसरी पुस्तक ‘मेरा शब्द संसार’ में जितेंद्र कुमार के आलोचनात्मक लेख और समीक्षाएं संकलित हैं। शमशेर, रेणु, नागार्जुन, सुरेंद्र चैधरी, भीष्म साहनी, नलिन विलोचन शर्मा, चंद्रभूषण तिवारी, पाश, विजेंद्र, विजेंद्र अनिल, मदन कश्यप, निलय उपाध्याय से लेकर युवा कवि संतोष चतुर्वेदी, ओमप्रकाश मिश्र तक की रचनाओं का उन्होंने मूल्यांकन किया है। पहली पुस्तक में भी पाश की कविताओं से संबंधित नोट्स मौजूद हैं। विजेंद्र की कविताओं पर इस पुस्तक में तीन लेख हैं। मुझे लगता है कि यह लगाव से लेखक की वैचारिक प्रतिबद्धता की ओर स्पष्ट तौर पर संकेत करता है। 

ये दोनों पुस्तकें पिछले लगभग ढाई दशक में एक लेखक के निर्माण की प्रक्रिया और उसकी वैचारिक जद्दोजहद को भी दर्शाती हैं। जो लोग लेखक बनना चाहते हैं, उनके लिए भी ये दोनों पुस्तकें काम की हो सकती हैं। सहज वर्णनात्मकता, वैचारिक आवेग और बहसतलब होना इन दोनों पुस्तकों की खासियत है। सबसे बड़ी बात यह है कि अराजनीतिकरण और वैचारिक अनास्थाओं के दौर में ये दोनों पुस्तकें साहित्य के प्रति आस्था जगाती हैं, उसे जरूरी बताती हैं। ‘मेरा शब्द संसार’ की भूमिका में जितेंद्र कुमार ने लिखा है- ‘‘मैं समझता हूं कि अधिक से अधिक बुद्धिजीवियों को अपने देश के सांस्कृतिक उन्नयन के लिए एवं सामाजिक संवेदना के प्रतिरक्षण के लिए साहित्य का गहरा अध्ययन करना चाहिए। रोजी-रोटी के लिए हम कहीं भी कार्यरत हों, साहित्य के पठन-पाठन के लिए समय का एक अंश अवश्य देना चाहिए।’’ 

Friday, January 16, 2015

गरीबों के हाथों में न्याय की तलवार हो, भोला जी यह चाहते थे: रवींद्रनाथ राय

जनकवि भोला जी स्मृति आयोजन संपन्न


शंकर बिगहा जनसंहार के अभियुक्तों की रिहाई पर क्षोभ और विरोध जाहिर किया गया,

न्याय के संहार पर साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने गहरा शोक जाहिर किया
तमिल उपन्यासकार पेरुमल मुरुगन की हिंदूवादी संगठनों द्वारा किये जा रहे विरोध और किताब जलाये जाने की निंदा


15 जनवरी को जनकवि भोला जी का स्मृति दिवस था। हमने आरा शहर के नवादा थाने के सामने उसी जगह पर उनकी स्मृति में आयोजन किया, जहां हर साल गोरख पांडेय की स्मृति में काव्य गोष्ठी आयोजित होती रही है और जिसके आयोजन में भोला जी की प्रमुख भूमिका रहती थी। भोला जी को चाहने वाले रचनाकार, कलाकार, संस्कृतिकर्मी और उनके राजनीतिक साथी बड़ी संख्या में इस आयोजन में शामिल हुए। यह आयोजन जन संस्कृति मंच और भाकपा-माले की नवादा ब्रांच कमेटी ने किया था। भोला जी नवादा मुहल्ले में रहते थे और भाकपा-माले और जन संस्कृति मंच दोनों के सदस्य थे। सबसे पहले नवादा ब्रांच के सचिव का. प्रमोद रजक ने बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और पत्रकारों का स्वागत किया और कहा कि भोला जी ने अपनी कविता के जरिए गरीबों और दलितों को जगाने का काम किया। 

आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि जगदीश नलिन, वरिष्ठ कवि-आलोचक रामनिहाल गुंजन, आलोचक प्रो. रवींद्रनाथ राय और जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने की। पहले उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण किया गया। आयोजन की शुरुआत जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही ने उनके मशहूर गीत ‘कवन हउवे देवी देवता, कवन ह मलिकवा, बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा’ सुनाकर की। उन्होंने उस गीत की रचना प्रक्रिया के बारे में बताया कि उनकी बहन ने अपने बेटे के लिए मन्नत मांगी थी, जिसे पूरा करने जाते वक्त वे हमें भी जबरन ले गए थे। भोला जी पूरे रास्ते देवी-देवताओं को गरियाते रहे। संयोगवश भांजे को चोट आ गई तो बहन ने डांटा की, इनकी वजह से ही ऐसा हुआ। इस पर भोला जी ने जवाब दिया कि नहीं, कोई बड़ी दुघर्टना होने वाली होगी, मेरे द्वारा देवी-देवता को गरियाने की वजह से ही यह हुआ, कि कम चोट ही आई। निर्मोही ने बताया कि जिस मरछही कुंड में वे लोग गए थे, उसमें योजना बनाकर वे कूदे कि पता चलें कि अंदर पानी में क्या है। 

कवि बनवारी राम ने भी भोला जी की नास्तिकता के बारे में जिक्र किया कि जब उन्हें उनकी बेटी का शादी का कार्ड मिला तो देखा कि उस पर गणेश जी की तस्वीर को लाल रंग से पोत दिया गया था। जाहिर है गणेश जी वाला कार्ड ही बाजार में मिलता है, वही छपकर आया होगा। उसके बाद भोला जी को वह तस्वीर नागवार गुजरी होगी।

आयोजन जनकवि की स्मृति का था, तो जनविरोधी राजनीति पर निशाना सधना ही था। कवि सुनील चौधरी ने मोदी के शासनकाल में सांप्रदायिक उन्माद को बढ़ावा दिए जाने की राजनीति के पीछे मौजूद असली मंशा की ओर लोगों का ध्यान खींचा और कहा कि चाय बेचने की बात करने वाला आज देश को बेच रहा है। आज देशी-विदेशी कंपनियों को देश के प्राकृतिक संसाधनों की लूट की खुली छूट दे दी गई है। इस देश का न्यायतंत्र बिका हुआ है। आजादी और लोकतंत्र दोनों खतरे में है। भोला जी आज होते तो आज इसके खिलाफ लिख रहे होते। 

आयोजन में शंकरबिगहा जनसंहार समेत बिहार में अन्य जनसंहारों के मामलों में अभियुक्तों की रिहाई पर विरोध और क्षोभ जताते हुए साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने एक मिनट का मौन रखकर न्याय के संहार पर गहरा शोक जाहिर किया। इसके साथ ही हिंदूवादी जातिवादी संगठनों द्वारा अपने उपन्यास 'माथोरुभगन' को जलाये जाने और उनके विरोध प्रदर्शनों के कारण तमिल उपन्यासकार पेरुमल मुरुगन द्वारा अपनी सारी किताबों को वापस ले लेने को विवश हो जाने को लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए घातक बताया गया तथा इसकी निंदा की गई। ज्ञात हो कि जिस उपन्यास को जलाया गया है वह चार वर्ष पहले तमिल में प्रकाशित हुआ था, लेकिन पिछले साल जब इसका अंगरेजी अनुवाद आया तब इसका विरोध शुरू हो गया।

कवि सुमन कुमार सिंह ने कहा कि कई मायने में भोला जी पढ़े-लिखे लोगों से ज्यादा अपने समय और समाज को समझते थे। उनकी कविता को किसी काव्यशास्त्रीय कसौटी के जरिए नहीं, बल्कि जनता की वेदना से समझा जा सकता है। सुमन कुमार सिंह ने कवि बलभद्र द्वारा भेजे गए भोला जी से संबंधित संस्मरण का भी पाठ किया। 
कवयित्री किरण कुमारी ने कहा कि भोला जी ने समाज की विद्रूपताओं पर प्रहार किया। वे सूत्रों में संदेश देते थे और वे संदेश बड़े होते थे। डाॅ. रणविजय ने कहा कि भोला जी कबीर की तरह थे। चित्रकार राकेश दिवाकर जिन्होंने कभी भोला जी का एक बेहतरीन पोट्रेट बनाया था, उन्होंने आशुकविता की उनकी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपनी आशुकविता सुनाई, जो शंकरबिगहा जनसंहार के अभियुक्तों की रिहाई से आहत होकर लिखी गई थी। राकेश दिवाकर की कविता की पंक्तियां कुछ इस तरह थीं- औरतें थीं, अबोध थे/ बूढ़े थे, निहत्थे थे/ सोए थे/ वे मार दिए गए/ निःशस्त्र थे, बेवश थे, लाचार थे/ वे मार दिए गए/ हत्यारे बरी हो गए/ क्योंकि सरकारें उनकी थीं....

भोला जी के पुत्र पेंटर मंगल माही ने कहा कि अपने पिता पर उन्हें गर्व है। वे समाज की बुराइयों के खिलाफ लिखते थे। कठिनाइयों में रहते हुए उन्होंने कविताएं लिखीं। गीतकार राजाराम प्रियदर्शी ने भोला जी का गीत ‘तोहरा नियर दुनिया मेें केहू ना हमार बा’ को गाकर सुनाया। रामदास राही ने भोला जी की कविताओं का संकलन प्रकाशित करने का सुझाव दिया। 
आशुतोष कुमार पांडेय ने कहा कि कविता भोला जी की जुबान पर रहती थी। वे सतही कवि नहीं थे, बल्कि उनकी कविताएं देश-समाज की गंभीर चिंताओं से जुड़ी हुई हैं।
 भाकपा-माले के आरा नगर सचिव का. दिलराज प्रीतम ने कहा कि आज देश के सामने गंभीर संकट है, मोदी शासन में अब तक 8 जनविरोधी अध्यादेश पारित हो चुके हैं। देश तानाशाही की ओर बढ़ रहा है। भोला जी की स्मृति हमें यह संकल्प लेने को प्रेरित करती है कि हम इस तानाशाही का प्रतिरोध करें, इसके खिलाफ रचनाएं लिखें। इस मौके पर युवानीति के अमित मेहता और सूर्य प्रकाश ने रमता जी के गीत ‘हमनी देशवा के नया रचवइया हईं जा’ का गाकर सुनाया। 

प्रो. अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने बताया कि जब प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान भोला जी की दूकान हटाने का फरमान आया था, उन्हीं दिनों उनसे पहली मुलाकात हुई थी और वे उसका विरोध करने की योजना बना रहे थे। उन्होंने जनता को अपनी कविताओं के जरिए बताया कि ये जो वर्दीधारी हैं, जो सफेदपोश हैं, इनसे बचने की जरूरत है। प्रो. उपाध्याय ने कहा कि विपन्नावस्था में उनकी जिंदगी गुजरी पर उनके चेहरे पर हंसी हमेशा बनी रही। वे बहुत बड़े थे। वे हमारी स्मृतियों में हमेशा रहेंगे।

कवि जितेंद्र कुमार ने कहा कि इस आयोजन में लोगों की उपस्थिति ही उनकी लोकप्रियता का पता देती है। वे उनमें से नहीं थे जो अपने परिवार को आगे बढ़ाने के लिए सिर्फ धन बटोरते रहते हैं, जो न्याय के नाम पर अन्याय करते हैं, जो सत्ता के बगैर नहीं रह सकते। मेहनतकश अवाम के प्रति उनमें सच्ची संवेदना थी। अपने आदर्शों को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने बताया कि वे और सुमन कुमार सिंह उनकी बीमारी के दौरान आरा सदर अस्पताल में भी मौजूद थे, जहां उन लोगों ने अस्पताल की कुव्यवस्था का विरोध भी किया था। लेकिन अंततः भोला जी को बचाया नहीं जा सका। जितेंद्र कुमार ने कहा कि कविता को व्यापक जनता से जोड़ना ही भोला जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन जी ने कहा कि अरबों लोग उन्हीं स्थितियों में रहते हैं, जिनमें भोला जी थे, लेकिन उनसे वे इसी मायने में अलग थे कि वे बदहाली के कारणों के बारे में सोचते थे और उस सोच को अपनी कविताओं के जरिए जनता तक पहुंचाते थे। भोला जी क्रांतिकारी जनकवि थे। वे दूजा कबीर थे। 

वरिष्ठ कवि जगदीश नलिन ने कहा कि जब वे भोला जी के पान दूकान के करीब मौजूद एक हाई स्कूल में शिक्षक थे, तो रोजाना उनकी मुलाकात उनसे होती थी। उन दिनों उन्होंने उनकी चालीस-पैंतालीस कविताएं देखी थीं। उन्होंने कहा कि भोला जी कविता की शास्त्रीयता पर ध्यान नहीं देते थे। सीधे-साधे लहजे में अपनी बात कहते थे। उन्होंने उन पर लिखी गई अपनी कविता का भी पाठ किया। 

आलोचक रवींद्रनाथ राय ने कहा कि भोला जी में निरर्थक संस्कारों को तोड़ देने का हौसला था। जनता का सवाल ही भोला जी की कविता का सवाल है। उनकी कविताओं में प्रश्नाकुलता है। वे सामाजिक-राजनीति संघर्षों के कवि थे। न्याय की तलवार जनता के हाथ में हो, यह भोला जी चाहते थे। 

अध्यक्षमंडल के वक्तव्य के दौरान ही भोला जी के अजीज दोस्त गीतकार सुरेंद्र शर्मा विशाल भी आयोजन में पहुंच गए। उन्होंने उन्हें एक अक्खड़ कवि के बतौर याद किया और कहा कि उनका जीवन अपने लिए नहीं था, बल्कि लोगों के लिए था। वे जिस राजनीतिक पार्टी से जुड़े हुए थे, जीवन भर उसके आंदोलनों के साथ रहे। सुरेंद्र शर्मा विशाल ने हिंदूवादी संगठनों के ‘घरवापसी’ अभियान की आलोचना करते हुए यह सवाल उठाया कि घर वापसी के बाद किस श्रेणी में जगह मिलेगी? रखा तो शूद्रों की श्रेणी में ही जाएगा! उन्होंने वर्गीय विषमता से ग्रस्त शिक्षा पद्धति पर भी सवाल उठाया। उन्होंने एक गीत भी सुनाया- का जाने कहिया ले चली इ चलाना/ धर्म के नावे प आदमी लड़ाना।

संचालन करते हुए मैंने भोला जी की कविता, कवि व्यक्तित्व और विचारधारा पर केंद्रित अपने लेख के जरिए कहा कि जनांदोलन और उसके नेताओं के प्रति भोला जी के गीतों पर जबर्दस्त अनुराग दिखाई पड़ता है। जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए जो लंबा संघर्ष चल रहा है, जो उसकी आजादी, बराबरी और खुदमुख्तारी का संघर्ष है, उसी के प्रति उम्मीद और भावनात्मक लगाव का इजहार हैं उनकी कविताएं।


इस मौके पर भोला जी की जनवाद के आवाज, जनसंगीत, जान जाई त जाई, फरमान, लहू किसका, आओ बात करें, आदमी, आखिर कौन है दोषी?, हम लड़ रहे हैं, आज पूछता गरीबवा आदि कविताओं का पाठ भी किया गया। इस आयोजन में यह भी तय किया गया कि भविष्य में भोला जी की स्मृति में होने वाले आयोजनों में आशुकविताओं का भी पाठ होगा, जिसके लिए विषय उसी वक्त निश्चित किया जाएगा।
समय के दबाव में कई बार अख़बारों में
कैसी गडबडियां होती हैं, उसकी एक बानगी
  दैनिक हिदुस्तान की यह खबर है. भोला जी
के बारे में गुंजन जी के वक्तव्य को  उन पर
 ही चिपका दिया गया. खैर, गुंजन जी की
लंबी उम्र की कामना है. 

प्रभात खबर 


























दैनिक जागरण अखबार में खबर तो नहीं छपी पर उसके वेबसाईट पर आयोजन की खबर मौजूद है.
http://www.jagran.com/bihar/bhojpur-11988581.html



Thursday, December 4, 2014

अपने अपने प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा



प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा

प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा 
20 नवंबर को मैं दिल्ली में था तभी आरा से कवि आलोचक जितेन्द्र कुमार ने फोन ने सूचना दी कि 19 नवंबर को प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा का निधन हो गया। वे सिन्हा नहीं, सिनहा लिखते थे। हमलोग जब एम.ए. में आये उसके पहले हिंदी के वही विभागाध्यक्ष थे। कार्यक्रमों के सिलसिले में उनसे मुलाकात होती थी। उनके रिटायर होने के बाद हम यानी मैं और सुमन सिंह ने एम.ए. में दाखिला लिया था। इस कारण हमारे साथ गुरु के बजाए एक स्नेहिल अभिभावक का ही उनका व्यवहार रहता था, काफी मित्रवत। उनका आलोचनात्मक विवेक काफी प्रखर था। हमारी पीढ़ी के वैचारिक मकसद और उलझनों के प्रति उनका रुख बहुत संवेदनशील रहता था। यथार्थ पर उनकी गहरी पकड़ थी। अगर वे जमकर साहित्य सृजन में लगे होते तो शायद बहुत सारी महत्वपूर्ण रचनाएँ दे गए होते। यह मैं उनके उपन्यास ‘उभरी परतें’ के आधार पर कहता रहा हूं। इस उपन्यास पर कथाकार मधुकर सिंह ने ‘इस बार’ के लिए लिखवाया था। मैंने उस उपन्यास और उसके नायक की सीमाओं की ओर संकेत किया था, जिसकी उन्होंने तारीफ की थी। ऐसी तारीफों ने ही हमें किसी रचना पर अपनी बेबाक आलोचनात्मक राय देने का हौसला दिया। इस उपन्यास पर और भी समीक्षाएं और आलोचनाएं लिखी गयी थीं, जिन्हें वे एक साथ प्रकाशित करना चाहते थे। उनके उपन्यास का नायक मुझे इस कारण भी याद रहता है कि वह रोमांटिक भी है और नियतिवादी भी। दिल्ली जाने के बाद से एकाध बार ही उनसे मुलाकात हो पाई थी। 

जितेन्द्र जी ने ही सूचना दी कि 3 दिसंबर को स्मृति सभा है। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के सभागार में उनकी स्मृति में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में गुरुजनों और साहित्यकार-बुद्धिजीवी मित्रों के अलावा छात्र-छात्राएं भी मौजूद थे। अध्यक्षमंडल में डाॅ. दुर्गविजय सिंह, डाॅ. दीनानाथ सिंह, प्रो. पारसनाथ सिंह, प्रतिकुलपति लीलाचंद साहा और प्रो. अयोध्या प्रसाद मंच पर मौजूद थे। 

रामनिहाल गुंजन 
जब मैं स्मृति सभा में पहुंचा तो जसम के राज्य उपाध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन बोल रहे थे। उन्होंने प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा के उपन्यास ‘उभरी परतें’ की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि उन पर प्रेमचंद का गहरा प्रभाव था। 
प्रो. वीर बहादुर सिंह ने कहा कि उनका व्यक्तित्व आडंबरहीन था। उन्होंने उनके उपन्यास ‘उभरी परतें’ को महत्वपूर्ण उपन्यास बताया। आलोचक प्रो. रवीद्रनाथ राय ने आरा की साहित्यिक बिरादरी के साथ उनकी घनिष्ठता की चर्चा की। 
डाॅ. रवींद्र कुमार और डाॅ. परशुराम सिंह ने उनके मिलनसार और सहयोगी रवैये को याद किया.प्रो. अरुण कुमार सिन्हा ने कहा कि प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा के विचारों और कृतियों पर विचार करना आज की जरूरहै। कवि जितेंद्र कुमार ने याद किया कि लालू यादव के शासनकाल में अपहरणकर्ताओं के एक गिरोह ने प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा के बेटे सुजीत की हत्या कर दी थी, क्योंकि उन्होंने उनका प्रतिरोध किया था। सुजीत बैंक के मैनेजर थे। अपहरणकर्ताओं ने उनके बेटे अपूर्व का अपहरण कर लिया था। बेटे की हत्या और पोते के अपहरण से प्रो. सिनहा को गहरा आघात पहुंचा था। जब उनके दूसरे बेटे समीर, जो उस समय आसाम में डीएम थे, ने जब गर्वनर से आग्रह किया और तब लालू यादव ने हस्तक्षेप किया, तब उनके पोते को अपहरणकर्ताओं ने छोड़ा। जितेंद्र कुमार ने कहा कि प्रो. सिनहा का जीवन बेहद सादगीपूर्ण था। उनका व्यवहार बेहद आत्मीय था। 


डाॅ. नंदजी दूबे ने कहा कि वे भी उनके शिष्य थे। उन दिनों किसी छात्र का शिक्षक से सान्निध्य हो, ऐसा दुर्लभ था। उनका व्यक्तित्व एक विरोधाभासी व्यक्तित्व था। कक्षा में वे बहुत ही सख्त और अनुशासन प्रिय शिक्षक की भूमिका में रहते थे। कक्षा में घड़ी देखने पर पड़ी डांट को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी कक्षा में कोई समय नहीं देख सकता था। कक्षा के बाहर वे कभी हिंदी में नहीं, बल्कि ठेठ भोजपुरी में बोलते थे। डाॅ. नंदजी दूबे ने कहा कि प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा सारे मतवादों को जानते थे। इसी कारण उनके उपन्यास को पढ़ते हुए सबको लगता है कि वे उसी के विचारधारा के हैं। उन्होंने उनको रामचरित मानस की समन्यवादी परंपरा से जोड़ते हुए तंज किया कि आजकल प्रगतिशीलता का दायरा बढ़ गया है, प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा तथाकथित वामपंथी भी थे। 
प्रो. अलखदेव सिंह ने कहा कि खान-पान, पहनावे से लक्ष्मीकांत सिनहा इंडीजनस व्यक्ति थे। वे कम्युनिस्टों की संगत में भी थे। 

अध्यक्षमंडल के पहले मुझे भी बोलने का मौका मिला। मैंने प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा के साथ शायर फराज नजर चांद, कथाकार मधुकर सिंह और कवयित्री उर्मिला कौल को भी याद किया। इनमें दो ही घोषित कम्युनिस्ट थे, लेकिन इन सबका हमें एक समान स्नेह मिला। जिनके होने से आरा हमारा अपना शहर बनता था, उनलोगों में से ये सब थे। निदा फाजली का एक शेर है- देर न करना घर जाने में/ वरना घर खो जाते हैं। दिल्ली से वापसी के बाद ऐसा ही लग रहा है जैसे कई घर खो गए हैं। वे सिर्फ व्यक्ति ही नहीं, हमारे लिए एक घर भी थे। प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा कम्युनिस्ट थे या नहीं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने अपने उपन्यास ‘उभरी परतें’ में बहुआयामी यथार्थ को पात्रगत और परिवेशगत वैविध्य के साथ दर्ज किया है। जातीय, लैंगिक और वर्गीय विभाजनों की जो वास्तविकता है, उस पर उनकी नजर थी। आज जब साहित्य, राजनीति और अर्थनीति हर क्षेत्र में वर्ग वैषम्य पर पर्दा डालने की कोशिशें की जा रही हैं, तब इस उपन्यास में आई वास्तविकता और नायक का अंतर्द्वंद्व नए सिरे से इसको प्रासंगिक बनाते हैं। 

उपन्यास के 268वें पृष्ठ को देखा जा सकता है, जहां नायक श्रीराम तिवारी जो बाद में स्वामी चिदानंद बन जाते हैं, को यह भान होता है कि ‘उनके संस्थान द्वारा जो विद्यालय-महाविद्यालय चलाए जाते हैं, उनमें केवल पैसों वालों की संतानें शिक्षा लेती हैं।....यह सारा धन धनियों का है और वे ही इसे भोग रहे हैं। हम तुम सभी इसके बड़भोगी हैं और हिस्सेदार हैं।’ 

असल में उपन्यास के अंत में स्वामी चिदानंद को यह भी लगता है कि ऋषि-मुनियों ने बहुत सोच-समझकर जो धार्मिक व्यवस्था की थी, उसकी साख सूख चली है। अब अमन-चैन के लिए कोई दूसरा मार्ग तलाशना होगा। लेकिन वे केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों और बुद्धिजीवियों से अपील के सिवा कुछ कर नहीं पाते। देश से लंदन वापस लौटते हुए वे सोचते हैं कि उन्हें उनका वर्तमान नहीं चाहिए। वे पुनः भूत बन जाना चाहते हैं और देश की मिट्टी में दुबारा जन्म चाहते हैं। 

यह सब मैंने ‘उभरी परतें’ पर अपनी समीक्षा में चिह्नित किया था। इसलिए मैंने कहा कि आज के दौर में स्वामी चिदानंद जैसी वेशभूषा वालों की भारी तादाद देश की सत्ता में दिख रही है, पर उनके यहां आदर्शों का सिर्फ नाटक है, जिससे इस देश की जनता के बुनियादी मुद्दों और सवालों का टकराव होना तय है।

डा. दीनानाथ सिंह 
अध्यक्षमंडल की ओर से बोलते हुए वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डाॅ. दीनानाथ सिंह ने कहा कि उनका प्रो. सिनहा के साथ पचास वर्षों का संबंध था। हर किसी का एक निजी जीवन होता है, जो वह शब्दों में अभिव्यक्ति के जरिए शेयर करता है या किसी मित्र से साझा करता है। उन्होंने कहा कि एक मित्र होने के नाते वे उनके अंतरंग जीवन से परिचित थे। लक्ष्मी बाबू से उन्होंने बहुत कुछ सीखा है।

प्रो. अयोध्या प्रसाद उपाध्याय 
वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के वर्तमान अध्यक्ष प्रो. अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने याद किया कि प्रो. सिनहा ऐसे शिक्षक थे जिन्हें अपने शिष्यों की बहुत चिंता रहती थी। उन्होंने उन्हें यह भी सिखाया कि शिक्षकों को क्या करना चाहिए। 

वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति लीलाचंद साहा ने कहा कि विश्वविद्यालय को हर साल प्रो. सिनहा की स्मृति मनानी चााहिए। उनकी अप्रकाशित रचनाओं को प्रकाशित करने का भी उन्होंने सुझाव दिया। उन्होंने ‘उभरी परतें’ उपन्यास की पंक्तियों को दुहराया- रोजी रोटी गरीबों को नहीं मिल रहा/ सोचो देश कहां जा रहा है? 

प्रो. दुर्गविजय सिंह 
जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और महाराजा काॅलेज, हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. दुर्गविजय सिंह ने कि स्मृति सभा में जो चर्चाएं हुईं, उससे प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा के महाकाव्यात्मक व्यक्तित्व का आभास होता है। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि प्रो. सिन्हा की स्मृति व्याख्यान आयोजित किए जाएं और उन्हें प्रकाशित भी किया जाए।

प्रो. पारसनाथ सिंह 
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए जैन काॅलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो. पारसनाथ सिंह ने कहा कि तीन तरह के व्यक्ति इस दुनिया में होते हैं, एक जो बड़े घर में जन्म लेते हैं, दूसरे जिन पर बड़प्पन थोप दिया जाता है और तीसरे जो अपनी कर्मठता के बल पर अपना व्यक्तित्व बनाते हैं। प्रो. लक्ष्मीकांत सिनहा तीसरे तरह के व्यक्ति थे। उनके विचार-व्यवहार का कोई विरोधी न था। गुरुदेव अजातशत्रु थे। 

स्मृति सभा में जनपथ संपादक अनंत कुमार सिंह, कथाकार मिथिलेश्वर, केसी दूबे और डाॅ. वीरेंद्र कुमार सिंह ने भी प्रो. सिन्हा से जुड़ी स्मृतियों को साझा किया। संचालन डाॅ. रणविजय ने किया। डाॅ. राघवेंद्र प्रसाद सिंह की स्मृति सभा को आयोजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका थी।
मुझे अच्छा लगा कि इस स्मृति सभा में का. राजू राम और का. रचना के साथ आइसा से जुड़े छात्र भी मौजूद थे।