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Friday, January 16, 2015

जनकवि भोला जी की याद में दो कविताएं


जनकवि भोला
जगदीश नलिन 

बहुत प्रखर थीं कामरेड भोला की
बिगुल फूंकतीं जनवादी कविताएं

आम अवाम पर होने वाली ज्यादतियों के 
खिलाफ फुत्कार थीं उनकी कविताएं
कविता उनकी जुबान थी
कविता में ही बोलते थे वे अपनी हर बात
और खूब बोलते थे।

सरकारी या गैरसरकारी
किसी भी जनविरोधी रवैये को 
कतई गवारा नहीं करते थे भोला
तत्काल तीखे शब्दों में रच डालते थे
विरोध दर्ज करती कविताएं

उनकी पान की दूकान पर आने वाले
जाने-अनजाने तमाम लोग
उनकी ताजा कविताओं से रू-ब-रू होते थे
पोस्टर की मानिंद दूकान पर
टंगी होती थीं उनकी कविताएं

शहर में अक्सर फटेहाल कांधे से लटकाए
लाल झोला राहगीरों को बांटते चलते थे भोला 
बतौर हैंडबिल कविता-प्रवाह में अपनी गुर्राती आवाजें
जन-समर्थन की एक सुर्ख पताका
औचक झुक गई
गुम हो गई कविता की वेगवती धारा
दमन-उत्पीड़न पर चीत्कारने वाला
साथी अब नहीं रहा हमारे साथ
जनकवि भोला व उनकी कविताओं को 
हम सलाम करते हैं
बार-बार सलाम करते हैं।

जनकवि
रामनिहाल गुंजन

जनकवि थे तुम इस जनपद के
जनजीवन के साक्षी रहे तुम

तुम थे अभावग्रस्त
आजीवन
और सहते रहे
नित कष्ट कसाले
मगर,
लिखते रहे कविताएं जन-जन की
अपनी, उनकी, सबकी

यह सही है कि
तुम गाते रहे गीत गरीब के
या थे जो मारे नसीब के
और गले लगाते रहे
उन सबको तुम

दरअसल साथी थे तुम
किसान-मजूरों के
लिहाजा
करते रहे प्रहार उन सब पर
जो थे जड़ उनके शोषण और उत्पीड़न की
ऐसे तुम जागते रहे रात-रात भर
जगाते रहे अलख और
कहते रहे-
जागते रहो सोने वालो।