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Thursday, May 19, 2016

जगदीश नलिन के कविता संग्रह 'सपना साथ नहीं छोडता' पर बातचीत



8 मई को बाल हिंदी पुस्तकालय, आरा के सभागार में वरिष्ठ कवि जगदीश नलिन के पहलेे कविता संग्रह ‘सपना साथ नहीं छोड़ता’ पर प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की ओर से एक बातचीत का आयोजन किया गया। लगभग साढ़े तीन घंटे से अधिक समय तक चले इस आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन, चर्चित जनवादी कहानीकार नीरज सिंह और प्रगतिशील आलोचक रवींद्रनाथ राय ने की। संचालन युवा कवि सुमन कुमार सिंह ने किया। 

31 दिसंबर 1938 को जन्मे जगदीश नलिन 1956 से कविताएं लिख रहे हैं। ‘सपना साथ नहीं छोड़ता’ उनका पहला कविता संग्रह है, जिसमें उनकी पचास कविताएं संकलित हैं। वे आरा शहर के क्षत्रिय हाई स्कूल में अंग्रेजी के अध्यापक रहे। अध्यापन के दौरान नाट्य लेखन, निर्देशन और अभिनय में भी उनकी रुचि रही। 

कविता संग्रह पर बातचीत से पहले जगदीश नलिन ने यह कहते हुए कि उनकी जिंदगी में सपनों का बहुत महत्व रहा है, ‘सपना: एक संकल्प’, ‘मजबूर सपने’, ‘सपना साथ नहीं छोड़ता’, ‘ना बेटी ना!’, ‘दुख, भूभुर में बैठा मोची’, ‘क्या पता था’ आदि अपनी कविताओं का पाठ किया। 

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए रामनिहाल गुंजन ने कहा कि जगदीश नलिन अपनी कविताओं को सिर्फ लिखते-पढ़ते ही नहीं, बल्कि उसे जीते हैं। जो कवि मनुष्यता को ध्यान में रखकर लिखता है उसकी कविताएं ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं। 

नीरज सिंह ने कहा कि पहली पुस्तक का प्रकाशन किसी भी रचनाकार के लिए अद्भुत अनुभव होता है। जगदीश नलिन एक सजग और दृष्टिसंपन्न रचनाकार हैं। उनकी पुस्तक पर केंद्रित इस आयोजन में बहुत दिनों के बाद इतनी बड़ी संख्या में लोग जुटे हैं। नलिन जी की कविताओं की बेटियां हमारे समय की बेटियां हैं। उन्होंने एक्टिविस्ट रचनाकारों पर लिखी गई उनकी कविताओं की चर्चा करते हुए कहा कि एक्टिविस्ट रचनाकार स्चयं रचना करने के साथ दूसरों को भी रचना करने के लिए प्रेरित करता है। 

रवींद्रनाथ राय का मानना था कि नलिन जी की कविताएं सपाटबयानी की कविताएं नहीं हैं, बल्कि वे गहरी संवेदना की कविताएं हैं। उनकी व्यक्तिगत जीवन की अनुभूतियों ने उनकी कविताओं को प्रभावित किया है। 

जनपथ के संपादक कथाकार अनंत कुमार सिंह ने विरासत के प्रति नलिन जी की श्रद्धा और उनके संवेदनशील व्यक्तित्व से जोड़कर उनकी कविताओं को देखा।

कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार का कहना था कि अंधेरा, रोशनी, हवा नलिन जी की कविताओं में बीजतत्व की तरह आते हैं। उन्होंने एक कविता में प्रकृति का मानवीकरण करते हुए उसको भी क्लांत दिखाया है, यह एक नए किस्म का प्रयोग है। उनकी कविताओं में हिंदी-उर्दू शब्दों के प्रयोग का जिक्र करते हुए उन्होंने उनकी काव्यभाषा को हिंदुस्तानी भाषा बताया। 

संचालक सुमन कुमार सिंह ने कहा कि ‘सपना साथ नहीं छोड़ता’ की कविताएं गहरी संवेदना और वेदना की कविताएं हैं। स्वप्न और यथार्थ के द्वंद्व से बुनी गई नलिन जी की कविताएं न केवल शिल्प तोड़ती-बनाती हैं, बल्कि चेतना व भाव के स्तर पर भी निरंतर समृद्ध होती दिखती हैं। 

इस आयोजन की खासियत यह थी कि संचालक समेत तीन अन्य युवा रचनाकारों ने जगदीश नलिन के संग्रह पर समीक्षात्मक आलेख लिखे थे। एक वरिष्ठ कवि के प्रति युवा पीढ़ी के लगाव का भी इससे पता चलता है। नई पीढ़ी के कवि रविशंकर सिंह ने उनके व्यक्तित्व और उनके कविता पाठ से जुड़े अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि उनके संग्रह की कविताओं में जिंदगी की जबर्दस्त जिजीविषा दिखाई पड़ती है। 

युवा कवि सुनील श्रीवास्तव ने कहा कि जब कविता से काव्यात्मकता गायब होती जा रही है, तब जगदीश नलिन की कविताएं कविता के प्रभाव के प्रति आशा के बीज बोती हैं। उन्होंने उनकी कविताओं में बेटियों के प्रति गैरप्रगतिशील नजरिये पर सवाल भी उठाया। 

मुझे जगदीश नलिन की शुरुआती दौर की कविताओं को पढ़ते हुए उनमें निराशा, उदासी, अकेलापन, नश्वरता और मृत्यु का बोध अधिक महसूस हुआ था। यह वही दौर है जिसे हिंदी साहित्य में मोहभंग का दौर कहा जाता है। आत्मउत्पीड़न और आत्मनाश के जरिए विडंबनाओं से ग्रस्त समाज को बदलने की अपील कवि-शायर करते रहे हैं, मुझे उनकी कविताएं उसी परंपरा से जुड़ी लगीं। मैंने उनकी कविताओं को गुरुदत्त की फिल्मों के गीतों से भी जोड़कर देखा। उनकी कई कविताएं उर्दू की जमीन पर लिखी गई हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए मशहूर शायर मजाज की भी याद आई। 

सपने जगदीश नलिन की कविता की ताकत हैं। वे उनके काव्य विषय और उसके शिल्प को भी बदलते हैं। आत्मपीड़ा और मोहभंग की वजहें जो अपेक्षाकृत शुरू की कविताओं में अमूर्त हैं, वे धीरे-धीरे मूर्त होती हैं- 

आप थे हमसफर, रहनुमा आप थे
जिस्म में जान थे, हमनवां आप थे

आपकी शख्सियत रहबरे आम थी
नक्शेपां आपका राह दिखलाएगा

क्या पता था कि मौसम बदल जाएगा
दिन वफाओं का चुपके से ढल जाएगा।

मैंने कहा कि इस कविता को राजनीतिक कविता की तरह भी पढ़ा जा सकता है और उनकी एक चर्चित कविता ‘कहवा घरों की युवा आवाजों के नाम’ से इसे जोड़कर देखा जा सकता है। बाद के दौर की कविताओं में आम अवाम की जिंदगी से जुड़े सवालों और बेहतर दुनिया के नक्शानवीस कई साहित्यकारों को जिस तरह जगह मिलती है, वह उनकी कविता को ज्यादा महत्वपूर्ण बनाता है। 

शुरू की कविताओं में जो गहरा मृत्युबोध है, कवि की जिजीविषा उसे पार करती है। एक कविता का शीर्षक ही है- ‘नहीं मरेगी जिजीविषा’। ‘आत्मावलोकन’ कविता में वे कहते हैं- ‘‘मुझे मत ले चलो/ तुम पाल लगी नाव में/ हवा की मर्जी पर चलना/ मुझे गवारा नहीं।...हो सके तो छोड़ दो तुम मुझे/ तट पर अकेला...
हवा का क्या भरोसा/ कभी भी रुख बदल लेती है वह/ पाल नीचे गिरा दो/ और थाम लो पतवार।’’

प्रो. तुंगनाथ चौधरी इस आयोजन के आमंत्रण पत्र में छपी इस कविता की पंक्तियों से ही प्रभावित होकर खींचे चले आए थे। जगदीश नलिन भी अंग्रेजी के शिक्षक थे और प्रो. तुंगनाथ चौधरी भी अंग्रेजी साहित्य के अध्यापक थे। लेकिन इन दोनों को हिंदी कविता परस्पर जोड़ रही थी। प्रो. चौधरी ने अनुभवों को कविता में ढाल देने की कवि की खासियत की खास तौर से तारीफ की। 

शायर इम्तयाज अहमद दानिश की गुजारिश थी कि किसी भी कविता के बारे में जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं सुनाया जाए। एक कविता की कई परतें होती हैं। उन्होंने उर्दू अदब से उनके गहरे जुड़ाव का जिक्र किया। उनके अनुसार उन्होंने उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल किया है और उसमें सफल भी रहे हैं। 

1985 से 95 तक क्षत्रिय हाई स्कूल में नलिन जी के सहकर्मी रहे शिक्षक संगठन की पत्रिका ‘प्राच्य प्रभा’ के संपादक विजय कुमार सिंह ने बताया कि उन्हें खुद उनसे लिखने की प्रेरणा मिलती थी। उनकी कविताओं में उम्मीदें टूटती हुई लग सकती हैं, पर सपने कभी नहीं टूटते। उन्होंने कहा कि उनका व्यक्तित्व एक लाइटहाउस की तरह है।

युवा कवि ओमप्रकाश मिश्र और संतोष श्रेयांश 78 साल की उम्र में भी जगदीश नलिन की सक्रियता से बेहद प्रभावित नजर आए। संतोष श्रेयांश ने कहा कि इस उम्र में उनकी सक्रियता नई पीढ़ी के लिए प्रेरक है। ओमप्रकाश मिश्र ने तो उन्हें साहित्य का कुंवरसिंह ही कह डाला। उनकी कविताओं में मौजूद कवितापन की उन्होंने सराहना की। 

कविता का असर का पैमाना यह भी होना चाहिए कि वह साहित्यकारों और साहित्य के नियमित पाठकों से इतर कवि के संबंधों की जो दुनिया होती है, उसमें उसकी कितनी पहुंच है। जगदीश नलिन के मित्र और रिश्तेदार लालजी प्रसाद ने कहा कि वे साहित्यकार तो नहीं हैं, पर जगदीश नलिन की कविताओं को सुनकर अक्सर लगता था कि इन कविताओं को संकलित करके पुस्तक प्रकाशित की जानी चाहिए। उन्होंने पुस्तक के फ्लैप पर मौजूद कहानीकार-आलोचक अरविंद कुमार के विचारों से अपनी पूरी सहमति जताई और कहा कि कवि चले जाते हैं, पर कविताएं रह जाती हैं। जब इन कविताओं की पुस्तक जनता के बीच चली गई हैं, अब ये कविताएं सिर्फ कवि की नहीं रह गई है, बल्कि जनता की हो गई हैं। 

वरिष्ठ कवि केडी सिंह ने कहा कि नलिन जी की काव्य भाषा, खासकर शुरुआती कविताओं की काव्य-भाषा उनके लिए दुरुह है। वे कविताएं उनको समझ में नहीं आतीं। हालांकि उनकी कविता ‘बारिश’ की उन्होंने विस्तार से चर्चा की। 

किरण कुमारी, आशुतोष कुमार पांडेय, विजय मेहता ने भी नलिन जी की कविताओं पर अपने विचार रखे। 

धन्यवाद ज्ञापन सुनील चौधरी ने किया। 

आयोजन में कहानीकार शीन हयात, शायर कुर्बान आतिश, कवि अरुण शीतांश, चित्रकार राकेश दिवाकर, कवि ए.के. आंसू, अयोध्या सिंह, डाॅ. महेंद्र सिंह, शमशाद प्रेम, नीलेश कुमार ‘गुल्लू’, सुबोध कुमार सिंह, सत्यदेव आदि भी मौजूद थे। 







Friday, January 16, 2015

जनकवि भोला जी की याद में दो कविताएं


जनकवि भोला
जगदीश नलिन 

बहुत प्रखर थीं कामरेड भोला की
बिगुल फूंकतीं जनवादी कविताएं

आम अवाम पर होने वाली ज्यादतियों के 
खिलाफ फुत्कार थीं उनकी कविताएं
कविता उनकी जुबान थी
कविता में ही बोलते थे वे अपनी हर बात
और खूब बोलते थे।

सरकारी या गैरसरकारी
किसी भी जनविरोधी रवैये को 
कतई गवारा नहीं करते थे भोला
तत्काल तीखे शब्दों में रच डालते थे
विरोध दर्ज करती कविताएं

उनकी पान की दूकान पर आने वाले
जाने-अनजाने तमाम लोग
उनकी ताजा कविताओं से रू-ब-रू होते थे
पोस्टर की मानिंद दूकान पर
टंगी होती थीं उनकी कविताएं

शहर में अक्सर फटेहाल कांधे से लटकाए
लाल झोला राहगीरों को बांटते चलते थे भोला 
बतौर हैंडबिल कविता-प्रवाह में अपनी गुर्राती आवाजें
जन-समर्थन की एक सुर्ख पताका
औचक झुक गई
गुम हो गई कविता की वेगवती धारा
दमन-उत्पीड़न पर चीत्कारने वाला
साथी अब नहीं रहा हमारे साथ
जनकवि भोला व उनकी कविताओं को 
हम सलाम करते हैं
बार-बार सलाम करते हैं।

जनकवि
रामनिहाल गुंजन

जनकवि थे तुम इस जनपद के
जनजीवन के साक्षी रहे तुम

तुम थे अभावग्रस्त
आजीवन
और सहते रहे
नित कष्ट कसाले
मगर,
लिखते रहे कविताएं जन-जन की
अपनी, उनकी, सबकी

यह सही है कि
तुम गाते रहे गीत गरीब के
या थे जो मारे नसीब के
और गले लगाते रहे
उन सबको तुम

दरअसल साथी थे तुम
किसान-मजूरों के
लिहाजा
करते रहे प्रहार उन सब पर
जो थे जड़ उनके शोषण और उत्पीड़न की
ऐसे तुम जागते रहे रात-रात भर
जगाते रहे अलख और
कहते रहे-
जागते रहो सोने वालो।