Showing posts with label राकेश दिवाकर. Show all posts
Showing posts with label राकेश दिवाकर. Show all posts

Monday, June 19, 2017

सोशल साइट्स के जमाने में कविता की जद्दोजहद : महज बिम्ब भर मैं


राकेश दिवाकर हैं तो चित्रकार, एक सरकारी स्कूल में छात्रों को चित्रकला की शिक्षा देते हैं, पर वे हिन्दी कविता के पाठक भी हैं। पाश उनके प्रिय कवि हैं। अक्सर फेसबुक और गुगल प्लस पर चित्रों के अलावा वे अपनी कवितानुमा अभिव्यक्तियाँ भी लगाते रहते हैं। पिछले दिनों उन्होंने अपनी पीढ़ी के कई चित्रकारों और मूर्तिकारों के काम पर धारावाहिक टिप्पणियाँ लिखीं। राकेश दिवाकर कला समीक्षाओं के अतिरिक्त कविता और कहानी संग्रहों की समीक्षाएं भी लिखते रहे हैं। पेश है सुमन कुमार सिंह के कविता संग्रह 'महज़ बिम्ब भर मैं' पर लिखी गई उनकी समीक्षा, किंचित सम्पादन के साथ। हाल के दिनों में आरा में पुस्तकों या रचनाओं पर गंभीर विचार-विमर्श की प्रवृत्ति बढ़ी है, राकेश की यह समीक्षा इसी की बानगी है। सुमन कुमार सिंह के कविता संग्रह पर बातचीत के दौरान उन्होंने इसी के अंश पढ़े थे। इस बीच पाठक कृष्ण समिद्ध द्वारा लिखी गई समीक्षा उनके ब्लॉग, फेसबुक और हवाट्सएप के जरिए पढ़ चुके होंगे। 'महज़ बिम्ब भर मैं' संग्रह पर जितेंद्र कुमार, सुनील श्रीवास्तव और रविशंकर सिंह ने भी टिप्पणी/ समीक्षा लिखी है। आगे वे भी कहीं पढ़ने को मिलेंगी। 
-----------------------------------------------------------------
पूंजीवादी व्यवस्था में जारी तकनीकी विकास ने हमसे बहुत सी खूबसूरत चीजें छीन ली है । संभवत साहित्य कला का चिंताजनक ह्रास भी इसी का एक दुष्प्रभाव है । यह ह्रास लगभग टीवी के आक्रामक विस्तार के साथ ही शुरू हो गया था लेकिन सोशल साइट्स कीजादुई छापेमारी ने तो सिनेमा तक को हाशिए पर धकेल दिया और साहित्य तो बेचारा अब लगभग इनडेंजर्ड की श्रेणी में पहुंच चुका है ।
यद्यपि फेसबुक पर चोरी की घासलेटी शायरी या कविता ने जोर भी पकड़ा है, बेशक उसमें कुछ मौलिक व काबिल-ए-तारीफ शायरी और कविताई भी हो रही है लेकिन साहित्यिक द्विजों के लिए वह लगभग अछूत है जिसकी स्वीकृति होते होते होगी या यह भी हो सकता है कि अभिव्यक्ति की यह पारंपरिक विधा विलुप्त ही हो जाए । खैर आने वाले समय में यह विधा कौन सा स्वरूप ग्रहण करेगी यह भविष्य के गर्भ में छिपा है क्योंकि ऐसा भी हो सकता है कि दकियानूसी ताकतें जो 21 वीं सदी के दूसरे दशक में दुनिया भर में नए सिरे से जोर पकड़ रहीं हैं, ऐसा भी हो सकता है कि वे पूरी दुनिया का तालीबानीकरण कर दें, तमाम तकनीकी विकास को मटियामेट कर डालें, या फिर सोशल साइट्स को अपनी जागीर बना लें जहां किसी तरह की खिलाफत की इजाजत न हों । फिलहाल कविताई अपने परम्परागत रूप को अर्थात किताबी रूप को बचाने की जद्दोजहद से गुजर रही है । जिसमें कई नए कवि शामिल हैं । ऐसे ही एक कवि हैं सुमन कुमार सिंह ।
सुमन कुमार सिंह ने पिछली सदी के अंतिम दशक में कविता के क्षेत्र में कदम रखा था। वे आम जनजीवन के आम व खास दोनों तरह के संघर्ष को अभिव्यक्त करते रहे हैं । हिंदी कविता की युवा पीढ़ी में उन्होंने एक पहचान भी बनाई है लेकिन बहुत धीरे-धीरे । दो दशक कविता के क्षेत्र में रहने के बाद अब उनका पहला कविता संग्रह आया है- "महज बिंब भर मैं "।
सुमन कुमार सिंह का यह संग्रह कई अर्थों में महत्वपूर्ण है । जब यह महसूस हो रहा था कि पारंपरिक रूढ़िवादी धार्मिक सामंती पुरूषवादी वर्जनाएँ को तोड़ दी गयी हैं और वे  विकृत अवशेष के रूप में अंतिम सांस ले रही हैं, उस दौर में जो कवि पीढ़ी सामने आई,  सुमन कुमार सिंह उस पीढ़ी के कवि हैं।  इस पीढ़ी ने सोवियत संघ का पतन को  भी  देखा और महसूस किया कि धार्मिक चरमपंथ से गठजोड़ कर साम्राज्यवादी पूंजी के नई आक्रामक दिशा में बढ़ रही है। इस पीढ़ी ने देश के पिछड़े गांव शहरों में बचे खुचे सामंती धार्मिक अवशेषों को नए रूप में संगठित होते देखा। किसानी घाटे का सौदा हो चुकी थी, बेरोजगारी पसर रही थी । बिहार में तथाकथित सामाजिक न्याय की सरकार के संरक्षण में खूंखार रणबीर सेना व नव धनाढ्य लंपट संस्कृति कुकरमुत्ते की तरह हर जगह पसर रही थी । नौकरी की संभावनाएं खत्म हो रही थीं। संयुक्त परिवार कलह, अभाव, बेईमानी, गाली गलौज व मारपीट का केन्द्र बन चुके थे। सत्ता संरक्षित अपराध का धंधा नई ऊंचाई हासिल कर रहा था । दूसरी तरफ दबे कुचले, गरीब, दलित पिछड़े, स्त्री शोषण-उत्पीड़न के पुराने दौर में धकेल दिये जाने की कोशिशों का विरोध कर रहे थे। यह उथल-पुथल का एक नया दौर था । ऐसे समय में सुमन सिंह ने कविता शुरू की और अपना स्पष्ट पक्ष चुना । 
सुमन कुमार सिंह की खासियत है कि वे चिल्लाते नहीं हैं, शोर नहीं मचाते हैं बल्कि कविता लिखते हैं । वे कहते हैं- '' पहाड़ पर चढना कभी आसान नहीं रहा / न है / जैसे लक्ष्य पर आगे बढना।'' इसी कविता में वे आगे कहते हैं ''हे मायावी! / हम नहीं जानते तो यह / कि तुम्हारे प्राण कहां बसते हैं / किस खोह में / और हम जानते हैं / अच्छी तरह / कि हमें क्या करना है / उस प्राण का ।'' कई नए रूपक व बिम्ब इस कविता संग्रह की कविताओं में हमें देखने को मिलते हैं। वैसे तो सभी कविताएं गौरतलब हैं परंतु 'आओ चांद', 'पधारो हे महानद!', 'ओ अविरल गंगे ' 'गंधाते बेहाये',  'बकरियां',  'मेरे बदले हुए शहर में' इस संग्रह की बेहतरीन कविताएं हैं ।
'आओ चांद',  'पधारो हे महानद!', 'ओ अविरल गंगे'  प्राकृतिक संसाधनों को कब्जियाने  की नव साम्राज्यवादी षड्यंत्रों की खिलाफत करती मानवीय प्रतिरोध की कविताएं हैं । कवि कहता है कि हे चांद उससे पहले की किसी धनेश्वर के द्वारा कब्जीया लिए जाओ, किसी धनेश्वर के तारामंडल की मशीन में पीस दिये जाने के पहले हमारी तहजीब बन जाओ कि कोई नपाक दैत्य तुम पर कब्जा करने की हिमाकत न करे । कवि कहता है कि सोन को बालू माफियाओं ने हड़प लिया, गंगा को भी हड़पा जा रही है । यह हम रोज देख भी रहे हैं कि किस तरह सोन जो हजारों लोगो को जीवन देता था उसे चंद बालू माफिया सीधे निगल गये । गंगा को हड़पने के लिए पाखंड का सहारा लिया जा रहा है । ये तीनो कविताएं हमें गहराई से संवेदित करती हैं। 
'गंधाते बेहाये' कविता भी आकर्षित करती है। बेहाये हमेशा उपेक्षा का पात्र रहे हैं । सुमन कुमार सिंह कहते हैं कि ये बेहाये घोंघे सितुहा मेढक जैसे कितने ही प्राणियों को आश्रय देते है । जब फूल खिलते हैं तो ये बेहाये विनम्रता से सिस झुका लेते हैं । भले ही इनका नाम बेहाया रख दिया गया हो लेकिन कवि इन्हे विनम्र भी कहता है यह अपने तरीके का बिलकुल नया बिम्ब है। उसी तरह 'बकरियां' कविता में कहता है कि ये बकरियां ऐसे चलती हैं जैसे कामगार महिलाएं । यहाँ भी कवि नए बिम्ब का इस्तेमाल करता है । मेरे बदले हुए शहर में कवि एक आततायी हत्यारे की हत्या के बाद आततायी ताकतों के द्वारा विंध्वस को रेखांकित करता है कि सत्ता किस तरह मौन होकर उनके उपद्रव को देखती है । यह साफ तौर पर यह बताती है कि आततायी ताकतों को सत्ता का संरक्षण था । यह बहुत ही धारदार कविता है । यह कवि की दक्षता को भी दर्शाती है। ऐसे विषय पर कविता लिखना बहुत ही मुश्किल होता है । 'आगे बधिक का घर है' कविता में कवि ने बहुत सावधानी से और सहज रूप में अंध भक्ति के परिणाम को दर्शा दिया है ।
आम तौर पर कवि की प्रेम कविता सर्वाधिक सम्प्रेषणीय व प्रभावशाली होती है, लेकिन सुमन कुमार सिंह यहाँ अपरिपक्व साबित होते हैं, ऐसा शायद इसलिए भी है कि वे कुछ ज्यादा आदर्शवादी दिखने का प्रयास करते हैं ।
कुल मिलाकर यह कविता संग्रह अपने समय का खास संग्रह है । 'जनता', 'हाथी', 'रक्षा सूत्र', 'एक है राजा', 'निरूपमेय डोडो', 'चैत के दिन' आदि बहुत अच्छी कविताएं हैं । पिछले तीन दशक के आम अवाम के संघर्ष व सपनों को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करने में यह संग्रह सफल रहा है । 

कविता संग्रह- महज़ बिम्ब भर मैं
 कवि- सुमन कुमार सिंह ।
प्रकाशक- बोधि प्रकाशन 
समीक्षक- राकेश कुमार  दिवाकर (मो- 8521815587)

Sunday, July 3, 2016

कला बाजार की शर्तों से ऊपर थे के. जी. सुब्रमण्यम : राकेश दिवाकर

29 जून 2016 को भारतीय आधुनिक कला के एक युग का अंत हो गया। मूर्धन्य चित्रकार के.जी. सुब्रमण्यम का जाना, भारतीय कला से गंभीरता का जाना है, आदर्श का जाना है। समकालीन भारतीय कला जगत में के.जी.सुब्रमण्यम एक ऐसे कलाकार थे, जो कला बाजार की शर्तों से ऊपर थे । 
1924 में केरल में के.जी सुब्रमण्यम का जन्म हुआ था। 1942 में उन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया था, जिसके फलस्वरूप उन्हे जेल की सजा भुगतनी पड़ी थी। राजनीति में महात्मा गांधी उनके आदर्श थे। 
1944 में उन्होंने कला अध्ययन के लिए शांति निकेतन में दाखिला लिया। राम किंकर बैज, विनोद बिहारी मुखर्जी, नंदलाल बोस सरीखे कलाकारों के निर्देशन में उन्होंने कला शिक्षा प्राप्त की। कालांतर में फेलोशिप प्राप्त कर पश्चिमी कला का भी गहन अध्ययन किया। कला रचना के साथ ही उन्होंने बडौदा व शांति निकेतन में अध्यापन कर समकालीन भारतीय कला की कई पीढ़ी का मार्ग-दर्शन किया। कला शिक्षण में हमारे यहां चली आ रही पुरानी पश्चिमी प्रशिक्षण पद्धति के खोखलेपन को भाप लिया था, उन्होंने स्वाभाविक कला प्रवृत्तियों को उभारने पर बल दिया। उन्होंने कहा है कि ‘‘आलमतिरा के कलाकार किसी कला विद्यालय में नहीं गये। हमारे प्राचीन मूर्तिकारों ने शरीर रचना विज्ञान का अध्ययन नहीं किया फिर भी उन्होंने अतुल्य कलाकृतियों का सृजन किया।’’ इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वे अंधभक्ति में विश्वास रखते थे बल्कि वे कला प्रवृत्तियों का स्वभाविक विकास करना चाहते थे।
उनकी कलाकृतियां बंगाल स्कूल की सकारात्मक प्रवृति को आगे ले जाती हैं, कविवर रवींद्रनाथ टैगोर के कला दर्शन को मूर्त करती हैं। रवींद्रनाथ टैगोर की कलाकृतियों का सौंदर्य उनकी स्वाभाविक अनगढ़ता है तो सुब्रमण्यम की कला का सौंदर्य सहज सुगठता। समकालीन भारतीय कला जब भारी जद्दोजहद के दौर से गुजर रहा थी, बंगाल स्कूल के कलाकार, बंबई के कलाकार, दिल्ली के कलाकार सब अलग-अलग दिशा में प्रयोग कर रहे थे, तब वे एक भिन्न रास्ते पर चले और गहन अध्ययन कर भारतीय कला को एक सरलता प्रदान की। दो चार रेखाओं, रंग के दो-चार धब्बे, दो चार तूलिकाघात में, पशु पक्षी आदमी दृश्य जगत को बहुत ही सरलता से छोटे छोटे कागज के टुकड़ों पर उतार दिया है। देखने में उनकी कृतियां चाहे जितनी सरल व साधारण लगें मगर जब हम उनके सामने खड़े होते हैं तो हर जटिल उतार-चढ़ाव हमारे समक्ष खुलने लगता है। जिस दक्षता से वे कागज के छोटे से टुकड़े को साधारण कलम की चंद रेखाओं से आलोकित कर देते हैं उतनी ही महारत से वे विशाल दीवार को भी म्यूरल से जीवंत बना देते हैं। वे एक मात्र भारतीय कलाकार हैं जिनके लिए कोई भी रचना सामग्री नकारात्मक मायने नहीं रखती । वे चित्रकार, प्रिंट मेकर, म्यूरलिस्ट, टेराकोटा शिल्पी और कला चिंतक हैं। 
रचना सामग्री की तरह ही बाजार की शर्ते भी उनके लिए कोई खास मायने नहीं रखती थीं। आम तौर पर बड़े कलाकार या बिकने वाले कलाकार रचना सामग्री व प्रदर्शनी स्थल का ध्यान रखते हैं, जिससे उनकी कृतियों का बाजार मूल्य बना रहे। चूंकि कला बाजार काले धन के निवेश का एक सुरक्षित जगह बन चुका है और निवेशक टिकाऊपन की वजह से कैनवास पर तैल चित्रण या एक्रेलिक चित्रण पसंद करता है। इसी तरह मूर्तिशिल्प में वह पत्थर या धातु पसंद करता है। वह चाहता है कि कलाकार बड़ी गैलरी में प्रदर्शनी करे ताकि उसकी कृतियों का बाजार मूल्य गिरे नहीं। के. जी. सुब्रमण्यम बड़ी विनम्रता से बाजार के इस अघोषित शर्त को दरकिनार कर देते हैं। वे कागज के छोटे से टुकड़े को भी चित्राधार बना लेते हैं, पटना जैसे शहर में भी अपनी प्रदर्शनी कर डालते हैं। अभी 24 जून से 05 जुलाई 16 तक ललित कला अकादमी बिहार, पटना में उनकी प्रदर्शनी चल भी रही है । के. जी. सुब्रमण्यम आधुनिक भारतीय कला के एक आदर्श कलाकार के तौर पर हमेशा याद रखे जाएंगे।

मूर्तन से अमूर्तन का सफर करते हैं बादल जी के चित्र


आनंदी प्रसाद बादल की चित्र-प्रदर्शनी 
 राकेश दिवाकर 
कला भी इश्क की तरह ही है। यह भी आग का दरिया है, जिसमें डूब के जाना है। ताउम्र कलाकारी आसान नहीं। समाज में रहते हुए भी समाज के रीति-रिवाज से इतर, समाज के रोजमर्रे की भागदौड़ भरी जिंदगी से अलग बादल की छटाओं को निहारते रहना और फिर उसे अपने कैनवास पर उतारना निश्चित तौर पर दीवानापन ही तो है। यही दीवानापन बादल जी जैसे बुजुर्ग कलाकार को इस उम्र में भी सक्रिय रखे हुए है। 1933 में जन्में बादल जी अपने पूरे जीवन के अनुभव व ज्ञान को तेज गति से कैनवास पर उकेरते जा रहे हैं। 
07 जून 16 से 12 जून 16 तक पटना ललित कला अकादमी के प्रदर्शनी कक्ष में बादल जी के नए कामों की प्रभावशाली प्रदर्शनी का आयोजित की गई।
प्रदर्शनी को देख कर यह सुखद आश्चर्य हुआ कि 83 वर्ष की अवस्था में भी बादल अनवरत सृजन कार्य में लगे हैं। बादल जी के चित्र मूर्तन से अमूर्तन का सफर करते हैं। रंगों की परिपक्वता और आकारों का सुगठन जहां उनके उम्र के अनुभव को प्रदर्शित करते हैं वहीं मस्त तूलिका संचालन व मजबूत तूलिकाघात उनके चंचल स्वभाव को दर्शाते हैं। सामाजिक स्थिति का प्रभाव उनके चित्रों पर परोक्ष रूप से नजर आता है। अमूर्तन की प्रक्रिया में भी आकार बरबस उनके कैनवास पर उतर आते है। आकृतिमूलकता से वे भाग नहीं पाते। उनकी कलाकृतियों में मौजूद गति दर्शकों पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। हालांकि रंगों की मोटी परत उतार-चढ़ाव तो पैदा करती है, पर गहराई उत्पन्न नहीं कर पाती। 
उनकी चित्रण शैली में कथ्य का अभाव बुरी तरह से खटकता है। उम्र के इस पड़ाव पर आकर यदि कोई कलाकार दुविधा की इस स्थिति में खड़ा है तो निश्चित तौर पर यह सामाजिक दुविधा है, सामाजिक कन्फ्यूजन है जो उनकी सारी कृतियों को शीर्षकहीन बनाता है। आज कलाकारों का एक बड़ा वर्ग इस कन्फ्यूजन में है, और सच कहें तो अधिकांश युवा कलाकार इस कन्फ्यूजन में हैं। इसकी झलक हम राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर भी देख सकते हैं। तीसरी कमी यह है कि इतने वर्षों तक रचनात्मक सक्रियता के बावजूद बादल जी अपनी शैली नहीं बना पाए हैं। विविधता जहां एक तरफ सम्पन्न बनाती है वहीं इसमें सबसे बड़ा खतरा यह भी रहता है कि कलाकार की पहचान नहीं बन पाती और इसकी वजह भी वह कन्फ्यूजन ही है जो उनकी कृतियों को शीर्षकहीन बनाता है और कभी-कभी तो सारहीन भी। 
वर्तमान में बादल जी बिहार ललित कला अकादमी के अध्यक्ष भी हैं, ऐसे में उनकी रचना का प्रभाव बिहार की कला पर पड़ना अवश्यंभावी है। उनकी रचना दृष्टि से बिहार की कला अप्रभावित नहीं रह सकती । 
बादल जी की यह प्रदर्शनी कुछ कमियों के साथ ही कुछ सकारात्मक प्रभाव डालती है। उनकी रचनात्मक सक्रियता कलाकारों को प्रेरित करती है, उन्हें ऊर्जा प्रदान करती है। खुशहाली से दमकते उनके रंग इस निराशा के दौर में हस्तक्षेप करते हैं और खुले आसमान में उड़ान भरने को प्रेरित करते हैं। 
जिस उम्र में और जिस पद पर बादल जी पहुंच गए हैं वहां पहुंच कर प्रदर्शनी व लगातार काम करना बहुत चुनौती भरा हो जाता है। मगर बादल जी ने इस चुनौती को स्वीकार किया है तथा समय के घोड़े के साथ दौड़ने की कोशिश की है। एक तरह से उन्होंने एक जोखिम उठाया है। बिहार के कलाकार जब राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूम मचा रहे हैं वैसे में बादल जी पटना में गड़ कर काम कर रहे हैं, यह वाकई साहस भरा काम है। यह इसलिए भी कि पटना में कोई कला बाजार नहीं है, कोई पेज थ्री नहीं है। इसके बावजूद अगर मंजा हुआ कलाकार इस शहर में प्रदर्शनी करता है तो इसे पटना शहर और बिहार के कला जगत में जान फूंकने की कोशिश के तौर पर भी देखा जाना चाहिए। बादल जी की प्रदर्शनी राज्य के कला जगत में बहुत दिन तक याद रखी जाएगी।

Sunday, October 5, 2014

छोले का स्वाद और कविता की संवेदना

बात तो शुरू हुई थी मटर के छोले से, मगर उसके साथ कविता भी आ जुड़ी। और फिर कविता ही आगे आ गई और छोले का मौका उसके बाद आया। लेकिन जो आया तो क्या खूब आया! 
हुआ यह कि दोस्त संजय ने कहा कि चाची (यानी मेरी मामी) के हाथ से बनाए गए छोले खाए हुए बहुत दिन हो गए। मैंने उनसे पूछा तो वे बनाने के लिए सहर्ष तैयार हो गईं। अगला दिन विजयदशमी का था, यूं ही हमलोग घूमने निकले। नौजवान मूर्तियों को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर रहे थे, वीडियो बना रहे थे। हमलोग बस पंडाल देखते हुए निकलते जा रहे थे। आशुतोष पांडेय और मैं दो दिन पहले ही दुर्गा की मूर्तियां देख चुके थे। महंगाई का असर इस बार मूर्तियों की कद-काठी और भव्यता पर भी दिख रहा था। पंडालों के निर्माण में कुछ विविधता जरूर थी। एक जगह ब्रह्मकुमारी नाम से शुरू होने वाली एक संस्था ने लड़कियों को ही मूर्ति बना दिया था। बीच-बीच में वे स्लाइड शो के जरिए ज्ञान-वान का प्रचार कर रहे थे। इस बीच लड़कियों को आराम मिल जाता होगा। वहां जैसे ही हम पहुंचे उद्घोषक की आवाज सुनाई पड़ी कि लक्ष्मी ज्ञान और धन की देवी हैं और सरस्वती विद्या और न जाने क्या की, अब याद नहीं है। सुनील और आशुतोष ने भी इस पर ध्यान दिया। थोड़ी देर हम वहां रुके। प्रवचननुमा उद्घोषणा में जो अज्ञान और मूर्खता धड़ल्ले से जारी थी, उसे सुन पाना मुश्किल था। मजा लेने के ख्याल से भी रुकना संभव नहीं हुआ। हम आगे बढ़ चले। मैं सोच रहा था कि क्या बोल रहे हैं उस पर गौर करने  के बजाए आजकल धाराप्रवाह कुछ भी बोलना ही काबलियत हो गई है। नरेंद्र मोदी तो इस शैली का मास्टर है। हम आगे बढ़ चले। 
इसके लगभग दस मिनट बाद ही कवि सुनील श्रीवास्तव ने भारी भीड़ के बीच अचानक कहा कि इससे तो अच्छा होता कि हमलोग कहीं बैठकर एक-दूसरे की कविताएं सुनते। उसके बाद आगे कवि सुमन कुमार सिंह मिल गए। मैंने कहा कि कल ही एक-दूसरे की कविताएं सुनी जा सकती हैं। मैं फोन करूंगा। हम घरों को लौट रहे थे, तभी आशुतोष के मोबाइल पर किसी का मैसेज आया कि गांधी मैदान में भगदड़ मची है, बहुत लोग मरे हैं। अपने शहर में भी एक-दो जगह ऐसी भीड़ से हमारा सामना हुआ, जिसे कंट्रोल करने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी। हमें लगा कि पटना की दुर्घटना के बाद प्रशासन को निर्देश आया होगा। 
3 अक्टूबर को सुबह रामजी भाई की कविता फेसबुक पर देखी, जो गांधी मैदान में भगदड़ की चपेट में आकर मरे बच्चों और महिलाओं के प्रति संवेदित होकर लिखी गई थी। इसी दुर्घटना को लेकर फेसबुक पर ही बड़ी ही क्रूरता के साथ लिखी गई कुछ टिप्पणियों, जिनमें आम लोगो की उत्सवधर्मिता या धार्मिकता को लेकर व्यंग्य किया गया या उपदेश दिया गया, के विपरीत रामजी भाई की कविता न केवल हमें मृतकों के परिजनों के दुख में साझीदार बनाती है, बल्कि बच्चों और स्त्रियों के प्रति भी संवेदनशील बनाती है और कोमल बच्चों की निगाह से उनकी सुरक्षा की वास्तविक फिक्र करने वाली महिलाओं- मां, बहन, फुआ.. के संवेदनशील चरित्र को प्रतिष्ठित करती है। बेशक वे बच्चों को बचाने की कोशिश में मारी गईं। वे अपना दायित्व निभाते हुए मारी गईं। इसी के बरक्स जब हम पूरी व्यवस्था और इसके संचालकों के बारे में सोचें तो लगता है कि वे अपने दायित्व से कितने बेखबर है, कितने संवेदनहीन है। 
शाम में जब कविता पाठ के लिए हम जुटे तो रामजी भाई की इस कविता का भी पाठ हुआ। आशुतोष पांडेय ने ‘वागर्थ’ में छपी विजया सिंह की दो कविताएं पढ़ीं, जो इराक और सीरिया के बच्चों के नाम लिखी गई हैं। इन कविताओं में भी बच्चों को उसी संवेदनशील निगाह से देखा गया है। बड़ा मौजूं सवाल उठाती हैं ये कविताएं- ये कैसे हाथ हैं जो/ बच्चों के गालों को/ बंदूकों से छू रहे हैं।
कविताओं में हमारे समय की असुरक्षा और जीवन-मृत्यु के बीच घटते फासले, तमाम व्यवस्थाजन्य विडंबनाओं जिनसे व्यक्ति का हर रोज साक्षात्कार होता है, उनका आना बहुत स्वाभाविक है। ‘यकीन’, ‘मेरे भीतर भी’, ‘समय नहीं था मेरे पास’ आदि कविताओं में सुनील श्रीवास्तव ने हमारे समय को इसी रूप में दर्ज किया है। उन्होंने ‘लड़कियों हंसो’ नामक कविता भी सुनाई जो स्त्रियों की आजादी और बराबरी का मजबूती से पक्ष लेती है। सुमन कुमार सिंह ने भी ‘चीखती मद्धम रोशनी’ शीर्षक कविता सुनाई, जो 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली गैंगरेप के बाद उभरे देशव्यापी आंदोलन के दौर में लिखी गई थी। ‘तुम्हारे ठीये से मैं’, ‘ख्वाजासरा और मेरा देश’, ‘बूढ़ी होती मां’, ‘ओ अविरल गंगे’ आदि कविताएं सुनाई। ‘बता बेटे सूबे-पैगाम का सच/ ये साड़ी, शाल, मन-मनुहार का सच’ शीर्षक एक गीत भी उन्होंने सुनाया।
चित्रकार राकेश दिवाकर ने भोजपुरी और हिंदी- दोनों जबानों में रचित अपनी कविताओं का पाठ किया। ‘तकलीफ हजार बा’ से शुरू करके ‘यह गुलामी’ शीर्षक कविता तक, उन्होंने पूंजीपतियों का ड्रामा, जनविरोधी बाजार और उससे जुड़ी राजनीति  को अपनी कविताओं के जरिए निशाना बनाया। बकौल राकेश- यह गुलामी जो आजादी के आवरण में सजी है/ पसरी है धुर देहात से शहर-नगर। 
दोपहर में सुनने में आया था कि धर्म के ठेकेदार एक दल के लोग सुबह से यह प्रचार करने में लगे हुए थे कि आज मूर्तियों का विसर्जन नहीं करना है, यानी अगले दिन भी नहीं, क्योंकि रविवार को विसर्जन नहीं किया जाता। उनकी योजना थी, विसर्जन के दिन को सोमवार तक ले जाने की, जिस दिन बकरीद है। लेकिन प्रशासन के दबाव के कारण विसर्जन हो रहा था। कानफोड़ू संगीत की आवाजें दूर से हम तक भी आ रही थीं, लेकिन हम लोगों ने अपना ध्यान कविताओं को सुनने में लगा रखा था। आखिर में मैंने भी चार-पांच कविताएं सुनाईं। बीच भी भाषा, व्याकरण, लिंग-निर्णय को लेकर अच्छी खासी बहस भी हुई। मेरी कविता में भी एक गड़बड़ी पकड़ में आई, मैंने उसे तत्काल सुधार लिया। 
कविता पाठ जब खत्म हुआ, तब तक पेट में चूहे दौड़ने लगे थे। छोले आए। सबने सराह-सराह कर खाए। जिन्होंने बनाया, उनके चेहरे पर खुशी और संतुष्टि की लहर थी कि आज भी उनके हाथों का जादू बरकरार है, आज भी उनके बनाए छोले पहले ही जैसे स्वादिष्ट हैं। इस खुशी में प्याज के पकौड़े भी मिल गए। हालांकि आशुतोष पांडेय, जिन्होंने पहली बार इन छोलों का स्वाद चखा था, उन्होंने कहा कि पकौड़े के बजाए छोले ही दुबारा मिल जाते तो मजा आ जाता। चूंकि परिवार के सारे बच्चे भी इन छोलों के स्वाद के आकर्षण में खींचकर चले आए थे और जब कविता पाठ चल रहा था, उसी बीच वे अपना हिस्सा खाकर जा चुके थे, इस कारण अब दुबारा की कोई संभावना ही नहीं बची थी। हां, प्याज के पकौड़े भी आशुतोष समेत सभी दोस्तों ने उसी तरह चटखारे लेकर खाए। मूर्ति विसर्जन के कारण बिजली गायब थी। इस कारण हम छत पर बैठे थे। 
मामी को मैंने बताया कि अभी और छोले होते तो एक बार और खाए जाते। इस पर उन्होंने मेरे ही हवाले से याद दिलाते हुए बताया कि एक दिन मधुकर जी आए थे, तो उन्होंने दो बार छोले खाए और आपसे बाद में कहा कि मैं तो और मांगने की सोच रहा था, पर संकोचवश नहीं कह पाया। 
अब तो पुराना घर टूट गया है, जिसमें मधुकर जी अक्सर आते थे। ‘इस बार’ का संपादकीय पता भले धरहरा था, पर ज्यादातर कामकाज यहीं होता था। अब उसी पुराने घर की जमीन पर बने इस नए घर में मधुकर जी की यादें थीं। 
आजकल दुनिया में जाने कितनी महत्वाकांक्षाएं पैदा हो गई है, बाजार ने जाने कितने तरह के स्वाद और आकर्षण पैदा कर दिए हैं। राकेश की कविता इस ओर इशारा भी कर रही थी। लेकिन इन छोलों के स्वाद के आगे वे आकर्षण बेकार लग रहे थे। हमारे लिए यह स्वाद अप्रतिम है। यह स्वाद जहां है, शायद वहीं कहीं हमारी कविताओं की संवेदना के तत्व भी हैं, वहीं शायद साहित्य का भविष्य भी है।
यह ठीक है कि इस स्वाद को रचने वाली हमारी कविताओं को सुन नहीं रही थीं। लेकिन शायद वे कविता को रचने वालों को ज्यादा ठीक से जानती-समझती हैं। ऐसा नहीं है कि घर के कामकाम में लगी औरतों का अक्षरों से नाता नहीं होता। अभी एक पत्रिका आई, जिसमें मधुकर सिंह पर मेरा लेख था। मैं नहीं था, तो कोरियर वाला बगल के घर में उसे देकर चला गया। जानिए कि एक बच्ची जो स्नातक की छात्रा है और एक महिला जो गृहिणी हैं, दोनों उस पत्रिका को पढ़ गईं। वह पत्रिका सरिता या मनोरमा जैसी पत्रिका नहीं थी, जिन्हें औरतों की पत्रिका का दर्जा दे दिया गया था। उन्हें अवसर मिले तो वे सबकुछ पढ़ सकती हैं। मां जब थीं, तब वे मेरी तमाम पत्रिकाओं को उलटती-पुलटती रहती थीं। बातों-बातों में कभी किसी लेख या कहानी की चर्चा भी करती थीं।