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Monday, October 28, 2013

बिहारी जनता की तर्कशीलता के पैमाने पर मोदी की रैली

बम विस्फोट ने मोदी की रैली को कुछ ज्यादा ही चर्चा दे दिया। वर्ना भीड़ इतनी अधिक नहीं थी, जिसके प्रचार में अखबारों के पन्ने रंगे हुए हैं। निश्चित तौर पर यह भीड़ भाजपा की पिछली रैलियों से अधिक थी। लेकिन क्या यह पूरे बिहार का प्रतिनिधित्व करने वाली रैली थी? यह सवाल इसलिए पैदा हो रहा है कि गांव जवार से लोग यही सवाल कर रहे हैं कि इस बार सड़क मार्ग से गाडि़यों का तांता नजर नहीं आया, तो फिर लोग कहां से आए? अभी एक जिले के स्थानीय संस्करण में छपी एक खबर पर लोग सवाल खड़ा कर रहे थे कि पैसा लेकर लिखा है या दारु पीकर, बता रहा है कि गाडि़यों की कतार से जाम रही सड़कें, जो कि सरासर गलत है, दिन भर हमलोग यहीं थे, हमें तो कोई जाम नहीं दिखा। फिर जो रैली की तस्वीरें हैं, उसे भी अलग-अलग अखबारों से मिलाकर लोग इस खेल पर चर्चा कर रहे थे कि कैसे किसी रैली को बड़ी रैली दिखाया जा सकता है। 
यह तर्कशीलता ही बिहार की खासियत है। लगता है कि मोदी के प्रचार मैनेजमेंट वालों को यह तर्कशीलता नजर नहीं आती। लोग तो बम विस्फोट के वक्त और उसके स्थान को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं। लोगों का यह कहना है कि अगर मोदी की भीड़ को प्रभावित करना बम विस्फोट करने वालों का मकसद होता, तो पहले ही विस्फोट करते, ठीक मोदी के भाषण के दो-तीन घंटा पहले अलग अलग जगहों पर विस्फोट की मंशा क्या है? खैर, जो भी हो, जब मोदी की रैली हो रही थी और नीतीश बाबू भाजपा की सांप्रदायिक साजिशों से नावाकिफ नहीं थे और इससे भी बाखबर ही होंगे कि किस तरह सांप्रदायिक राजनीति के सूत्र आईबी तक से जुड़े हुए हैं, इसके बावजूद उनकी पुलिस और खुफिया विभाग ने चौकसी क्यों नहीं रखी? सवाल यह भी है कि क्या इस मामले की सही ढंग से पड़ताल की जाएगी या इसके आड़ में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का वही खेल चलेगा, जो पूरे देश में पिछले दो दशक से भाजपा-कांग्रेस, सपा और अन्य पार्टियां खेल रही हैं?
खैर, मोदी महिमा मंडन में डूबी मीडिया में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने अपना होश नहीं खोया। इस रैली में कौन सा बिहार मौजूद था, इसके बारे में दैनिक हिंदुस्तान में आशीष कुमार मिश्र ने लिखा है। उन्होंने मोदी के भाषण कला की तारीफ भी की है, जिससे मैं असहमत हूं, क्योंकि मोदी का अपना कुछ नहीं है, वह तो प्रचार एजेंसियों के कठपुतले का भाषण था, जो लोकप्रियता के हर लटके-झटके का इस्तेमाल कर लेना चाहता है। बहरहाल आशीष ने चिह्नित किया है कि रैली में कौन सा वर्ग आया था। जाहिर है कि वे गरीब नहीं थे, जिनसे मोदी हुंकार भरने को कह रहे थे। दूसरे आशीष ने इस पर भी सवाल उठाया है कि मोदी के भाषण में दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के महापुरुषों का नाम नहीं था। उन्होंने रैली में शामिल नौजवानों के कम सउर के होने को भी चिह्नित किया है, साथ ही उनकी नजर इस पर है कि रैली में महिलाओं की संख्या कम थी। उनका यह मानना है कि यह रैली बिहार का यथार्थ नहीं, बल्कि उसके उच्च मध्यवर्ग और मध्यवर्ग का चेहरा था।
इतना तो तय है कि यह रैली गरीबों की रैली नहीं थी। वैसे भी गरीबों के हत्यारों के पक्ष में खड़ी पार्टी के साथ गरीब कैसे हो सकते हैं? लेकिन मेरा सवाल तो मोदी के भाषण लेखकों से है कि भाई महापुरुषों का तो अपमान न करो। गांधी के हत्यारे गोडसे की तारीफ करने वालों के मुंह से चंपारण के गांधी की याद और देश भर में सांप्रदायिक कत्लेआम की राजनीति को बढ़ावा देने वाले, गुजरात के राज्य प्रायोजित कत्लेआम के दोषी के मुंह से महान स्वाधीनता सेनानी कुंवर सिंह का नाम सुनना भी विडंबनापूर्ण ही था। यह किसको नहीं पता कि कुंवर सिंह के नेतृत्व में साम्राज्यवादविरोधी युद्ध के हिरावल गरीब-दलित लोग थे, मुसलमान उस लड़़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे। कारपोरेट लूट और साम्राज्यवादी अर्थनीति का कोई पैरोकार, मुसलमानों व दलितों के जनसंहार को न्यायोचित बताने वाली कोई पार्टी भला कुंवर सिंह की परंपरा के साथ कैसे हो सकती है? नरेंद्र मोदी तो सम्राट अशोक की परंपरा को भी कलंकित करने वाले हैं। अशोक ने तो कलिंग जनसंहार के बाद युद्ध से तौबा कर लिया था, और एक तरह से प्रायश्चित किया था, लेकिन मोदी तो आरएसएस के हैं, वे प्रायश्चित कैसे कर सकते हैं, न तो उन्हें और उनकी पार्टी को बाबरी मस्जिद ध्वंस पर प्रायश्चित करना है, न उसके बाद हुए कत्लेआम पर और न गुजरात जनसंहार पर, वह तो उनके लिए शौर्य का प्रदर्शन है, वे तो अभी अंधराष्ट्रवाद और सांप्रदायिक फासीवादी अभियान के तहत ‘हुंकार’ भर रहे हैं। जहां तक छठ पूजा की बात है, तो यह भी याद रखना चाहिए कि वह सूर्य की उपासना का त्योहार है। सूरज अपने आप में एक प्रतीक भी  है। मुझे तो एक गीत याद आ रहा है- जगत भर की रोशनी के लिए करोड़ों की जिंदगी के लिए/ सूरज रे तू जलते रहना। तो जो सूरज खुद जलके रोशनी देता है, उसकी पूजा होती है छठ में, लोगों के घरों और उनको जला देने वाली किसी आग की बिहार के गरीब लोग पूजा नहीं करते।