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Friday, June 25, 2021

महेश्वर के असंकलित गीत और कविताएँ

महेश्वर जी हिंदी की क्रांतिकारी जनवादी धारा के महत्वपूर्ण एक्टिविस्ट, पत्रकार, संपादक, लेखक, कवि और विचारक थे। वे समकालीन जनमत के प्रधान संपादक थे। महेश्वर जी जन संस्कृति मंच के महासचिव भी रहे। अपनी जानलेवा बीमारी से उनका जुझारू संघर्ष चला। लगभग एक दशक के उसी अंतराल में उन्होंने साहित्य-संस्कृति और पत्रकारिता के मोर्चे पर बेमिसाल काम किया। 25 जून 1994 को उनका निधन हो गया, पर आज भी उनका जीवन और उनका काम हमारे लिए उत्प्रेरक है, प्रासंगिक है। उनके स्मृति दिवस पर पेश है उनके कुछ असंकलित गीत और कविताएँ-


प्रीत के परनवां

अनगिन किरिनियां से घेरि के गगनवां 

                    सुरूजवा उतरै धरतिया

                    हमरी धरती पै राम

                    खेले फाग तपनवां।

रूमझुम रगिनिया से घेरि के गगनवां

                पवनवां उतरै धरतिया

                हमरी धरती पै राम

                        बाजे मारू बजनवां।

अतल हिलोरि चहूं दिसि व्यापै

अटक तोड़ि जिनगानी,

तेग सपन सतरंगिया बान्हे

फिरै जगत हुलसानी।

बावरी बिजुरिया से घेरि के गगनवां

            बदरवा उतरै धरतिया

            हमरी धरती पै राम

                    दमकै सरस सवनवां।

रंगमहल की राजलक्ष्मी

जब बिच मरै पियासी

अगम लहर पै डारि हिंडोला

झूलै जुग अविनासी।

अपरूब रंगोलिया से घेरि कै गगनवां

            मधुअवा उतरै धरतिया

            हमरी धरती पै राम

                    गावे कजरी फगुनवां।

सत की चुंदरी ओढ़ि सुहागिनि

सेज चढ़ी पुरवइया

सीस बदै नित न्याय की चैसर

खेलै सजन समइया

टटकी चंदनिया से घेरि कै गगनवां

            चनरमा उतरै धरतिया

            हमरी धरती पै राम

                दहकै प्रीत के परनवां

(जगरम, मार्च 91, प्रवेशांक)



सुन लो जिंदगी की मांग

सुन लो जिंदगी की मांग-

थोड़ी छाया

थोड़ी धूप

दे दो साथियो!

समय का पहिया ठहरा क्यों है, सोचो मेरे भाई,

सदियों से अपनी धरती की दिखी नहीं अंगड़ाई;

आसमान से गिरी न बिजली आंधी कभी न आई,

ऐसा क्या हो गया जगत की रीत बदल न पाई?

सुन लो जिंदगी की मांग-

थोड़ी छाया...



जिस तेवर से दुश्मन कांपे वहीं कहाये छाया,

बहुत पुराना भेद जगत का कोई समझ न पाया;

धूप वही करनी है जो अंधियारा दूर भगाये,

पिंजरे में बंदी गोरैया सांस मुक्ति की पाये।

सुन लो जिंदगी की मांग-

थोड़ी छाया....



जोर लगाकर पिंजरा तोड़े वही कहाये वीर,

अपने पथ पर बढ़ता जाये उल्टी धारा चीर;

ओस शीत ठिठुराये चाहे छूटे पसीना,

सूरज सा दमके कर डाले चाक वर्दी का सीना,

सुन लो जिंदगी की मांग-

थोड़ी छाया....



रोक टोक न माने दिल पर कड़ी चोट ले झेल,

विपदाओं के आगे खेलें धूप-छांव का खेल;

ऐसे वीरों की जमात को टेक सके यह धरती,

एका का हथियार उठाये, मारे कभी न मरती।

सुन लो नयी कबीरी सीख-



ले के छाया

ले के धूप

आओ साथियों।

जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाओ-

ले के छाया

ले के धूप

आओ साथियो!



चले हिरावल काल के

चले हिरावल काल के

जलती हुई मशाल से

रोशनियों को रोशन करती, चढ़ी रक्त की धारा

बदल रही है रस्म जिंदगी तोड़ जुल्म की कारा

                           साथी, तोड़ जुल्म की कारा!



धरती की भट्टी में तपकर जिंदा हुआ पसीना,

फसल हाथ से फाड़ रहा खूंख्वार जेठ का सीना,

चले हिरावल काल के

ज्वालामुखी सवाल से

मेड़ रौंदते कदम ढूंढते पावे नहीं किनारा,

बदल रही है रस्म जिंदगी तोड़ जुल्म की कारा,

                    साथी, तोड़ जुल्म की कारा!



पर्वत सीना तान कूच कर ओ मासूम इरादे,

मेहनतकश आकाश दहक छाती पर सूरज साधे,

चले हिरावल आज के

भावी सही समाज से

बच्चों की सांसों ने कातिल सपनों को ललकारा,

एक बार बस और कि होता सदियों का निपटारा,

                            साथी, तोड़ जुल्म की कारा!

(अग्रिम पहल, दिसंबर-फरवरी 1989)



कविताएँ

महेश्वर

बच्चों के बारे में

बच्चों से अदब से बात करो

वे तुमसे बाहर

तुम्हारे आदमी होने की तमीज है

जब भी उठता है

कोई हाथ

उनके खिलाफ

तुम्हारे आदमी होने की तमीज हैं

जब भी उठता है

कोई हाथ

उनके खिलाफ

तुम्हारे अंदर का इन्सान मारा जाता है

लोट सको

तो बचपन की देहरी पर लौटकर देखो

वहाँ मासूमियत की जबान में

घायल इन्सानियत का प्रतिशोध पलता है।

16.9.93



किसी एक के लिए

तुम्हारे सीने में जज्ब था मेरे सूरज का बीज

तभी तो धरती के अंधकार में

अब भी सलामत है उजाले की संभावना

तुम्हारी धड़कनों ने न सहेजा होता

मेरे उद्धत मन का आवारा समुद्र

तो लहरें किनारों से भला क्या बतियातीं

और कितना बेअक्स गुजर जाता

भंवर में फंसे आकाश का दिल

युद्ध के भोगे हुए दर्द की तरह तुम अपनी देह से उठीं

और मेरी सांसों के टूटते कगार पर

एक इन्सानी चीख की तरह ठहर गई

उस क्षण

काल की परिधि से परे

तुम्हारे एहसासों की जलती जमीन पर

मैंने जाना कि जन्म लेना भी कितना मुश्किल है

मैंने कहा- मुझे लो

                        मुझे ग्रहण करो

                        मुझे जीतो

                        मुझे जोड़ो

                        मुझे अपने बंधन में मुक्ति दो...

तुमने मुस्कराकर मेरी आत्मा के ऊसर में

रोप दिया अपनी उदास आंखों का नन्हा-सा बिरवा और आज मैं

तुम्हारे उस भरे-पूरे पेड़ पर

जीवन और यौवन का शाश्वत बसंत हूं

आखिर में एक दिन

जब पतझड़ और पाले की सूनी पगडंडी से

रात और बिरात की रागिनी अलापता

आएगा मृत्यु का अभिशप्त हरकारा-

जब सजने से पहले ही घिस-पिट जाएगा

श्रद्धांजलियों की लफ्फाजी का कीमती लिबास-

जब उठने से पहले ही बैठ जाएगा

अफवाहनुमा सच और सचमुच अफवाहों का गर्द-गुबार-

जब कलई किये चेहरों से अचानक

उतर जाएगा आंसुओं और अफसोस का मुलम्मा-

और जब नामी-गिरामी मसखरों का भी जायका बिगाड़ देंगे

मेरी उदात्तता के लावारिस चुटकुले-

तब,

तुम्हारे भरे-पूरे पेड़ के धूप धुले माथे से

टूटेगा एक कोई पत्ता-चुपचाप-

सदियों के धीरज-सा

आहिस्ता-आहिस्ता आएगा नीचे

छुएगा

समेटेगा

धारण करेगा मुझे मेरी संपूर्णता में

और मेरी जड़ों में बज उठेगा जैसे जलतरंग....

27.9.93



कुछ निरे खैरख्वाहों से

पहले भाव से लुभाया

अब अभाव का ठेंगा दिखाते हो!

अपने को अपने ही शीशे में उतारते हुए

जब नमक निभाने का वक्त आया

तो मौत की शर्तों पर जीना सिखाते हो!

क्या समझते हो मुझे-

सिर्फ इसलिए

कि काजी जी दुबले हैं शहर के अंदेशे

मैं नाक दबाकर निगल लूंगा

तुम्हारी छिनाल भलमनसी का गू!

मैं नहीं हूं

सवर्ण मुर्दों पर लुटाए गए सिक्कों-जैसे

जिंदगी के चंद भगोड़े पलों का बेगैरत उठाईगीर

टूटी सांसों की आंख मिचौली नहीं है मेरी दास्तान

न शो-केस में सजी बेजान मूरतों पर

खारिश मारे कुत्तों की उठी हुई टांग

मैं नहीं हूं

आत्मा की देहबंदी का दलाल

न भिखारी

न मसीहा

न वाइज

न बनिया-बक्काल


मैं हूं समय का स्वायत्त सारथी

मेरे हाथ की रेखाओं में नत्थी है

नकचढ़े सूरज के सात घोड़ों की बाग

मेरे तलवों में दम तोड़ते हैं

दिन के सेंधमार काली रातों के लंबोतरे साये

मेरे फैसलों की शिनाख्त है

अतीत के गर्त में सर धुनता भय का अपराधी अंधड़

मुझे मालूम है मचकती सदिच्छाओं की साजिश

और ऐसी शुभकामनाओं का वह पुराना शब्द जाल

जो आदमी से चूस लेता है आदमी की अंतर्वस्तु....

नहीं, नहीं

तुम कभी नहीं बना सकते

मेरी अर्थवत्ता को मेरा ही शून्य

एहतियात और पाबंदियों की फकत खैरख्वाही से

जकड़ नहीं सकते तुम


हामियों-मनाहियों के निरे दस्तूर से



कंधों पर भविष्य वहन करने का मेरा दायित्व...



मैं नहीं हूं ताबेदार कैलेंडर के पन्नों का

न घड़ी के कांटों का हुक्मी गुमाश्ता

मैं तो हूं आने वाली पीढ़ियों का राजदूत

काल के द्वार पर भावी नर-नारियों की दस्तक

मैं तुम पर इंसानियत का चढ़ा हुआ कर्ज हूं

और इसकी भरपाई की बकाया रसीद पर

अपने बच्चों के नाम का रबड़ स्टाम्प हूं...

नगद-उधार के रिश्तों के माहिर हो,

अब तो कबूल करो

मेरी ताईद के बगैर तुम उलटपांव प्रेत हो....

                                                        ऋणी हो

                                                        कैदी हो

                                                        सीठी हो

                                                        रेत हो!! 
                                                                        (30.9.93)



एक कटे हुए सिर का बयान

(तसलीमा नसरीन के लिए एक कविता)

अंधेरे की छाती में

रोशनी के सूराख की तरह

मैं अपने लहू की धार से उभरा

और

जबकि

मुर्दा जिस्मों की नुमाइश में मशगूल थे

खुदाई खिदमतगार

मैंने एक अदद सीधे-सच्चे इन्सान को

उसकी अपनी जबान में पुकारा

रिश्तों के सफेद खून को क्या मालूम

कि किसी सरहद के रोके नहीं रुकता

जमीर का फैलाव

मांएं अलबत्ता जानती हैं

कि उनके बच्चों के लिए

नकचढ़े मजहब से ज्यादा जरूरी है

कायदे के सूखे गर्भ पोतड़े

तो क्या....

तो क्या मांओं और बच्चों के बाद

अब पोतड़ों को भी सूली चढ़ाओगे?

और क्या होगा

सरहदों का और जमीर का-

ये तो हद है, म्यां,

ये तो हद है...

मैंने कहा- नहीं...

मैं ऐलान करता हूं-

मैं ऐलान करता हूं

खुदा से खाविंद तक

अब और नहीं है

महज खौफ की परछाई

एक औरत

साजिश की रेशमी उंगलियों पर

अब और नहीं है

सिर्फ अक्सरीयत और

अकल्लीयत का जोड़-बाकी

आने वाले कल का बीज

एड़ियों से झटककर मौत के साये

मुक्त हो जीवन का प्रचंड सौंदर्य

पचास हजार टके की सनद रहे-

मेघना बेचकर मदीना नहीं

कमाएगा मेरा मयमनसिंग

मेघना

बेचकर

मदीना

नहीं कमाएगा

मेरा मयमनसिंग!!

13.12.93

(समकालीन जनमत, 16-31 दिसंबर 1994)

Monday, October 15, 2018

'शंभु बादल का कविकर्म' विषय पर हजारीबाग में आयोजन हुआ



बादल की कविता जीवन की कविता है : रविभूषण
बादल की कविताएं वर्गीय दृष्टि की कविताएं हैं : रामजी राय


हजारीबाग के डीवीसी, प्रशिक्षण सभागार में 14 अक्टूबर 2018 को वरिष्ठ कवि शंभु बादल के कविकर्म पर जन संस्कृति मंच की ओर से एक आयोजन संपन्न हुआ, जिसका संचालन कवि बलभद्र ने किया। अध्यक्षता वरिष्ठ आलोचक रविभूषण ने की। 

रविभूषण ने शंभु बादल को हिंदी की क्रांतिकारी धारा का कवि बताते हुए कहा कि वे संघर्षशील मुक्तिकामी कवियों की उज्जवल कतार में शामिल हैं। भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला और संकटग्रस्त-संघर्षशील प्यारे लोगों के प्रति कवि के हृदय-सागर में लगातार लहरे उत्पन्न होती है, जैसा कि उनकी चयनित कविताओं के संकलन के समर्पण में कहा गया है। उनकी कविता में 71 वर्षीय आजाद विह्वल होकर भगतसिंह को याद करते हैं, इसलिए कि भगतसिंह के सपने पूरे नहीं हुए हैं। बादल की कविता में जो सपने हैं, वे भगतसिंह के सपनों के भारत से जुड़े हुए हैं। भगतसिंह बार-बार उनकी कविताओं में आते हैं।
उन्होंने कहा कि संयोग यह है कि जब बादल अपने सृजन के पचासवें साल में प्रवेश करने वाले हैं, तब उनके कवि कर्म पर केंद्रित यह महत्वपूर्ण आयोजन हो रहा है। कविता के जीवन, अंतर्वस्तु, संतुलन, दृश्यबिंब, प्रतीक और मुहाबरे की दृष्टि से उनकी कविताएं हिंदी की प्रगतिशील काव्यधारा से जुड़ती हैं। 
रविभूषण ने कहा कि कविता के जीवन का प्रश्न महत्वपूर्ण है, पर उससे ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न जीवन की कविता का है। बादल की कविता जीवन की कविता है। 
रविभूषण ने कहा कि एक दौर में केंद्र बनाम परिधि की बहस चली थी। दिल्ली केंद्र है और केंद्र के प्रति कवियों में गुस्सा रहा है। दिल्ली के प्रति बादल का गुस्सा भी हाशिये के कवि का गुस्सा है। उन्होंने उनकी कविता में चिड़ियों की मौजूदगी की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि आकाश में उड़ना विस्तार और आजादी का प्रतीक है। 
समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि शंभु बादल की कविताएं अलंकाररहित हैं, यह कोई बुरी बात नहीं है, क्योंकि जीवन से बड़ा कोई अलंकार नहीं होता। दरअसल सहजता ही उनकी कविता का अलंकार है और सरलता उसका लय या संगीत है। बादल का कवित्व गतिमान यथार्थ से जुड़ा हुआ है। वे भाषा को अतिरिक्त आवेशित नहीं करते। भाषा के स्तर पर थोड़ी असजगता जरूर है, पर उनकी कविताएं जिन तर्कों और विडंबनाओं को सामने लाती हैं, वे गौरतलब हैं। उनकी कविताएं वर्गीय दृष्टि की कविताएं हैं। ‘घर’ कविता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वह एक दलित के वर्गांतरण की कविता है। रामजी राय ने बलभद्र द्वारा संपादित ‘शंभु बादल की चुनी हुई कविताएं’ के बारे में कहा कि इसमें पच्चीस-तीस कविताएं अच्छी हैं और यह सामान्य बात नहीं है। 
जनवादी लेखक संघ के राज्य अध्यक्ष प्रो. अली इमाम ने कहा कि बादल की कविताएं संघर्ष और सामूहिक चेतना की कविताएं हैं। वे व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं। पाठक को बेचैन करती हैं, कुछ करने और बदलने को उकसाती हैं। ‘आ बाघ’ कविता के बारे में उन्होंने कहा कि इसमें बाघ हिंसक, खूंखार और क्रूर अंतर्राष्ट्रीय पूंजी का प्रतीक है। ‘घर’ कविता के संदर्भ में उनका कहना था कि गरीबी और सामाजिक बेइज्जती का रिश्ता है। बेशक पहचान की राजनीति की अपनी सीमा है, पर वर्ग की राजनीति उसे पीछे धकेलकर आगे नहीं बढ़ सकती।
प्रलेस के राज्य सचिव मिथिलेश सिंह ने कहा कि जुमलेबाजी वाले राजनैतिक दौर में भी कविता का अपना अस्तित्व है। राजसत्ता की नजर में हम महज एक मतदाता है और बाजार की नजर में उपभोक्ता। पोस्ट ट्रूथ की बात तो दुनिया में बाद में सामने आई, हमारे यहां तो वह 2014 से जारी है। सवाल यह है कि असीमित लूट और झूठ के इस समय में जब बात घुमा-फिराकर कहने से काम नहीं चल रहा है, तो बात को सीधे-सीधे क्यों न कहा जाए? शंभु बादल की कविताएं इसी जरूरी काम को अंजाम दे रही हैं। 
जसम के महासचिव चर्चित पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने कहा कि शंभु बादल जन संस्कृति मंच के संस्थापक साथी हैं और हमारे पथ-प्रदर्शक हैं। 50 साल से वे सृजनरत हैं और हर दौर में जनता के दमन-शोषण के खिलाफ संघर्षों पर उन्होंने कविताएं लिखी हैं, यह महत्वपूर्ण बात है। 
वरिष्ठ कवि रंजीत वर्मा ने कविताओं को प्रभावशाली बनाने के लिए संपादन की जरूरत पर जोर दिया। बादल की कविता ‘चिड़िया वही मारी गई’ के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वे आर्थिक-सामाजिक भेदभाव को प्रश्नों को एक-साथ मिलाकर देखते हैं। दलित-वामपंथी राजनीतिक धाराओं की एकजुटता की संभावना की ओर उन्होंने पहले ही संकेत किया था। 
आलोचक अजय वर्मा ने कहा कि आज के आयोजन में बादल जी और उनकी कविताओं के प्रति सबका प्रेम उभरा है। निःसंदेह वे महत्वपूर्ण कवि हैं। उन्होंने कहा कि जीवन के बारे में बहुत बातें होती हैं, पर कविता के जीवन पर भी बात होनी चाहिए। कविता क्या केवल अपनी अंतर्वस्तु से पहचानी जानी चाहिए? कविता भाषा में लिखी जाती है, लिहाजा उसकी भाषा पर भी बात होनी चाहिए, क्या उसके अंतर्वस्तु और रूप में संतुलन है, इसका भी मूल्यांकन होना चाहिए। 
युवा कवि निशांत का कहना था कि शंभु बादल जी सिर्फ कवि नहीं, अपने आप में एक संस्थान हैं। वे एक प्रतिबद्ध कवि हैं और उनके सरोकार आम आदमियों से जुड़े हुए हैं। वे अपनी कविताओं के माध्यम से आम आदमी को लगातार जनविरोधी स्थितियों के प्रति आगाह करते हैं। जिम्मेदार नागरिक होने की जरूरत का अहसास दिलाते हैं। शमशेर या कुंवर नारायण की तरह काव्य तत्व उनमें ढूंढना ठीक नहीं होगा। उनकी कविताएं उनके निज अनुभवों की कविताएं हैं।
कवि अनवर शमीम ने बादल जी को लोक मन का पारखी कवि बताते हुए कहा कि उनकी कविता कठिन समय से टकराने वाली कविता है। आज की कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हर मनुष्य के साथ उनकी कविता खड़ी है। उनकी कविता में मिट्टी की गंध है और प्रतिरोध का कड़क स्वर भी है। 
‘लोकचेतना वार्ता’ के संपादक और आलोचक रविरंजन के अनुसार शंभु बादल की कविताओं में स्मृतियों का आलोक और परंपराओं का विकास नजर आता है। ‘जनता का कवि’ कविता की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यह विचार करना चाहिए कि दिल्ली कवियों को अच्छी क्यों नहीं लगती। ‘हजारीबाग’ कविता के संदर्भ में उनका कहना था कि इसमें यहां के संत कवि दलेल सिंह का जिक्र होना चाहिए था। 
आलोचक और संस्कृतिकर्मी सुधीर सुमन ने कहा कि आज अपने देश में मुसोलिनी, हिटलर जैसों का जो जुल्मी बयार है, ‘झूम रहा बाजार’ और ‘झूम रही सरकार’ के जो प्रधान और प्रवक्ता हैं, बादल जी की कविता उनकी शिनाख्त करती है, ‘वे सब कौन हैं?’ यह बताती है। उन्होंने कहा कि उनकी कविता में सपने उदासी, अकेलपन और संकट के घास-पात को साफ करते हैं। वे कहते हैं- ‘हम दुनिया को देखते हैं/ सपनों के हाथ लिये।’ सपनों को बचा कर रखने के लिए वे सपनों का जीवन बन जाना चाहते हैं। जाहिर है ये सपने बेहतर समाज और दुनिया के हैं, जिन सपनों का जीवन बन जाने की चाहत विरल काव्य-संदर्भ है। सपनों के हाथ बदलाव के लिए लोगों के हाथों की जरूरत महसूस करते हैं।
सुधीर सुमन ने कहा कि किसके बल पर गति की स्याही से कवि जीवन भर लिखता रहा, वह गौर करने लायक है- टोकरी भर धूप, टोकरी भर छाया, ऊर्जा के घने मेघ, ऐसी बिजली की गर्जना जिससे धरती के दागदार वृक्ष फट जाते हैं, खेत झूम उठते हैं, उनकी कविता की ताकत हैं। खेती-किसानी से जुड़े बिंब और प्रतीक उनकी कविता में बड़ी सहजता से आते हैं। ‘चने लगाता आया हूं’ और ‘बीज हंस रहे हैं’ जैसी कविताएं इसका उदाहरण हैं। चिड़ियां उनकी कविता में उत्पीड़ित समुदायों और स्त्रियों के संदर्भ में आती हैं। एक कविता में चिड़िया खुद उनकी पत्नी का प्रतीक है।
विडंबनाओं और वर्ग-वैषम्य की स्थितियों की पहचान कराना उनकी कविताओं की खासियत है। उनकी चुनी हुई कविताओं के संकलन की पहली कविता ‘चांद’ से लेकर ‘प्रिय वेनिस’ जैसी कविता तक में इसे देखा जा सकता है। चांद पर मनुष्य के कदम से कवि को खुशी है तो आशंका भी है कि वह कहीं धुएं से न भर जाए, वेनिस के सौंदर्य में डूबा कवि इस विडंबना की शिनाख्त करना नहीं भूलता कि ‘समृद्ध नगर में कट्टर अविवेक’ है, मानो ‘भव्य नाव में बारीक सुराख’। शासकवर्गीय छल-प्रपंच का लगातार पर्दाफाश करने के कारण भी उनकी कविताएं महत्वपूर्ण हैं। 
सुधीर सुमन ने कहा कि शंभु बादल परिवर्तन की उम्मीद और संघर्ष के प्रति सक्रियता का भाव जगाने वाले कवि हैं। ‘मैं ही महेंद्र सिंह हूं’ कविता में वे कहते हैं- ‘‘तुमने/ क्रांति की/ उदास फसलों को/ अपने खून से सींच/ हरा-भरा किया।’ इसी कविता में कवि ने वर्तमान को बहुमार्गी बताया है और इस बहुमार्गी वर्तमान को संवारने वालों की एकता की बात कही है। यह राजनीति और साहित्य दोनों के लिए जरूरी सामयिक वैचारिक संदर्भ है। 
कवि लालदीप गोप ने यह चिह्नित किया कि बादल की कविताओं में सर्वहारा की स्थिति को लेकर विलाप नहीं, बल्कि उन स्थितियों को बदल देने की जिजीविषा नजर आती है। 
कवि नीलोत्पल रमेश ने शंभु बादल की कविताओं को उद्धृत करते हुए उन्हें हिंदी की प्रगतिशील-जनवादी काव्य परंपरा का महत्वपूर्ण कवि बताया। जनता के संघर्ष, प्रतिरोध और परिवर्तन के प्रति उनकी कविता प्रतिबद्ध है। डाॅ. गजेंद्र सिंहने कहा कि कविता में बाघ वालमाॅर्ट और कारपोरेट्स का प्रतीक है। राजेश रंजन ने कहा कि उनकी कविताओं में सूरत नहीं, सीरत है। राजेश दूबे, अभिषेक पांडेय और डाॅ. हीरालाल साहा ने भी कवि शंभु बादल और उनकी कविताओं के महत्व को रेखांकित किया। 
इस मौके पर शिल्पा कुमारी झा ने बादल जी की कविता ‘सांवली लड़की’ और प्रियंका कुमारी ने ‘सपनों से बनते हैं सपने’ का पाठ किया। स्वयं शंभु बादल ने ‘आ बाघ’ और अपनी नई कविता ‘हंसी फैलेगी’ सुनाई।
आयोजन स्थल को संभावना कला मंच, गाजीपुर के निहाल कुमार और मृदुल चौधरी ने कविता-पोस्टरों से सजाया था। इस आयोजन में बादल जी और उनकी कविता को चाहने वालों की भारी तादाद मौजूद थी। आयोजन के आरंभ में जन संस्कृति मंच, झारखंड के सचिव अनिल अंशुमन ने अतिथियों और श्रोताओं का स्वागत किया। धन्यवाद ज्ञापन जावेद इस्लाम ने किया। 
इस मौके पर गंगा में प्रदूषण मुक्ति के लिए अनशन के दौरान शहीद प्रोफेसर और पर्यावरण विज्ञानी जी. डी. अग्रवाल को एक मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई।


Monday, May 11, 2015

सुरेश कांटक की पुस्तक ‘अंजोरिया के पीछे’ और ‘वीर बांकुड़ा बाबू कुंवर सिंह’ का लोकार्पण




लोकार्पण आयोजन में 1857 का जनविद्रोह और किसानों की जिंदगी का संकट बहस के केंद्र में रहा 



आरा: 10 मई 2015

सुरेश कांटक द्वारा कहानी पाठ 
1857 के स्वाधीनता संग्राम के आरंभ के ऐतिहासिक दिवस पर आज स्थानीय तिलक नगर के फिजिक्स स्टडी प्वाइंट में जन संस्कृति मंच की ओर से प्रसिद्ध कथाकार सुरेश कांटक के भोजपुरी कहानी संग्रह ‘अंजोरिया के पीछे’ और नाटक ‘सत्तावन के वीर बांकुड़ा कुंवर सिंह’ का लोकार्पण और उस पर बातचीत का आयोजन हुआ। लोकार्पण आलोचक रामनिहाल गुंजन, कथाकार नीरज सिंह और आलोचक रवींद्रनाथ राय ने किया। संचालन कवि सुमन कुमार सिंह ने किया।


रामनिहाल गुंजन 
सुमन कुमार सिंह 
पहले सुरेश कांटक ने ‘अंजोरिया के पीछे’ कहानी संग्रह से एक कहानी ‘नेता जी के बैल’ का पाठ किया। 
लोकार्पित पुस्तकों की चर्चा करते हुए रामनिहाल गुंजन ने कहा कि सुरेश कांटक मूलतः कहानीकार हैं। उनकी कहानी ‘नेता जी का बैल’ प्रेमचंद की ‘दो बैलोें की कथा’ से आगे की कहानी है। उन्होंने कहा कि भोजपुरी में अधिक से अधिक राजनैतिक कहानियां लिखने की जरूरत है। कुंवर सिंह के प्रसंग में  उनकी राय थी, कि इस विद्रोह को दो साल पहले हुए आदिवासी विद्रोह से भी जोड़कर देखना चाहिए। 

नीरज सिंह 
कुंवर सिंह नेतृत्व में लड़े गए स्वाधीनता संग्राम में जबर्दस्त जनसहभागिता की चर्चा करते हुए कथाकार नीरज सिंह ने कहा कि सुरेश कांटक ने कुंवर सिंह पर नाटक लिखकर महत्वपूर्ण कार्य किया है। 1857 के बाद अंग्रेजों ने साजिशन सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। आज की परिस्थिति में 1857 को याद करना जनता की ताकत में यकीन करने जैसा है। उन्होंने कहा कि देश में जिस तरह का निरंकुश शासन चल रहा है, जिस तरह लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन हो रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि 2017 तक इस देश में फिर भयंकर विद्रोह होगा। 

आलोचक रवींद्रनाथ राय ने कहा कि सुरेश कांटक की कहानियां प्रगतिवादी दौर की कहानियों की याद दिलाती हैं। धन का प्रलोभन, बाजार की चमक और खेती को हाशिये पर रखने की परिघटनाओं को इन्होंने बखूबी दर्शाया है। इनमें नागार्जुन-सी जनपक्षधरता है। कुंवर सिंह की लड़ाई किस तरह जनता की लड़ाई थी, इसे इन्होंने अपने नाटक में अच्छी तरह दिखाया है।

अनन्त कुमार सिंह 
कथाकार अनंत कुमार सिंह ने कहा कि खेती-किसानी की संस्कृति को किस तरह कसाई के हवाले कर दिया गया है, इसे इनकी कहानियां बखूबी दर्शाती हैं। कवि सुमन कुमार सिंह ने उनकी कहानियों पर केंद्रित लेख का पाठ करते हुए कहा कि किसान की जिंदगी पर सुरेश कांटक की गहरी पकड़ है। खेती से किसान का मन कैसे फटा है, इसे इनकी कहानियों को पढ़ते हुए महसूस किया जा सकता है। 

सुधीर सुमन ने कहा कि कांटक जी ने नाटक की भूमिका में जिन मेहनतकश जातियों की 1857 की लड़ाई में भागीदारी का उल्लेख किया है, उसे नाटक के दृश्यों में भी परिणत होना चाहिए था। वर्तमान दौर में सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति के खतरों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि 1857 की सांप्रदायिक एकजुटता को फिर से हासिल करना वक्त की जरूरत है। आज जरूरी है कि धर्मन और कर्मन की हकीकत को खोजकर सामने लाया जाए। जिस तरह टीवी धारावाहिकों में राजाओं और बादशाहों के बीच की लड़ाई को हिंदू-मुसलमान की लड़ाई के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है, वह इतिहास को विकृत करने की कोशिश है। सांप्रदायिक बोध को बढ़ाने वाले इतिहास से मुक्ति के लिए सचेत प्रयास करना होगा। 

कवि सुनील श्रीवास्तव ने व्यवस्थागत जटिलता की और ज्यादा पड़ताल करने की जरूरत पर जोर दिया। कवि अरविंद अनुराग ने कहा कि प्रेमचंद जिस तरह की कहानियां हिंदी में लिख रहे थे उसी तरह की कहानी सुरेश कांटक भोजपुरी में लिख रहे हैं। 
राकेश दिवाकर 
कवि ओमप्रकाश मिश्र ने सुरेश कांटक को भोजपुरी कहानी में कथ्य के चयन के प्रति सचेत कहानीकार के बतौर चिह्नित किया। कवि संतोश श्रेयांश ने उन्हें हमारे समय का जरूरी कहानीकार बताया। चित्रकार राकेश दिवाकर ने सुरेश कांटक की कहानी ‘एक सई तिरिपन बरिस के आदमी’ की तुलना एचजी वेल्स के उपन्यास ‘टाइम मशीन’ से की। 
भाकपा-माले के नगर सचिव दिलराज प्रीतम ने कहा कि शासकवर्ग ने आम अवाम को जिस खतरनाक मोड़ पर खड़ा कर दिया है, उसके खिलाफ जो जनांदोलन चल रहे हैं, उसके बारे में लिखना ही 1857 को याद करने का सही तरीका होगा।
निर्मोही 
इस मौके पर जनकवि निर्मोही ने ‘कारपोरेट से कइले बा इयारी/ ए भइया करऽ लड़े के तैयारी’ तथा युवानीति के संयोजक अरुण प्रसाद ने खेती और किसानों की दुर्दशा से संबंधित गीत सुनाए। शिक्षक अजय महतो और रंगकर्मी सूर्यप्रकाश ने भी अपने विचार रखे। धन्यवाद ज्ञापन कवि सुनील चैधरी ने किया। इस अवसर पर आशुतोष कुमार पांडेय, चित्रकार-कवि रविशंकर सिंह, शिक्षक मुकेश कुमार, रंगकर्मी अमित मेहता, आशय, शांतनु आदि भी मौजूद थे। 




सुमन कुमार सिंह द्वारा जारी

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