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Sunday, December 7, 2014

नए भारत का निर्माण जनता के गुणों के जरिए होगा इसका अहसास कराया छठे पटना फिल्मोत्सव ने



अभिभावकों की संवेदना को झकझोरा ‘कैद’ ने 

बच्चों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होने की जरूरत का अहसास कराया फिल्म और फिल्मकारों ने
जनस्वास्थ्य का मुद्दा भी उठा फिल्मोत्सव में 


पटना: 7 दिसंबर 2014
हिरावल, जन संस्कृति  मंच द्वारा कालिदास रंगालय में आयोजित त्रिदिवसीय पटना फिल्मोत्सव, प्रतिरोध का सिनेमा के आखिरी दिन का पूरा एक सत्र बच्चों के नाम रहा।  जिसकी शुरुआत ज्ञान प्रकाश विवेक की कहानी ‘कैद’ पर इसी नाम से बनाई गई एक बेहद मार्मिक और हृदय को झकझोर देने वाली फिल्म से हुई। एक बच्चे की चिल्लाहट से फिल्म शुरू हुई, जो एक छत पर बने कमरे में कैद में है। फिर कहानी फ्लैश बैक में लौटती है। लड़के का नाम संजू है। वह बहुत गुस्से में रहता है। बच्चों और बड़ों पर भी हमले करता है, उन्हें काट खाता है। डाॅक्टर मेंटल स्ट्रेस का शिकार बताकर उसका इलाज करते हैं, पर वह ठीक नहीं हो पाता। उसके मां-बाप उसे ओझा गुनियों के पास ले जाते हैं। ओझा उस पर जिन्नात का साया बताता है। लेकिन जितना ही उसे रोगमुक्त करने की कोशिश की जाती है, उतना ही उसका मर्ज बढ़ता जाता है। संजू के स्कूल के एक शिक्षक को, जो कि बच्चों पर रिसर्च भी करता रहा है, पता चलता है कि संजू तेज छात्र था। गणित में भी वह अच्छा था, पर ट्यूशन पढ़ाकर कमाई करने वाले उसके गणित शिक्षक को उसकी योग्यता नागवार गुजरती थी। वे उसे डांटते थे और रोजाना झूठी सजा देकर बेंच पर खड़ा कर देते थे, उसकी काॅपी नहीं चेक करते थे। तब एक दिन उसने काॅपी फाड़कर फेंक दी थी। वह अपने सहपाठियों के साथ टूर में जाना चाहता था, पर हिंदी की शिक्षिका उसे नाराज रहती थी, उसके द्वारा माफी मांगने और आइंदा गलती न करने के वादे के बावजूद टूर पर उसे नहीं ले जाया जाता। वह लगातार उपेक्षित महसूस करता है। इसी उपेक्षा और डांट के कारण वह तनाव में रहता है और हिंसक होता जाता है। अंततः परिवार के लोग उसे छत पर एक कमरे में कैद कर देते हैं। वह लगातार चिल्लाता रहता है- खोल दो, निकाल दो। 

यह फिल्म ‘तारे जमीन पर’ से इस मायने में भिन्न है कि यहां बच्चा बीमारी से पहले से ग्रस्त नहीं है, बल्कि डांट और उपेक्षा ने उसे बीमार और विक्षिप्त-सा बना दिया है। इस फिल्म का परिवेश ‘तारे जमीन पर’ के बच्चे से अलग है। यहां एक आम निम्नमध्यवर्गीय परिवार है, जिसमें बाप को बच्चे की इलाज और नौकरी में से किसी एक को चुनना पड़ता है। अगर वह इलाज के लिए जाता है तो नौकरी प्रभावित होती है। उसकी बहन को छोड़कर सबको लगता है कि बच्चा पागल है। खैर, रिसर्चर जो संजू के स्कूल में शिक्षक हो गया है, को लगता है कि उसका गुस्सा ही इसका साक्ष्य है कि वह पागल नहीं है। वह जिंदगी में लौटना चाहता है। संजू के मनोभावों को वह ठीक से समझता है और उस पर यकीन करके उसे कैद से मुक्त करता है। इस फिल्म के संवाद लेखक ज्ञानप्रकाश विवेक और हनीफ मदार है. रिसर्चर  व शिक्षक की  भूमिका सनीफ मदार तथा संजू की भूमिका किशन ने निभाई है। खासकर किशन ने संजू की भूमिका में अविस्मरणीय अभिनय किया है।

संजय मट्टू के साथ बच्चों ने किस्सों की दुनिया की सैर की

संजय मट्टू आॅल इंडिया रेडियो में अंगे्रजी के समाचार वाचक हैं। पिछले पांच-छह साल से वे कहानियों, खासकर लोककथाओं के माध्यम से बच्चों की सृजनशीलता और कल्पनाशीलता को आवेग देने में लगे हुए हैं। आज कालिदास रंगालय में अभिनय और संवाद के जादू से लैस संजय मट्टू की किस्सागोई का बच्चों ने खूब आनंद उठाया। आज प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए संजय मट्टू ने कहा कि वे लोककथाओं का इस्तेमाल इसलिए करते हैं, क्योंकि वे ज्यादा सहज होती हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों को नसमझ समझना ठीक नहीं है, उनके साथ गहरा संपर्क बहुत जरूरी है। वे क्या कहना चाहते हैं, इसे सुनना बहुत जरूरी है। 

अभिभावकों को मालिकाना रवैया छोड़ना होगा

लेखकों-फिल्मकारों-संस्कृतिकर्मियों को बच्चों को विकल्प देना होगा
आज प्रेस कांफ्रेंस में ‘कैद’ फिल्म के संवाद लेखक हनीफ मदार और अभिनेता सनीफ मदार ने कहा कि मां-बाप को बच्चों के साथ मालिकाना रिश्ता छोड़ना होगा। उन पर अपनी अतृप्त इच्छाओं को लादना बंद करना होगा। संजय मट्टू का कहना था कि टीवी का दुष्प्रभाव बच्चों पर इस कारण पड़ता है कि उन्हें दूसरा कोई विकल्प नहीं मिल रहा है। बच्चों के मानसिकता को समझकर ही कोई विकल्प भी देना होगा। सनीफ मदार ने कहा कि बच्चों में अंधविश्वास, अवतारवाद, बाजारवाद और सांप्रदायिकता का जो कूड़ा परोसा जा रहा है, उसके खिलाफ ज्यादा संगठित तरीके से काम करना होगा। उन्होंने कहा कि दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। उन्होंने अपनी फिल्म ‘कैद’ को मिले जनसहयोग का उदाहरण देते हुए कहा कि अब तकनीक भी सस्ता हो गया है, अब जनता का सिनेमा बनाना ज्यादा संभव है। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म मथुरा के स्कूलों में दिखाई जा रही है, वे गांवों में भी इसे दिखा रहे हैं। प्रतिरोध का सिनेमा फिल्मोत्सवों में भी लोग सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए इसका डीवीडी खरीद रहे हैं।

बच्चों ने अपनी कल्पनाओं में रंग भरा

इस बार पटना फिल्मोत्सव के प्रेक्षागृह के बाहर परिसर में पेंटिंग कार्यशाला आयोेजित हुई, जिसमें बच्चों ने अपनी कल्पनाओं को कैनवस पर उतारा। उन्हें किसी विषय में नहीं बांधा गया था। पेड़-पौधे, मछली, सूरज, नदी से लेकर कई तरह की आकृतियां उन्होंने बनाई, जिनको बाद में यहां प्रदर्शित भी किया गया। कार्यशाला का उद्घाटन कवयित्री प्रतिभा ने किया। सुमन सिन्हा ने प्रतिभागी बच्चों को प्रमाणपत्र दिया। इस मौके पर डाॅ. अमूल्या भी मौजूद थे। 


वैकल्पिक जनस्वास्थ्य की राह दिखाई अजय टीजी की फिल्म ‘पहली आवाज’ ने

अजय टी जी की दस्तावेजी फिल्म ‘पहली आवाज’ को देखना और उसके निष्कर्षों को समझना स्वास्थ्य में ठोस विकल्प का रास्ता सुझाता लगा। भिलाई में रहने वाले अजय पूरावक्ती दस्तावेजी फिल्मकार हैं और कामगारों के सवालों को वे लगातार अपनी फिल्मों का विषय बनाते आये हैं। पहली आवाज या फस्र्ट क्राई छतीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के नायक शहीद शंकर गुहा नियोगी द्वारा शुरू किए गए शहीद अस्पताल की कहानी है। इसकी कहानी हमेंपूंजीवादी समाज में स्वास्थ्य के ढांचे के बरक्स समतामूलक समाज में होने वाली स्वास्थ संबंधी चिंताओं को सहज समझाती है। छत्तीसगढ़ के खनन इलाके दल्ली राजहरा में शुरू हुआ शहीद अस्पताल अपने लोगों को बचाने की जरूरत से शुरू हुआ। इसलिए इसके निर्माण में भी इससे लाभान्वित होने वाले लोगों का श्रम लगा था। फिल्म में अस्पताल को देखते हुए बड़े शहरों में निर्मित हो रहे फाइव स्टार अस्पतालों से बड़ा फर्क नजर आया। यह फर्क दल्ली राजहरा और बड़े फाइव स्टार की चमक और उसके अर्थ का था। शहीद अस्पताल में चमकते प्राइवेट वार्ड नहीं हैं, न ही उसकी बिल्डिंग का बाहरी हिस्सा दमकता है। लेकिन यहां भी इलाज के लिए जरूरी उपकरण और उससे भी ज्यादा संत जैसे डाॅक्टरों और सहायकों की एक बड़ी फौज नज़र आती है। सबसे खास बात जो है वो यह कि यहां हर गरीब का बिना किसी भेदभाव के इलाज हो सकता है। यह शायद देश का एकमात्र अस्पताल है जिसमे काम करने वाले सहायकों और डाक्टरों की तनख्वाह में मामूली अंतर है। दरअसल यह अस्पताल अपने मरीज की लूट पर नहीं बल्कि उसका इलाज कर उसे स्वस्थ कर घर भेजने के सिद्धांत पर निर्मित हुआ है। फिल्म देखते हुए दल्ली राजहरा के इस अनोखे अस्पताल की दुश्वारियों का भी पता चला। हर चीज को मुनाफे में देखने के आदी लोगों के सामने यह एक नसीहत के रूप में सामने खड़ा दिखाई देता है।
अजय टीजी जनता का सिनेमा बनाते रहे हैं। उन पर छत्तीसगढ़ सरकार के एक दमनकारी कानून के तहत माओवादी करार कर जेल में बंद कर दिया गया था, जिसके खिलाफ पूरे देश के बुद्धिजीवियों और साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों ने प्रतिवाद किया था। फिल्म के प्रदर्शन के बाद इसके निर्देशक अजय टीजी से दर्शकों का स्वास्थ्य के मुद्दे और फिल्म निर्माण की प्रक्रिया पर संवाद हुआ। अजय टीजी ने कहा कि जनता का सिनेमा कम खर्चे में बनाया जा सकता है। भोजपुरी में भी ऐसी फिल्मों का निर्माण संभव है। 

इंसेफलाइटिस के निदान के लिए एक सिनेमाई पहल

गोरखपुर फिल्म सोसाइटी की ओर से बनाई गई फिल्म ‘इंसेफलाइटिस: एक ट्रेजडी’ ने भी स्वास्थ्य के सवाल को ही उठाया। इसका परिचय कराते हुए गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक मनोज सिंह ने बताया कि यह बीमारी पूर्वांचल में काफी गंभीर रूप अख्तियार कर चुकी है। पिछले साढ़े तीन दशक में एक लाख से अधिक बच्चे असमय काल कवलित हो चुके हैं। इस बीच कितनी सरकारें आईं गईं लेकिन आज तक इस बीमारी के निदान के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया है। इस आपराधिक उपेक्षा के खिलाफ जनांदोलन संगठित करने की मंशा से भी यह फिल्म बनाई गई है। 

फर्जी गिरफ्तारियों का विरोध

‘फैब्रिकेटेड’ केपी ससी निदेर्शित मलयालम फिल्म थी, जिसमें फर्जी गिरफ्तारियों के सवाल को उठाया गया। 

तमाम खतरों के बावजूद कला-संगीत की यात्रा जारी रहेगी

'हाफ मून' कुर्दिश भाषा में 2006 में बनी इरानियन-कुर्दिश लेखक बहमन गोबादी निर्देशित फिल्म हैं। ईरान, आस्ट्रिया, इराक और फ्रांस का संयुक्त प्रस्तुति है। अंतराष्र्टीय स्तर पर इस फिल्म को काफी पुरस्कार मिले हैं। ममो नाम का एक बुजुर्ग कुर्दिश संगीतकार यह फैसला करता है कि वह अपने एक अंतिम संगीत प्रस्तुति इराकी कुर्दिस्तान में देगा। तो गांव के बूढ़े बुजर्ग लोग उसे चेतावनी देती हैं कि अगर आधा चांद पूरा हो गया तो कोई बड़ी दुघर्टना घट सकती है। लेकिन वह अपने बेटे के साथ लंबी और खतरनाक यात्रा पर निकल पड़ता है। उस यात्रा में हेसो नाम की एक गायिका को भी साथ ले लेता है जो एक ऐसे गांव में रहती है जहां लगभग डेढ़ हजार गायिकाएं विस्थापन में जी रही हैं। लेकिन हेसो के पास इराक जाने का कोई वैध कागजात नहीें होेने के कारण इस यात्रा की जटिलता और बढ़ जाती है। लेकिन तमाम बाधाओं के बावजूद ममो अपने फैसले पर कायम है कि वह यात्रा पूरी करेगा और अपनी सांगीतिक प्रस्तुति देगा। 

नए भारत के निर्माण के लिए प्रेरित किया फिल्मोत्सव ने: रामजी राय

रामजी राय ने दिया फिल्मोत्सव का समापन वक्तव्य
आखिर में समापन सत्र को संबोधित करते हुए जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि जो बातें, जो फिल्मों और जो डाक्यूमेंट्री फिल्मोत्सव में दिखाई गईं, वे हमारे मानसिक धरातल को विस्तार देती हैं। इनसे यह पता चला है कि इस देश और समाज को बेहतर बनाने के लिए कितनी तरह से लोग लगे हुए हैं। चाहे दंगे का सवाल हो या शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई का मसला, इनके जरिए ये फ़िल्में एक नए देश को  बनाने की बात करती है। ये यह दर्शाती हैं कि भविष्य के भारत का निर्माण जनता के गुणों के जरिए ही होगा। रामजी राय ने कहा कि बच्चों ने अपनी पेंटिंग में रंगों और सृजन की जो छटा बिखेरी उसने हमें आह्लादित तो किया ही भविष्य के लिए आश्वस्त भी किया। उनके सृजन में रंगों का वैभव था, रंग बातें कर रहे थे, और उन बातों से खुश्बू आ रही थी। यह सारा सृजन हमें हमें एक नए देश बनाने के लिए कृतसंकल्प होने को बाध्य कर रहा था, यही प्रतिरोध के सिनेमा का मकसद है। 

दर्शक का सम्मान

पटना फिल्मोत्सव की ओर से इस बार परम शिवम और उनके परिवार को सबसे प्रतिबद्ध दर्शक के रूप में सम्मानित किया गया। वे अपने परिवार के साथ पहले दिन से आखिरी दिन तक लगातार मौजूद थे। 

चित्र प्रदर्शनी और बुक स्टाॅल

फिल्मोत्सव में तीनों दिन जैनुल आबेदीन की याद में उनकी चित्र प्रदर्शनी ‘अकाल की कला’ और कविता पोस्टर भी प्रदर्शित किए गए। कालीदास रंगालय का परिसर भी कलात्मक तौर पर सजाया गया था। परिसर में किताबों और सीडी का स्टाॅल भी लगाया गया था। 
यह फिल्मोत्सव महान गायिका बेगम अख्तर, क्रांतिकारी कवि नबारुण भट्टाचार्य,  विख्यात रंगकर्मी जोहरा सहगल, जन-चित्रकार जैनुल आबेदीन और कथाकार मधुकर सिंह की स्मृति को समर्पित था। इसमें हाल में गुजरे अभिनेता देवेन वर्मा, महान नृत्यांगना सितारा देवी और बिहार के फिल्म निर्देशक गिरीश रंजन को भी श्रद्धांजलि दी गयी।  फिल्मोत्सव की केन्द्रीय थीम 'बोल की लैब आज़ाद हैं तेरे'  भारतीय उपमहाद्वीप के मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ की गज़ल से ली गई थी।  फिल्मोत्सव ने देश की अर्थनीति, राजनीति, आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक समुदायों की जिंदगी की मुश्किलों, अन्धविश्वास, महिलाओं और बच्चों के अधिकार और स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों के प्रति संवेदित किया।

Saturday, December 6, 2014

साझे जनपक्षधर सांस्कृतिक मूल्यों की विरासत को फिल्मों ने अभिव्यक्त ने किया




हिंदी सिनेमा की प्रगतिशील-जनपक्षधर परंपरा के इतिहास और वर्तमान से रूबरू हुए दर्शक


पटना: 6 दिसंबर 2014

हिरावल (जन संस्कृति मंच) द्वारा कालिदास रंगालय में आयोजित छठे पटना फिल्मोत्सव प्रतिरोध का सिनेमा के दूसरे दिन आज हिंदी सिनेमा के इतिहास और वर्तमान दोनों के जनसरोकारों से दर्शक रूबरू हुए। किस तरह हिंदी सिनेमा और गायिकी की परंपरा हमारी साझी संस्कृति और प्रगतिशील मूल्यों की अभिव्यक्ति का माध्यम रही है, इसे भी दर्शकों ने देखा और महसूस किया।

जनता के सच को दर्शाने वाले प्रगतिशील लेखक-निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास को याद किया गया 

प्रगतिशील फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास की जन्मशती के अवसर पर उनकी याद में ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी की आॅडियो-विजुअल प्रस्तुति से दूसरे दिन की शुरुआत हुई। उन्होंने बताया कि ख्वाजा अहमद अब्बास इप्टा के प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन से निकले ऐसे फिल्मकार हैं, जो अपने स्क्रिप्ट और संवाद लेखन तथा निर्देशन के जरिए भारतीय सिनेमा में आम जन के महत्व को स्थापित किया। हिंदी सिनेमा के प्रगतिशील वैचारिक सिनेमा के निर्माण में उनकी बहुत बड़ी भूमिका रही है। उनकी एक महत्वपूर्ण फिल्म ‘धरती के लाल’ जो बंगाल के अकाल की सीधे-सीधे सिनेमाई अभिव्यक्ति थी, के अंशों और गीतों के जरिए संजय जोशी ने आज के दौर में किसानों की आत्महत्या और वर्ग वैषम्य के संदर्भाें से जोड़ा। उन्होंने कहा कि ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपने दौर की सामाजिक-आर्थिक विषमता और जनता की जिंदगी की मर्माहत कर देने वाली वास्तविकता को अपने लेखन और निर्देशन के जरिए दर्ज किया, यह विरासत आज भी जनता का सिनेमा बनाने वाली के लिए एक बड़ी पे्ररणा का स्रोत है। संजय जोशी की आॅडियो-विजुअल प्रस्तुति के बाद आर.एन. दास ने ख्वाजा अहमद अब्बास के महत्व को रेखांकित करने के लिए उन्हें बधाई दिया और वादा किया कि पटना फिल्मोत्सव समिति की ओर से उनकी जन्मशती पर आगे कोई विशेष आयोजन किया जाएगा।

दीवानगी से शुरू आजादी का सफर किस बेगानगी पर खत्म हुआ इसे दर्शाया ‘बेगम अख्तर’ फिल्म ने 
बेगम अख्तर ने भारतीय उपमहाद्वीप की जनता के दिल को अपनी गायिकी के बल पर जीता

दूसरी फिल्म महान गायिका अख्तरी बाई यानी बेगम अख्तर पर थी। 1971 में फिल्म प्रभाग द्वारा ब्लैक एंड ह्वाइट में बनाई गई इस फिल्म का अत्यंत सारगर्भित परिचय कराते हुए संतोष सहर ने कहा कि यह फिल्म इस सच्चाई को दिखाती है कि आजाद हिंदुस्तान का सफर जिस दीवानगी से शुरू हुआ वह बेगानगी पर जाकर खत्म होता है। एक दौर था कि जब बेगम अख्तर ने गाया कि काबा नहीं बनता है, तो बुतखाना बना दे, लेकिन आजाद हिंदुस्तान के इतने वर्षों के राजनीतिक सफर की हकीकत यह है कि काबा और बुतखाने के बीच की दूरी बढ़ा दी गई है। उन्हांेने कहा कि पटना से बेगम अख्तर का गहरा रिश्ता था। उनके पहले गुरु यहीं के थे। बिहार के भूकंप पीडि़तों की मदद के लिए बेगम ने एक कंसर्ट भी किया था। महान लेखक मंटो के हवाले से उन्होंने कहा कि दीवाना बनाना है, तो दीवाना बना दे आम लोगों में भी जबर्दस्त मकबूल हुआ था। करांची में आयोजित उनके एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब वे गाती हैं कि आओ संवरिया हमरे द्वारे, सारा झगड़ा बलम खतम होई जाए, तो लगता है कि जैसे यह आवाज भारत-पाकिस्तान के बंटवारे से टकरा रही है। संतोष सहर ने एक खास बात और कही कि भारतीय पुनर्जागरण में बहुत सारी महिला व्यक्तित्व नजर आती है। उनमें से एक भारत कोकिला सरोजिनी नायडू ने तो उनकी पहली प्रस्तुति में ही उनसे बहुत आगे तक जाने की भविष्यवाणी की थी। लेकिन इतना नीचे से उठकर इतनी ऊंचाई तक पहुंचने वाली दूसरी कोई महिला शख्सियत नहीं है। वे ऐसी महिला नहीं थीं, जिन्होंने किसी देश में सेना भेजकर उसे जीता, बल्कि जीवन में त्रासदियों का सामना करते हुए भी अपनी गायिकी के बल पर उन्होंने पूरे भारतीय महाद्वीप की जनता के दिल को जीता। 

फिल्म गजल और ठुमरी गायिकी की पंरपरा मेे मुस्लिम नवाबों की महत्वूपर्ण भूमिका को चिह्नित करते हुए बेगम अख्तर की उस जिंदगी की एक झलक दिखाती है कि कैसे 1914 में फैजाबाद जैसे छोटे शहर में जन्मी अख्तरी बाई कलकत्ता पहुंची और फिर बेगम अख्तर के रूप में मशहूर हुईं। उन्होंने कुलीन वर्ग के लिए गाना शुरू किया, पर उन्हें आम अवाम के बीच भी जबर्दस्त मकबूलियत हासिल हुई। फिल्म में एक जगह बेगम अख्तर कहती हैं कि ठुमरी और गजल को गाना ऐसा आसान नहीं है, जैसा अमूमन समझ लिया जाता है।...गजल शायर के दिल की आवाज है, हुस्न और इश्क का खुबसूरत मुरक्का है... अगर कोई गजल गाने वाला अपनी अदायगी से इस हुस्न इश्क के पैगाम को शामइन यानी श्रोताओं के दिल तक पहुंचाने में कामयाब है, तब और सिर्फ तभी उसे गजल गाने का हक मिलता है। 

शायर के दिल की बात को श्रोताओं तक सही ढंग से पहुंचा देना ही अच्छी गायिकी है। इसकी मिसाल बेगम अख्तर पर बनाई गई इस फिल्म में उनके द्वारा गई गजलों के अंशों से भी जाहिर हुआ। 

अत्याचार और गैरबराबरी के खिलाफ ग्रामीण महिलाओं के संगठित संघर्ष को दिखाया ‘गुलाबी गैंग’ ने

निष्ठा जैन निर्देशित ‘गुलाबी गैंग’ में उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के बांदा जिले में गुलाबी गैंग नाम के महिलाओं के संगठन और उसके संघर्ष दास्तान को दिखाया गया। इस संगठन की महिलाएं गुलाबी साड़ी पहनती हैं और हाथ में लाठी लिए महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ती हैं। ‘गुलाबी गैंग की प्रमुख संपत पाल फिल्म का मुख्य चरित्र हैं. उत्त्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा जैसे राज्यों में जहां महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों का ग्राफ बढ़ता जा रहा है और और समाज का पितृसत्तात्मक ढांचा उन्हें हमेशा पृष्ठभूमि में रक्ता आया है, संपत पाल महिलाओं को प्रेरित करती हैं कि जब तक वे स्वयं एकजूट होकर अपने हकों के लिए नहीं लड़ेंगी तब तक तब तक उनकी लड़ाई अधूरी ही रहेगी. यह फिल्म एक तरफ सम्पत पाल को पितृसत्तात्मक दबावों से लोहा लेने वाली महिला के रूप में दिखाती है तो साथ ही सम्पत पाल को खास जगह पर व्यवस्था के गणित से संचालित भी दिखाती है। यह फिल्म एक आंदोलन के बढ़ने-बनने से लेकर उसके अंतर्विरोधों तथा कमजोर पहलुओं की ओर भी इशारा करती है। महिलाओं पर बढ़ती हिंसा के इस दौर में यह फिल्म संगठित प्रतिरोध की पे्ररणा देती है। निष्ठा जैन ने छ महीने गुलाबी गैंग के साथ रहकर उनकी गतिविधियों को लगातार दर्ज कर यह फिल्म बनायी. स्वयं संपत पाल ने फीचर फिल्म ‘गुलाब गैंग’ और इसकी तुलना करते हुए कहा, “यह फिल्म मेरी जिंदगी की सच्चाई है। माधुरी की फिल्म की तरह इसे पैसे कमाने के लिए नहीं बनाया गया है। निष्ठा ने महीनों मेरे साथ इस फिल्म के लिए काम किया है। वो दिखाया है जो मैं करती हूं। नाम बदलकर फिल्म बना देने जैसा धोखा इसमें नहीं है जैसा गुलाब गैंग में किया गया है।” इस फिल्म को सामाजिक मुद्दों पर बनी सर्वश्रेष्ठ दस्तावेजी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार और दुबई, अफ्रीका तथा मैड्रिड जैसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भी पुरस्कार मिल चुके हैं।

फिल्म की निर्देशक निष्ठा जैन थ्ज्प्प् की स्नातक हैं और इससे पूर्व कई दस्तावेजी फिल्में बना चुकी हैं जिनमें ‘लक्ष्मी एंड मी’, ‘एट माय डोरस्टेप’ तथा ‘सिक्स यार्ड्स टू डेमोक्रेसी’ प्रमुख हैं।

आंखों देखी: अनभुव का सत्य बनाम सत्य का अनुभव 

रजत कपूर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘आँखों देखी’ में दो नजरिये का टकराव है, एक यह कि नजरिये का फर्क किसी सच को झूठ में नहीं बदल देता, और दूसरा यह कि सच्चाई को देखने-समझने और महसूस करने के सबके अपने निजी तरीके-रास्ते हो सकते हैं। इसके केंद्रीय चरित्र बाबूजी हैं। उनकी बेटी के प्रेमी को जब बाकी लोग पिट रहे हैं, तभी उनको लगता है कि उस लड़के बारे में जो दुष्प्रचार था, वह ठीक नहीं है। उसके बाद एक सुबह वे दफ्तर जाने से पहले नहाते हुए यह प्रण करते हैं कि “मेरा सच मेरे अनुभव का सच होगा। आज से मैं हर उस बात को मानने से इनकार कर दूंगा जिसे मैंने खुद देखा या सुना न हो. हर बात में सवाल करूँगा। हर चीज को दोबारा देखूँगा, सुनूँगा, जानूँगा, अपनी नजर के तराजू से तौलूँगा। और कोई भी ऐसी बात, जिसको मैंने जिया ना हो उसको अपने मुँह से नहीं निकालूँगा. जो कुछ भी गलत मुझे सिखाया गया है, या गलत तरीके से सिखाया गया है वो सब भुला दूँगा. अब सब कुछ नया होगा. नए सिरे से होगा. सच्चा होगा, अच्छा होगा, सब कुछ नया होगा. जो देखूँगा, उस पर ही विश्वास करूँगा।”

अपने ही दफ्तर के चायवाले और साथ काम कर रहे बाबू में उन्हें वह सुन्दरता नजर आने लगती है, जिसे चिह्नित करने की फुरसत और नजर, शायद दोनों ही उनके पास पहले नहीं थी। लेकिन बाबूजी अपनी नई दृष्टि से लैस होकर भी घर के भीतर उस नई दृष्टि का इस्तेमाल कर पाने में असमर्थ हैं और अपनी पत्नी को कहते हैं, “कुछ भी नया सोचो और तुम औरतें, चुप रहो.” लेकिन फिर अपनी बेटी से संबंध में यह नई दृष्टि बाबूजी को नई पीढ़ी के अनुभव तक पहुँचने में मदद भी करती है। वे देख पाते हैं बिना किसी पूर्वाग्रह के, जो उनकी बेटी अपने भविष्य के लिए निर्धारित कर रही है। बाबूजी अजीब किस्म की लगती खब्त तो पालते हैं, लेकिन वे इसके जरिये कोई क्रान्ति करने निकले मसीहाई अवतार नहीं हैं। इसके बावजूद यह फिल्म यथास्थिति को तो तोड़ती ही है। 

विभाजन के शिकार लोगों के दर्द की दास्तान दिखी ‘फुटप्रिंट्स इन दी डेजर्ट’ में

आज फिल्मोत्सव में बलाका घोष निर्देशित फिल्म ‘फुटप्रिंट्स इन दी डेजर्ट’ भी दिखाई गई, जिसमें भारत-पाकिस्तान के आसपास रहने वाले लोगों के दर्द, चाहत, पे्रम और इंतजार की कहानी है। अपनी जान की परवाह न करते हुए सीमा पार करने की कहानी है। इस फिल्म का साउथ कोरिया बुसान इंटरनेशनल फेस्टिवल में प्रीमियर हुआ था। आज आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में बलाका घोष ने कहा कि वे पहले पैरों के निशान के प्रति आकर्षित हुए। इसे बनाने में चार-साढ़े चार साल लग गए। पैदल ही चलना पड़ा। रेगिस्तान में बहुत सारी रातें रुकना पड़ा।

हुआ यह कि विभाजन के बाद कुछ लोग पाकिस्तान में रह गए और कुछ भारत में। कुंए पाकिस्तान में रह गए और भारत में रहने वालों के लिए पानी की व्यवस्था नहीं रही। सीमा के पार घर नजर आते हैं, पर लोग गैरकानूनी तरीके से ही वहां जा सकते हैं। उनके बीच शादियां भी होती हैं, पर एक बार दुल्हन इधर आए तो फिर वापस नहीं जा पाती। 

फिल्म के प्रोड्यूशर कुमुद रंजन ने बताया कि पाकिस्तान के लोगों को जैसलमेर जाने का विजा नहीं मिलता है। उन्हं जोधपुर तक का ही विजा मिलता है। जबकि अमेरिकन, ब्रिटिश टूरिस्ट जैसलमेर तक जा सकते हैं, लेकिन पाकिस्तानी होने के कारण वे काूननी तौर पर नहीं आ सकते। भारत में एक सूफी गायक हैं और पाकिस्तान में गुरु हैं। लेकिन वे उनसे नहीं मिल पाते। फिल्म प्रदर्शन के बाद बलाका घोष ने दर्शकों के सवालों का जवाब दिया। 

मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक जनसंहार के सच को दर्शाया ‘ मुजफ्फरनगर बाकी हैं’ ने 

आज फिल्मोत्सव की आखिरी फिल्म नकुल सिंह साहनी की फिल्म ‘मुजफ्फरनगर बाकी हैं’ थी, जिसका भारतीय प्रीमियर भी आज हुआ। पिछले साल मुजफ्फरनगर में जो जनसंहार हुआ था, उसके पीछे की वजहों और आसपास के कई पहलुओं को इस फिल्म ने दर्शाया। भाजपा ने कैसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए इसे भड़काया और किस तरह भारतीय बड़े हिंदू-मुस्लिम किसानों के बल पर टिका हुआ टिकैत का भारतीय किसान यूनियन का यह इलाका सांप्रदायिक जनसंहार से गुजरा इसकी यह फिल्म शिनाख्त करती है। हिंदू महिलाओं की सुरक्षा और इज्जत के नाम पर हिंदुत्ववादी ताकतों ने सांप्रदायिक धु्रवीकरण किया, लेकिन इस फिल्म में महिलाएं इस झूठ का पर्दाफाश करते हुए कहती हैं कि मुसलमान तो अल्पसंख्यक हैं, उनकी हिम्मत छेड़छाड़ करने की आमतौर पर नहीं होती, छेड़छाड़ तो अपनी ही जाति-बिरादरी के पुरुष अधिक करते हैं। यह फिल्म दिखाती है कि सांप्रदायिक धु्रवीकरण ने दलितों को भी विभाजित किया है। लेकिन अभी भी दलितों का एक बड़ा हिस्सा और भारत नौजवान सभा जैसे संगठन सांप्रदायिकता का प्रतिरोध कर रहे हैं। 

आज बाबरी मस्जिद ध्वंस और डाॅ. अंबेडकर के स्मृति दिवस पर सांप्रदायिकता, दलित प्रश्न, महिलाओं के अधिकार आदि पर इन फिल्मों ने गंभीर बहसों को जन्म दिया। ‘मुजफ्फरनगर बाकी है’ पर भी गंभीर संवाद हुआ।

प्रेस कांफ्रेंस

देश मे निवेश करने जो आएगा वह मुनाफे के लिए आएगा : प्रो. आनंद तेलतुंबडे़

आज प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए राजनीतिक विश्लेषक प्रो. आनंद तेलतुंबड़े कहा कि इस देश में कोई निवेश करने आएगा तो अपने मुनाफे के लिए आएगा, वह हमें दान देने नहीं आएगा। एफडीआई और निवेश के नाम पर लोगों को सिर्फ बुद्धू बनाया जा रहा है। आजकल सड़कों पर तो फुटपाथ भी नहीं बनते, फ्लाईओवर बनते हैं और उसी को विकास बताया जा रहा है। मोदी के विकास और अच्छे दिन के दावों पर बोलते हुए प्रो. तेलतुंबड़े ने कहा कि ये आने वाली पीढि़यों पर बोझ लाद रहे हैं। हमें तो इस तरह का विकास चाहिए कि जनता में ताकत आए। उन्होंने सवाल किया कि शिक्षा और चिकित्सा दो बुनियादी मुद्दे हैं, इनके लिए सरकारों ने क्या किया है? चिकित्सा सेवा का सबसे ज्यादा निजीकरण हुआ है। प्राथमिक से लेकर उच्चशिक्षा तक का बाजारीकरण हो गया। बंबई के सारे म्युनिसिपल स्कूल एनजीओ के हवाले किए जा रहे हैं। देश के देहाती इलाके गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से पूरी तरह कट चुके हैं। उन्होंने यह भी सवाल किया कि चीन ने जैसा विकास किया है, क्या इंडिया वैसा कर पाएगा? वहां के शासकवर्ग और यहां के हरामखोरों मेें बहुत फर्क है। 

दलित आंदोलन पर बोलते हुए प्रो. तेलतुमड़े ने कहा कि दलितों में भी जातियां हैं। जो बड़ी आबादी वाली जातियां हैं, दलित आंदोलन का उन्हें ही ज्यादा फायदा हुआ है। दलित नेताओं के भीतर भी सत्ता की प्रतिस्पर्धा बड़ी है, जिसके कारण वे कभी कांग्रेस और भाजपा में जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा-आरएसएस की ओर से दलितों को एडाॅप्ट करने की लगातार कोशिश की जा रही है। अंबेडकरवादी सिद्धांतों की बात करने वाले जो नेता कांग्रेस या भाजपा में गए हैं, दलाली के सिवा उनकी कोई दूसरी राजनीति नहीं है। उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि यहां जो 18-19 प्रतिशत दलितों का वोट है, उसे ही ध्यान में रखकर कांशीराम ने अपनी राजनीति की थी। लेकिन बहुजन से सर्वजन करने पर दलितों में संदेह बढ़ा। उन्होंने कहा कि 1997 के बाद से आरक्षण की स्थिति बदली है, अब नौकरियां सात प्रतिशत घट गई हैं। शिक्षा के बाजारीकरण और निजीकरण ने जो सत्यानाश किया है, उसका नुकसान भी दलितों को हुआ है। आईआईटी के रिजर्वेशन की सीटें भर ही नहीं रही है। मुट्ठी भर दलित भले उपर पहुंच चुके हों। बड़ी आबादी को रिजर्वेशन से फायदा हो ही नहीं रहा है। इसके जरिए शासकवर्ग ने दलितों का अराजनीतिकरण किया है। 

बिहार के राजनीतिक महागठबंधन पर बोलते हुए कहा कि ये सभी जेपी के आंदोलन से निकले हुए हैं, ये कोई सही विकल्प नहीं हो सकते। इसके जरिए व्यवस्था भावी परिवर्तन को थोड़ा लंबा खींच सकती है। आज वामपंथ भले कमजोर लग रहा हो, लेकिन यह इतिहास का अंत नहीं है। क्योंकि नवउदारवाद का जो यह दौर है, वह मुट्ठी भर लोगों के लिए ही है। दुनिया में सात अरब लोग हैं। बहुसंख्यक आबादी की जरूरतें पूरी नहीं होगी, तो संघर्ष जरूर तेज होगा।

दलित उत्पीड़न बढ़ा है और अल्पसंख्यकों का जीना हराम हो गया है इस व्यवस्था में : प्रो. आनंद तेलतुमड़े




इस देश के शासवर्ग का चरित्र जनता के साथ धोखाधड़ी का है : प्रो. आनंद तेलतुमड़े

छठे पटना फिल्मोत्सव प्रतिरोध का सिनेमा की शुरुआत 


पटना: 5 दिसंबर 2014


'बोल की लब आजाद हैं तेरे’ इस आह्वान के साथ कालीदास रंगालय में छठे पटना फिल्मोत्सव प्रतिरोध का सिनेमा उद्घाटन हुआ। यह त्रिदिवसीय फिल्मोत्सव प्रसिद्ध चित्रकार जैनुल आबेदीन, कवि नवारुण भट्टाचार्य, गायिका बेगम अख्तर, अदाकारा जोहरा सहगल और कथाकार मधुकर सिंह की स्मृति को समर्पित है। 

फिल्मोत्सव का उद्घाटन महाराष्ट्र से पटना आए चर्चित राजनीतिक विश्लेषक, लेखक और सोशल एक्टिविस्ट प्रो. आनंद तेलतुमड़े ने किया। आनंद तेलतुमड़े ने कहा कि आज विकास का मतलब आदिवासियों, दलितों को उनकी जमीन से उखाड़ देना और कामगारों के अधिकारों को खत्म करना हो गया है। जो भी शासकवर्ग के इस विकास माॅडल का विरोध करता है या जो उत्पीडि़त जनता की बात करता है, उसे नक्सलवादी घोषित कर दिया जाता है। आज दलित महिलाओ पर बलात्कार की संख्या दुगुनी हो गई है। साल भर मे करीब चालीस हजार दलित उत्पीड़न की घटनाएं इस देश में होती हैं। महाराष्ट्र में एक दलित परिवार को टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया, बिहार में दलितों की हत्या करने वालों की हाईकोर्ट से रिहाई हो गई। और जो अल्पसंख्यक हैं, उनका तो इस देश में जीना हराम हो गया है। दिल्ली में चर्च जला दिया गया। इशरत जहां और उनके साथियों की फर्जी मुठभेड़ में हत्या हो या मालेगांव में हिंदूत्ववादियों द्वारा मुसलमानों का वेष धारण करके की गई कार्रवाई, ये मुसलमानों को आतंकवादी बताने की साजिश का नमूना है। उन्होंने कहा कि इसमें आरएसएस-बीजेपी की तो भूमिका है ही, कांग्रेस भी कम दोषी नहीं है, बल्कि भाजपा के उत्थान के लिए कांग्रेस ही जिम्मेवार है। 

प्रो. तेलतुमड़े ने कहा कि शुरू से ही इस देश के शासकवर्ग का चरित्र बेहद खतरनाक था। औपनिवेशिक शासकों ने जिनको सत्ता सौंपी, उनका इतिहास जनता के साथ धोखाधड़ी का इतिहास है। उभरते हुए पूँजीपति वर्ग न केवल संविधान निर्माण के दौरान धोखाधड़ी की, बल्कि नेहरू ने पंचवर्षीय योजना और समाजवाद का नाम लेकर पूँजीपतियों के हित में ही काम किया। सन् 1944 में देश के आठ पूंजीपतियों ने निवेश के लिए जो एक पंद्रह वर्षीय योजना बनाई थी, पंचवर्षीय योजना का प्रारूप वहीं से लिया गया था, वह सोवियत रूस की नकल नहीं था। देश में जो भूमि सुधार हुए, उसका मकसद भी भूमिहीन मेहनतकश किसानों के बीच जमीन को वितरित करना नहीं था, बल्कि उसका मकसद अमीर किसानों को पैदा करना था। 

अस्सी और नब्बे के दशक में नवउदारवादी भूमंडलीकरण की नीतियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसने समाज से व्यक्ति को अलहदा करके छोड़ दिया है। इसने खुद का स्वार्थ देखने और बाकी सबकुछ को बेमानी समझने के फलसफे को बढ़ावा दिया है। इसने जनता के प्रतिरोधी ताकत के प्रति आस्था को कमजोर किया है। हालांकि आज भी जनता में प्रतिरोध की भावनाएं जिंदा हैं। बेशक शासकवर्ग के प्रोपगैंडा को काउंटर करने लायक संसाधन प्रतिरोधी संस्कृतिकर्म में लगे लोगों के पास नहीं है, पर भी बहुत सारे लोग हैं, जिनकी इकट्ठी संख्या बहुत हो सकती है। ये अगर और रचनात्मक तरीके से जनता तक पहुंचे तो आज के माहौल को बदला जा सकता है। 

उन्होंने रामायण और महाभारत सीरियल का हवाला देते हुए कहा कि इनसे भी हिंदुत्व का असर बढ़ा। दिन-रात टीवी और मुख्यधारा के सिनेमा के जरिए जनता के बीच प्रचारित आत्मकेंद्रित और सांप्रदायिक जीवन मूल्यों की चर्चा करते हुए प्रो. तेलतुमड़े ने कहा कि जो आॅडियो-विजुअल माध्यम है, वह काफी पावरफुल माध्यम है, उसके जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक जाना होगा। प्रतिरोध का सिनेमा साल में एक ही दिन नहीं, बल्कि प्रतिदिन लोगों को दिखाना होगा। 

माइकल मूर की फिल्म 'फॉरेनहाईट 9/11' की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उसे देखने के लिए उन्हें लाइन में लगकर टिकट लेना पड़ा. पूरी फिल्म में दर्शकों का जबरदस्त रिस्पॉन्स देखने को मिला. उन्होंने बताया कि माइकल मूर का कहना है कि इस तरह की फिल्म को डाक्यूमेंट्री फिल्म कहना बंद होना चाहिए. वे चाहते हैं कि फिल्म से दर्शक अवसाद लेकर जाने के बजाए आक्रोश लेकर जाए. प्रो. तेलतुमड़े ने कहा कि हमें सामान्य दस्तावेजीकरण से आगे बढ़ना होगा. दर्शकों को आकर्षित करने के लिए रचनात्मक बातें इन फिल्मों में डालनी होगी. उन्होंने महान फ़िल्मकार गोदार के हवाले से कहा- don't make political film, make film politically.

प्रो. तेलतुमड़े ने क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय को लाल सलाम करते हुए उनके और जन संस्कृति मंच के साथ अपने पुराने जुड़ाव को याद किया। उन्होंने कहा कि पिछले चालीस वर्षों से उनका प्रतिरोधी जनांदोलनों से गहरा संबंध रहा है। 

उद्घाटन सत्र में डाॅ. सत्यजीत ने आयोजन समिति की ओर से स्वागत वक्तव्य दिया। मंच पर कवि आलोक धन्वा, डा. मीरा मिश्रा, प्रीति सिन्हा, कवयित्री प्रतिभा, रंग निर्देशक कुणाल, पत्रकार मणिकांत ठाकुर, कथाकार अशोक, प्रो. भारती एस कुमार, पत्रकार अग्निपुष्प, निवेदिता झा, दयाशंकर राय, अवधेश प्रीत, कवि अरुण शाद्वल, कथाकार अशोक, प्रतिरोध के सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी आदि मौजूद थे। संचालन संतोष झा ने किया। 
इस सत्र में डा. मीरा मिश्रा ने फिल्मोत्सव की स्मारिका का लोकार्पण किया. स्मारिका में बेगम अख्तर, जोहरा सहगल, जैनुल आबेदीन, नबारुण भट्टाचार्य और मधुकर सिंह पर स्मृति लेख हैं. 'तकनालाजी के नए दौर में सिनेमा देखने-दिखाने के नए तरीके और उनके मायने' नामक संजय जोशी का एक महत्वपूर्ण लेख भी इसमें है. 'फंड्री' और 'आँखों देखी' फिल्मों पर अतुल और मिहिर पंड्या को दो लेख भी इसको संग्रहणीय बनाते हैं.


राष्ट्र में दलितों की दशा को दर्शाया ‘फंड्री’ ने

‘फंड्री’ के साथ उठा छठे प्रतिरोध का सिनेमा पटना फिल्म फेस्टिवल का पर्दा 

‘फंड्री’ महाराष्ट्र के एक दलित समुदाय ‘कैकाडी’ द्वारा बोले जाने वाली बोली का शब्द है जिसका अर्थ सूअर होता है। फिल्म एक दलित लड़के जामवंत उर्फ जब्या (सोमनाथ अवघडे) की कहानी है जो किशोरवय का है और अपनी कक्षा में पढ़ने वाली एक उच्च जाति की लड़की शालू (राजेश्वरी खरात) से प्यार कर बैठा है। लेकिन यह प्रेम कहानी वाली फिल्म नहीं है, बल्कि इस फिल्म के गहरे सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ हैं। पृष्ठभूमि में दिख रही स्कूल की दीवारों पर बनी अम्बेडकर और सावित्रीबाई फुले की तस्वीरें हो या कक्षा में अंतिम पंक्ति में बैठने को मजबूर दलित बच्चे, अपने घर की दीवार पर ‘शुभ विवाह’ लिख रहा जब्या का परिवार हो या फिर स्कूल में डफली बजा रहा जब्या या फिर एक अन्य दृश्य जहाँ जब्या का परिवार सूअर उठाकर ले जाता रहता है, तब भी पृष्ठभूमि में दीवार पर दलित आन्दोलनों से जुड़े सभी अगुआ नेताओं की तस्वीरें नजर आती हैं। 

इस फिल्म में एक अविस्मरणीय दुश्य है। जब्या स्कूल जाने की जगह गाँव के सवर्णों के आदेश पर अपने परिवार के साथ सूअर पकड़ रहा होता है. तभी अचानक स्कूल में राष्ट्र-गान बजना शुरू हो जाता है। राष्ट्र-गान सुनकर पहले जब्या स्थिर खड़ा हो जाता है और फिर उसका पूरा परिवार। इस दृश्य के गहरे राजनीतिक अर्थ हैं कि कैसे हमारा शासक वर्ग राष्ट्रीय प्रतीकों और एक कल्पित राष्ट्र के सिद्धांत के बल पर देश के वंचित तबकों को बेवकूफ बनाकर रखे हुए है।

फंड्री सच्चे अर्थों में एक नव-यथार्थवादी फिल्म है जहाँ एक दलित फिल्मकार नागराज मंजुले ने बिना भव्य-नकली सेटों की मदद के असली लोकेशन पर फिल्म शूट की है। फिल्म में जब्या के बाप का किरदार कर रहे किशोर कदम को छोड़कर लगभग सभी किरदार नए हैं। सोमनाथ कोई मंजा हुआ अभिनेता नहीं है बल्कि महाराष्ट्र के एक गांव का दलित लड़का है जो अभी कक्षा 9 में पढ़़़ रहा है वहीं उसके दोस्त पिरया का किरदार कर रहा सूरज पवार सातवीं कक्षा का छात्र है। फिल्म मराठी में है लेकिन कई जगह दलित कैकाडी समुदाय की मराठी बोली का भी प्रयोग किया है। अभी तक मराठी फिल्म निर्माण में सवर्णों का ही दबदबा रहा है. कुछ लोग व्यंग्य से कह रहे हैं कि फंड्री और इसकी भाषा ने मराठी फिल्मों की ‘शुद्धता’ को ‘अपवित्र’ कर दिया है। 

फिल्म में सोमनाथ सहित दूसरे सभी किरदारों का अभिनय बहुत ही स्वाभाविक रहा है। फिल्म में जब्या और उसका दोस्त पिरया अभिनय करते नहीं बल्कि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जीते दिखते हैं। फिल्म में सोमनाथ ने डफली बजायी है और उसे वाकई डफली बजाना आता भी है। दरअसल फिल्मकार की मुलाकात सोमनाथ से भी तब ही हुई थी जब वह अपने गाँव के एक कार्यक्रम में डफली बजा रहा था। फंड्री में कैमरा और साउंड का काम भी बेहतरीन रहा है। नागराज मंजुले का कहना कि जब तक अलग-अलग समुदाय, खासकर वंचित समुदाय के लोगों को फिल्म इंडस्ट्री में जगह नहीं मिलेगी तब तक हमारा सिनेमा हमारे समाज का सही मायने में प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएगा। पिछले कुछ सालों में आए हिंदी के कथित प्रयोगधर्मी फिल्में फंड्री के आगे पानी भरते दिखती हैं। फंड्री सच्चे अर्थों में लोगों का सिनेमा है जिसकी हमारे समय में बहुत जरूरत है।


जैनुल आबेदीन की जन्म शताब्दी पर ‘अकाल की कला और भूख की राजनीति’ शीर्षक चित्र-प्रदर्शनी लगाई गई। 

कविता पोस्टर और किताबों और सीडी का स्टाॅल भी परिसर में मौजूद है

फिल्मोत्सव के मुख्य अतिथि आनंद तेलतुमड़े ने चित्रकार जैनुल आबेदीन की जन्म शताब्दी के अवसर पर आयोजित ‘अकाल की कला और भूख की राजनीति’ शीर्षक से उनके चित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। जैनुल आबेदीन का जन्म 9 दिसंबर 1914 को मैमन सिंह, जो अब बांग्ला देश में है, के किशोरगंज गांव में हुआ था। शासकवर्गीय कला आम लोगों की जिंदगी के जिस यथार्थ से मुंह फेर लेती है, उस यथार्थ को दर्शाने वाले चित्रकारों में चित्तो प्रसाद, कमरुल हसन, सोमनाथ होड़, रामकिंकर बैज, सादेकैन जैसे चित्रकारों की कतार में जैनुल आबेदीन भी शामिल थे। जैनुल आबेदीन ने बंगाल के अकाल पर चित्र बनाए थे। उनके ये चित्र अकाल की अमानवीय हकीकत से हमारा सामना कराते हैं, और यह भी दिखाते हैं कि यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव निर्मित ‘राजनीतिक’ अकाल है। उनके इन चित्रों में ड्राइंगरूम में लटकाने वाली सुदंरता नहीं मिलती, बल्कि सहस्राब्दियों में जो सभ्यता मनुष्यों ने बनाई है, उसकी सारी कुरूपताएं इनमें से झांकती हैं। किसी ने आबेदीन से पूछा कि उन्होंने अकाल को ही क्यों चित्रित किया, बाढ़ को क्यों नहीं? तो उनका जवाब था कि बाढ़ एक प्राकृतिक विपत्ति है, जबकि अकाल मानवनिर्मित है। उनका स्पष्ट तौर पर कहना था कि ‘कलाकार का असली काम मनुष्य के द्वारा मनुष्य के खिलाफ रचे जा रहे षड्यंत्र को उजागर करना है।’ यह और बात है कि हाल के वर्षों में हम मनुष्य द्वारा निर्मित बाढ़ से भी परिचित हो चुके हैं। 

जैनुल आबेदीन की चित्र प्रदर्शनी के अलावा फिल्मोत्सव के हाॅल के बाहर कविता पोस्टर भी प्रदर्शित किए गए हैं। कालीदास रंगालय का परिसर भी कलात्मक तौर पर सजाया गया है। परिसर में किताबों और सीडी का स्टाॅल भी लगाया गया है। 

कवि नवारुण भट्टाचार्य के जीवन और कविता पर फिल्म का प्रदर्शन हुआ 
आज फिल्मोत्सव का आकर्षण क्रांतिकारी कवि नवारुण भट्टाचार्य के जीवन और कविता पर पावेल द्वारा निर्देशित फिल्म ‘ए मृत्युउपत्यका जार देश ना’ भी थी। यह इस फिल्म का भारतीय प्रीमियर था। इस फिल्म से पहले प्रेस कांफ्रंेस को संबोधित करते हुए पावेल ने कहा कि नवारुण से उनका ताल्लुक छात्र जीवन से ही हो गया था। नंदीग्राम और सिंगूर में जो जनता का आंदोलन था, उसके साथ नवारुण ने उन्हें जोड़ा। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने नवारुण के अंतिम कविता संग्रह ‘बुलेटप्रूफ कविता’ का डिजाइन और प्रकाशन किया। उन्होंने कहा कि नवारुण को उनके पिता ने कहा था कि लेखक बनना पर पैसे के लिए मत लिखना। आज जो कारपोरेट पूंजी 200 फिल्में बना रही हैं, उसकी तुलना में 20 फिल्में भी अगर वैकल्पिक या प्रतिरोधी फिल्मकारों की ओर से बनाई जाई तो उनका मुकाबला किया जा सकता है। पावेल ने कहा कि नवारुण का धनी प्रकाशकों से हमेशा टकराव रहा, उन्होंने पद-प्रतिष्ठा को भी ठुकराया, लेकिन उनकी किताबें इतनी पढ़ी जाती थी कि एक दौर में आनंद बाजार पत्रिका अखबार उनके उद्धरण छापने लगा था, क्योंकि वे उसे अपनी रचनाएं नहीं देते थे। पावेल ने कहा कि जो वैकल्पिक सिनेमा है वही भविष्य का सिनेमा है। जो क्षेत्रीय सिनेमा है, वह भी घाटे में जा रहा है, क्योंकि वह मुंबइया फिल्मों का वल्गर संस्करण होकर रह गया है।